शान्ति पर्व · अध्याय 263
शिव की प्रार्थना और मृत्यु का जन्म
स्थाणु (शिव) ब्रह्मा से प्रार्थना करते हैं कि वे सब प्राणियों को जलानेवाली अपने क्रोध की अग्नि को लौटा लें; ब्रह्मा कहते हैं कि वे प्रजा का नाश नहीं चाहते, केवल पृथ्वी का भार हल्का करना चाहते हैं। शिव कोई दूसरा उपाय माँगते हैं और यह भी कि प्रजा बार-बार जन्म लेनेवाली हो। ब्रह्मा अग्नि को अपने भीतर समेट लेते हैं और प्रवृत्ति तथा निवृत्ति की रचना करते हैं; तब उनके शरीर के छिद्रों से काले और लाल वस्त्रों वाली एक नारी प्रकट होती है, जिसे वे 'मृत्यु' कहकर सब प्राणियों को मारने का आदेश देते हैं। वह रोने लगती है, और ब्रह्मा उसके आँसू हथेलियों में थामकर मनुष्यों के हित के लिए उससे फिर याचना करते हैं।
स्थाणुरुवाच
श्लोक 1 (12.263.1)
प्रजासर्गनिमित्तं मे कार्यवत्तामिमां प्रभो । विद्धि सृष्टास्त्वया हीमा मा कुप्यासां पितामह ॥
prajāsarganimittaṃ me kāryavattāmimāṃ prabho | viddhi sṛṣṭāstvayā hīmā mā kupyāsāṃ pitāmaha
हे प्रभो, प्रजा की सृष्टि के कारण मेरा आपसे एक निवेदन है। जान लीजिए कि ये प्रजाएँ आपकी ही रची हुई हैं; हे पितामह, इन पर क्रोध न कीजिए।
श्लोक 2 (12.263.2)
तव तेजोग्निना देव प्रजा दह्यन्ति सर्वशः । ता दृष्ट्वा मम कारुण्यं मा कुप्यासां जगत्प्रभो ॥
tava tejogninā deva prajā dahyanti sarvaśaḥ | tā dṛṣṭvā mama kāruṇyaṃ mā kupyāsāṃ jagatprabho
हे देव, आपके तेजरूपी अग्नि से सब ओर प्रजा जल रही है। उसे देखकर मुझे दया आती है; हे जगत्प्रभु, इन पर क्रोध न कीजिए।
प्रजापतिरुवाच
श्लोक 3 (12.263.3)
न कुप्ये न च मे कामो न भवेयुः प्रजा इति । लाघवार्थं धरण्यास्तु ततः संहार इष्यते ॥
na kupye na ca me kāmo na bhaveyuḥ prajā iti | lāghavārthaṃ dharaṇyāstu tataḥ saṃhāra iṣyate
मैं क्रुद्ध नहीं हूँ, और मेरी यह इच्छा भी नहीं कि प्रजा न रहे। पृथ्वी का भार हल्का करने के लिए ही संहार चाहा जाता है।
श्लोक 4 (12.263.4)
इयं हि मां सदा देवी भारार्ता समचोदयत् । संहारार्थं महादेव भारेणाप्सु निमज्जती ॥
iyaṃ hi māṃ sadā devī bhārārtā samacodayat | saṃhārārthaṃ mahādeva bhāreṇāpsu nimajjatī
हे महादेव, भार से पीड़ित यह देवी पृथ्वी, भार के कारण जल में डूबती हुई, मुझे संहार के लिए सदा प्रेरित करती रही है।
श्लोक 5 (12.263.5)
यदाऽहं नाधिगच्छामि बुद्ध्या बहु विचारयन् । संहारमासां वृद्धानां ततो मां क्रोध आविशत् ॥
yadā'haṃ nādhigacchāmi buddhyā bahu vicārayan | saṃhāramāsāṃ vṛddhānāṃ tato māṃ krodha āviśat
जब बहुत सोचने पर भी मैं बुद्धि से इन बढ़ी हुई प्रजाओं के संहार का कोई उपाय न पा सका, तब क्रोध ने मुझे आविष्ट कर लिया।
स्थाणुरुवाच
श्लोक 6 (12.263.6)
संहारात्त्वं निवर्तस्व मा क्रुधो विबुधेश्वर । मा प्रजाः स्थावरं चैव जङ्गमं च व्यनीनशः ॥
saṃhārāttvaṃ nivartasva mā krudho vibudheśvara | mā prajāḥ sthāvaraṃ caiva jaṅgamaṃ ca vyanīnaśaḥ
आप संहार से लौट आइए। हे देवेश्वर, क्रोध न कीजिए। स्थावर और जंगम प्रजा का नाश न कीजिए।
श्लोक 7 (12.263.7)
पल्वलानि च सर्वाणि सर्वं चैव तृणोलपम् । स्थावरं जङ्गमं चैव भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥
palvalāni ca sarvāṇi sarvaṃ caiva tṛṇolapam | sthāvaraṃ jaṅgamaṃ caiva bhūtagrāmaṃ caturvidham
सब पोखरों, सारी घास और सरकण्डों, स्थावर और जंगम, चारों प्रकार के प्राणिसमूह को —
श्लोक 8 (12.263.8)
अकाले भस्मसाद्भूतं जगत्सर्वमुपप्लुतम् । प्रसीद भगवन्साधो वर एष वृतो मया ॥
akāle bhasmasādbhūtaṃ jagatsarvamupaplutam | prasīda bhagavansādho vara eṣa vṛto mayā
असमय में सारा जगत् भस्म हो गया, तहस-नहस हो गया। हे भगवन्, हे साधु, प्रसन्न होइए; यही वर मैंने माँगा है।
श्लोक 9 (12.263.9)
नष्टा न पुनरेष्यन्ति प्रजा ह्येताः कथंचन । तस्मान्निवर्ततामेतत्तेन स्वेनेव तेजसा ॥
naṣṭā na punareṣyanti prajā hyetāḥ kathaṃcana | tasmānnivartatāmetattena sveneva tejasā
नष्ट होकर ये प्रजाएँ किसी प्रकार लौटकर नहीं आएँगी। इसलिए इसे लौटा लिया जाए, मानो उसी आपके अपने तेज से।
श्लोक 10 (12.263.10)
उपायमन्यं संपश्य भूतानां हितकाम्यया । यथामी जन्तवः सर्वे न दह्येरन्पितामह ॥
upāyamanyaṃ saṃpaśya bhūtānāṃ hitakāmyayā | yathāmī jantavaḥ sarve na dahyeranpitāmaha
प्राणियों के हित की इच्छा से कोई दूसरा उपाय सोचिए, ताकि हे पितामह, ये सब जीव जलें नहीं।
श्लोक 11 (12.263.11)
अभावं हि न गच्छेयुरुत्सन्नप्रजनाः प्रजाः । पुत्रत्वेनानुसंकल्प्य त्वयाहं तपसाप्यज । अधिदैवे नियुक्तोस्मि त्वया लोकहितेप्सुना ॥
abhāvaṃ hi na gaccheyurutsannaprajanāḥ prajāḥ | putratvenānusaṃkalpya tvayāhaṃ tapasāpyaja | adhidaive niyuktosmi tvayā lokahitepsunā
जिनकी सन्तान की परम्परा कट गई है, ऐसी प्रजा अभाव को न पहुँचे। हे अजन्मा, आपने तप से मुझे पुत्र-रूप में संकल्पित किया था, और लोकहित चाहनेवाले आपने मुझे अधिदैव के पद पर नियुक्त किया है।
श्लोक 12 (12.263.12)
त्वद्भवं हि जगन्नाथ एतत्स्थावरजङ्गमम् । प्रसाद्य त्वां महादेव याचाम्यावृत्तिजाः प्रजाः ॥
tvadbhavaṃ hi jagannātha etatsthāvarajaṅgamam | prasādya tvāṃ mahādeva yācāmyāvṛttijāḥ prajāḥ
हे जगन्नाथ, यह स्थावर-जंगम जगत् आपसे ही उत्पन्न है। हे महादेव, आपको प्रसन्न करके मैं माँगता हूँ कि प्रजाएँ बार-बार जन्म लेनेवाली हों।
नारद उवाच
श्लोक 13 (12.263.13)
श्रुत्वा तु वचनं देवः स्थाणोर्नियतवाङ्मनाः । तेजस्तत्सन्निजग्राह पुनरेवान्तरात्मनि ॥
śrutvā tu vacanaṃ devaḥ sthāṇorniyatavāṅmanāḥ | tejastatsannijagrāha punarevāntarātmani
स्थाणु की बात सुनकर वाणी और मन को संयत किए हुए देव ने उस तेज को फिर अपने ही भीतर समेट लिया।
श्लोक 14 (12.263.14)
ततोऽग्निमुपसंगृह्य भगवाँल्लोकपूजितः । प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कल्पयामास वै प्रभुः ॥
tato'gnimupasaṃgṛhya bhagavām̐llokapūjitaḥ | pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca kalpayāmāsa vai prabhuḥ
फिर अग्नि को समेटकर लोकपूजित भगवान् प्रभु ने प्रवृत्ति और निवृत्ति की रचना की।
श्लोक 15 (12.263.15)
उपसंहरतस्तस्य तमग्निं रोषजं तदा । प्रादुर्बभूव विश्वेभ्यः खेभ्यो नारी महात्मनः ॥
upasaṃharatastasya tamagniṃ roṣajaṃ tadā | prādurbabhūva viśvebhyaḥ khebhyo nārī mahātmanaḥ
जब वे अपने क्रोध से उत्पन्न उस अग्नि को समेट रहे थे, तब उन महात्मा के सब छिद्रों से एक नारी प्रकट हुई।
श्लोक 16 (12.263.16)
कृष्णरक्ताम्बरधरा कृष्णनेत्रतलान्तरा । दिव्यकुण्डलसंपन्ना दिव्याभरणभूषिता ॥
kṛṣṇaraktāmbaradharā kṛṣṇanetratalāntarā | divyakuṇḍalasaṃpannā divyābharaṇabhūṣitā
वह काले और लाल वस्त्र पहने थी, उसके नेत्रों के भीतर का भाग काला था; वह दिव्य कुण्डलों से सम्पन्न और दिव्य आभूषणों से सजी थी।
श्लोक 17 (12.263.17)
सा विनिःसृत्य वै खेभ्यो दक्षिणामाश्रिता दिशम् । ददृशाते च तां कन्यां देवौ विश्वेश्वरावुभौ ॥
sā viniḥsṛtya vai khebhyo dakṣiṇāmāśritā diśam | dadṛśāte ca tāṃ kanyāṃ devau viśveśvarāvubhau
उन छिद्रों से निकलकर वह दक्षिण दिशा में जा खड़ी हुई; और विश्व के दोनों स्वामी देवों ने उस कन्या को देखा।
श्लोक 18 (12.263.18)
तामाहूय तदा देवो लोकानामादिरीश्वरः । मृत्यो इति महीपाल जहि चेमाः प्रजा इति ॥
tāmāhūya tadā devo lokānāmādirīśvaraḥ | mṛtyo iti mahīpāla jahi cemāḥ prajā iti
तब लोकों के आदि ईश्वर देव ने उसे बुलाकर कहा, 'मृत्यु!' और हे राजन्, 'इन प्रजाओं को मार डालो।'
ब्रह्मोवाच
श्लोक 19 (12.263.19)
त्वं हि संहारबुद्ध्या मे चिन्तिता रुषितेन च । तस्मात्संहर सर्वास्त्वं प्रजाः सजडपण्डिताः ॥
tvaṃ hi saṃhārabuddhyā me cintitā ruṣitena ca | tasmātsaṃhara sarvāstvaṃ prajāḥ sajaḍapaṇḍitāḥ
तुम्हारा चिन्तन मैंने क्रोध में, संहार की बुद्धि से किया था; इसलिए मूर्खों और पण्डितों सहित इन सब प्रजाओं का तुम संहार करो।
श्लोक 20 (12.263.20)
अविशेषेण चैव त्वं प्रजाः संहर कामिनि । मम त्वं हि नियोगेन श्रेयः परमवाप्स्यसि ॥
aviśeṣeṇa caiva tvaṃ prajāḥ saṃhara kāmini | mama tvaṃ hi niyogena śreyaḥ paramavāpsyasi
और हे कामिनी, बिना भेद किए तुम प्रजा का संहार करो। मेरी आज्ञा से ऐसा करके तुम परम कल्याण पाओगी।
नारद उवाच
श्लोक 21 (12.263.21)
एवमुक्ता तु या देवी मृत्युः कमलमालिनी । प्रदध्यौ दुःखिता बाला साश्रुपातमतीव च ॥
evamuktā tu yā devī mṛtyuḥ kamalamālinī | pradadhyau duḥkhitā bālā sāśrupātamatīva ca
यह सुनकर कमलों की माला पहने वह देवी मृत्यु दुःखी होकर सोचने लगी; वह बाला बहुत आँसू बहाने लगी।
श्लोक 22 (12.263.22)
पाणिभ्यां चैव जग्राह तान्यश्रूणि जनेश्वरः । मानवानां हितार्थाय ययाचे पुनरेव ह ॥
pāṇibhyāṃ caiva jagrāha tānyaśrūṇi janeśvaraḥ | mānavānāṃ hitārthāya yayāce punareva ha
जनेश्वर ने उन आँसुओं को अपनी दोनों हथेलियों में थाम लिया, और मनुष्यों के हित के लिए उससे फिर याचना की।