शान्ति पर्व · अध्याय 255
सत्त्व और क्षेत्रज्ञ; ज्ञानी की निर्भयता
व्यास बताते हैं कि सत्त्व मकड़ी के जाले की तरह गुणों को रचता है, जबकि क्षेत्रज्ञ उदासीन स्वामी की तरह देखता रहता है। इसे समझने वाला क्रोध और ईर्ष्या से मुक्त होकर विचरता है, हृदय की गाँठ पार कर लेता है और उस ठोस भूमि पर चलता है जहाँ अज्ञानी संसार की नदी में छटपटाते हैं। आत्मज्ञान और शान्ति ही ब्राह्मण के जन्म का सच्चा फल है; ज्ञानी को कोई बड़ा भय नहीं रहता, वह किसी बात पर शोक नहीं करता और अपने कर्म से बँधता नहीं।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (12.255.1)
सृजते त्रिगुणान्सत्वं क्षेत्रज्ञस्त्वधितिष्ठति । गुणान्विक्रियते सर्वानुदासीनवदीश्वरः ॥
sṛjate triguṇānsatvaṃ kṣetrajñastvadhitiṣṭhati | guṇānvikriyate sarvānudāsīnavadīśvaraḥ
सत्त्व तीनों गुणों को रचता है और क्षेत्रज्ञ उस पर अधिष्ठित रहता है। उदासीन स्वामी की तरह वह सब गुणों के बदलते रहने पर उनके ऊपर स्थित रहता है।
श्लोक 2 (12.255.2)
स्वभावयुक्तं तत्सत्वं यदिमान्सृजते गुणान् । ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं सृजते तन्तुवद्गुणान् ॥
svabhāvayuktaṃ tatsatvaṃ yadimānsṛjate guṇān | ūrṇanābhiryathā sūtraṃ sṛjate tantuvadguṇān
स्वभाव से युक्त वह सत्त्व ही इन गुणों को रचता है, जैसे मकड़ी अपना सूत्र रचती है, वैसे ही वह तन्तुओं की तरह गुणों को रचता है।
श्लोक 3 (12.255.3)
प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते प्रवृत्तिर्नोपलभ्यते । एवमेके व्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे ॥
pradhvastā na nivartante pravṛttirnopalabhyate | evameke vyavasyanti nivṛttiriti cāpare
एक बार नष्ट हो जाने पर वे लौटते नहीं और फिर कोई प्रवृत्ति दिखाई नहीं देती। कुछ लोग ऐसा निश्चय करते हैं और दूसरे इसे निवृत्ति कहते हैं।
श्लोक 4 (12.255.4)
उभयं संप्रधार्यैतदध्यवस्येद्यथामति । अनेनैव विधानेन भवेद्गर्भशयो महान् ॥
ubhayaṃ saṃpradhāryaitadadhyavasyedyathāmati | anenaiva vidhānena bhavedgarbhaśayo mahān
दोनों मतों पर विचार करके वह अपनी बुद्धि के अनुसार निश्चय करे; इसी विधि से वह गर्भ में शयन करने वाला महान् हो सकता है।
श्लोक 5 (12.255.5)
अनादिनिधनं नित्यं तं बुद्ध्वा विचरेन्नरः । अक्रुध्यन्नप्रहृष्यंश्च नित्यं विगतमत्सरः ॥
anādinidhanaṃ nityaṃ taṃ buddhvā vicarennaraḥ | akrudhyannaprahṛṣyaṃśca nityaṃ vigatamatsaraḥ
जो अनादि, अनन्त और नित्य है, उसे समझकर मनुष्य क्रोधरहित, हर्षरहित और सदा मत्सरमुक्त होकर विचरे।
श्लोक 6 (12.255.6)
इत्येवं हृदयग्रन्थिं बुद्धिचिन्तामयं दृढम् । अतीत्य सुखमासीत अशोचंश्छिन्नसंशयः ॥
ityevaṃ hṛdayagranthiṃ buddhicintāmayaṃ dṛḍham | atītya sukhamāsīta aśocaṃśchinnasaṃśayaḥ
इस प्रकार बुद्धि की चिन्ताओं से बनी हुई हृदय की दृढ़ गाँठ को पार करके वह शोकरहित और संशयमुक्त होकर सुख से बैठे।
श्लोक 7 (12.255.7)
ताम्येयुः प्रच्युताः पृथ्व्यां यथा पूर्णां नदीं नराः । अवगाढा ह्यविद्वांसो विद्धि लोकमिमं तथा ॥
tāmyeyuḥ pracyutāḥ pṛthvyāṃ yathā pūrṇāṃ nadīṃ narāḥ | avagāḍhā hyavidvāṃso viddhi lokamimaṃ tathā
जैसे सूखी भूमि से फिसलकर भरी हुई नदी में गिरे हुए मनुष्य कष्ट पाते हैं, वैसे ही इस लोक को उन अज्ञानियों के लिए जानो जो इसमें डूब गए हैं।
श्लोक 8 (12.255.8)
न तु ताम्यति वै विद्वान्स्थले चरति तत्त्ववित् । एवं यो विन्दतेऽऽत्मानं केवलं ज्ञानमात्मनः ॥
na tu tāmyati vai vidvānsthale carati tattvavit | evaṃ yo vindate''tmānaṃ kevalaṃ jñānamātmanaḥ
पर तत्त्व जानने वाला विद्वान् कष्ट नहीं पाता; वह स्थल पर चलता है। ऐसा ही वह है जो आत्मा को पा लेता है, जो आत्मा का केवल ज्ञान है।
श्लोक 9 (12.255.9)
एवं बुद्ध्वा नरः सर्वं भूतानामागतिं गतिम् । समवेक्ष्य च वैषम्यं लभते शममुत्तमम् ॥
evaṃ buddhvā naraḥ sarvaṃ bhūtānāmāgatiṃ gatim | samavekṣya ca vaiṣamyaṃ labhate śamamuttamam
यह सब जानकर मनुष्य प्राणियों के आने-जाने को देखकर और उनकी विषमता पर विचार करके परम शान्ति प्राप्त करता है।
श्लोक 10 (12.255.10)
एतद्वै जन्मसामर्थ्यं ब्राह्मणस्य विशेषतः । आत्मज्ञानं शमश्चैव पर्याप्तं तत्परायणम् ॥
etadvai janmasāmarthyaṃ brāhmaṇasya viśeṣataḥ | ātmajñānaṃ śamaścaiva paryāptaṃ tatparāyaṇam
जन्म का यही वास्तविक सामर्थ्य है, विशेषकर ब्राह्मण का: आत्मज्ञान और शम। यही पर्याप्त है, यही परम आश्रय है।
श्लोक 11 (12.255.11)
एतद्बुद्ध्वा भवेद्बुद्धः किमन्यद्बुद्धलक्षणम् । विज्ञायैतद्विमुच्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ॥
etadbuddhvā bhavedbuddhaḥ kimanyadbuddhalakṣaṇam | vijñāyaitadvimucyante kṛtakṛtyā manīṣiṇaḥ
इसे जानकर मनुष्य बुद्ध हो जाता है; बुद्ध का और क्या लक्षण है? इसे जानकर कृतकृत्य ज्ञानी मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 12 (12.255.12)
न भवति विदुषां महद्भयं । यदविदुषां सुमहद्भयं परत्र । न हि गतिरधिकाऽस्ति कस्यचि । द्भवति हि या विदुषः सनातनी ॥
na bhavati viduṣāṃ mahadbhayaṃ | yadaviduṣāṃ sumahadbhayaṃ paratra | na hi gatiradhikā'sti kasyaci | dbhavati hi yā viduṣaḥ sanātanī
विद्वानों को वह महान् भय नहीं होता जो अज्ञानियों को परलोक में बहुत बड़ा होता है। जो सनातन गति ज्ञानी को मिलती है, उससे ऊँची गति किसी की नहीं है।
श्लोक 13 (12.255.13)
लोकमातुरमसूयते जन । स्तत्तदेव च निरीक्ष्य शोचते । तत्र पश्य कुशलानशोचतो । ये विदुस्तदुभयं कृताकृतम् ॥
lokamāturamasūyate jana | stattadeva ca nirīkṣya śocate | tatra paśya kuśalānaśocato | ye vidustadubhayaṃ kṛtākṛtam
मनुष्य दुःख से पीड़ित संसार की निन्दा करता है और तरह-तरह की बातें देखकर शोक करता है। वहाँ उन कुशल पुरुषों को देखो जो शोक नहीं करते, जो कृत और अकृत दोनों को जानते हैं।
श्लोक 14 (12.255.14)
यत्करोत्यनभिसन्धिपूर्वकं । तच्च निर्णुदति यत्पुरा कृतम् । न प्रियं तदुभयं न चाप्रिय । तस्य तज्जनयतीह कुर्वतः ॥
yatkarotyanabhisandhipūrvakaṃ | tacca nirṇudati yatpurā kṛtam | na priyaṃ tadubhayaṃ na cāpriya | tasya tajjanayatīha kurvataḥ
जो कर्म वह बिना पूर्व संकल्प के करता है, वह पहले किए हुए कर्म को भी हटा देता है। इस प्रकार कर्म करने वाले के लिए वह कर्म न प्रिय को उत्पन्न करता है न अप्रिय को, दोनों में से किसी को नहीं।