शान्ति पर्व · अध्याय 259
शरीर से मुक्त सूक्ष्म आत्मा
व्यास बताते हैं कि शरीर से मुक्त सूक्ष्म आत्मा को शास्त्र और तत्त्व जाननेवाले लोग देखते हैं, जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब दीखता है। सात सूक्ष्म गुणों से युक्त यह आत्मा स्वप्न में भी सुख-दुःख जानता है और दस मास गर्भ में रहता है; तम और रज से घिरे लोग उसे शरीरों में नहीं देखते, पर उनसे मुक्त योगी देख लेते हैं। अन्त में समाधि में योग के विषय में शाण्डिल्य का उपदेश है, और यह कि सूक्ष्म तत्त्वों तथा प्रधान को जाननेवाला परब्रह्म को देखता है।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (12.259.1)
शरीराद्विप्रमुक्तं हि सूक्ष्मभूतं शरीरिणम् । कर्मभिः परिपश्यन्ति शास्त्रोक्तैः शास्त्रचेतसः ॥
śarīrādvipramuktaṃ hi sūkṣmabhūtaṃ śarīriṇam | karmabhiḥ paripaśyanti śāstroktaiḥ śāstracetasaḥ
शरीर से मुक्त हुए, सूक्ष्म स्वरूपवाले देहधारी को शास्त्र में मन लगानेवाले लोग शास्त्र-कथित कर्मों के द्वारा देखते हैं।
श्लोक 2 (12.259.2)
यथा मरीच्यः सहिताश्चरन्ति गच्छन्ति तिष्ठन्ति च दृश्यमानाः । देहैर्विमुक्तानि विचरन्ति लोकांस्तथैव सत्वान्यतिमानुषाणि ॥
yathā marīcyaḥ sahitāścaranti gacchanti tiṣṭhanti ca dṛśyamānāḥ | dehairvimuktāni vicaranti lokāṃstathaiva satvānyatimānuṣāṇi
जैसे किरणें एक साथ चलती हैं और चलती तथा ठहरती हुई दिखाई देती हैं, वैसे ही मनुष्य से परे प्राणी शरीरों से मुक्त होकर लोकों में विचरते हैं।
श्लोक 3 (12.259.3)
प्रतिरूपं यथैवाप्सु तावत्सूर्यस्य लक्ष्यते । सत्ववांस्तु तथा सत्वं प्रतिरूपं स पश्यति ॥
pratirūpaṃ yathaivāpsu tāvatsūryasya lakṣyate | satvavāṃstu tathā satvaṃ pratirūpaṃ sa paśyati
जैसे जल में सूर्य का उतना ही प्रतिबिम्ब दीखता है, वैसे ही सत्त्वगुण से युक्त पुरुष उस सत्त्व को प्रतिबिम्ब-रूप में देखता है।
श्लोक 4 (12.259.4)
तानि सूक्ष्माणि सत्वानि विमुक्तानि शरीरतः । तेन तत्वेन तत्वज्ञाः पश्यन्ति नियतेन्द्रियाः ॥
tāni sūkṣmāṇi satvāni vimuktāni śarīrataḥ | tena tatvena tatvajñāḥ paśyanti niyatendriyāḥ
इन्द्रियों को वश में रखनेवाले तत्त्वज्ञ पुरुष शरीर से मुक्त हुए उन सूक्ष्म प्राणियों को उसी तत्त्व के द्वारा देखते हैं।
श्लोक 5 (12.259.5)
स्वपतां जाग्रतां चैष सर्वेषामात्मचिन्तितम् । प्रधानद्वैधयुक्तानां दह्यते कर्मजं रजः ॥
svapatāṃ jāgratāṃ caiṣa sarveṣāmātmacintitam | pradhānadvaidhayuktānāṃ dahyate karmajaṃ rajaḥ
सोते और जागते हुए सभी लोगों के विषय में यह आत्मा का चिन्तन है: प्रधान के दो भेदों से युक्त जनों में कर्म से उत्पन्न रज जल जाता है।
श्लोक 6 (12.259.6)
यथाऽहनि तथा रात्रौ यथा रात्रौ तथाऽहनि । वशे तिष्ठति सत्वात्मा सततं योगयोगिनाम् ॥
yathā'hani tathā rātrau yathā rātrau tathā'hani | vaśe tiṣṭhati satvātmā satataṃ yogayoginām
जैसे दिन में, वैसे रात में; जैसे रात में, वैसे दिन में — योग में लगे योगियों के वश में सत्त्वरूप आत्मा सदा रहता है।
श्लोक 7 (12.259.7)
तेषां नित्यं सदा नित्यो भूतात्मा सततं गुणैः । सप्तभिस्त्वन्वितः सूक्ष्मैश्चरिष्णुरजरामरः ॥
teṣāṃ nityaṃ sadā nityo bhūtātmā satataṃ guṇaiḥ | saptabhistvanvitaḥ sūkṣmaiścariṣṇurajarāmaraḥ
उनके लिए भूतात्मा सदा-सदा नित्य है; वह सात सूक्ष्म गुणों से निरन्तर युक्त होकर विचरता है, जरा और मृत्यु से रहित।
श्लोक 8 (12.259.8)
मनोबुद्धिपराभूतः स्वदेहपरदेहवित् । स्वप्नेष्वपि भवत्येष विज्ञाता सुखदुःखयोः ॥
manobuddhiparābhūtaḥ svadehaparadehavit | svapneṣvapi bhavatyeṣa vijñātā sukhaduḥkhayoḥ
मन और बुद्धि से अभिभूत होकर वह अपने और दूसरे के शरीर को जाननेवाला होता है; स्वप्नों में भी यह सुख और दुःख का ज्ञाता बना रहता है।
श्लोक 9 (12.259.9)
तत्रापि लभते दुःखं तत्रापि लभते सुखम् । कामं क्रोधं च तत्रापि कृत्वा व्यसनमृच्छति ॥
tatrāpi labhate duḥkhaṃ tatrāpi labhate sukham | kāmaṃ krodhaṃ ca tatrāpi kṛtvā vyasanamṛcchati
वहाँ भी वह दुःख पाता है और वहाँ भी सुख पाता है; वहाँ भी काम और क्रोध करके वह विपत्ति को प्राप्त होता है।
श्लोक 10 (12.259.10)
प्रीणितश्चापि भवति महतोऽर्थानवाप्य हि । करोति पुण्यं तत्रापि जाग्रन्निव च पश्यति ॥
prīṇitaścāpi bhavati mahato'rthānavāpya hi | karoti puṇyaṃ tatrāpi jāgranniva ca paśyati
बहुत धन पाकर वह प्रसन्न भी होता है; वहाँ भी वह पुण्य करता है और जागते हुए-सा देखता है।
श्लोक 11 (12.259.11)
सदोष्मान्तर्गतश्चापि गर्भत्वं समुपेयिवान् । दश मासान्वसन्कुक्षौ नैषोऽन्नमिव जीर्यते ॥
sadoṣmāntargataścāpi garbhatvaṃ samupeyivān | daśa māsānvasankukṣau naiṣo'nnamiva jīryate
सदा उष्मा के भीतर रहता हुआ वह गर्भावस्था को भी प्राप्त हुआ; दस महीने कोख में रहकर भी वह अन्न की तरह पचता नहीं।
श्लोक 12 (12.259.12)
तमेतमतितेजोंशं भूतात्मानं हृदि स्थितम् । तमोरजोभ्यामाविष्टा नानुपश्यन्ति मूर्तिषु ॥
tametamatitejoṃśaṃ bhūtātmānaṃ hṛdi sthitam | tamorajobhyāmāviṣṭā nānupaśyanti mūrtiṣu
हृदय में स्थित उस अत्यन्त तेजस्वी अंशरूप भूतात्मा को, तम और रज से घिरे हुए लोग शरीरों में नहीं देख पाते।
श्लोक 13 (12.259.13)
योगशास्त्रपरा भूत्वा स्वमात्मानं परीप्सवः । तमोरजोभ्यां निर्मुक्तास्तं प्रपश्यन्ति मूर्तिषु । अनुच्छ्वासान्यमूर्तानि यानि वज्रोपमान्यपि ॥
yogaśāstraparā bhūtvā svamātmānaṃ parīpsavaḥ | tamorajobhyāṃ nirmuktāstaṃ prapaśyanti mūrtiṣu | anucchvāsānyamūrtāni yāni vajropamānyapi
योगशास्त्र में लगकर अपने आत्मा को पाना चाहनेवाले, तम और रज से मुक्त होकर, उसे शरीरों में देख लेते हैं — उन सूक्ष्म सत्ताओं को, जो श्वास-रहित और निराकार होती हैं, फिर भी वज्र के समान हैं।
श्लोक 14 (12.259.14)
पृथग्भूतेषु सृष्टेषु चतुर्ष्वाश्रमकर्मसु । समाधौ योगमेवैतच्छाण्डिल्यः सममब्रवीत् ॥
pṛthagbhūteṣu sṛṣṭeṣu caturṣvāśramakarmasu | samādhau yogamevaitacchāṇḍilyaḥ samamabravīt
चारों आश्रमों के कर्म जब अलग-अलग रचे गए, तब शाण्डिल्य ने समाधि में इसी योग को सबके लिए समान बताया।
श्लोक 15 (12.259.15)
विदित्वा सप्तसूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम् । प्रधानविनियोगज्ञः परं ब्रह्मानुपश्यति ॥
viditvā saptasūkṣmāṇi ṣaḍaṅgaṃ ca maheśvaram | pradhānaviniyogajñaḥ paraṃ brahmānupaśyati
सात सूक्ष्म तत्त्वों और छह अंगोंवाले महेश्वर को जानकर, प्रधान के विनियोग को जाननेवाला पुरुष परब्रह्म को देखता है।