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शान्ति पर्व · अध्याय 261

भूतों, मन और बुद्धि के गुण

भीष्म पाँच भूतों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — में से प्रत्येक के गुण गिनाते हैं, जिनकी संख्या पचास कही गई है, फिर मन के नौ और बुद्धि के पाँच गुण बताते हैं। युधिष्ठिर पूछते हैं कि बुद्धि के पाँच गुण और इन्द्रियों के पाँच गुण कैसे हैं; भीष्म उत्तर देते हैं कि भूतों के साठ गुण हैं, जो भूतों से जुड़े और प्रकृति से रचे गए हैं और नित्य नहीं कहे जाते, और युधिष्ठिर को शान्त बुद्धि प्राप्त करने के लिए कहते हैं।

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भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.261.1)

भूतानां गुणसङ्ख्यानं भूयः पुत्र निशामय । द्वैपायनमुखाद्भ्रष्टं श्लाघया परयाऽनघ ॥

bhūtānāṃ guṇasaṅkhyānaṃ bhūyaḥ putra niśāmaya | dvaipāyanamukhādbhraṣṭaṃ ślāghayā parayā'nagha

हे पुत्र, भूतों के गुणों की गणना फिर सुनो। हे निष्पाप, यह द्वैपायन के मुख से बड़े गौरव के साथ निकली थी।

श्लोक 2 (12.261.2)

दीप्तानलनिभः प्राह भगवान्धूमवत्सलः । ततोऽहमपि वक्ष्यामि भूयः पुत्र निदर्शनम् ॥

dīptānalanibhaḥ prāha bhagavāndhūmavatsalaḥ | tato'hamapi vakṣyāmi bhūyaḥ putra nidarśanam

अग्नि के समान दीप्तिमान, धूम के प्रेमी भगवान् ने यह कहा था; इसलिए हे पुत्र, मैं भी तुम्हें फिर एक उदाहरण बताऊँगा।

श्लोक 3 (12.261.3)

भूमेः स्थैर्यं गुरुत्वं च काठिन्यं प्रसवात्मता । गन्धो भारश्च शक्तिश्च संघातः स्थापना धृतिः ॥

bhūmeḥ sthairyaṃ gurutvaṃ ca kāṭhinyaṃ prasavātmatā | gandho bhāraśca śaktiśca saṃghātaḥ sthāpanā dhṛtiḥ

पृथ्वी के गुण: स्थिरता, भारीपन, कठोरता, उत्पन्न करने की शक्ति, गन्ध, भार, सामर्थ्य, संघात, आधार देना और धृति।

श्लोक 4 (12.261.4)

अपां शैत्यं रसः क्लेदो द्रवत्वं स्नेहसौम्यता । जिह्वाविस्यन्दनं चापि भौमानां श्रपणं तथा ॥

apāṃ śaityaṃ rasaḥ kledo dravatvaṃ snehasaumyatā | jihvāvisyandanaṃ cāpi bhaumānāṃ śrapaṇaṃ tathā

जल के गुण: शीतलता, रस, आर्द्रता, द्रवता, स्नेह और सौम्यता; जिह्वा, बहना, और इसी प्रकार पार्थिव वस्तुओं का पकाना।

श्लोक 5 (12.261.5)

अग्नेर्दुर्धर्षता ज्योतिस्तापः पाकः प्रकाशनम् । शौचं रागो लघुस्तैक्ष्ण्यं सततं चोर्ध्वभागिता ॥

agnerdurdharṣatā jyotistāpaḥ pākaḥ prakāśanam | śaucaṃ rāgo laghustaikṣṇyaṃ satataṃ cordhvabhāgitā

अग्नि के गुण: दुर्धर्षता, ज्योति, ताप, पाक, प्रकाश, शुद्धता, लाली, लघुता, तीक्ष्णता और सदा ऊपर की ओर जाना।

श्लोक 6 (12.261.6)

वायोरनियमस्पर्शो वादस्थानं स्वतन्त्रता । बलं शैघ्र्यं च मोक्षं च कर्म चेष्टात्मता भवः ॥

vāyoraniyamasparśo vādasthānaṃ svatantratā | balaṃ śaighryaṃ ca mokṣaṃ ca karma ceṣṭātmatā bhavaḥ

वायु के गुण: अनियन्त्रित स्पर्श, वाणी का स्थान, स्वतन्त्रता, बल, वेग, मोक्ष, कर्म, चेष्टा का स्वभाव और उत्पत्ति।

श्लोक 7 (12.261.7)

आकाशस्य गुणः शब्दो व्यापित्वं छिद्रताऽपि च । अनाश्रयमनालम्बमव्यक्तमविकारिता ॥

ākāśasya guṇaḥ śabdo vyāpitvaṃ chidratā'pi ca | anāśrayamanālambamavyaktamavikāritā

आकाश के गुण: शब्द, व्यापकता, छिद्रता, निराश्रयता, निरालम्बता, अव्यक्तता और अविकारिता।

श्लोक 8 (12.261.8)

अप्रतीघातिता चैव श्रोतत्वं विवराणि च । गुणाः पञ्चाशतं प्रोक्ताः पञ्चभूतविभाविताः ॥

apratīghātitā caiva śrotatvaṃ vivarāṇi ca | guṇāḥ pañcāśataṃ proktāḥ pañcabhūtavibhāvitāḥ

अप्रतिघातिता, श्रोत्रत्व और विवर — इस प्रकार पाँच भूतों से प्रकट होनेवाले पचास गुण कहे गए हैं।

श्लोक 9 (12.261.9)

फलोपपत्तिर्व्यक्तिश्च विसर्गः कल्पना क्षमा । सदसच्चाशुता चैव मनसो नव वै गुणाः ॥

phalopapattirvyaktiśca visargaḥ kalpanā kṣamā | sadasaccāśutā caiva manaso nava vai guṇāḥ

फल की प्राप्ति, व्यक्ति, विसर्ग, कल्पना, क्षमा, सत्, असत् और शीघ्रता — ये मन के नौ गुण हैं।

श्लोक 10 (12.261.10)

इष्टानिष्टविपत्तिश्च व्यवसायः समाधिता । संशयः प्रतिपत्तिश्च बुद्धेः पञ्च गुणान्विदुः ॥

iṣṭāniṣṭavipattiśca vyavasāyaḥ samādhitā | saṃśayaḥ pratipattiśca buddheḥ pañca guṇānviduḥ

इष्ट और अनिष्ट अवस्थाओं का नाश, निश्चय, समाधि, संशय और प्रतिपत्ति — इन्हें बुद्धि के पाँच गुण जाना गया है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 11 (12.261.11)

कथं पञ्चगुणा बुद्धिः कथं पञ्चेन्द्रिया गुणाः । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सूक्ष्मज्ञानं पितामह ॥

kathaṃ pañcaguṇā buddhiḥ kathaṃ pañcendriyā guṇāḥ | etanme sarvamācakṣva sūkṣmajñānaṃ pitāmaha

पितामह, बुद्धि पाँच गुणोंवाली कैसे है? और इन्द्रियों के पाँच गुण कैसे हैं? यह सूक्ष्म ज्ञान मुझे पूरा बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 12 (12.261.12)

आहुः षष्टिं भूतगुणान्वै भूतविषक्तान्प्रकृतिविसृष्टान् । नित्यविषक्तांश्चाक्षरसृष्टान्पुत्र न नित्यं तदिह वदन्ति ॥

āhuḥ ṣaṣṭiṃ bhūtaguṇānvai bhūtaviṣaktānprakṛtivisṛṣṭān | nityaviṣaktāṃścākṣarasṛṣṭānputra na nityaṃ tadiha vadanti

भूतों के साठ गुण बताए जाते हैं, जो भूतों से जुड़े हैं और प्रकृति से रचे गए हैं; जो नित्य से जुड़े हैं और अक्षर से रचे गए हैं। पर हे पुत्र, यहाँ उन्हें नित्य नहीं कहते।

श्लोक 13 (12.261.13)

तत्पुत्रचिन्ताकलिलं तदुक्तमनागतं वै तव संप्रतीह । भूतार्थवत्त्वं तदवाप्य सर्वं भूतप्रभावाद्भव शान्तबुद्धिः ॥

tatputracintākalilaṃ taduktamanāgataṃ vai tava saṃpratīha | bhūtārthavattvaṃ tadavāpya sarvaṃ bhūtaprabhāvādbhava śāntabuddhiḥ

हे पुत्र, चिन्ता से उलझा हुआ जो मैंने कहा, वह अभी तुम्हारे आगे आनेवाला है। भूतों से सम्बन्धित उन सब अर्थों को पाकर भूतों के प्रभाव से शान्त बुद्धिवाले हो जाओ।

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