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शान्ति पर्व · अध्याय 256

परम धर्म: मन पर विजय

शुक उस धर्म के बारे में पूछते हैं जिससे ऊँचा कोई धर्म नहीं, और व्यास उत्तर देते हैं कि मन और इन्द्रियों की एकाग्रता ही परम तप और श्रेष्ठ धर्म है। इन्द्रियाँ समेट ली जाने पर साधक आत्मा को देख पाता है। व्यास संसार को एक भयानक नदी बताते हैं जिसे धैर्यवान् लोग बुद्धि से पार करते हैं, कहते हैं कि प्राणियों को पर्वत की चोटी से देखो, और अन्त में बताते हैं कि यह उपदेश किसे दिया जाए।

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शुक उवाच

श्लोक 1 (12.256.1)

यस्माद्धर्मात्परो धर्मो विद्यते नेह कश्चन । यो विशिष्टश्च धर्मेभ्यस्तं भवान्प्रब्रवीतु मे ॥

yasmāddharmātparo dharmo vidyate neha kaścana | yo viśiṣṭaśca dharmebhyastaṃ bhavānprabravītu me

जिस धर्म से ऊँचा यहाँ कोई दूसरा धर्म नहीं है और जो सब धर्मों में श्रेष्ठ है, उसे आप मुझे बताइए।

व्यास उवाच

श्लोक 2 (12.256.2)

धर्मं ते संप्रवक्ष्यामि पुराणमृषिसंस्तुतम् । विशिष्टं सर्वधर्मेभ्यस्तमिहैकमनाः शृणु ॥

dharmaṃ te saṃpravakṣyāmi purāṇamṛṣisaṃstutam | viśiṣṭaṃ sarvadharmebhyastamihaikamanāḥ śṛṇu

मैं तुम्हें वह धर्म बताऊँगा जो प्राचीन है, ऋषियों द्वारा प्रशंसित है और सब धर्मों में श्रेष्ठ है। उसे एकाग्र मन से सुनो।

श्लोक 3 (12.256.3)

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि बुद्ध्या संयम्य यत्नतः । सर्वतो निष्पतिष्णूनि पिता बालानिवात्मजान् ॥

indriyāṇi pramāthīni buddhyā saṃyamya yatnataḥ | sarvato niṣpatiṣṇūni pitā bālānivātmajān

उपद्रवी और चारों ओर भागने वाली इन्द्रियों को बुद्धि से प्रयत्नपूर्वक रोककर, जैसे पिता अपने छोटे पुत्रों को रोकता है,

श्लोक 4 (12.256.4)

मनसश्चेन्द्रियाणां चाप्यैकाग्र्यं परमं तपः । तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः पर उच्यते ॥

manasaścendriyāṇāṃ cāpyaikāgryaṃ paramaṃ tapaḥ | tajjyāyaḥ sarvadharmebhyaḥ sa dharmaḥ para ucyate

मन और इन्द्रियों की एकाग्रता परम तप है; वह सब धर्मों से श्रेष्ठ है और वही परम धर्म कहा जाता है।

श्लोक 5 (12.256.5)

तानि सर्वाणि संधाय मनःषष्ठानि मेधया । आत्मतृप्त इवासीत बहुचिन्त्यमचिन्तयन् ॥

tāni sarvāṇi saṃdhāya manaḥṣaṣṭhāni medhayā | ātmatṛpta ivāsīta bahucintyamacintayan

विवेक से इन सब इन्द्रियों को, मन को छठा लेकर, एकत्र करके वह आत्मा में तृप्त-सा बैठे और चिन्तन योग्य बहुत-सी बातों का चिन्तन न करे।

श्लोक 6 (12.256.6)

गोचरेभ्यो निवृत्तानि यदा स्थास्यन्ति वेश्मनि । तदा त्वमात्मनाऽऽत्मानं परं द्रक्ष्यसि शाश्वतम् ॥

gocarebhyo nivṛttāni yadā sthāsyanti veśmani | tadā tvamātmanā''tmānaṃ paraṃ drakṣyasi śāśvatam

जब अपने चरागाहों से लौटी हुई वे अपने घर में टिक जाएँगी, तब तुम आत्मा के द्वारा परम और शाश्वत आत्मा को देखोगे।

श्लोक 7 (12.256.7)

सर्वात्मानं महात्मानं विधूममिव पावकम् । तं पश्यन्ति महात्मानो ब्राह्मणा ये मनीषिणः ॥

sarvātmānaṃ mahātmānaṃ vidhūmamiva pāvakam | taṃ paśyanti mahātmāno brāhmaṇā ye manīṣiṇaḥ

जो सबका आत्मा है, महान् आत्मा है, धूमरहित अग्नि के समान है, उसे महात्मा लोग, जो विवेकी ब्राह्मण हैं, देखते हैं।

श्लोक 8 (12.256.8)

यथा पुष्पफलोपेतो बहुशाखो महाद्रुमः । आत्मनो नाभिजानीते क्व मे पुष्पं क्व मे फलम् ॥

yathā puṣpaphalopeto bahuśākho mahādrumaḥ | ātmano nābhijānīte kva me puṣpaṃ kva me phalam

जैसे फूलों और फलों से लदा, बहुत शाखाओं वाला महावृक्ष अपने बारे में नहीं जानता कि मेरा फूल कहाँ है और मेरा फल कहाँ।

श्लोक 9 (12.256.9)

एवमात्मा न जानीते क्व गमिष्ये कुतस्त्वहम् । अन्यो ह्यत्रान्तरात्माऽस्ति यः सर्वमनुपश्यति ॥

evamātmā na jānīte kva gamiṣye kutastvaham | anyo hyatrāntarātmā'sti yaḥ sarvamanupaśyati

इसी प्रकार जीवात्मा नहीं जानता कि मैं कहाँ जाऊँगा और मैं कहाँ से आया हूँ। पर यहाँ एक दूसरा अन्तरात्मा है जो सब कुछ देखता है।

श्लोक 10 (12.256.10)

ज्ञानदीपेन दीप्तेन पश्यत्यात्मानमात्मना । दृष्ट्वा त्वमात्मनाऽऽत्मानं निरात्मा भव सर्ववित् ॥

jñānadīpena dīptena paśyatyātmānamātmanā | dṛṣṭvā tvamātmanā''tmānaṃ nirātmā bhava sarvavit

प्रज्वलित ज्ञान-दीप से आत्मा को आत्मा के द्वारा देखा जाता है। आत्मा को आत्मा से देखकर तुम निरात्मा और सर्वज्ञ बन जाओ।

श्लोक 11 (12.256.11)

विमुक्तः सर्वपापेभ्यो विमुक्तत्वगिवोरगः । परां बुद्धिमवाप्येह विपाप्मा विगतज्वरः ॥

vimuktaḥ sarvapāpebhyo vimuktatvagivoragaḥ | parāṃ buddhimavāpyeha vipāpmā vigatajvaraḥ

केंचुल छोड़े साँप की तरह सब पापों से मुक्त होकर, यहीं परम बुद्धि पाकर, पापरहित और ज्वररहित होकर,

श्लोक 12 (12.256.12)

सर्वतः प्रवहां घोरां नदीं लोकप्रवाहिनीम् । पञ्चेन्द्रियग्राहवतीं मनःसंकल्परोधसम् ॥

sarvataḥ pravahāṃ ghorāṃ nadīṃ lokapravāhinīm | pañcendriyagrāhavatīṃ manaḥsaṃkalparodhasam

चारों ओर बहने वाली, भयानक, लोकों को बहा ले जाने वाली नदी को, जिसके ग्राह पाँच इन्द्रियाँ हैं और जिसके तट मन के संकल्प हैं,

श्लोक 13 (12.256.13)

लोभमोहतृणच्छन्नां कामक्रोधसरीसृपाम् । सत्यतीर्थानृतक्षोभां क्रोधपङ्कां सरिद्वराम् ॥

lobhamohatṛṇacchannāṃ kāmakrodhasarīsṛpām | satyatīrthānṛtakṣobhāṃ krodhapaṅkāṃ saridvarām

जो लोभ और मोह रूपी तिनकों से ढकी है, काम और क्रोध रूपी सर्पों वाली है, जिसके घाट सत्य हैं और जिसकी हलचल असत्य है, जिसका कीचड़ क्रोध है, उस श्रेष्ठ नदी को,

श्लोक 14 (12.256.14)

अव्यक्तप्रभवां शीघ्रां दुस्तरामकृतात्मभिः । प्रतरस्व नदीं बुद्ध्या कामग्राहसमाकुलाम् ॥

avyaktaprabhavāṃ śīghrāṃ dustarāmakṛtātmabhiḥ | pratarasva nadīṃ buddhyā kāmagrāhasamākulām

जो अव्यक्त से उत्पन्न है, तेज बहने वाली है, अजितात्माओं के लिए दुस्तर है और कामरूपी ग्राहों से भरी है, उस नदी को बुद्धि से पार करो।

श्लोक 15 (12.256.15)

संसारसागरगमां योनिपातालदुस्तराम् । आत्मजन्मोद्भवां तात जिह्वावर्तां दुरासदाम् ॥

saṃsārasāgaragamāṃ yonipātāladustarām | ātmajanmodbhavāṃ tāta jihvāvartāṃ durāsadām

जो संसार रूपी समुद्र की ओर बहती है, योनि रूपी पाताल के कारण दुस्तर है, जो आत्मा के जन्म से उत्पन्न होती है, हे तात, और जिह्वा रूपी भँवरों वाली तथा अगम्य है,

श्लोक 16 (12.256.16)

यां तरन्ति कृतप्रज्ञा धृतिमन्तो मनीषिणः । तां तीर्णः सर्वतोमुक्तो विधूतात्माऽऽत्मविच्छुचिः ॥

yāṃ taranti kṛtaprajñā dhṛtimanto manīṣiṇaḥ | tāṃ tīrṇaḥ sarvatomukto vidhūtātmā''tmavicchuciḥ

जिसे दृढ़ प्रज्ञा वाले धैर्यवान् ज्ञानी पार करते हैं। उसे पार कर सब ओर से मुक्त, शुद्ध आत्मा वाला, आत्मज्ञानी और पवित्र होकर,

श्लोक 17 (12.256.17)

उत्तमां बुद्धिमास्थाय ब्रह्मभूयं भविष्यसि । संतीर्णः सर्वसंक्लेशान्प्रसन्नात्मा विकल्मषः ॥

uttamāṃ buddhimāsthāya brahmabhūyaṃ bhaviṣyasi | saṃtīrṇaḥ sarvasaṃkleśānprasannātmā vikalmaṣaḥ

उत्तम बुद्धि का आश्रय लेकर तुम ब्रह्मभाव को प्राप्त करोगे, सब क्लेशों को पार कर, प्रसन्नचित्त और निष्कलंक होकर।

श्लोक 18 (12.256.18)

भूमिष्ठानीव भूतानि पर्वतस्थो निशामय । अक्रुध्यन्नप्रहृष्यंश्च अनृशंसमतिस्तथा ॥

bhūmiṣṭhānīva bhūtāni parvatastho niśāmaya | akrudhyannaprahṛṣyaṃśca anṛśaṃsamatistathā

पर्वत पर खड़े होकर प्राणियों को ऐसे देखो मानो वे नीचे भूमि पर खड़े हों, क्रोधरहित, हर्षरहित और दयालु मन से।

श्लोक 19 (12.256.19)

ततो द्रक्ष्यसि सर्वेषां भूतानां प्रभवाप्ययौ । एनं वै सर्वभूतेभ्यो विशिष्टं मेनिरे बुधाः । धर्मं धर्मभृतां श्रेष्ठा मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ॥

tato drakṣyasi sarveṣāṃ bhūtānāṃ prabhavāpyayau | enaṃ vai sarvabhūtebhyo viśiṣṭaṃ menire budhāḥ | dharmaṃ dharmabhṛtāṃ śreṣṭhā munayastattvadarśinaḥ

तब तुम सब प्राणियों की उत्पत्ति और लय को देखोगे। इसे ज्ञानियों ने सब से श्रेष्ठ माना है; तत्त्वदर्शी मुनि, जो धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ हैं, इसी को धर्म कहते हैं।

श्लोक 20 (12.256.20)

आत्मनो व्यापिनो ज्ञानमिदं पुत्रानुशासनम् । प्रयताय प्रवक्तव्यं हितायानुगताय च ॥

ātmano vyāpino jñānamidaṃ putrānuśāsanam | prayatāya pravaktavyaṃ hitāyānugatāya ca

सर्वव्यापी आत्मा का यह ज्ञान, पुत्र को दिया जाने वाला यह उपदेश, संयमी, हितैषी और अनुगत को बताना चाहिए।

श्लोक 21 (12.256.21)

आत्मज्ञानमिदं गुह्यं सर्वगुह्यतमं महत् । अब्रुवं यदहं तात आत्मसाक्षिकमञ्जसा ॥

ātmajñānamidaṃ guhyaṃ sarvaguhyatamaṃ mahat | abruvaṃ yadahaṃ tāta ātmasākṣikamañjasā

यह आत्मज्ञान गुप्त है, सब गुप्त बातों में सबसे गुप्त और महान् है। तात, मैंने इसे आत्मा को साक्षी मानकर तुम्हें सीधे-सीधे कह दिया।

श्लोक 22 (12.256.22)

नैव स्त्री न पुमानेतन्नैव चेदं नपुंसकम् । अदुःखमसुखं ब्रह्म भूतभव्यभवात्मकम् ॥

naiva strī na pumānetannaiva cedaṃ napuṃsakam | aduḥkhamasukhaṃ brahma bhūtabhavyabhavātmakam

यह न स्त्री है, न पुरुष और न नपुंसक। यह ब्रह्म है, जो दुःख और सुख से रहित है और भूत, भविष्य तथा वर्तमान जिसका स्वरूप है।

श्लोक 23 (12.256.23)

नैतज्ज्ञात्वा पुमान्स्त्री वा पुनर्भवमवाप्नुते । स्वभावप्रतिपत्त्यर्थमेतद्धर्मं विधीयते ॥

naitajjñātvā pumānstrī vā punarbhavamavāpnute | svabhāvapratipattyarthametaddharmaṃ vidhīyate

इसे जानकर न पुरुष न स्त्री फिर जन्म पाता है। यह धर्म अपने स्वरूप की प्राप्ति के लिए विहित है।

श्लोक 24 (12.256.24)

यथा मतानि सर्वाणि तथैतानि यथातथा । कथितानि मया पुत्र भवन्ति न भवन्ति च ॥

yathā matāni sarvāṇi tathaitāni yathātathā | kathitāni mayā putra bhavanti na bhavanti ca

सभी मत ऐसे ही हैं; ये भी वैसे ही हैं, चाहे जैसे हों। बेटा, मैंने जो कहा है, वह किसी अर्थ में है और किसी अर्थ में नहीं है।

श्लोक 25 (12.256.25)

तत्प्रीतियुक्तेन गुणान्वितेन । पुत्रेण सत्पुत्र दमान्वितेन । पृष्टो हि संप्रीतिमना यथार्थं । ब्रूयात्सुतस्येह यदुक्तमेतत् ॥

tatprītiyuktena guṇānvitena | putreṇa satputra damānvitena | pṛṣṭo hi saṃprītimanā yathārthaṃ | brūyātsutasyeha yaduktametat

इसलिए प्रेम और सद्गुणों से युक्त, संयमी, हे सत्पुत्र, ऐसे पुत्र के पूछने पर पिता प्रसन्न मन से पुत्र को यहाँ कही हुई यह बात यथार्थ रूप में बताए।

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