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शान्ति पर्व · अध्याय 264

मृत्यु के आँसुओं से रोगों की उत्पत्ति

नारद मृत्यु की कथा आगे सुनाते हैं, जिसे ब्रह्मा ने प्राणियों के संहार के लिए रचा था। वह अधर्म के भय से प्रार्थना करती है और ब्रह्मा के मौन हो जाने पर चली जाकर बहुत लम्बे समय तक तप करती है। अन्त में ब्रह्मा वचन देते हैं कि उसे पाप नहीं लगेगा: उनके हाथों में थामे हुए आँसू रोग बन जाएँगे और प्रत्येक जीवन के अन्त में काम और क्रोध उसके साथ रहेंगे। फिर नारद राजा से कहते हैं कि देवता और मनुष्य दोनों जाते और लौटते हैं, इसलिए उसे अपने पुत्र के लिए शोक नहीं करना चाहिए।

अध्याय 263अध्याय-सूचीअध्याय 265

नारद उवाच

श्लोक 1 (12.264.1)

विनीय दुःखमबला साऽऽत्मनैवायतेक्षणा । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा तमेवावर्जिता तदा ॥

vinīya duḥkhamabalā sā''tmanaivāyatekṣaṇā | uvāca prāñjalirbhūtvā tamevāvarjitā tadā

अपने ही बल से दुःख को दूर करके उस विशाल नेत्रोंवाली अबला ने उन्हीं के सामने विनत होकर हाथ जोड़े और तब कहा।

मृत्युरुवाच

श्लोक 2 (12.264.2)

त्वया सृष्टा कथं नारी मादृशी वदतां वर । रौद्रकर्माभिजायेत सर्वप्राणिभयंकरी ॥

tvayā sṛṣṭā kathaṃ nārī mādṛśī vadatāṃ vara | raudrakarmābhijāyeta sarvaprāṇibhayaṃkarī

“हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, आपकी रची हुई मुझ जैसी नारी क्रूर कर्म करनेवाली और सब प्राणियों को भय देनेवाली कैसे बने?

श्लोक 3 (12.264.3)

विभेम्यहमधर्मस्य धर्म्यमादिश कर्म मे । त्वं मां भीतामवेक्षस्व शिवेनेश्वरचक्षुषा ॥

vibhemyahamadharmasya dharmyamādiśa karma me | tvaṃ māṃ bhītāmavekṣasva śiveneśvaracakṣuṣā

मैं अधर्म से डरती हूँ; मुझे कोई धर्मसंगत कर्म बताइए। आप अपनी कल्याणकारी, ईश्वरीय दृष्टि से मुझ भयभीत की ओर देखिए।

श्लोक 4 (12.264.4)

बालान्वृद्धान्वयस्थांश्च न हरेयमनागसः । प्राणिनः प्राणिनामीश नमस्तेऽस्तु प्रसीद मे ॥

bālānvṛddhānvayasthāṃśca na hareyamanāgasaḥ | prāṇinaḥ prāṇināmīśa namaste'stu prasīda me

हे प्राणियों के स्वामी, मैं निरपराध बालकों, वृद्धों और युवाओं को नहीं हरूँगी। आपको नमस्कार है, मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक 5 (12.264.5)

प्रियान्पुत्रान्वयस्यांश्च भ्रातॄन्मातॄः पितृनपि । अपध्यास्यन्ति यद्येवं मृतास्तेभ्यो विभेम्यहम् ॥

priyānputrānvayasyāṃśca bhrātṝnmātṝḥ pitṛnapi | apadhyāsyanti yadyevaṃ mṛtāstebhyo vibhemyaham

मृतकों के प्रिय पुत्र, मित्र, भाई, माताएँ और पिता यदि इस प्रकार मेरा अनिष्ट चाहेंगे, तो मैं उनसे डरती हूँ।

श्लोक 6 (12.264.6)

कृपणाश्रुपरिक्लेदो दहेन्मां शाश्वतीः समाः । तेभ्योऽहं बलवद्भीता शरणं त्वामुपागता ॥

kṛpaṇāśruparikledo dahenmāṃ śāśvatīḥ samāḥ | tebhyo'haṃ balavadbhītā śaraṇaṃ tvāmupāgatā

दीन जनों के आँसुओं की धारा मुझे अनन्त वर्षों तक जलाती रहेगी; मैं उनसे बहुत डरी हुई हूँ, इसीलिए आपकी शरण में आई हूँ।

श्लोक 7 (12.264.7)

यमस्य भवने देव पात्यन्ते पापकर्मिणः । प्रसादये त्वां वरद प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥

yamasya bhavane deva pātyante pāpakarmiṇaḥ | prasādaye tvāṃ varada prasādaṃ kuru me prabho

हे देव, यम के भवन में पापकर्म करनेवाले गिराए जाते हैं। हे वरदायक, मैं आपको प्रसन्न करती हूँ; हे प्रभु, मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक 8 (12.264.8)

एतदिच्छाम्यहं कामं त्वत्तो लोकपितामह । इच्छेयं त्वत्प्रसादाच्च तपस्तप्तुं महेश्वर ॥

etadicchāmyahaṃ kāmaṃ tvatto lokapitāmaha | iccheyaṃ tvatprasādācca tapastaptuṃ maheśvara

हे लोकपितामह, मैं आपसे यही वर चाहती हूँ; और हे महेश्वर, आपकी कृपा से मैं तपस्या करना चाहती हूँ।”

पितामह उवाच

श्लोक 9 (12.264.9)

त्वं हि संहारबुद्ध्या मे चिन्तिता रुषितेन च । तस्मात्संहर सर्वास्त्वं प्रजा मा च विचारय ॥

tvaṃ hi saṃhārabuddhyā me cintitā ruṣitena ca | tasmātsaṃhara sarvāstvaṃ prajā mā ca vicāraya

“मैंने क्रोध में भरकर संहार के विचार से ही तुम्हें सोचा (रचा) था; इसलिए तुम सब प्रजा का संहार करो और सोच-विचार मत करो।

श्लोक 10 (12.264.10)

एतदेवमवश्यं हि भविता नैतदन्यथा । क्रियतामनवद्याङ्गि यथोक्तं मद्वचोऽनघे ॥

etadevamavaśyaṃ hi bhavitā naitadanyathā | kriyatāmanavadyāṅgi yathoktaṃ madvaco'naghe

यह इसी प्रकार अवश्य होगा, अन्यथा नहीं होगा। हे निर्दोष अंगोंवाली, हे निष्पाप, जैसा मैंने कहा है वैसा करो।”

नारद उवाच

श्लोक 11 (12.264.11)

एवमुक्ता महाबाहो मृत्युः परपुरंजय । न व्याजहार तस्थौ च प्रह्वा भगवदुन्मुखी ॥

evamuktā mahābāho mṛtyuḥ parapuraṃjaya | na vyājahāra tasthau ca prahvā bhagavadunmukhī

हे महाबाहु, हे शत्रुनगरों को जीतनेवाले, इस प्रकार कहे जाने पर मृत्यु ने कोई उत्तर नहीं दिया; वह विनम्र होकर भगवान् की ओर मुख किए खड़ी रही।

श्लोक 12 (12.264.12)

पुनः पुनरथोक्ता सा गतसत्त्वेव भामिनी । तूष्णीमासीत्ततो देवो लोकानामीश्वरेश्वरः ॥

punaḥ punarathoktā sā gatasattveva bhāminī | tūṣṇīmāsīttato devo lokānāmīśvareśvaraḥ

बार-बार कहे जाने पर भी वह सुन्दरी प्राणहीन-सी होकर चुप रही; तब लोकों के ईश्वरों के भी ईश्वर देव भी मौन हो गए।

श्लोक 13 (12.264.13)

प्रससाद किल ब्रह्मा स्वयमेवात्मनाऽऽत्मनि । स्मयमानश्च लोकेशो लोकान्सर्वानवैक्षत ॥

prasasāda kila brahmā svayamevātmanā''tmani | smayamānaśca lokeśo lokānsarvānavaikṣata

कहते हैं, तब ब्रह्मा अपने ही भीतर अपने आप प्रसन्न हो गए, और मुस्कराते हुए उन लोकपति ने सब लोकों को देखा।

श्लोक 14 (12.264.14)

निवृत्तरोषे तस्मिंस्तु भगवत्यपराजिते । सा कन्याऽथ जगामास्य समीपादिति नःश्रुतम् ॥

nivṛttaroṣe tasmiṃstu bhagavatyaparājite | sā kanyā'tha jagāmāsya samīpāditi naḥśrutam

उन अपराजित भगवान् का क्रोध शान्त हो जाने पर वह कन्या उनके पास से चली गई, ऐसा हमने सुना है।

श्लोक 15 (12.264.15)

अपसृत्याप्रतिश्रुत्य प्रजासंहरणं तदा । त्वरमाणेव राजेन्द्र मृत्युर्धेनुकमभ्यगात् ॥

apasṛtyāpratiśrutya prajāsaṃharaṇaṃ tadā | tvaramāṇeva rājendra mṛtyurdhenukamabhyagāt

हे राजेन्द्र, प्रजा के संहार की प्रतिज्ञा किए बिना ही वहाँ से हटकर मृत्यु मानो शीघ्रता से धेनुक की ओर गई।

श्लोक 16 (12.264.16)

सा तत्र परमं देवी तपोऽचरत दुश्चरम् । समा ह्येकपदे तस्थौ दशपद्मानि पञ्च च ॥

sā tatra paramaṃ devī tapo'carata duścaram | samā hyekapade tasthau daśapadmāni pañca ca

वहाँ उस देवी ने अत्यन्त कठिन परम तपस्या की; वह एक पैर पर पन्द्रह पद्म वर्षों (दस और पाँच पद्म) तक खड़ी रही।

श्लोक 17 (12.264.17)

तां तथा कुर्वतीं तत्र तपः परमदुश्चरम् । पुनरेव महातेजा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥

tāṃ tathā kurvatīṃ tatra tapaḥ paramaduścaram | punareva mahātejā brahmā vacanamabravīt

वहाँ इस प्रकार अत्यन्त कठिन तप करती हुई उससे महातेजस्वी ब्रह्मा ने फिर कहा।

श्लोक 18 (12.264.18)

कुरुष्व मे वचो मृत्यो तदनादृत्य सत्वरा । तथैवैकपदे तात पुनरन्यानि सप्त सा ॥

kuruṣva me vaco mṛtyo tadanādṛtya satvarā | tathaivaikapade tāta punaranyāni sapta sā

“हे मृत्यु, मेरा वचन मानो।” पर उसकी उपेक्षा करके वह शीघ्रता से उसी प्रकार, हे तात, एक पैर पर फिर अन्य सात पद्म वर्ष तक

श्लोक 19 (12.264.19)

तस्थौ पद्मानि षट् चैव पञ्च द्वे चैव मानद । भूयः पद्मायुतं तात मृगैः सह चचार सा ॥

tasthau padmāni ṣaṭ caiva pañca dve caiva mānada | bhūyaḥ padmāyutaṃ tāta mṛgaiḥ saha cacāra sā

खड़ी रही; फिर छह, पाँच और दो पद्म वर्ष भी, हे मान देनेवाले। इसके बाद दस हज़ार पद्म वर्ष तक वह मृगों के साथ विचरती रही।

श्लोक 20 (12.264.20)

द्वे चायुते नरश्रेष्ठ वाय्वाहारा महामते । पुनरेव ततो राजन्मौनमातिष्ठदुत्तमम् ॥

dve cāyute naraśreṣṭha vāyvāhārā mahāmate | punareva tato rājanmaunamātiṣṭhaduttamam

हे नरश्रेष्ठ, हे महामते, दो अयुत (दस-दस हज़ार) और वह वायु ही का आहार करती रही; फिर हे राजन्, उसने परम मौन व्रत धारण किया।

श्लोक 21 (12.264.21)

अप्सु वर्षसहस्राणि सप्त चैकं च पार्थिव । ततो जगाम सा कन्या कौशिकीं नृपसत्तम ॥

apsu varṣasahasrāṇi sapta caikaṃ ca pārthiva | tato jagāma sā kanyā kauśikīṃ nṛpasattama

सात हज़ार और एक वर्ष तक वह जल में रही। हे नृपश्रेष्ठ, फिर वह कन्या कौशिकी नदी पर गई।

श्लोक 22 (12.264.22)

तत्र वायुजलाहारा चचार नियमं पुनः । ततो ययौ महाभागा गङ्गां मेरुं च केवलम् ॥

tatra vāyujalāhārā cacāra niyamaṃ punaḥ | tato yayau mahābhāgā gaṅgāṃ meruṃ ca kevalam

वहाँ वायु और जल का आहार करती हुई उसने फिर नियम का पालन किया। फिर वह महाभागा गंगा और केवल मेरु के पास गई।

श्लोक 23 (12.264.23)

तस्थौ दार्विव निश्चेष्टा प्रजानां हितकाम्यया । ततो हिमवतो मूर्ध्नि यत्र देवाः समीजिरे ॥

tasthau dārviva niśceṣṭā prajānāṃ hitakāmyayā | tato himavato mūrdhni yatra devāḥ samījire

प्रजा के हित की कामना से वह काठ की तरह निश्चेष्ट खड़ी रही। फिर वह हिमालय के उस शिखर पर गई जहाँ देवताओं ने यज्ञ किए थे।

श्लोक 24 (12.264.24)

तत्राङ्गुष्ठेन राजेन्द्र निखर्वमचरत्तपः । तस्थौ पितामहं चैव तोषयामास यत्नतः ॥

tatrāṅguṣṭhena rājendra nikharvamacarattapaḥ | tasthau pitāmahaṃ caiva toṣayāmāsa yatnataḥ

हे राजेन्द्र, वहाँ उसने अँगूठे पर खड़े होकर निखर्व (अतिविशाल कालखण्ड) तक तप किया; वह खड़ी रही और उसने प्रयत्नपूर्वक पितामह को प्रसन्न किया।

श्लोक 25 (12.264.25)

ततस्तामब्रवीत्तत्र लोकानां प्रपितामहः । किमिदं वर्तसे पुत्रि क्रियतां मम तद्वचः ॥

tatastāmabravīttatra lokānāṃ prapitāmahaḥ | kimidaṃ vartase putri kriyatāṃ mama tadvacaḥ

तब वहाँ लोकों के प्रपितामह ने उससे कहा, “पुत्री, यह तुम क्या कर रही हो? मेरी बात मानो।”

श्लोक 26 (12.264.26)

ततोऽब्रवीत्पुनर्मृत्युर्भगवन्तं पितामहम् । न हरेयं प्रजा देव पुनस्त्वाऽहं प्रसादये ॥

tato'bravītpunarmṛtyurbhagavantaṃ pitāmaham | na hareyaṃ prajā deva punastvā'haṃ prasādaye

तब मृत्यु ने भगवान् पितामह से फिर कहा, “हे देव, मैं प्रजा को नहीं हरूँगी; मैं आपसे फिर विनती करती हूँ।”

श्लोक 27 (12.264.27)

तामधर्मभयाद्भीतां पुनरेव प्रयाचतीम् । तदाऽब्रवीद्देवदेवो निगृह्येदं वचस्ततः ॥

tāmadharmabhayādbhītāṃ punareva prayācatīm | tadā'bravīddevadevo nigṛhyedaṃ vacastataḥ

अधर्म के भय से डरी हुई और बार-बार याचना करती हुई उससे तब देवों के देव ने दृढ़ निश्चय करके यह वचन कहा।

पितामह उवाच

श्लोक 28 (12.264.28)

अधर्मो नास्ति ते मृत्यो संयच्छेमाः प्रजाः शुभे । मयाऽप्युक्तं मृषा भद्रे भविता नेह किंचन ॥

adharmo nāsti te mṛtyo saṃyacchemāḥ prajāḥ śubhe | mayā'pyuktaṃ mṛṣā bhadre bhavitā neha kiṃcana

“हे मृत्यु, तुम्हें अधर्म नहीं लगेगा; हे शुभे, इन प्रजाओं का संयमन करो। हे भद्रे, मेरा कहा हुआ भी मिथ्या नहीं होगा; यहाँ कुछ भी अन्यथा नहीं होगा।

श्लोक 29 (12.264.29)

धर्मः सनातनश्च त्वामिहैवानुप्रवेक्ष्यति । अहं च विबुधाश्चैव त्वद्धिते निरताः सदा ॥

dharmaḥ sanātanaśca tvāmihaivānupravekṣyati | ahaṃ ca vibudhāścaiva tvaddhite niratāḥ sadā

सनातन धर्म तुम में यहीं प्रवेश करेगा; और मैं तथा सब देवता सदा तुम्हारे हित में लगे रहेंगे।

श्लोक 30 (12.264.30)

इममन्यं च ते कामं ददानि मनसेप्सितम् । न त्वां दोषेण यास्यन्ति व्याधिसंपीडिताः प्रजाः ॥

imamanyaṃ ca te kāmaṃ dadāni manasepsitam | na tvāṃ doṣeṇa yāsyanti vyādhisaṃpīḍitāḥ prajāḥ

मैं तुम्हें तुम्हारे मन का एक और मनोरथ भी देता हूँ: रोगों से पीड़ित प्रजाएँ तुम्हें दोष नहीं देंगी।

श्लोक 31 (12.264.31)

पुरुषेषु च रूपेण पुरुषस्त्वं भविष्यसि । स्त्रीषु स्त्रीरूपिणी चैव तृतीयेषु नपुंसकम् ॥

puruṣeṣu ca rūpeṇa puruṣastvaṃ bhaviṣyasi | strīṣu strīrūpiṇī caiva tṛtīyeṣu napuṃsakam

पुरुषों में तुम रूप से पुरुष होगी, स्त्रियों में स्त्री-रूप होगी और तीसरी कोटि वालों में नपुंसक।”

नारद उवाच

श्लोक 32 (12.264.32)

सैवमुक्ता महाराज कृताञ्जलिरुवाच ह । पुनरेव महात्मानं नेति देवेशमव्ययम् ॥

saivamuktā mahārāja kṛtāñjaliruvāca ha | punareva mahātmānaṃ neti deveśamavyayam

हे महाराज, इस प्रकार कहे जाने पर उसने हाथ जोड़कर उन अविनाशी महात्मा देवेश्वर से फिर कहा, “नहीं।”

श्लोक 33 (12.264.33)

तामब्रवीत्तदा देवो मृत्यो संहर मानवान् । अधर्मस्ते न भविता यथा ध्यास्याम्यहं शुभे ॥

tāmabravīttadā devo mṛtyo saṃhara mānavān | adharmaste na bhavitā yathā dhyāsyāmyahaṃ śubhe

तब देव ने उससे कहा, “मृत्यु, मनुष्यों का संहार करो; तुम्हें अधर्म नहीं होगा — हे शुभे, मैं ऐसा विचार करूँगा।”

पितामह उवाच

श्लोक 34 (12.264.34)

त्वं हि शक्ता च युक्ता च पूर्वोत्पन्ना च भामिनि । अनुशिष्टा च निर्दोषा तस्मात्त्वं कुरु मे मतम् ॥

tvaṃ hi śaktā ca yuktā ca pūrvotpannā ca bhāmini | anuśiṣṭā ca nirdoṣā tasmāttvaṃ kuru me matam

“हे भामिनी, तुम समर्थ हो, योग्य हो, सबसे पहले उत्पन्न हुई हो, उपदेश पाई हुई और निर्दोष हो; इसलिए मेरे मत के अनुसार करो।”

श्लोक 35 (12.264.35)

यानश्रुबिन्दून्पतितानपश्यं । ये पाणिभ्यां धारितास्ते पुरस्तात् । ते व्याधयो मानवान्घोररूपाः । प्राप्ते काले पीडयिष्यन्ति मृत्यो ॥

yānaśrubindūnpatitānapaśyaṃ | ye pāṇibhyāṃ dhāritāste purastāt | te vyādhayo mānavānghorarūpāḥ | prāpte kāle pīḍayiṣyanti mṛtyo

“जिन आँसू की बूँदों को मैंने गिरते देखा, जिन्हें मैंने पहले अपने हाथों में थामा था, वे ही घोर रूपवाले रोग बनेंगे और हे मृत्यु, समय आने पर मनुष्यों को पीड़ित करेंगे।

श्लोक 36 (12.264.36)

सर्वेषां त्वं प्राणिनामन्तकाले । कामक्रोधौ सहितौ योजयेथाः । एवं धर्मस्त्वामुपैष्यत्यमोघो । न चाधर्मं लप्स्यसे तुल्यवृत्तिः ॥

sarveṣāṃ tvaṃ prāṇināmantakāle | kāmakrodhau sahitau yojayethāḥ | evaṃ dharmastvāmupaiṣyatyamogho | na cādharmaṃ lapsyase tulyavṛttiḥ

सब प्राणियों के अन्तकाल में तुम काम और क्रोध को साथ-साथ जोड़ देना। इस प्रकार अमोघ धर्म तुम्हारे पास आएगा और सबके प्रति समान आचरण करती हुई तुम अधर्म को नहीं पाओगी।

श्लोक 37 (12.264.37)

एवं धर्मं पालयिष्यस्यथो त्वं । न चात्मानं मञ्जयिष्यस्यधर्मे । तस्मात्कामं रोचयाभ्यागतं त्वं । सा त्वं साधो संहरस्वेह जन्तून् ॥

evaṃ dharmaṃ pālayiṣyasyatho tvaṃ | na cātmānaṃ mañjayiṣyasyadharme | tasmātkāmaṃ rocayābhyāgataṃ tvaṃ | sā tvaṃ sādho saṃharasveha jantūn

इस प्रकार तुम धर्म का पालन करोगी और अपने को अधर्म में नहीं डुबाओगी। इसलिए जो कार्य तुम्हारे सामने आया है उसे अपनाओ; हे साध्वी, तुम यहाँ प्राणियों का संहार करो।”

नारद उवाच

श्लोक 38 (12.264.38)

सा वै तदा मृत्युसंज्ञा कृतास्त्री । शापाद्भीता बाढमित्यब्रवीत्तम् । अथो प्राणान्प्राणिनामन्तकाले । कामक्रोधौ प्राप्य नित्यं निहन्ति ॥

sā vai tadā mṛtyusaṃjñā kṛtāstrī | śāpādbhītā bāḍhamityabravīttam | atho prāṇānprāṇināmantakāle | kāmakrodhau prāpya nityaṃ nihanti

तब मृत्यु नाम पाई हुई, स्त्री के रूप में रची गई उसने शाप के भय से उनसे कहा, “ठीक है।” और तब से वह प्राणियों के अन्तकाल में काम और क्रोध को लाकर उनके प्राण नित्य हर लेती है।

श्लोक 39 (12.264.39)

मृत्योर्ये ते व्याधयश्चाश्रुपाता । मनुष्याणां युज्यते यैः शरीरम् । सर्वेषां वै प्राणिनां प्राणनान्ते । तस्माच्छोकं मा कृथा बुद्ध्य बुद्ध्या ॥

mṛtyorye te vyādhayaścāśrupātā | manuṣyāṇāṃ yujyate yaiḥ śarīram | sarveṣāṃ vai prāṇināṃ prāṇanānte | tasmācchokaṃ mā kṛthā buddhya buddhyā

मृत्यु के वे आँसू ही रोग हैं, जिनसे मनुष्यों का शरीर बँधता है; वे सब प्राणियों के प्राणान्त के समय आते हैं। इसलिए शोक मत करो; बुद्धि से इसे समझो।

श्लोक 40 (12.264.40)

सर्वे देवाः प्राणिनां प्राणनान्ते । गत्वा वृत्ताः सन्निवृत्तास्तथैव । एवं सर्वे मानवाः प्राणनान्ते । गत्वा वृत्ता देववद्राजसिंह ॥

sarve devāḥ prāṇināṃ prāṇanānte | gatvā vṛttāḥ sannivṛttāstathaiva | evaṃ sarve mānavāḥ prāṇanānte | gatvā vṛttā devavadrājasiṃha

सब देवता भी प्राणों के अन्त पर जाकर उसी प्रकार लौट आते हैं; इसी तरह, हे राजसिंह, सब मनुष्य प्राणान्त पर जाकर देवताओं की भाँति लौट आते हैं।

श्लोक 41 (12.264.41)

वायुर्भीमो भीमनादो महौजाः । सर्वेषां च प्राणिनां प्राणभूतः । अनावृत्तिर्देहिनां देहपाते । तस्माद्वायुर्देवदेवो विशिष्टः ॥

vāyurbhīmo bhīmanādo mahaujāḥ | sarveṣāṃ ca prāṇināṃ prāṇabhūtaḥ | anāvṛttirdehināṃ dehapāte | tasmādvāyurdevadevo viśiṣṭaḥ

वायु भयंकर है, भयंकर नादवाला और महाबली है, और सब प्राणियों का प्राणरूप है; देहधारियों के शरीर गिरने पर (उनका) लौटना नहीं होता; इसलिए वायु देवों का देव, सबसे श्रेष्ठ है।

श्लोक 42 (12.264.42)

सर्वे देवा मर्त्यसंज्ञाविशिष्टाः । सर्वे मर्त्या देवसंज्ञाविशिष्टाः । तस्मात्पुत्रं मा शुचो राजसिंह । पुत्रः स्वर्गं प्राप्य ते मोदते ह ॥

sarve devā martyasaṃjñāviśiṣṭāḥ | sarve martyā devasaṃjñāviśiṣṭāḥ | tasmātputraṃ mā śuco rājasiṃha | putraḥ svargaṃ prāpya te modate ha

सब देवता केवल “मर्त्य” नाम से और सब मर्त्य केवल “देव” नाम से विशिष्ट हैं। इसलिए, हे राजसिंह, अपने पुत्र के लिए शोक मत करो; वह स्वर्ग पाकर आनन्द करता है।

श्लोक 43 (12.264.43)

एवं मृत्युर्देवसृष्टा प्रजानां । प्राप्ते काले संहरन्ती यथावत् । तस्याश्चैव व्याधयस्तेऽश्रुपाताः । प्राप्ते काले संहरन्तीह जन्तून् ॥

evaṃ mṛtyurdevasṛṣṭā prajānāṃ | prāpte kāle saṃharantī yathāvat | tasyāścaiva vyādhayaste'śrupātāḥ | prāpte kāle saṃharantīha jantūn

इस प्रकार देव की रची हुई मृत्यु समय आने पर प्रजा का यथाविधि संहार करती है; और उसके वे रोगरूप आँसू भी समय आने पर यहाँ प्राणियों का संहार करते हैं।

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