शान्ति पर्व · अध्याय 260
कामरूपी वृक्ष और शरीररूपी नगर
व्यास काम को हृदय में उगे एक विचित्र वृक्ष के समान बताते हैं: अज्ञान उसका आधार है, क्रोध और अभिमान उसका तना, शोक और भय उसकी डालियाँ और अंकुर। जो उसके पाशों को वश में करके समता की तलवार से उसे उखाड़ देता है, वह जरा और मृत्यु के पार चला जाता है। फिर वे शरीर को नगर कहते हैं, जिसकी स्वामिनी बुद्धि है, मन मन्त्री है, इन्द्रियाँ नगरवासी हैं और तम तथा रज दो भयंकर दोष हैं; और दिखाते हैं कि बुद्धि से कटा हुआ मन रज से मित्रता कर लेता है और इन्द्रियों को उसके हाथ सौंप देता है।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (12.260.1)
हृदि कामद्रुमश्चित्रो मोहसंचयसंभवः । क्रोधमानमहास्कन्धो विवित्सापरिवेषणः ॥
hṛdi kāmadrumaścitro mohasaṃcayasaṃbhavaḥ | krodhamānamahāskandho vivitsāpariveṣaṇaḥ
हृदय में कामरूपी एक विचित्र वृक्ष है, जो मोह के संचय से उत्पन्न होता है; क्रोध और अभिमान उसका विशाल तना है और जानने की इच्छा उसे चारों ओर से घेरे हुए है।
श्लोक 2 (12.260.2)
तस्य चाज्ञानमाधारः प्रमादः परिषेचनम् । सोऽभ्यसूयापलाशो हि पुरा दुष्कृतसारवान् ॥
tasya cājñānamādhāraḥ pramādaḥ pariṣecanam | so'bhyasūyāpalāśo hi purā duṣkṛtasāravān
अज्ञान उसका आधार है और प्रमाद उसका सिंचन; ईर्ष्या उसके पत्ते हैं, और पूर्वकाल के दुष्कर्म उसका सार हैं।
श्लोक 3 (12.260.3)
संमोहचिन्ताविटपः शोकशाखो भयाङ्कुरः । मोहनीभिः पिपासाभिर्लताभिरनुवेष्टितः ॥
saṃmohacintāviṭapaḥ śokaśākho bhayāṅkuraḥ | mohanībhiḥ pipāsābhirlatābhiranuveṣṭitaḥ
मोह और चिन्ता उसकी टहनियाँ हैं, शोक उसकी डालियाँ हैं, भय उसके अंकुर हैं; और वह मोहित करनेवाली प्यासों की बेलों से चारों ओर लिपटा हुआ है।
श्लोक 4 (12.260.4)
उपासते महावृक्षं सुलुब्धास्तत्फलेप्सवः । आयतैः संयुताः पाशैः फलदं परिवेष्ट्य तम् ॥
upāsate mahāvṛkṣaṃ sulubdhāstatphalepsavaḥ | āyataiḥ saṃyutāḥ pāśaiḥ phaladaṃ pariveṣṭya tam
लोभी लोग उसके फल की इच्छा से उस विशाल वृक्ष की उपासना करते हैं; लम्बे पाशों में बँधे हुए वे उस फल देनेवाले वृक्ष को घेरे रहते हैं।
श्लोक 5 (12.260.5)
यस्तान्पाशान्वशे कृत्वा तं वृक्षमपकर्षति । गतः स दुःखयोरन्तं जरामरणयोर्द्वयोः ॥
yastānpāśānvaśe kṛtvā taṃ vṛkṣamapakarṣati | gataḥ sa duḥkhayorantaṃ jarāmaraṇayordvayoḥ
जो उन पाशों को वश में करके उस वृक्ष को उखाड़ फेंकता है, वह जरा और मरण — इन दोनों दुःखों के अन्त को पहुँच जाता है।
श्लोक 6 (12.260.6)
संरोहत्यकृतप्रज्ञः ससत्वो हन्ति पादपम् । स तमेवाहतो हन्ति विषं ग्रस्तमिवातुरम् ॥
saṃrohatyakṛtaprajñaḥ sasatvo hanti pādapam | sa tamevāhato hanti viṣaṃ grastamivāturam
अप्रशिक्षित बुद्धिवाला उस पर चढ़ता है, और बलवान् पुरुष उस वृक्ष पर प्रहार करता है। पर आहत होकर वह उसी को मारता है, जैसे निगला हुआ विष रोगी को मारता है।
श्लोक 7 (12.260.7)
तस्यानुगतमूलस्य मूलमुद्ध्रियते बलात् । योगप्रसादात्कृतिना साम्येन परमासिना ॥
tasyānugatamūlasya mūlamuddhriyate balāt | yogaprasādātkṛtinā sāmyena paramāsinā
जिसकी जड़ें फैल चुकी हैं, उसकी जड़ को योग की कृपा से कुशल पुरुष समता की परम तलवार से बलपूर्वक उखाड़ देता है।
श्लोक 8 (12.260.8)
एवं यो वेद कामस्य केवलं परिसर्पणम् । एतच्च कामशास्त्रस्य सुदुःखान्यतिवर्तते ॥
evaṃ yo veda kāmasya kevalaṃ parisarpaṇam | etacca kāmaśāstrasya suduḥkhānyativartate
जो इस प्रकार काम के सम्पूर्ण प्रसार को जानता है, और कामशास्त्र की इस बात को भी जानता है, वह अत्यन्त कठिन दुःखों को पार कर जाता है।
श्लोक 9 (12.260.9)
शरीरं पुरमित्याहुः स्वामिनी बुद्धिरिष्यते । तत्र बुद्धेः शरीरस्थं मनो नामार्थचिन्तकम् ॥
śarīraṃ puramityāhuḥ svāminī buddhiriṣyate | tatra buddheḥ śarīrasthaṃ mano nāmārthacintakam
शरीर को नगर कहते हैं, और बुद्धि उसकी स्वामिनी मानी जाती है। उसमें शरीर में रहनेवाला, बुद्धि का अपना मन है, जो प्रयोजनों का चिन्तन करनेवाला कहलाता है।
श्लोक 10 (12.260.10)
इन्द्रियाणि जनाः पौरास्तदर्थं तु परा कृतिः । तत्र द्वौ दारुणौ दोषौ तमो नाम रजस्तथा । तदर्थमुपजीवन्ति पौराः सह पुरेश्वरैः ॥
indriyāṇi janāḥ paurāstadarthaṃ tu parā kṛtiḥ | tatra dvau dāruṇau doṣau tamo nāma rajastathā | tadarthamupajīvanti paurāḥ saha pureśvaraiḥ
इन्द्रियाँ नगरवासी जन हैं, और उन्हीं के लिए यह महान् प्रयत्न है। वहाँ दो भयंकर दोष हैं — तम और रज; उसी के लिए नगरवासी, नगर के स्वामियों सहित, जीते हैं।
श्लोक 11 (12.260.11)
अद्वारेण तमेवार्थं द्वौ दोषावुपजीवतः । तत्र बुद्धिर्हि दुर्धर्षा मनः साधर्म्यमुच्यते ॥
advāreṇa tamevārthaṃ dvau doṣāvupajīvataḥ | tatra buddhirhi durdharṣā manaḥ sādharmyamucyate
वे दोनों दोष बिना द्वार के उसी विषय पर जीते हैं। वहाँ बुद्धि को जीतना कठिन है, और मन उसके समान धर्मवाला कहा जाता है।
श्लोक 12 (12.260.12)
पौराश्चापि मनस्तृप्तास्तेषामपि चला स्थितिः । यदर्थं बुद्धिरध्यास्ते सोऽनर्थः परिषीदति ॥
paurāścāpi manastṛptāsteṣāmapi calā sthitiḥ | yadarthaṃ buddhiradhyāste so'narthaḥ pariṣīdati
नगरवासी भी मन से सन्तुष्ट रहते हैं, फिर भी उनकी स्थिति चंचल है। जिस प्रयोजन से बुद्धि वहाँ विराजती है, वह अनर्थ नष्ट हो जाता है।
श्लोक 13 (12.260.13)
पौरमन्त्रवियुक्तायाः सोऽर्थः संसीदति क्रमात् । यदर्थं पृथगध्यास्ते मनस्तत्परिषीदति ॥
pauramantraviyuktāyāḥ so'rthaḥ saṃsīdati kramāt | yadarthaṃ pṛthagadhyāste manastatpariṣīdati
नगरवासियों की सलाह से कटी हुई बुद्धि का वह प्रयोजन धीरे-धीरे डूब जाता है। जिस प्रयोजन के लिए मन अलग जा बैठता है, वह नष्ट हो जाता है।
श्लोक 14 (12.260.14)
पृथग्भूतं मनो बुद्ध्या मनो भवति केवलम् । तत्रैनं विकृतं शून्यं रजः पर्यवतिष्ठते ॥
pṛthagbhūtaṃ mano buddhyā mano bhavati kevalam | tatrainaṃ vikṛtaṃ śūnyaṃ rajaḥ paryavatiṣṭhate
बुद्धि से अलग होकर मन अकेला रह जाता है; तब विकृत और सूने उस मन को रज घेर लेता है।
श्लोक 15 (12.260.15)
तन्मनः कुरुते सख्यं रजसा सह संगतम् । तं चादाय जनं पौरं रजसे संप्रयच्छति ॥
tanmanaḥ kurute sakhyaṃ rajasā saha saṃgatam | taṃ cādāya janaṃ pauraṃ rajase saṃprayacchati
वह मन रज से मिलकर उसके साथ मित्रता कर लेता है, और नगरवासी जन को साथ लेकर उसे रज के हाथ सौंप देता है।