शान्ति पर्व · अध्याय 257
कामना से मुक्ति: सच्चा ब्राह्मण
व्यास कहते हैं कि विद्या, यज्ञ और सर्वज्ञता से भी जब तक कामना रहती है, मनुष्य ब्राह्मण नहीं बनता, क्योंकि कामना ही एकमात्र बन्धन है; जो किसी से नहीं डरता, किसी से द्वेष नहीं करता और कुछ नहीं चाहता, वह ब्रह्म हो जाता है। जैसे जल भरे हुए समुद्र में समा जाता है और उसे क्षुब्ध नहीं करता, वैसे ही सारी कामनाएँ मुनि में समा जाती हैं और वह शान्ति पाता है। फिर वे वेद से शम तक के रहस्यार्थों की शृंखला, शान्त ज्ञानी के छह लक्षण और आत्मा के द्वार बन्द कर लेने वाले के सुख का वर्णन करते हैं, जिसे बुढ़ापा और मृत्यु नहीं पाते।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (12.257.1)
गन्धान्रसान्नानुरुन्ध्यात्सुखं वा । नालंकारांश्चाप्नुयात्तस्य तस्य । मानं च कीर्तिं च यशश्च नेच्छेत् । स वै प्रचारः पश्यतो ब्राह्मणस्य ॥
gandhānrasānnānurundhyātsukhaṃ vā | nālaṃkārāṃścāpnuyāttasya tasya | mānaṃ ca kīrtiṃ ca yaśaśca necchet | sa vai pracāraḥ paśyato brāhmaṇasya
वह गन्धों और रसों में, या सुख में न फँसे; किसी प्रकार के आभूषण न अपनाए; मान, कीर्ति और यश की इच्छा न करे। यही देखने वाले ब्राह्मण का आचरण है।
श्लोक 2 (12.257.2)
सर्वान्वेदानधीयीत शुश्रूषुर्ब्रह्मचर्यवान् । ऋचो यजूंषि सामानि वेदवेदाङ्गपारगः ॥
sarvānvedānadhīyīta śuśrūṣurbrahmacaryavān | ṛco yajūṃṣi sāmāni vedavedāṅgapāragaḥ
वह सब वेदों का अध्ययन करे, गुरु की सेवा करने वाला और ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला हो: ऋक्, यजुः और साम के मन्त्रों में, और वेद तथा वेदांगों में पारंगत।
श्लोक 3 (12.257.3)
ज्ञानी यः सर्वभूतानां सर्ववित्सर्वभूतवित् । नाकामो म्रियते जातु न तेन न च ब्राह्मणः ॥
jñānī yaḥ sarvabhūtānāṃ sarvavitsarvabhūtavit | nākāmo mriyate jātu na tena na ca brāhmaṇaḥ
जो सब प्राणियों के विषय में ज्ञानी है, सब कुछ जानता है, सब प्राणियों को जानता है, फिर भी कामना से रहित होकर कभी नहीं मरता, वह इससे ब्राह्मण नहीं हो जाता।
श्लोक 4 (12.257.4)
इष्टीश्च विविधाः प्राप्य क्रतूंश्चैवाप्तदक्षिणान् । प्राप्नोति नैव ब्राह्मण्यमविज्ञानात्कथंचन ॥
iṣṭīśca vividhāḥ prāpya kratūṃścaivāptadakṣiṇān | prāpnoti naiva brāhmaṇyamavijñānātkathaṃcana
मनुष्य अनेक प्रकार की इष्टियाँ और पूर्ण दक्षिणा वाले यज्ञ कर ले, फिर भी अज्ञान के कारण वह किसी प्रकार ब्राह्मणत्व नहीं पाता।
श्लोक 5 (12.257.5)
यदा चायं न बिभेति यदा चास्मान्न बिभ्यति । यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म संपद्यते तदा ॥
yadā cāyaṃ na bibheti yadā cāsmānna bibhyati | yadā necchati na dveṣṭi brahma saṃpadyate tadā
जब वह किसी से नहीं डरता और कोई उससे नहीं डरता, जब वह न इच्छा करता है न द्वेष, तब वह ब्रह्म हो जाता है।
श्लोक 6 (12.257.6)
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म संपद्यते तदा ॥
yadā na kurute bhāvaṃ sarvabhūteṣu pāpakam | karmaṇā manasā vācā brahma saṃpadyate tadā
जब वह कर्म, मन या वाणी से किसी प्राणी के प्रति पापभाव नहीं रखता, तब वह ब्रह्म हो जाता है।
श्लोक 7 (12.257.7)
कामबन्धनमेवेदं नान्यदस्तीह बन्धनम् । कामबन्धनमुक्तो हि ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
kāmabandhanamevedaṃ nānyadastīha bandhanam | kāmabandhanamukto hi brahmabhūyāya kalpate
यह कामना का ही बन्धन है; यहाँ दूसरा कोई बन्धन नहीं। कामना के बन्धन से मुक्त होकर मनुष्य ब्रह्मभाव के योग्य हो जाता है।
श्लोक 8 (12.257.8)
कामतो मुच्यमानस्तु धूमाभ्रादिव चन्द्रमाः । विरजाः कालमाकाङ्क्षन्धीरो धैर्येण वर्तते ॥
kāmato mucyamānastu dhūmābhrādiva candramāḥ | virajāḥ kālamākāṅkṣandhīro dhairyeṇa vartate
कामना से छूटा हुआ, धुएँ जैसे बादल से निकले चन्द्रमा की तरह निर्मल, अपने समय की प्रतीक्षा करता हुआ धीर पुरुष धैर्य से रहता है।
श्लोक 9 (12.257.9)
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं । समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे । स शान्तिमाप्नोति न कामकामः ॥
āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṃ | samudramāpaḥ praviśanti yadvat | tadvatkāmā yaṃ praviśanti sarve | sa śāntimāpnoti na kāmakāmaḥ
जैसे जल पूर्ण और अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही जिसमें सारी कामनाएँ प्रवेश करती हैं, वह शान्ति पाता है; कामनाओं की कामना करने वाला नहीं।
श्लोक 10 (12.257.10)
स कामकान्तो न तु कामकामः । स वै कामात्स्वर्गमुपैति देही ॥
sa kāmakānto na tu kāmakāmaḥ | sa vai kāmātsvargamupaiti dehī
वह कामनाओं का प्रिय है, कामनाओं की कामना करने वाला नहीं; वह देहधारी कामना से स्वर्ग को जाता है।
श्लोक 11 (12.257.11)
वेदस्योपनिषद्दानं दानस्योपनिषद्दमः । दमस्योपनिषद्दानं दानस्योपनिषत्तपः ॥
vedasyopaniṣaddānaṃ dānasyopaniṣaddamaḥ | damasyopaniṣaddānaṃ dānasyopaniṣattapaḥ
वेद का रहस्य दान है; दान का रहस्य दम है; दम का रहस्य दान है; और दान का रहस्य तप है।
श्लोक 12 (12.257.12)
तपसोपनिषत्त्यागस्त्यागस्योपनिषत्सुखम् । सुखस्योपनिषत्स्वर्गः स्वर्गस्योपनिषच्छमः ॥
tapasopaniṣattyāgastyāgasyopaniṣatsukham | sukhasyopaniṣatsvargaḥ svargasyopaniṣacchamaḥ
तप का रहस्य त्याग है; त्याग का सुख; सुख का स्वर्ग; और स्वर्ग का रहस्य शम है।
श्लोक 13 (12.257.13)
क्लेदनं शोकमनसोः संतीर्णं तृष्णया सह । सत्वमृच्छति संतोषाच्छान्तिलक्षणमुत्तमम् ॥
kledanaṃ śokamanasoḥ saṃtīrṇaṃ tṛṣṇayā saha | satvamṛcchati saṃtoṣācchāntilakṣaṇamuttamam
शोक और मन की आर्द्रता को तृष्णा के साथ पार करके मनुष्य सन्तोष से उस सत्त्व को पाता है जो शान्ति का परम लक्षण है।
श्लोक 14 (12.257.14)
विशोको निर्ममः शांतः प्रशांतात्माऽत्मविच्छुचिः । षड्भिर्लक्षणवानेतैः समग्रः पुनरेष्यति ॥
viśoko nirmamaḥ śāṃtaḥ praśāṃtātmā'tmavicchuciḥ | ṣaḍbhirlakṣaṇavānetaiḥ samagraḥ punareṣyati
शोकरहित, ममतारहित, शान्त, प्रशान्त चित्त वाला, आत्मज्ञानी और पवित्र: इन छह लक्षणों से युक्त पूर्ण पुरुष फिर आएगा।
श्लोक 15 (12.257.15)
षड्भिः सत्वगुणोपेतैः प्राज्ञैरधिगतं त्रिभिः । ये विदुः प्रत्यगात्मानमिहस्थानमृतान्विदुः ॥
ṣaḍbhiḥ satvaguṇopetaiḥ prājñairadhigataṃ tribhiḥ | ye viduḥ pratyagātmānamihasthānamṛtānviduḥ
इसे सत्त्वगुण के छह अंगों से युक्त ज्ञानी तीन साधनों से पाते हैं। जो प्रत्यगात्मा को जानते हैं, वे यहाँ रहने वालों को अमर जानते हैं।
श्लोक 16 (12.257.16)
अकृत्रिममसंहार्यं प्राकृतं निरुपस्कृतम् । अध्यात्मवित्कृतप्रज्ञः सुखमव्ययमश्नुते ॥
akṛtrimamasaṃhāryaṃ prākṛtaṃ nirupaskṛtam | adhyātmavitkṛtaprajñaḥ sukhamavyayamaśnute
जो अकृत्रिम, अहरणीय, स्वाभाविक और निरलंकृत है, उस अविनाशी सुख को आत्मज्ञानी, दृढ़ प्रज्ञा वाला पुरुष भोगता है।
श्लोक 17 (12.257.17)
निष्प्रचारं मनः कृत्वा प्रतिष्ठाप्य च सर्वशः । यामयं लभते तुष्टिं सा न शक्याऽऽत्मनोन्यथा ॥
niṣpracāraṃ manaḥ kṛtvā pratiṣṭhāpya ca sarvaśaḥ | yāmayaṃ labhate tuṣṭiṃ sā na śakyā''tmanonyathā
मन का भटकना रोककर और उसे सब प्रकार से स्थिर करके यह पुरुष जो तृप्ति पाता है, वह आत्मा को किसी और प्रकार से नहीं मिल सकती।
श्लोक 18 (12.257.18)
येन तृप्यत्यभुञ्जानो येन तृप्यत्यवित्तवान् । येनास्नेहो बलं धत्ते यस्तं वेद स वेदवित् ॥
yena tṛpyatyabhuñjāno yena tṛpyatyavittavān | yenāsneho balaṃ dhatte yastaṃ veda sa vedavit
जिससे मनुष्य भोजन न करके भी तृप्त रहता है, धन न होते हुए भी सन्तुष्ट रहता है और स्नेहरहित होकर भी बल धारण करता है, उसे जो जानता है वही वेद का ज्ञाता है।
श्लोक 19 (12.257.19)
असङ्गो ह्यात्मनो द्वाराण्यपिधाय विचिन्तयन् । यो ह्यास्ते ब्राह्मणः शिष्टः स आत्मरतिरुच्यते ॥
asaṅgo hyātmano dvārāṇyapidhāya vicintayan | yo hyāste brāhmaṇaḥ śiṣṭaḥ sa ātmaratirucyate
जो अनासक्त ब्राह्मण आत्मा के द्वारों को बन्द करके चिन्तन करता हुआ बैठता है, वह संयमी आत्मा में रमने वाला कहा जाता है।
श्लोक 20 (12.257.20)
समाहितं परे तत्त्वे क्षीणकाममवस्थितम् । सर्वतः सुखमन्वेति वपुश्चान्द्रमसं यथा ॥
samāhitaṃ pare tattve kṣīṇakāmamavasthitam | sarvataḥ sukhamanveti vapuścāndramasaṃ yathā
जो परम तत्त्व में समाहित है, जिसकी कामनाएँ क्षीण हो गई हैं और जो स्थिर है, उसके पास चारों ओर से सुख आता है, जैसे चन्द्रमा का तेजोमय स्वरूप।
श्लोक 21 (12.257.21)
अविशेषाणि भूतानि गुणांश्च जहतो मुनेः । सुखेनापोह्यते दुःखं भास्करेण तमो यथा ॥
aviśeṣāṇi bhūtāni guṇāṃśca jahato muneḥ | sukhenāpohyate duḥkhaṃ bhāskareṇa tamo yathā
जो मुनि अविशेष भूतों और गुणों को छोड़ देता है, उसका दुःख सुख से वैसे ही दूर हो जाता है जैसे सूर्य से अन्धकार।
श्लोक 22 (12.257.22)
तमतिक्रान्तकर्माणमतिक्रान्तगुणक्षयम् । ब्राह्मणं विषयाश्लिष्टं जरामृत्यू न विन्दतः ॥
tamatikrāntakarmāṇamatikrāntaguṇakṣayam | brāhmaṇaṃ viṣayāśliṣṭaṃ jarāmṛtyū na vindataḥ
जो सब कर्मों से परे है, गुणों के क्षय से परे है, उस विषयों से अलिप्त ब्राह्मण को बुढ़ापा और मृत्यु नहीं पाते।
श्लोक 23 (12.257.23)
स यदा सर्वतो मुक्तः समः पर्यवतिष्ठते । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च शरीरस्थोऽतिवर्तते ॥
sa yadā sarvato muktaḥ samaḥ paryavatiṣṭhate | indriyāṇīndriyārthāṃśca śarīrastho'tivartate
जब वह सब ओर से मुक्त और सम होकर स्थित होता है, तब शरीर में रहता हुआ भी वह इन्द्रियों और उनके विषयों से ऊपर उठ जाता है।
श्लोक 24 (12.257.24)
कारणं परमं प्राप्य अतिक्रान्तस्य कार्यताम् । पुनरावर्तनं नास्ति संप्राप्तस्य परात्परम् ॥
kāraṇaṃ paramaṃ prāpya atikrāntasya kāryatām | punarāvartanaṃ nāsti saṃprāptasya parātparam
परम कारण को पाकर वह कार्यभाव से परे हो गया है; जो परात्पर को प्राप्त हो चुका है, उसका लौटना नहीं होता।