शान्ति पर्व · अध्याय 265
भीष्म द्वारा धर्म के लक्षणों का वर्णन
युधिष्ठिर पूछते हैं कि धर्म क्या है, कहाँ से आता है, और वह इस लोक के लिए है, परलोक के लिए या दोनों के लिए। भीष्म उसके लक्षण (सदाचार, स्मृति, वेद और प्रयोजन) बताते हैं और भयभीत चोर तथा निर्भय सज्जन के उदाहरण से दिखाते हैं कि धर्म सत्य पर टिका है और इस नियम पर कि दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार किया जाए जैसा अपने लिए चाहा जाता है। अन्त में वे युधिष्ठिर को कभी कुटिलता में मन न लगाने की चेतावनी देते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.265.1)
इमे वै मानवाः सर्वे धर्मं प्रति विशङ्किताः । कोऽयं धर्मः कुतो धर्मस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
ime vai mānavāḥ sarve dharmaṃ prati viśaṅkitāḥ | ko'yaṃ dharmaḥ kuto dharmastanme brūhi pitāmaha
ये सब मनुष्य धर्म के विषय में शंकित हैं। हे पितामह, यह धर्म क्या है और धर्म कहाँ से आता है? यह मुझे बताइए।
श्लोक 2 (12.265.2)
धर्मस्त्वयमिहार्थः किममुत्रार्थोपि वा भवेत् । उभयार्थो हि वा धर्मस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
dharmastvayamihārthaḥ kimamutrārthopi vā bhavet | ubhayārtho hi vā dharmastanme brūhi pitāmaha
क्या यह धर्म इस लोक के लिए है, या परलोक के लिए भी हो सकता है, अथवा दोनों के लिए है? हे पितामह, यह मुझे बताइए।”
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.265.3)
सदाचारः स्मृतिर्वेदास्त्रिविधं धर्मलक्षणम् । चतुर्थमर्थमप्याहुः कवयो धर्मलक्षणम् ॥
sadācāraḥ smṛtirvedāstrividhaṃ dharmalakṣaṇam | caturthamarthamapyāhuḥ kavayo dharmalakṣaṇam
“सदाचार, स्मृति और वेद, ये धर्म के तीन लक्षण हैं; और विद्वान् धर्म का चौथा लक्षण उसका प्रयोजन (अर्थ) भी बताते हैं।
श्लोक 4 (12.265.4)
अविध्युक्तानि कर्माणि व्यवस्यन्त्युप्तमूषरे । लोकयात्रार्थमेवेह धर्मस्य नियमः कृतः ॥
avidhyuktāni karmāṇi vyavasyantyuptamūṣare | lokayātrārthameveha dharmasya niyamaḥ kṛtaḥ
विधि से न कहे गए कर्म ऊसर में बोए बीज के समान ही अपनाए जाते हैं। धर्म का नियम केवल लोकयात्रा के निर्वाह के लिए बनाया गया है।
श्लोक 5 (12.265.5)
उभयत्र सुखोदर्क इह चैव परत्र च । अलब्ध्वा निपुणं धर्मं पापः पापे प्रसज्जति ॥
ubhayatra sukhodarka iha caiva paratra ca | alabdhvā nipuṇaṃ dharmaṃ pāpaḥ pāpe prasajjati
इसका फल यहाँ और परलोक, दोनों जगह सुखद होता है। जिसने धर्म को सूक्ष्मता से नहीं पाया, वह पापी पाप में ही लगा रहता है।
श्लोक 6 (12.265.6)
न च पापकृतः पापान्मुच्यन्ते केचिदापदि । अपापवादी भवति यथा भवति धर्मवित् । धर्मस्य निष्ठा स्वाचारस्तमेवाश्रित्य चावसेत् ॥
na ca pāpakṛtaḥ pāpānmucyante kecidāpadi | apāpavādī bhavati yathā bhavati dharmavit | dharmasya niṣṭhā svācārastamevāśritya cāvaset
आपत्ति के समय भी कोई पापकर्म करनेवाला अपने पापों से मुक्त नहीं होता। मनुष्य निन्दा से उसी प्रकार रहित होता है जिस प्रकार वह धर्म का जाननेवाला बनता है। धर्म की निष्ठा अपना सदाचार है; उसी का आश्रय लेकर रहना चाहिए।
श्लोक 7 (12.265.7)
यथाधर्मसमाविष्टो धनं गृह्णाति तस्करः । रमते निर्हरस्तेनः परवित्तमराजके ॥
yathādharmasamāviṣṭo dhanaṃ gṛhṇāti taskaraḥ | ramate nirharastenaḥ paravittamarājake
जैसे अधर्म से भरा चोर धन ले लेता है और जहाँ राजा नहीं है वहाँ दूसरों का धन हरता हुआ लुटेरा आनन्द मनाता है,
श्लोक 8 (12.265.8)
यदास्य तद्धरन्त्यन्ये तदा राजानमिच्छति । तदा तेषां स्पृहयते ये वै तुष्टाः स्वकैर्धनैः ॥
yadāsya taddharantyanye tadā rājānamicchati | tadā teṣāṃ spṛhayate ye vai tuṣṭāḥ svakairdhanaiḥ
वैसे ही जब दूसरे उसका वही धन हर लेते हैं, तब वह राजा को चाहने लगता है; तब वह उन लोगों से स्पृहा करता है जो अपने ही धन से सन्तुष्ट हैं।
श्लोक 9 (12.265.9)
अभीतः शुचिरभ्येति राजद्वारमशङ्कितः । न हि दुश्चरितं किंचिदन्तरात्मनि पश्यति ॥
abhītaḥ śucirabhyeti rājadvāramaśaṅkitaḥ | na hi duścaritaṃ kiṃcidantarātmani paśyati
पवित्र मनुष्य निर्भय और शंकारहित होकर राजद्वार पर जाता है, क्योंकि वह अपने अन्तःकरण में कोई दुराचरण नहीं देखता।
श्लोक 10 (12.265.10)
सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद्विद्यते परम् । सत्येन विधृतं सर्वं सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥
satyasya vacanaṃ sādhu na satyādvidyate param | satyena vidhṛtaṃ sarvaṃ sarvaṃ satye pratiṣṭhitam
सत्य बोलना उत्तम है; सत्य से बढ़कर कुछ नहीं है। सत्य से सब कुछ धारण किया गया है और सब कुछ सत्य में प्रतिष्ठित है।
श्लोक 11 (12.265.11)
अपि पापकृतो रौद्राः सत्यं कृत्वा मिथःकृतम् । अद्रोहमविसंवादं प्रवर्तन्ते तदाश्रयाः ॥
api pāpakṛto raudrāḥ satyaṃ kṛtvā mithaḥkṛtam | adrohamavisaṃvādaṃ pravartante tadāśrayāḥ
क्रूर पापी भी आपस में सत्य की प्रतिज्ञा करके, उसी का आश्रय लेकर, द्रोह और वचन-भंग के बिना व्यवहार करते हैं।
श्लोक 12 (12.265.12)
ते चेन्मिथ्या धृतिं कुर्युर्विनश्येयुरसंशयम् । न हर्तव्यं परधनमिति धर्मविदो विदुः ॥
te cenmithyā dhṛtiṃ kuryurvinaśyeyurasaṃśayam | na hartavyaṃ paradhanamiti dharmavido viduḥ
यदि वे उस प्रतिज्ञा को झूठा कर दें तो निश्चय ही नष्ट हो जाएँ। “दूसरे का धन नहीं हरना चाहिए”, ऐसा धर्म के जाननेवाले कहते हैं।
श्लोक 13 (12.265.13)
मन्यन्ते बलवन्तस्तं दुर्बलैः संप्रवर्तितम् । यदा नियतिदौर्बल्यमथैषामेव रोचते ॥
manyante balavantastaṃ durbalaiḥ saṃpravartitam | yadā niyatidaurbalyamathaiṣāmeva rocate
बलवान् उसे दुर्बलों का चलाया हुआ मानते हैं; पर जब भाग्य से दुर्बलता आती है, तब वही उन्हें भी अच्छा लगने लगता है।
श्लोक 14 (12.265.14)
न ह्यत्यन्तं बलयुता भवन्ति सुखिनोपि वा । तस्मादनार्जवे बुद्धिर्न कार्या ते कदाचन ॥
na hyatyantaṃ balayutā bhavanti sukhinopi vā | tasmādanārjave buddhirna kāryā te kadācana
बलवान् सदा बलवान् नहीं रहते और सुखी भी सदा सुखी नहीं रहते। इसलिए तुम्हें कभी कुटिलता में मन नहीं लगाना चाहिए।
श्लोक 15 (12.265.15)
असाधुभ्योऽस्य न भयं न चौरेभ्यो न राजतः । अकिंचित्कस्यचित्कुर्वन्निर्भयः शुचिरावसेत् ॥
asādhubhyo'sya na bhayaṃ na caurebhyo na rājataḥ | akiṃcitkasyacitkurvannirbhayaḥ śucirāvaset
उसे दुष्टों से भय नहीं, चोरों से नहीं, राजा से भी नहीं। जो किसी का कुछ अनिष्ट नहीं करता, वह निर्भय और पवित्र होकर रहे।
श्लोक 16 (12.265.16)
सर्वतः शङ्कते स्तेनो मृगो ग्राममिवेयिवान् । बहुधाऽऽचरितं पापमन्यत्रैवानुपश्यति ॥
sarvataḥ śaṅkate steno mṛgo grāmamiveyivān | bahudhā''caritaṃ pāpamanyatraivānupaśyati
चोर सब ओर शंका करता है, जैसे गाँव में आया हुआ मृग; अनेक प्रकार से किया हुआ पाप वह दूसरों में ही देखता है।
श्लोक 17 (12.265.17)
मुदितः शुचिरभ्येति सर्वतो निर्भयः सदा । न हि दुश्चरितं किंचिदात्मनोऽन्येषु पश्यति ॥
muditaḥ śucirabhyeti sarvato nirbhayaḥ sadā | na hi duścaritaṃ kiṃcidātmano'nyeṣu paśyati
पवित्र मनुष्य सदा सब ओर से निर्भय होकर प्रसन्नता से आता है; क्योंकि वह दूसरों में अपना कोई दुराचरण नहीं देखता।
श्लोक 18 (12.265.18)
दातव्यमित्ययं धर्म उक्तो भूतहिते रतैः । तं मन्यन्ते धनयुताः कृपणैः संप्रवर्तितम् ॥
dātavyamityayaṃ dharma ukto bhūtahite rataiḥ | taṃ manyante dhanayutāḥ kṛpaṇaiḥ saṃpravartitam
“देना चाहिए”, यह धर्म प्राणियों के हित में लगे लोगों ने कहा है; पर धनी लोग उसे दीनों का चलाया हुआ मानते हैं।
श्लोक 19 (12.265.19)
यदा नियतिकार्पण्यमथैषामेव रोचते । धनवन्तोपि नात्यन्तं भवन्ति सुखिनोपि वा ॥
yadā niyatikārpaṇyamathaiṣāmeva rocate | dhanavantopi nātyantaṃ bhavanti sukhinopi vā
जब भाग्य की दीनता उन पर आती है, तब वही उन्हें भी अच्छा लगने लगता है; क्योंकि धनी भी सदा धनी नहीं रहते और सुखी भी सदा सुखी नहीं रहते।
श्लोक 20 (12.265.20)
यदन्यैर्विहितं नेच्छेदात्मनः कर्म पूरुषः । न तत्परेषु कुर्वीत जानन्नप्रियमात्मनः ॥
yadanyairvihitaṃ necchedātmanaḥ karma pūruṣaḥ | na tatpareṣu kurvīta jānannapriyamātmanaḥ
जो कर्म दूसरों द्वारा किया जाना मनुष्य स्वयं नहीं चाहता, उसे वह दूसरों के साथ न करे, यह जानते हुए कि वह अपने लिए अप्रिय है।
श्लोक 21 (12.265.21)
योऽन्यस्य स्यादुपपतिः स कं किं वक्तुमर्हति । यदन्यस्य ततः कुर्यान्न मृष्येदिति मे मतिः ॥
yo'nyasya syādupapatiḥ sa kaṃ kiṃ vaktumarhati | yadanyasya tataḥ kuryānna mṛṣyediti me matiḥ
जो दूसरे का उपपति (जार) बनता है, वह किससे क्या कहने का अधिकारी है? जो वह दूसरे के साथ करे, उसे वह स्वयं नहीं सह सकता, यह मेरा मत है।
श्लोक 22 (12.265.22)
जीवितुं यः स्वयं चेच्छेत्कथं सोऽन्यं प्रघातयेत् । यद्यदात्मन इच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत् ॥
jīvituṃ yaḥ svayaṃ cecchetkathaṃ so'nyaṃ praghātayet | yadyadātmana iccheta tatparasyāpi cintayet
जो स्वयं जीना चाहता है, वह दूसरे को कैसे मरवाए? जो-जो वह अपने लिए चाहे, वही दूसरे के लिए भी सोचे।
श्लोक 23 (12.265.23)
अतिरिक्तः संविभजेद्भोगैरन्यानकिंचनान् । एतस्मात्कारणाद्धात्रा कुसीदं संप्रवर्तितम् ॥
atiriktaḥ saṃvibhajedbhogairanyānakiṃcanān | etasmātkāraṇāddhātrā kusīdaṃ saṃpravartitam
जिसके पास अधिक हो, वह अपने भोगों में से दूसरे निर्धनों को बाँटे। इसी कारण विधाता ने ब्याज पर उधार देने की रीति चलाई।
श्लोक 24 (12.265.24)
यस्मिंस्तु देवाः समये सन्तिष्ठेरंस्तथा भवेत् । अथ चेल्लोभसमये स्थितिर्धर्मोऽपि शोभना ॥
yasmiṃstu devāḥ samaye santiṣṭheraṃstathā bhavet | atha cellobhasamaye sthitirdharmo'pi śobhanā
जिस समझौते (नियम) में देवता ठहरते हैं, वैसा ही हो; और यदि कोई लाभ के समझौते में टिका हो, तो धर्म की दृष्टि से भी वह स्थिति शोभन है।
श्लोक 25 (12.265.25)
सर्वं प्रियाभ्युपगतं पुण्यमाहुर्मनीषिणः । पश्यैतं लक्षणोद्देशं धर्माधर्मे युधिष्ठिर ॥
sarvaṃ priyābhyupagataṃ puṇyamāhurmanīṣiṇaḥ | paśyaitaṃ lakṣaṇoddeśaṃ dharmādharme yudhiṣṭhira
ज्ञानी लोग कहते हैं कि जो कुछ प्रिय मानकर स्वीकार किया जाता है, वह पुण्य है। हे युधिष्ठिर, धर्म और अधर्म के इस लक्षण-निर्देश को देखो।
श्लोक 26 (12.265.26)
लोकसंग्रहसंयुक्तं विधात्रा विहितं पुरा । सूक्ष्मधर्मार्थनियतं सतां चरितमुत्तमम् ॥
lokasaṃgrahasaṃyuktaṃ vidhātrā vihitaṃ purā | sūkṣmadharmārthaniyataṃ satāṃ caritamuttamam
यह लोक के निर्वाह से जुड़ा है, विधाता ने इसे बहुत पहले बनाया था; यह सूक्ष्म धर्म और उसके प्रयोजन से नियत है, और यही सज्जनों का उत्तम आचरण है।
श्लोक 27 (12.265.27)
धर्मलक्षणमाख्यातमेतत्ते कुरुसत्तम । तस्मादनार्जवे बुद्धिर्न ते कार्या कथंचन ॥
dharmalakṣaṇamākhyātametatte kurusattama | tasmādanārjave buddhirna te kāryā kathaṃcana
हे कुरुश्रेष्ठ, यह धर्म का लक्षण तुम्हें बता दिया। इसलिए तुम्हें कभी कुटिलता में मन नहीं लगाना चाहिए।”