शान्ति पर्व · अध्याय 267
जाजलि का अभिमान और आकाशवाणी
युधिष्ठिर पूछते हैं कि जाजलि ने कौन-सा कठिन कर्म किया था जिससे उसे सिद्धि मिली, और भीष्म कथा सुनाते हैं। समुद्र के तट पर वर्षों तप करने के बाद जाजलि घोषणा करता है कि धर्म में उसके समान कोई नहीं है; समुद्र के प्राणी उसे टोकते हैं और वाराणसी के व्यापारी तुलाधार के पास जाने को कहते हैं। फिर भीष्म बताते हैं कि जाजलि के निश्चल सिर पर चिड़ियों ने घोंसला बनाया और अपने बच्चे पाले, कैसे इससे उसे अभिमान हुआ और उसने फिर घोषणा की कि उसने धर्म पा लिया है, और कैसे आकाशवाणी ने तुलाधार को उससे श्रेष्ठ बताया। जाजलि वाराणसी जाता है, जहाँ तुलाधार उसका स्वागत करता है और उससे उसके आने का कारण कहता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.267.1)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । तुलाधारस्य वाक्यानि धर्मे जाजलिना सह ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | tulādhārasya vākyāni dharme jājalinā saha
इसी विषय में लोग एक पुराना इतिहास सुनाते हैं: धर्म के विषय में तुलाधार और जाजलि की बातचीत।
श्लोक 2 (12.267.2)
वने वनचरः कश्चिज्जाजलिर्नाम वै द्विजः । सागरोद्देशमागम्य तपस्तेपे महातपाः ॥
vane vanacaraḥ kaścijjājalirnāma vai dvijaḥ | sāgaroddeśamāgamya tapastepe mahātapāḥ
वन में रहनेवाला जाजलि नाम का एक ब्राह्मण था। महान् तपस्वी उसने समुद्र के तट पर आकर तप किया।
श्लोक 3 (12.267.3)
नियतो नियताहारश्चीराजिनजटाधरः । मलपङ्कधरो धीमान्बहून्वर्षगणान्मुनिः ॥
niyato niyatāhāraścīrājinajaṭādharaḥ | malapaṅkadharo dhīmānbahūnvarṣagaṇānmuniḥ
संयमी और नियमित आहार करनेवाला, वल्कल, मृगचर्म और जटाएँ धारण किए तथा शरीर पर मैल और कीचड़ लगाए हुए वह बुद्धिमान मुनि बहुत वर्षों तक इसी प्रकार रहा।
श्लोक 4 (12.267.4)
स कदाचिन्महातेजा जलवासो महीपते । चचार लोकान्विप्रर्षिः प्रेक्षमाणो मनोजवः ॥
sa kadācinmahātejā jalavāso mahīpate | cacāra lokānviprarṣiḥ prekṣamāṇo manojavaḥ
हे पृथ्वीपति, एक बार जल में रहनेवाला वह महातेजस्वी विप्रर्षि मन के समान वेग से देखता हुआ लोकों में विचरण करने लगा।
श्लोक 5 (12.267.5)
स चिन्तयामास मुनिर्जलमध्ये कदाचन । विप्रेक्ष्य सागरान्तां वै महीं सवनकाननाम् ॥
sa cintayāmāsa munirjalamadhye kadācana | viprekṣya sāgarāntāṃ vai mahīṃ savanakānanām
एक बार जल के बीच में रहते हुए उस मुनि ने समुद्र तक फैली, वनों और उपवनों से भरी पृथ्वी को देखा और सोचने लगा।
श्लोक 6 (12.267.6)
न मया सदृशोऽस्तीह लोके स्थावरजङ्गमे । अप्सु वैहायसं गच्छेन्मया योऽन्यः सहेति वै ॥
na mayā sadṛśo'stīha loke sthāvarajaṅgame | apsu vaihāyasaṃ gacchenmayā yo'nyaḥ saheti vai
"चर और अचर वाले इस लोक में मेरे समान कोई नहीं है। जल में और आकाश में मेरे साथ चल सके, ऐसा दूसरा कौन है?"
श्लोक 7 (12.267.7)
स दृश्यमानो रक्षोभिर्जलमध्ये च भारत । आस्फोटयत्तदाऽऽकाशे धर्मः प्राप्तो मयेति वै ॥
sa dṛśyamāno rakṣobhirjalamadhye ca bhārata | āsphoṭayattadā''kāśe dharmaḥ prāpto mayeti vai
हे भारत, जल के बीच खड़े उसे जब राक्षसों ने देखा, तब उसने आकाश की ओर भुजाएँ ठोंकीं और कहा, "मैंने धर्म पा लिया!"
श्लोक 8 (12.267.8)
अब्रुवंश्च पिशाचास्तं नैवं त्वं वक्तुमर्हसि । तुलाधारो वणिग्धर्मा वाराणस्यां महायशाः । सोऽप्येवं नार्हते वक्तुं यथा त्वं द्विजसत्तम ॥
abruvaṃśca piśācāstaṃ naivaṃ tvaṃ vaktumarhasi | tulādhāro vaṇigdharmā vārāṇasyāṃ mahāyaśāḥ | so'pyevaṃ nārhate vaktuṃ yathā tvaṃ dvijasattama
पिशाचों ने उससे कहा, "तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए। वाराणसी में वणिक्-धर्म का पालन करनेवाला महायशस्वी तुलाधार भी, हे द्विजश्रेष्ठ, इस प्रकार नहीं बोल सकता जैसे तुम बोल रहे हो।"
श्लोक 9 (12.267.9)
इत्युक्तो जाजलिर्भूतैः प्रत्युवाच महातपाः । पश्येयं तमहं प्राज्ञं तुलाधारं यशस्विनम् ॥
ityukto jājalirbhūtaiḥ pratyuvāca mahātapāḥ | paśyeyaṃ tamahaṃ prājñaṃ tulādhāraṃ yaśasvinam
प्राणियों के ऐसा कहने पर महातपस्वी जाजलि ने उत्तर दिया, "मैं उस बुद्धिमान और यशस्वी तुलाधार को देखना चाहता हूँ।"
श्लोक 10 (12.267.10)
इति ब्रुवाणं तमृषिं रक्षांस्युत्थाय सागरात् । अब्रुवन्गच्छ पन्थानमास्थायेमं द्विजोत्तम ॥
iti bruvāṇaṃ tamṛṣiṃ rakṣāṃsyutthāya sāgarāt | abruvangaccha panthānamāsthāyemaṃ dvijottama
ऋषि के ऐसा कहने पर राक्षसों ने समुद्र से उठकर कहा, "हे द्विजश्रेष्ठ, इस मार्ग पर जाओ।"
श्लोक 11 (12.267.11)
इत्युक्तो जाजलिर्भूतैर्जगाम विमनास्तदा । वाराणस्यां तुलाधारं समासाद्याब्रवीदिदम् ॥
ityukto jājalirbhūtairjagāma vimanāstadā | vārāṇasyāṃ tulādhāraṃ samāsādyābravīdidam
प्राणियों के ऐसा कहने पर जाजलि उदास मन से चल पड़ा। वाराणसी में तुलाधार के पास पहुँचकर उसने उससे यह कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 12 (12.267.12)
किं कृतं दुष्करं तात कर्म जाजलिना पुरा । येन सिद्धिं परां प्राप्तस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
kiṃ kṛtaṃ duṣkaraṃ tāta karma jājalinā purā | yena siddhiṃ parāṃ prāptastanme vyākhyātumarhasi
हे तात, जाजलि ने पूर्वकाल में कौन-सा कठिन कर्म किया था, जिससे उसे परम सिद्धि प्राप्त हुई? कृपया यह मुझे समझाइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 13 (12.267.13)
अतीव तपसा युक्तो घोरेण स बभूव ह । नद्युपस्पर्शनपरः सायंप्रातर्महातपाः ॥
atīva tapasā yukto ghoreṇa sa babhūva ha | nadyupasparśanaparaḥ sāyaṃprātarmahātapāḥ
वह महातपस्वी अत्यन्त घोर तप में लगा रहता था और सन्ध्या तथा प्रातःकाल नदियों में स्नान करने में तत्पर रहता था।
श्लोक 14 (12.267.14)
अग्नीन्परिचरन्सम्यक्स्वाध्यायपरमो द्विजः । वानप्रस्थविधानज्ञो जाजलिर्ज्वलितः श्रिया ॥
agnīnparicaransamyaksvādhyāyaparamo dvijaḥ | vānaprasthavidhānajño jājalirjvalitaḥ śriyā
वह ब्राह्मण अग्नियों की ठीक-ठीक सेवा करता और स्वाध्याय में सबसे अधिक लगा रहता था। वानप्रस्थ के विधान को जाननेवाला जाजलि तेज से दीप्त था।
श्लोक 15 (12.267.15)
वने तपस्यतिष्ठत्स न चाधर्ममवैक्षत । वर्षास्वाकाशशायी च हेमन्ते जलसंश्रयः ॥
vane tapasyatiṣṭhatsa na cādharmamavaikṣata | varṣāsvākāśaśāyī ca hemante jalasaṃśrayaḥ
वह वन में तप करता रहा और उसमें उसे कोई अधर्म नहीं दिखा। वर्षा में वह खुले आकाश के नीचे सोता और हेमन्त में जल में रहता था;
श्लोक 16 (12.267.16)
वातातपसहो ग्रीष्मे न चाधर्ममविन्दत । दुःखशय्याश्च विविधा भूमौ च परिवर्तनम् ॥
vātātapasaho grīṣme na cādharmamavindata | duḥkhaśayyāśca vividhā bhūmau ca parivartanam
ग्रीष्म में वह हवा और धूप सहता था और उसमें भी उसे अधर्म नहीं मिला। वह अनेक प्रकार की कष्टदायक शय्याएँ और भूमि पर लोटना भी सहता रहा।
श्लोक 17 (12.267.17)
ततः कदाचित्स मुनिर्वर्षास्वाकाशमास्थितः । अन्तरिक्षाज्जलं मूर्ध्ना प्रत्यगृह्णान्मुहुर्मुहुः ॥
tataḥ kadācitsa munirvarṣāsvākāśamāsthitaḥ | antarikṣājjalaṃ mūrdhnā pratyagṛhṇānmuhurmuhuḥ
फिर एक बार वर्षा ऋतु में वह मुनि खुले आकाश के नीचे खड़ा रहा और बार-बार आकाश से गिरता जल अपने सिर पर लेता रहा।
श्लोक 18 (12.267.18)
आप्लुतस्य जटाः क्लिन्ना बभूवुर्ग्रथिताः प्रभो । अरण्यगमनान्नित्यं मलिनोऽमलसंयुतः ॥
āplutasya jaṭāḥ klinnā babhūvurgrathitāḥ prabho | araṇyagamanānnityaṃ malino'malasaṃyutaḥ
हे प्रभो, भीगने से उसकी जटाएँ गीली होकर उलझ गईं। वन में नित्य घूमने के कारण वह मैला था, फिर भी पाप से रहित था।
श्लोक 19 (12.267.19)
स कदाचिन्निराहारो वायुभक्षो महातपाः । तस्थौ काष्ठवदव्यग्रो न चचाल च कर्हिचित् ॥
sa kadācinnirāhāro vāyubhakṣo mahātapāḥ | tasthau kāṣṭhavadavyagro na cacāla ca karhicit
एक बार वह महातपस्वी निराहार रहकर केवल वायु का भोजन करता हुआ काठ की तरह स्थिर खड़ा रहा; वह शान्त था और तनिक भी नहीं हिला।
श्लोक 20 (12.267.20)
तस्य स्म स्थाणुभूतस्य निर्विचेष्टस्य भारत । कुलिङ्गशकुनौ राजन्नीडं शिरसि चक्रतुः ॥
tasya sma sthāṇubhūtasya nirviceṣṭasya bhārata | kuliṅgaśakunau rājannīḍaṃ śirasi cakratuḥ
हे भारत, खम्भे के समान निश्चेष्ट खड़े उसके सिर पर, हे राजन्, चिड़ियों के एक जोड़े ने घोंसला बना लिया।
श्लोक 21 (12.267.21)
स तौ दयावान्ब्रह्मर्षिरुपप्रैक्षत दंपती । कुर्वाणौ नीडकं तत्र जटासु तृणतन्तुभिः ॥
sa tau dayāvānbrahmarṣirupapraikṣata daṃpatī | kurvāṇau nīḍakaṃ tatra jaṭāsu tṛṇatantubhiḥ
उस दयालु ब्रह्मर्षि ने देखा कि वह जोड़ा उसकी जटाओं में तिनकों और रेशों से घोंसला बना रहा है, और उसने उन्हें रोका नहीं।
श्लोक 22 (12.267.22)
यदा न स चलत्येव स्थाणुभूतो महातपाः । ततस्तौ सुखविश्वस्तौ सुखं तत्रोषतुस्तदा ॥
yadā na sa calatyeva sthāṇubhūto mahātapāḥ | tatastau sukhaviśvastau sukhaṃ tatroṣatustadā
जब वह महातपस्वी खम्भे की तरह खड़ा रहकर बिलकुल नहीं हिला, तब उस जोड़े ने उस पर विश्वास कर लिया और वे वहाँ सुख से रहने लगे।
श्लोक 23 (12.267.23)
अतीतास्वथ वर्षासु शरत्काल उपस्थिते । प्राजापत्येन विधिना विश्वासात्काममोहितौ ॥
atītāsvatha varṣāsu śaratkāla upasthite | prājāpatyena vidhinā viśvāsātkāmamohitau
वर्षा बीतने पर जब शरद् ऋतु आई, तब विश्वास के कारण कामवश मोहित हुए उन दोनों ने प्रजापति के विधान के अनुसार सन्तान उत्पन्न करने का मार्ग अपनाया।
श्लोक 24 (12.267.24)
तत्रोत्पादयतां राजञ्शिरस्यण्डानि खेचरौ । तान्यबुध्यत तेजस्वी स विप्रः संशितव्रतः ॥
tatrotpādayatāṃ rājañśirasyaṇḍāni khecarau | tānyabudhyata tejasvī sa vipraḥ saṃśitavrataḥ
हे राजन्, उन दोनों पक्षियों ने वहीं उसके सिर पर अण्डे दिए। दृढ़ व्रतवाले उस तेजस्वी ब्राह्मण को उन अण्डों का पता चल गया।
श्लोक 25 (12.267.25)
बुद्ध्वा च स महातेजा न चचाल च जाजलिः । धर्मे कृतमना नित्यं नाधर्मं स त्वरोचयत् ॥
buddhvā ca sa mahātejā na cacāla ca jājaliḥ | dharme kṛtamanā nityaṃ nādharmaṃ sa tvarocayat
यह जानकर भी महातेजस्वी जाजलि नहीं हिला। उसका मन सदा धर्म में लगा रहता था और अधर्म उसे पसन्द नहीं था।
श्लोक 26 (12.267.26)
अहन्यहनि चागत्य ततस्तौ तस्य मूर्धनि । आश्वासितौ निवसतः संप्रहृष्टौ तदा विभौ ॥
ahanyahani cāgatya tatastau tasya mūrdhani | āśvāsitau nivasataḥ saṃprahṛṣṭau tadā vibhau
हे प्रभो, वे दोनों प्रतिदिन आकर उसके सिर पर निश्चिन्त और अत्यन्त प्रसन्न रहते थे।
श्लोक 27 (12.267.27)
अण्डेभ्यस्त्वथ पुष्टेभ्यः प्राजायन्त शकुन्तकाः । व्यवर्धन्त च तत्रैव न चाकम्पत जाजलिः ॥
aṇḍebhyastvatha puṣṭebhyaḥ prājāyanta śakuntakāḥ | vyavardhanta ca tatraiva na cākampata jājaliḥ
फिर अण्डे पक जाने पर उनसे बच्चे निकले और वहीं बढ़ने लगे; और जाजलि नहीं हिला।
श्लोक 28 (12.267.28)
स रक्षमाणस्त्वण्डानि कुलिङ्गानां धृतव्रतः । तथैव तस्थौ धर्मात्मा निर्विचेष्टः समाहितः ॥
sa rakṣamāṇastvaṇḍāni kuliṅgānāṃ dhṛtavrataḥ | tathaiva tasthau dharmātmā nirviceṣṭaḥ samāhitaḥ
व्रत में दृढ़ रहकर चिड़ियों के उन अण्डों की रक्षा करता हुआ वह धर्मात्मा पहले की ही तरह निश्चल और एकाग्र खड़ा रहा।
श्लोक 29 (12.267.29)
ततस्तु काले राजेन्द्र बभूवुस्तेऽथ पक्षिणः । बुबुधे तांस्तु स मुनिर्जातपक्षान्कुलिङ्गकान् ॥
tatastu kāle rājendra babhūvuste'tha pakṣiṇaḥ | bubudhe tāṃstu sa munirjātapakṣānkuliṅgakān
हे राजेन्द्र, फिर समय आने पर वे बच्चे पक्षी बन गए, और मुनि ने जान लिया कि उन चिड़ियों के पंख निकल आए हैं।
श्लोक 30 (12.267.30)
ततः कदाचित्तांस्तत्र पश्यन्पक्षीन्यतव्रतः । बभूव परमप्रीतस्तदा मतिमतां वरः ॥
tataḥ kadācittāṃstatra paśyanpakṣīnyatavrataḥ | babhūva paramaprītastadā matimatāṃ varaḥ
फिर एक बार वहाँ उन पक्षियों को देखकर संयमित व्रतवाला वह बुद्धिमानों में श्रेष्ठ मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुआ।
श्लोक 31 (12.267.31)
तथा तानभिसंवृद्धान्दृष्ट्वा चैवाप्तवान्मुदम् । शकुनौ निर्भयौ तत्र ऊषतुश्चात्मजैः सह ॥
tathā tānabhisaṃvṛddhāndṛṣṭvā caivāptavānmudam | śakunau nirbhayau tatra ūṣatuścātmajaiḥ saha
उन्हें बड़ा हुआ देखकर उसे आनन्द हुआ, और वे दोनों पक्षी निर्भय होकर अपने बच्चों के साथ वहीं रहते रहे।
श्लोक 32 (12.267.32)
जातपक्षांश्च सोऽपश्यदुड्डीनान्पुनरागतान् । सायंसायं द्विजान्विप्रो न चाकम्पत जाजलिः ॥
jātapakṣāṃśca so'paśyaduḍḍīnānpunarāgatān | sāyaṃsāyaṃ dvijānvipro na cākampata jājaliḥ
पंख निकल आने पर वे बच्चे उड़ जाते और हर सन्ध्या फिर लौट आते थे; ब्राह्मण जाजलि यह देखता रहा और नहीं हिला।
श्लोक 33 (12.267.33)
कदाचित्पुनरभ्येत्य पुनर्गच्छन्ति संततम् । त्यक्ता मातापितृभ्यां ते न चाकम्पत जाजलिः ॥
kadācitpunarabhyetya punargacchanti saṃtatam | tyaktā mātāpitṛbhyāṃ te na cākampata jājaliḥ
कभी वे लौट आते और फिर बार-बार चले जाते; माता-पिता से छोड़ दिए जाने पर भी वे ऐसा करते रहे, और जाजलि नहीं हिला।
श्लोक 34 (12.267.34)
तथा ते दिवसं चापि गत्वा सायं पुनर्नृप । उपावर्तन्त तत्रैव निवासार्थं शकुन्तकाः ॥
tathā te divasaṃ cāpi gatvā sāyaṃ punarnṛpa | upāvartanta tatraiva nivāsārthaṃ śakuntakāḥ
हे राजन्, इसी प्रकार वे बच्चे दिन में उड़कर जाते और सन्ध्या को रात बिताने के लिए फिर उसी स्थान पर लौट आते थे।
श्लोक 35 (12.267.35)
कदाचिद्दिवसान्पञ्च समुत्पत्य विहगमाः । षष्ठेऽहनि समाजग्मुर्न चाकम्पत जाजलिः ॥
kadāciddivasānpañca samutpatya vihagamāḥ | ṣaṣṭhe'hani samājagmurna cākampata jājaliḥ
एक बार वे पक्षी पाँच दिन तक उड़ गए और छठे दिन लौट आए; और जाजलि नहीं हिला।
श्लोक 36 (12.267.36)
क्रमेण च पुनः सर्वे दिवसान्सुबहूनथ । नोपावर्तन्त शकुना जातपक्षाश्च ते यदा ॥
krameṇa ca punaḥ sarve divasānsubahūnatha | nopāvartanta śakunā jātapakṣāśca te yadā
फिर धीरे-धीरे पंख पूरे निकल आने पर वे सब पक्षी बहुत दिनों तक दूर रहने लगे और लौटकर नहीं आए।
श्लोक 37 (12.267.37)
कदाचिन्मासमात्रेण समुत्पत्य विहंगमाः । नैवागच्छंस्ततो राजन्प्रातिष्ठत स जाजलिः ॥
kadācinmāsamātreṇa samutpatya vihaṃgamāḥ | naivāgacchaṃstato rājanprātiṣṭhata sa jājaliḥ
हे राजन्, एक बार पूरे एक मास के लिए उड़ जाने पर वे पक्षी फिर लौटे ही नहीं, और तब जाजलि वहाँ से चल पड़ा।
श्लोक 38 (12.267.38)
ततस्तेषु प्रलीनेषु जाजलिर्जातविस्मयः । सिद्धोऽस्मीति मतिं चक्रे ततस्तं मान आविशत् ॥
tatasteṣu pralīneṣu jājalirjātavismayaḥ | siddho'smīti matiṃ cakre tatastaṃ māna āviśat
उनके सब ओर चले जाने पर जाजलि को आश्चर्य हुआ। उसने मन में निश्चय किया, "मैं सिद्ध हो गया हूँ," और उसे अभिमान ने घेर लिया।
श्लोक 39 (12.267.39)
स तथा निर्गतान्दृष्ट्वा शकुन्तान्नियतव्रतः । संभावितात्मा संभाव्य भृशं प्रीतस्तदाऽभवत् ॥
sa tathā nirgatāndṛṣṭvā śakuntānniyatavrataḥ | saṃbhāvitātmā saṃbhāvya bhṛśaṃ prītastadā'bhavat
उन पक्षियों को उड़कर जाते देख दृढ़ व्रतवाला वह मुनि अपने को बड़ा मानकर और अपने किए पर विचार कर बहुत प्रसन्न हुआ।
श्लोक 40 (12.267.40)
स नद्यां समुपस्पृश्य तर्पयित्वा हुताशनम् । उदयन्तमथादित्यमभ्यागच्छन्महातपाः ॥
sa nadyāṃ samupaspṛśya tarpayitvā hutāśanam | udayantamathādityamabhyāgacchanmahātapāḥ
उसने नदी में स्नान किया, अग्नि को तर्पण और आहुति दी, और फिर वह महातपस्वी उगते हुए सूर्य के सम्मुख गया।
श्लोक 41 (12.267.41)
संभाव्य चटकान्मूर्ध्नि जाजलिर्जपतांवरः । आस्फोटयत्तथाऽऽकाशे धर्मः प्राप्तो मयेति वै ॥
saṃbhāvya caṭakānmūrdhni jājalirjapatāṃvaraḥ | āsphoṭayattathā''kāśe dharmaḥ prāpto mayeti vai
अपने सिर पर चिड़ियों का पालन करके जप करनेवालों में श्रेष्ठ जाजलि ने आकाश की ओर भुजाएँ ठोंकीं और कहा, "मैंने धर्म पा लिया!"
श्लोक 42 (12.267.42)
अथान्तरिक्षे वागासीत्तां च शुश्राव जाजलिः । धर्मेण न समस्त्वं वै तुलाधारस्य जाजले ॥
athāntarikṣe vāgāsīttāṃ ca śuśrāva jājaliḥ | dharmeṇa na samastvaṃ vai tulādhārasya jājale
तब आकाश में एक वाणी हुई और जाजलि ने उसे सुना: "हे जाजले, धर्म में तुम तुलाधार के बराबर नहीं हो।
वागुवाच
श्लोक 43 (12.267.43)
वाराणस्यां महाप्राज्ञस्तुलाधारः प्रतिष्ठितः । सोऽप्येवं नार्हते वक्तुं यथा त्वं भाषसे द्विज ॥
vārāṇasyāṃ mahāprājñastulādhāraḥ pratiṣṭhitaḥ | so'pyevaṃ nārhate vaktuṃ yathā tvaṃ bhāṣase dvija
वाराणसी में महाप्राज्ञ तुलाधार रहता है। हे ब्राह्मण, वह भी वैसा नहीं कह सकता जैसा तुम कह रहे हो।"
भीष्म उवाच
श्लोक 44 (12.267.44)
सोऽमर्षवशमापन्नस्तुलाधारदिदृक्षया । पृथिवीमचरद्राजन्यत्रसायंगृहो मुनिः ॥
so'marṣavaśamāpannastulādhāradidṛkṣayā | pṛthivīmacaradrājanyatrasāyaṃgṛho muniḥ
क्रोध से भरा हुआ वह मुनि तुलाधार को देखने की इच्छा से, जहाँ सन्ध्या हो जाती वहीं ठहरता हुआ, पृथ्वी पर घूमता रहा।
श्लोक 45 (12.267.45)
कालेन महताऽगच्छत्स तु वाराणसीं पुरीम् । विक्रीणन्तं च पण्यानि तुलाधारं ददर्श सः ॥
kālena mahatā'gacchatsa tu vārāṇasīṃ purīm | vikrīṇantaṃ ca paṇyāni tulādhāraṃ dadarśa saḥ
बहुत समय बाद वह वाराणसी नगरी में पहुँचा और वहाँ उसने तुलाधार को अपना सामान बेचते देखा।
श्लोक 46 (12.267.46)
सोऽपि दृष्ट्वैव तं विप्रमायान्तं भाण्डजीवनः । समुत्थाय सुसंहृष्टः स्वागतेनाभ्यपूजयत् ॥
so'pi dṛṣṭvaiva taṃ vipramāyāntaṃ bhāṇḍajīvanaḥ | samutthāya susaṃhṛṣṭaḥ svāgatenābhyapūjayat
व्यापार से जीविका चलानेवाले उस तुलाधार ने ब्राह्मण को आते देखा तो अत्यन्त हर्ष से उठकर स्वागत करके उसका सत्कार किया।
तुलाधार उवाच
श्लोक 47 (12.267.47)
आयानेवासि विदितो मम ब्रह्मन्न संशयः । ब्रवीमि यत्तु वचनं तच्छृणुष्व द्विजोत्तम ॥
āyānevāsi vidito mama brahmanna saṃśayaḥ | bravīmi yattu vacanaṃ tacchṛṇuṣva dvijottama
"हे ब्रह्मन्, मुझे निःसन्देह तुम्हारे आने का पता था। हे द्विजश्रेष्ठ, मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो।
श्लोक 48 (12.267.48)
सागरानूपमाश्रित्य तपस्तप्तं त्वया महत् । न च धर्मस्य संज्ञां त्वं पुरा वेत्थ कथंचन ॥
sāgarānūpamāśritya tapastaptaṃ tvayā mahat | na ca dharmasya saṃjñāṃ tvaṃ purā vettha kathaṃcana
तुमने समुद्र के तट पर बड़ा तप किया, किन्तु उस समय तुम धर्म का नाम तक नहीं जानते थे।
श्लोक 49 (12.267.49)
ततः सिद्धस्य तपसा तव विप्र शकुन्तकाः । क्षिप्रं शिरस्यजायन्त ते च संभावितास्त्वया ॥
tataḥ siddhasya tapasā tava vipra śakuntakāḥ | kṣipraṃ śirasyajāyanta te ca saṃbhāvitāstvayā
फिर, हे विप्र, तप से सिद्ध हुए तुम्हारे सिर पर शीघ्र ही चिड़ियाँ उत्पन्न हो गईं, और तुमने उन्हें पाला।
श्लोक 50 (12.267.50)
जातपक्षा यदा ते च गताः संचरितुं ततः । मन्यमानस्ततो धर्मं चटकप्रभवं द्विज । खे वाचं त्वमथाश्रौषीर्मां प्रति द्विजसत्तम ॥
jātapakṣā yadā te ca gatāḥ saṃcarituṃ tataḥ | manyamānastato dharmaṃ caṭakaprabhavaṃ dvija | khe vācaṃ tvamathāśrauṣīrmāṃ prati dvijasattama
जब पंख निकल आने पर वे उड़कर चले गए, तब, हे द्विजश्रेष्ठ, चिड़ियों से धर्म उत्पन्न हुआ मानते हुए तुमने आकाश में मेरे विषय में कही गई वाणी सुनी।
श्लोक 51 (12.267.51)
अमर्षवशमापन्नस्ततः प्राप्तो भवानिह । करवाणि प्रियं किं ते तद्ब्रूहि द्विजसत्तम ॥
amarṣavaśamāpannastataḥ prāpto bhavāniha | karavāṇi priyaṃ kiṃ te tadbrūhi dvijasattama
तब क्रोध से भरकर तुम यहाँ आए हो। मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? हे द्विजश्रेष्ठ, मुझे बताओ।"