Skip to main content

शान्ति पर्व · अध्याय 262

मनुष्य क्यों मरते हैं? ब्रह्मा का क्रोध

युद्धभूमि में मरे हुए राजाओं को देखकर युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं कि 'मृत' शब्द कहाँ से आया, मृत्यु किसकी है और वह प्राणियों को कैसे हर लेती है। भीष्म उत्तर में वह कथा सुनाते हैं जो नारद ने कभी राजा अकम्पन को सुनाई थी, जिसका पुत्र हरि युद्ध में मारा गया था। नारद ब्रह्मा से आरम्भ करते हैं, जिन्होंने जगत् को प्राणियों से ठसाठस भरा देखा और उनके अन्त का कोई उपाय न पा सके; क्रोध में उनके शरीर के छिद्रों से अग्नि उठी और सब प्राणियों को जलाने लगी, तब शिव उनकी शरण में आए।

अध्याय 261अध्याय-सूचीअध्याय 263

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.262.1)

य इमे पृथिवीपालाः शेरते पृथिवीतले । पृतनामध्य एते हि गतसत्त्वा महाबलाः ॥

ya ime pṛthivīpālāḥ śerate pṛthivītale | pṛtanāmadhya ete hi gatasattvā mahābalāḥ

जो ये पृथ्वी के पालक राजा सेना के बीच पृथ्वी पर पड़े हैं, प्राणहीन हैं, यद्यपि वे महाबली थे —

श्लोक 2 (12.262.2)

एकैकशो भीमबला नागायुतबलास्तथा । एते हि निहताः सङ्ख्ये तुल्यतेजोबलैर्नरैः ॥

ekaikaśo bhīmabalā nāgāyutabalāstathā | ete hi nihatāḥ saṅkhye tulyatejobalairnaraiḥ

इनमें से प्रत्येक भीम के समान बलवान् था और दस हजार हाथियों के बल के समान बल रखता था; फिर भी ये युद्ध में समान तेज और बलवाले मनुष्यों द्वारा मारे गए।

श्लोक 3 (12.262.3)

नैषां पश्यामि हन्तारं प्राणिनां संयुगे पुरा । विक्रमेणोपसंपन्नास्तेजोबलसमन्विताः ॥

naiṣāṃ paśyāmi hantāraṃ prāṇināṃ saṃyuge purā | vikrameṇopasaṃpannāstejobalasamanvitāḥ

मैं पहले युद्ध में इन प्राणियों का कोई मारनेवाला नहीं देखता; ये पराक्रम से सम्पन्न थे और तेज तथा बल से युक्त थे।

श्लोक 4 (12.262.4)

अथ चेमे महाप्राज्ञाः शेरते हि गतासवः । मृता इति च शब्दोऽयं वर्तत्येषु गतासुषु ॥

atha ceme mahāprājñāḥ śerate hi gatāsavaḥ | mṛtā iti ca śabdo'yaṃ vartatyeṣu gatāsuṣu

और अब ये महाप्रज्ञ प्राणहीन होकर पड़े हैं; इन प्राणहीनों के लिए 'मृत' यह शब्द चलता है।

श्लोक 5 (12.262.5)

इमे मृता नृपतयः प्रायशो भीमविक्रमाः । तत्र मे संशयो जातः कुतः संज्ञा मृता इति ॥

ime mṛtā nṛpatayaḥ prāyaśo bhīmavikramāḥ | tatra me saṃśayo jātaḥ kutaḥ saṃjñā mṛtā iti

ये राजा, जिनमें अधिकतर भयंकर पराक्रमवाले थे, मर गए हैं। यहीं मुझे संशय हुआ है कि 'मृत' यह नाम कहाँ से आया?

श्लोक 6 (12.262.6)

कस्य मृत्युः कुतो मृत्युः केन मृत्युरिह प्रजाः । हरत्यमरसंकाश तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

kasya mṛtyuḥ kuto mṛtyuḥ kena mṛtyuriha prajāḥ | haratyamarasaṃkāśa tanme brūhi pitāmaha

मृत्यु किसकी है? मृत्यु कहाँ से आती है? यहाँ मृत्यु किस प्रकार प्राणियों को हर लेती है? हे अमरों के समान पितामह, यह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 7 (12.262.7)

पुरा कृतयुगे तात राजा ह्यासीदकम्पनः । स शत्रुवशमापन्नः संग्रामे क्षीणवाहनः ॥

purā kṛtayuge tāta rājā hyāsīdakampanaḥ | sa śatruvaśamāpannaḥ saṃgrāme kṣīṇavāhanaḥ

हे तात, पूर्वकाल में कृतयुग में अकम्पन नाम का एक राजा था। वह युद्ध में शत्रु के वश में पड़ गया, उसके वाहन क्षीण हो गए थे।

श्लोक 8 (12.262.8)

तस्य पुत्रो हरिर्नाम नारायणसमो बले । स शत्रुभिर्हतः सङ्ख्ये सबलः सपदानुगः ॥

tasya putro harirnāma nārāyaṇasamo bale | sa śatrubhirhataḥ saṅkhye sabalaḥ sapadānugaḥ

उसका हरि नाम का पुत्र बल में नारायण के समान था; वह भी सेना और अनुचरों सहित युद्ध में शत्रुओं के हाथों मारा गया।

श्लोक 9 (12.262.9)

स राजा शत्रुवशगः पुत्रशोकसमन्वितः । यदृच्छया शान्तिपरो ददर्श भुवि नारदम् ॥

sa rājā śatruvaśagaḥ putraśokasamanvitaḥ | yadṛcchayā śāntiparo dadarśa bhuvi nāradam

शत्रु के वश में पड़ा हुआ, पुत्रशोक से ग्रस्त वह राजा संयोग से शान्ति की खोज में पृथ्वी पर नारद से मिला।

श्लोक 10 (12.262.10)

तस्मै स सर्वमाचष्ट यथावृत्तं जनेश्वरः । शत्रुभिर्ग्रहणं सङ्ख्ये पुत्रस्य मरणं तथा ॥

tasmai sa sarvamācaṣṭa yathāvṛttaṃ janeśvaraḥ | śatrubhirgrahaṇaṃ saṅkhye putrasya maraṇaṃ tathā

उस नरेश्वर ने उनसे सब कुछ ठीक-ठीक कहा — युद्ध में शत्रुओं द्वारा अपना पकड़ा जाना और पुत्र की मृत्यु।

श्लोक 11 (12.262.11)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा नारदोऽथ तपोधनः । आख्यानमिदमाचष्ट पुत्रशोकापहं तदा ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā nārado'tha tapodhanaḥ | ākhyānamidamācaṣṭa putraśokāpahaṃ tadā

उसकी वह बात सुनकर तपोधन नारद ने तब पुत्रशोक को हरनेवाला यह आख्यान सुनाया।

नारद उवाच

श्लोक 12 (12.262.12)

राजञ्शृणु महाख्यानं ममेदं बहुविस्तरम् । यथावृत्तं श्रुतं चैव मयाऽपि वसुधाधिप ॥

rājañśṛṇu mahākhyānaṃ mamedaṃ bahuvistaram | yathāvṛttaṃ śrutaṃ caiva mayā'pi vasudhādhipa

हे राजन्, मेरी यह महान् कथा सुनो, जो बहुत विस्तारवाली है और जैसी घटी थी तथा जैसी मैंने भी सुनी है, हे पृथ्वीपति।

श्लोक 13 (12.262.13)

प्रजाः सृष्ट्वा महातेजाः प्रजासर्गे पितामहः । अतीव वृद्धा बहुला नामृष्यत पुनः प्रजाः ॥

prajāḥ sṛṣṭvā mahātejāḥ prajāsarge pitāmahaḥ | atīva vṛddhā bahulā nāmṛṣyata punaḥ prajāḥ

महातेजस्वी पितामह प्रजा को रचकर, सृष्टि के समय, उसे अत्यन्त बढ़ी हुई और बहुत देखकर फिर सहन न कर सके।

श्लोक 14 (12.262.14)

न ह्यन्तरमभूत्किंचित्क्वचिज्जन्तुभिरच्युत । निरुच्छ्वासमिवोन्नद्धं त्रैलोक्यमभवन्नृप ॥

na hyantaramabhūtkiṃcitkvacijjantubhiracyuta | nirucchvāsamivonnaddhaṃ trailokyamabhavannṛpa

हे अच्युत, प्राणियों के कारण कहीं भी तनिक स्थान नहीं बचा। हे राजन्, तीनों लोक ठसाठस भर गए, मानो उनकी साँस ही रुक गई हो।

श्लोक 15 (12.262.15)

तस्य चिन्ता समुत्पन्ना संहारं प्रति भूपते । चिन्तयन्नाध्यगच्छच्च संहारे हेतुकारणम् ॥

tasya cintā samutpannā saṃhāraṃ prati bhūpate | cintayannādhyagacchacca saṃhāre hetukāraṇam

हे भूपति, उनके मन में संहार की चिन्ता उत्पन्न हुई; पर सोचते हुए भी वे संहार का कोई हेतु या कारण न पा सके।

श्लोक 16 (12.262.16)

तस्य रोषान्महाराज खेभ्योऽग्निरुदतिष्ठत । तेन सर्वा दिशो राजन्ददाह स पितामहः ॥

tasya roṣānmahārāja khebhyo'gnirudatiṣṭhata | tena sarvā diśo rājandadāha sa pitāmahaḥ

हे महाराज, उनके क्रोध से उनके शरीर के छिद्रों से अग्नि उठी; हे राजन्, उसी से पितामह ने सब दिशाओं को जला दिया।

श्लोक 17 (12.262.17)

ततो दिवं भुवं खं च जगच्च सचराचरम् । ददाह पावको राजन्भगवत्कोपसंभवः ॥

tato divaṃ bhuvaṃ khaṃ ca jagacca sacarācaram | dadāha pāvako rājanbhagavatkopasaṃbhavaḥ

हे राजन्, तब भगवान् के क्रोध से उत्पन्न उस अग्नि ने स्वर्ग, पृथ्वी और आकाश को, तथा चर-अचर सहित सारे जगत् को जला डाला।

श्लोक 18 (12.262.18)

तत्रादह्यन्त भूतानि जङ्गमानि ध्रुवाणि च । महता क्रोधवेगेन कुपिते प्रपितामहे ॥

tatrādahyanta bhūtāni jaṅgamāni dhruvāṇi ca | mahatā krodhavegena kupite prapitāmahe

वहाँ प्रपितामह के कुपित होने पर उनके क्रोध के महान् वेग से चर और अचर सब प्राणी जलने लगे।

श्लोक 19 (12.262.19)

ततो हरो जटी स्थाणुर्देवोऽध्वरपतिः शिवः । जगाम शरणं देवो ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् ॥

tato haro jaṭī sthāṇurdevo'dhvarapatiḥ śivaḥ | jagāma śaraṇaṃ devo brahmāṇaṃ parameṣṭhinam

तब जटाधारी हर, स्थाणु, यज्ञों के स्वामी देव शिव परमेष्ठी देव ब्रह्मा की शरण में गए।

श्लोक 20 (12.262.20)

तस्मिन्नभिगते स्थाणौ प्रजानां हितकाम्यया । अब्रवीद्वरदो देवो ज्वलन्निव तदा शिवम् ॥

tasminnabhigate sthāṇau prajānāṃ hitakāmyayā | abravīdvarado devo jvalanniva tadā śivam

स्थाणु के पहुँचने पर वरदायक देव ने प्रजा के हित की इच्छा से, मानो जलते हुए, शिव से कहा।

ब्रह्मोवाच

श्लोक 21 (12.262.21)

करवाण्यद्य कं कामं वरार्होऽसि मतो मम । कर्ता ह्यस्मि प्रियं शंभो तव यद्धृदि वर्तते ॥

karavāṇyadya kaṃ kāmaṃ varārho'si mato mama | kartā hyasmi priyaṃ śaṃbho tava yaddhṛdi vartate

मैं आज तुम्हारी कौन-सी इच्छा पूरी करूँ? मैं तुम्हें वर के योग्य मानता हूँ। हे शम्भो, तुम्हारे हृदय में जो प्रिय बात है, उसे मैं पूरा करूँगा।

अध्याय 261अध्याय-सूचीअध्याय 263