शान्ति पर्व · अध्याय 268
तुलाधार का जाजलि को अहिंसा-धर्म का उपदेश
जाजलि व्यापारी तुलाधार से पूछता है कि उसे यह स्थिर बुद्धि कहाँ से मिली, और तुलाधार बताता है कि वह सनातन धर्म को जानता है: ऐसी जीविका जो किसी को कष्ट न दे, सब प्राणियों के प्रति समभाव, और राग-द्वेष से मुक्ति। वह कहता है कि अभयदान सब दानों में श्रेष्ठ है और धर्म सूक्ष्म है तथा कारणों से समझा जाता है। फिर वह व्यापार, खेती और यज्ञ में पशुओं पर होनेवाली क्रूरता की निन्दा करता है, नहुष के गाय और बैल को मारने पर ऋषियों द्वारा रोग फैलाने की कथा कहता है, और जाजलि से कहता है कि कोई उसे मारे या स्तुति करे, वह एक-सा रहता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.268.1)
इत्युक्तः स तदा तेन तुलाधारेण धीमता । प्रोवाच वचनं धीमाञ्जाजलिर्जपतांवरः ॥
ityuktaḥ sa tadā tena tulādhāreṇa dhīmatā | provāca vacanaṃ dhīmāñjājalirjapatāṃvaraḥ
बुद्धिमान् तुलाधार के इस प्रकार कहने पर जप करनेवालों में श्रेष्ठ बुद्धिमान् जाजलि ने तब उत्तर दिया।
जाजलिरुवाच
श्लोक 2 (12.268.2)
विक्रीणतः सर्वरसान्सर्वगन्धांश्च वाणिज । वनस्पतीनोषधीश्च तेषां मूलफलानि च ॥
vikrīṇataḥ sarvarasānsarvagandhāṃśca vāṇija | vanaspatīnoṣadhīśca teṣāṃ mūlaphalāni ca
"हे वणिक्, तुम सब प्रकार के रस और सब प्रकार के गन्ध बेचते हो, तथा वनस्पतियाँ और ओषधियाँ और उनके मूल और फल भी।
श्लोक 3 (12.268.3)
अग्र्या सा नैष्ठिकी बुद्धिः कुतस्त्वामियमागता । एतदाचक्ष्व मे सर्वं निखिलेन महामते ॥
agryā sā naiṣṭhikī buddhiḥ kutastvāmiyamāgatā | etadācakṣva me sarvaṃ nikhilena mahāmate
तुम्हें यह श्रेष्ठ और स्थिर बुद्धि कहाँ से मिली? हे महामते, यह सब मुझे पूरा-पूरा बताओ।"
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (12.268.4)
एवमुक्तस्तुलाधारो ब्राह्मणेन यशस्विना । उवाच धर्मसूक्ष्माणि वैश्यो धर्मार्थतत्त्ववित् ॥
evamuktastulādhāro brāhmaṇena yaśasvinā | uvāca dharmasūkṣmāṇi vaiśyo dharmārthatattvavit
यशस्वी ब्राह्मण के ऐसा कहने पर धर्म और अर्थ के तत्त्व को जाननेवाले वैश्य तुलाधार ने धर्म की सूक्ष्म बातें कहीं।
तुलाधार उवाच
श्लोक 5 (12.268.5)
वेदाहं जाजले धर्मं सरहस्यं सनातनम् । सर्वभूतहितं मैत्रं पुराणं यं जना विदुः ॥
vedāhaṃ jājale dharmaṃ sarahasyaṃ sanātanam | sarvabhūtahitaṃ maitraṃ purāṇaṃ yaṃ janā viduḥ
"हे जाजले, मैं रहस्यसहित उस सनातन धर्म को जानता हूँ, जो सब प्राणियों का हित करनेवाला, मैत्रीपूर्ण और पुराना है और जिसे लोग जानते हैं।
श्लोक 6 (12.268.6)
अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः । या वृत्तिः स परो धर्मस्तेन जीवामि जाजले ॥
adroheṇaiva bhūtānāmalpadroheṇa vā punaḥ | yā vṛttiḥ sa paro dharmastena jīvāmi jājale
जो जीविका प्राणियों से बिलकुल द्रोह न करे, या बहुत थोड़ा द्रोह करे, वही परम धर्म है, हे जाजले; उसी से मैं जीता हूँ।
श्लोक 7 (12.268.7)
परिच्छिन्नैः काष्ठतृणैर्मयेदं शरणं कृतम् । अलक्तं पद्मकं तुङ्गं गन्धांश्चोच्चावचांस्तथा ॥
paricchinnaiḥ kāṣṭhatṛṇairmayedaṃ śaraṇaṃ kṛtam | alaktaṃ padmakaṃ tuṅgaṃ gandhāṃścoccāvacāṃstathā
मैंने कटी हुई लकड़ियों और घास से यह आश्रय बनाया है। लाख का रंग, पद्मक, तुंग तथा ऊँचे-नीचे सब प्रकार के गन्ध,
श्लोक 8 (12.268.8)
रसांश्च तांस्तान्विप्रर्षे मद्यवर्ज्यान्बहूनहम् । क्रीत्वा वै प्रतिविक्रीणे परहस्तादमायया ॥
rasāṃśca tāṃstānviprarṣe madyavarjyānbahūnaham | krītvā vai prativikrīṇe parahastādamāyayā
और हे विप्रर्षि, मद्य को छोड़कर बहुत-से रस भी मैं दूसरों के हाथ से खरीदकर बिना छल के फिर बेच देता हूँ।
श्लोक 9 (12.268.9)
सर्वेषां यः सुहृन्नित्यं सर्वेषां च हिते रतः । कर्मणा मनसा वाचा स धर्मं वेद जाजले ॥
sarveṣāṃ yaḥ suhṛnnityaṃ sarveṣāṃ ca hite rataḥ | karmaṇā manasā vācā sa dharmaṃ veda jājale
जो कर्म, मन और वाणी से सदा सबका मित्र है और सबके हित में लगा रहता है, वही धर्म को जानता है, हे जाजले।
श्लोक 10 (12.268.10)
नानुरुध्ये विरुध्ये वा न द्वेष्मि न च कामये । समोऽहं सर्वभूतेषु पश्य मे जाजले व्रतम् । तुला मे सर्वभूतेषु समा तिष्ठति जाजले ॥
nānurudhye virudhye vā na dveṣmi na ca kāmaye | samo'haṃ sarvabhūteṣu paśya me jājale vratam | tulā me sarvabhūteṣu samā tiṣṭhati jājale
मैं न किसी के अनुकूल चलता हूँ, न किसी का विरोध करता हूँ; न द्वेष करता हूँ, न कामना करता हूँ। मैं सब प्राणियों में सम हूँ। हे जाजले, मेरा व्रत देखो: मेरी तराजू सब प्राणियों के प्रति बराबर रहती है।
श्लोक 11 (12.268.11)
नाहं परेषां कृत्यानि प्रशंसामि न गर्हये । आकाशस्येव विप्रेन्द्र पश्यँल्लोकस्य चित्रताम् ॥
nāhaṃ pareṣāṃ kṛtyāni praśaṃsāmi na garhaye | ākāśasyeva viprendra paśyam̐llokasya citratām
हे विप्रश्रेष्ठ, मैं दूसरों के कर्मों की न प्रशंसा करता हूँ, न निन्दा; मैं संसार की विचित्रता को वैसे ही देखता हूँ जैसे कोई आकाश को देखता है।
श्लोक 12 (12.268.12)
कृपा मे सर्वभूतेषु समा तिष्ठति जाजले । इष्टानिष्टनियुक्तस्य प्रियद्वेषौ बहिष्कृतौ ॥
kṛpā me sarvabhūteṣu samā tiṣṭhati jājale | iṣṭāniṣṭaniyuktasya priyadveṣau bahiṣkṛtau
हे जाजले, मुझमें सब प्राणियों के प्रति समान दया बनी रहती है। इष्ट और अनिष्ट के बीच रहते हुए भी मैंने प्रिय और द्वेष, दोनों को बाहर निकाल दिया है।
श्लोक 13 (12.268.13)
इति मां त्वं विजानीहि सर्वलोकस्य जाजले । समं मतिमतां श्रेष्ठ समलोष्टाश्मकाञ्चनम् ॥
iti māṃ tvaṃ vijānīhi sarvalokasya jājale | samaṃ matimatāṃ śreṣṭha samaloṣṭāśmakāñcanam
हे जाजले, मुझे ऐसा ही जानो: हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, मैं सारे संसार के प्रति सम हूँ, और मेरे लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना बराबर हैं।
श्लोक 14 (12.268.14)
यथाऽन्धबधिरोन्मत्ता उच्छ्वासपरमाः सदा । देवैरपिहितद्वाराः सोपमा पश्यतो मम ॥
yathā'ndhabadhironmattā ucchvāsaparamāḥ sadā | devairapihitadvārāḥ sopamā paśyato mama
जैसे अन्धे, बहरे और उन्मत्त लोग, जिनका सबसे बड़ा आश्रय केवल साँस लेना है और जिनके द्वार देवताओं ने बन्द कर दिए हैं, वैसी ही उपमा मुझ देखनेवाले के लिए है।
श्लोक 15 (12.268.15)
यथा वृद्धातुरकृशा निस्पृहा विषयान्प्रति । तथाऽर्थकामभोगेषु ममापि विगता स्पृहा ॥
yathā vṛddhāturakṛśā nispṛhā viṣayānprati | tathā'rthakāmabhogeṣu mamāpi vigatā spṛhā
जैसे वृद्ध, रोगी और दुर्बल लोगों की विषयों के प्रति इच्छा नहीं रहती, वैसे ही मेरी भी अर्थ, काम और भोगों के प्रति इच्छा चली गई है।
श्लोक 16 (12.268.16)
यदा चायं न बिभेति यदा चास्मान्न बिभ्यति । यदा नेच्छति न द्वेष्टि तदा सिद्ध्यति वै द्विज ॥
yadā cāyaṃ na bibheti yadā cāsmānna bibhyati | yadā necchati na dveṣṭi tadā siddhyati vai dvija
हे द्विज, जब मनुष्य किसी से नहीं डरता और कोई उससे नहीं डरता, जब वह न इच्छा करता है, न द्वेष करता है, तभी वह सिद्धि पाता है।
श्लोक 17 (12.268.17)
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म संपद्यते तदा ॥
yadā na kurute bhāvaṃ sarvabhūteṣu pāpakam | karmaṇā manasā vācā brahma saṃpadyate tadā
जब मनुष्य कर्म, मन और वाणी से किसी भी प्राणी के प्रति बुरा भाव नहीं रखता, तब वह ब्रह्म हो जाता है।
श्लोक 18 (12.268.18)
न भूतो न भविष्योऽस्ति न च धर्मोऽस्ति कश्चन । योऽभयः सर्वभूतानां स प्राप्नोत्यभयं पदम् ॥
na bhūto na bhaviṣyo'sti na ca dharmo'sti kaścana | yo'bhayaḥ sarvabhūtānāṃ sa prāpnotyabhayaṃ padam
न कोई हुआ है, न होगा, और न कोई धर्म ऐसा है: जो सब प्राणियों के लिए भय का कारण नहीं है, वह निर्भय पद को पाता है।
श्लोक 19 (12.268.19)
यस्मादुद्विजते लोकः सर्वो मृत्युमुखादिव । वाक्क्रूराद्दण्डपरुषात्स प्राप्नोति महद्भयम् ॥
yasmādudvijate lokaḥ sarvo mṛtyumukhādiva | vākkrūrāddaṇḍaparuṣātsa prāpnoti mahadbhayam
जिस मनुष्य से अपनी क्रूर वाणी और कठोर दण्ड के कारण सारा संसार मृत्यु के मुख के समान डरता है, वह स्वयं महान् भय पाता है।
श्लोक 20 (12.268.20)
यथावद्वर्तमानानां वृद्धानां पुत्रपौत्रिणाम् । अनुवर्तामहे वृत्तमहिंस्त्राणां महात्मनाम् ॥
yathāvadvartamānānāṃ vṛddhānāṃ putrapautriṇām | anuvartāmahe vṛttamahiṃstrāṇāṃ mahātmanām
हम उन महात्मा वृद्धों के आचरण का अनुसरण करते हैं जो ठीक प्रकार से जीवन बिताते हैं, पुत्र-पौत्रों वाले हैं और हिंसा नहीं करते।
श्लोक 21 (12.268.21)
प्रनष्टः शाश्वतो धर्मः सदाचारेण मोहितः । तेन वैद्यस्तपस्वी वा बलवान्वा विमुह्यते ॥
pranaṣṭaḥ śāśvato dharmaḥ sadācāreṇa mohitaḥ | tena vaidyastapasvī vā balavānvā vimuhyate
सनातन धर्म लोकाचार से ढककर नष्ट हो गया है; इसी कारण विद्वान्, तपस्वी और बलवान् भी भ्रम में पड़ जाते हैं।
श्लोक 22 (12.268.22)
आचाराज्जाजले प्राज्ञः क्षिप्रं धर्ममवाप्नुयात् । एवं यः साधुभिर्दान्तश्चरेदद्रोहचेतसा ॥
ācārājjājale prājñaḥ kṣipraṃ dharmamavāpnuyāt | evaṃ yaḥ sādhubhirdāntaścaredadrohacetasā
हे जाजले, जो बुद्धिमान् सज्जनों के साथ संयम रखकर द्रोहरहित मन से इस प्रकार आचरण करता है, वह आचार के द्वारा शीघ्र धर्म को पा लेता है।
श्लोक 23 (12.268.23)
नद्यां चेह यथा काष्ठमुह्यमानं यदृच्छया । यदृच्छयैव काष्ठेन सन्धि गच्छेत केनचित् ॥
nadyāṃ ceha yathā kāṣṭhamuhyamānaṃ yadṛcchayā | yadṛcchayaiva kāṣṭhena sandhi gaccheta kenacit
जैसे नदी में संयोग से बहता हुआ कोई काठ संयोग से ही किसी दूसरे काठ से जुड़ जाता है,
श्लोक 24 (12.268.24)
तत्रापराणि दारूणि संसृज्यन्ते ततस्ततः । तृणकाष्ठकरीषाणि कदाचिन्न समीक्षया ॥
tatrāparāṇi dārūṇi saṃsṛjyante tatastataḥ | tṛṇakāṣṭhakarīṣāṇi kadācinna samīkṣayā
और वहाँ इधर-उधर से दूसरी लकड़ियाँ, तिनके, काठ और गोबर के कण भी कभी बिना किसी सोच-विचार के उससे जुड़ते जाते हैं;
श्लोक 25 (12.268.25)
यस्मान्नोद्विजते भूतं जातु किंचित्कथंचन । अभयं सर्वभूतेभ्यः स प्राप्नोति सदा मुने ॥
yasmānnodvijate bhūtaṃ jātu kiṃcitkathaṃcana | abhayaṃ sarvabhūtebhyaḥ sa prāpnoti sadā mune
उसी प्रकार जिससे कोई प्राणी कभी किसी प्रकार नहीं डरता, हे मुने, वह सब प्राणियों से अभय पा लेता है।
श्लोक 26 (12.268.26)
यस्मादुद्विजते विद्वन्सर्वलोको वृकादिव । क्रोशतस्तीरमासाद्य यथा सर्वे जलेचराः ॥
yasmādudvijate vidvansarvaloko vṛkādiva | krośatastīramāsādya yathā sarve jalecarāḥ
हे विद्वन्, जिससे सारा संसार भेड़िये की तरह डरता है, जैसे किनारे पर आकर चिल्लानेवाले से सब जलचर डरते हैं,
श्लोक 27 (12.268.27)
एवमेवायमाचारः प्रादुर्भूतो यतस्ततः । सहायवान्द्रव्यवान्यः सुभगोऽथ परस्तथा ॥
evamevāyamācāraḥ prādurbhūto yatastataḥ | sahāyavāndravyavānyaḥ subhago'tha parastathā
इसी प्रकार यह आचार जहाँ-तहाँ से उत्पन्न हुआ है: साथियोंवाले, धनवान्, भाग्यवान् और उन्हीं जैसे दूसरे लोगों से।
श्लोक 28 (12.268.28)
ततस्तानेव कवयः शास्त्रेषु प्रवदन्त्युत । कीर्त्यर्थमल्पहृल्लेखाः पटवः कृत्स्ननिर्णयाः ॥
tatastāneva kavayaḥ śāstreṣu pravadantyuta | kīrtyarthamalpahṛllekhāḥ paṭavaḥ kṛtsnanirṇayāḥ
उन्हीं की कवि लोग शास्त्रों में प्रशंसा करते हैं, कीर्ति के लिए; वे चतुर होते हैं, उनके हृदय में गहरी छाप थोड़ी होती है, और वे सब बातों का निर्णय कर डालते हैं।
श्लोक 29 (12.268.29)
तपोभिर्यज्ञदानैश्च वाक्यैः प्रज्ञाश्रितैस्तथा । प्राप्नोत्यभयदानस्य यद्यत्फलमिहाश्नुते ॥
tapobhiryajñadānaiśca vākyaiḥ prajñāśritaistathā | prāpnotyabhayadānasya yadyatphalamihāśnute
तप, यज्ञ, दान और प्रज्ञा पर टिके वचनों से यहाँ जो-जो फल भोगा जाता है, वह सब मनुष्य अभयदान से पा लेता है।
श्लोक 30 (12.268.30)
लोके यः सर्वभूतेभ्यो ददात्यभयदक्षिणाम् । स सत्ययज्ञैरीजानः प्राप्नोत्यभयदक्षिणाम् ॥
loke yaḥ sarvabhūtebhyo dadātyabhayadakṣiṇām | sa satyayajñairījānaḥ prāpnotyabhayadakṣiṇām
जो इस लोक में सब प्राणियों को अभय की दक्षिणा देता है, वह सच्चे यज्ञों से यजन करके स्वयं अभय की दक्षिणा पाता है।
श्लोक 31 (12.268.31)
न भूतानामहिंसाया ज्यायान्धर्मोऽस्ति कश्चन । यस्मान्नोद्विजते भूतं जातु किंचित्कथंचन । सोऽभयं सर्वभूतेभ्यः संप्राप्नोति महामुने ॥
na bhūtānāmahiṃsāyā jyāyāndharmo'sti kaścana | yasmānnodvijate bhūtaṃ jātu kiṃcitkathaṃcana | so'bhayaṃ sarvabhūtebhyaḥ saṃprāpnoti mahāmune
प्राणियों के प्रति अहिंसा से बड़ा कोई धर्म नहीं है। हे महामुने, जिससे कोई प्राणी कभी किसी प्रकार नहीं डरता, वह सब प्राणियों से अभय पाता है।
श्लोक 32 (12.268.32)
यस्मादुद्विजते लोकः सर्पाद्वेश्मगतादिव । न स धर्ममवाप्नोति इह लोके परत्र च ॥
yasmādudvijate lokaḥ sarpādveśmagatādiva | na sa dharmamavāpnoti iha loke paratra ca
जिससे संसार घर में घुसे साँप की तरह डरता है, वह न इस लोक में धर्म पाता है, न परलोक में।
श्लोक 33 (12.268.33)
सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतानि पश्यतः । देवाऽपि मार्गे मुह्यन्ति ह्यपदस्य पदैषिणः ॥
sarvabhūtātmabhūtasya sarvabhūtāni paśyataḥ | devā'pi mārge muhyanti hyapadasya padaiṣiṇaḥ
जो सब प्राणियों का आत्मा बन गया है और सब प्राणियों को देखता है, उस पदहीन के पदचिह्न खोजनेवाले देवता भी उसके मार्ग में मोह में पड़ जाते हैं।
श्लोक 34 (12.268.34)
दानं भूताभयस्याहुः सर्वदानेभ्य उत्तमम् । ब्रवीमि ते सत्यमिदं श्रद्धत्स्व मम जाजले ॥
dānaṃ bhūtābhayasyāhuḥ sarvadānebhya uttamam | bravīmi te satyamidaṃ śraddhatsva mama jājale
कहते हैं कि प्राणियों को अभय देना सब दानों में उत्तम है। मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ; हे जाजले, मेरी बात पर विश्वास करो।
श्लोक 35 (12.268.35)
स एव सुभगो भूत्वा पुनर्भवति दुर्भगः । व्यापत्तिं कर्मणां दृष्ट्वा जुगुप्सन्ति जनाः सदा ॥
sa eva subhago bhūtvā punarbhavati durbhagaḥ | vyāpattiṃ karmaṇāṃ dṛṣṭvā jugupsanti janāḥ sadā
जो भाग्यवान् होता है, वही फिर अभागा हो जाता है; कर्मों का विनाश देखकर लोग सदा घृणा करने लगते हैं।
श्लोक 36 (12.268.36)
अकारणो हि नैवास्ति धर्मः सूक्ष्मो हि जाजले । भूतभव्यार्थमेवेह धर्मप्रवचनं कृतम् ॥
akāraṇo hi naivāsti dharmaḥ sūkṣmo hi jājale | bhūtabhavyārthameveha dharmapravacanaṃ kṛtam
हे जाजले, धर्म सूक्ष्म होने पर भी प्रयोजनरहित नहीं है; धर्म का उपदेश यहाँ प्राणियों के वर्तमान और भविष्य के हित के लिए ही किया गया है।
श्लोक 37 (12.268.37)
सूक्ष्मत्वान्न स विज्ञातुं शक्यते बहुनिह्नवः । उपलभ्यान्तरा चान्यानाचारानवबुध्यते ॥
sūkṣmatvānna sa vijñātuṃ śakyate bahunihnavaḥ | upalabhyāntarā cānyānācārānavabudhyate
सूक्ष्म होने के कारण वह भली-भाँति जाना नहीं जा सकता; उसमें बहुत छिपाव है। बीच-बीच में दूसरे आचारों को देखकर उसे समझा जाता है।
श्लोक 38 (12.268.38)
ये च च्छिन्दन्ति वृषणान्ये च भिन्दन्ति नस्तकान् । वहन्ति महतो भारान्बध्नन्ति दमयन्ति च । हत्वा सत्वानि खादन्ति तान्कथं न विगर्हसे ॥
ye ca cchindanti vṛṣaṇānye ca bhindanti nastakān | vahanti mahato bhārānbadhnanti damayanti ca | hatvā satvāni khādanti tānkathaṃ na vigarhase
जो पशुओं के अण्डकोश काटते हैं, उनके नथुने छेदते हैं, उनसे भारी बोझ ढुलवाते हैं, उन्हें बाँधते और वश में करते हैं, और जीवों को मारकर खा जाते हैं, उनकी निन्दा तुम क्यों नहीं करते?
श्लोक 39 (12.268.39)
मानुषा मानुषानेव दासभोगेन भुञ्जते । वधबन्धनिरोधेन कारयन्ति दिवानिशम् ॥
mānuṣā mānuṣāneva dāsabhogena bhuñjate | vadhabandhanirodhena kārayanti divāniśam
मनुष्य ही मनुष्यों को दास बनाकर उनसे काम लेते हैं और मारने, बाँधने और कैद करने के बल पर दिन-रात उनसे काम करवाते हैं।
श्लोक 40 (12.268.40)
आत्मनश्चापि जानाति यद्दुःखं वधबन्धने । पञ्चेन्द्रियेषु भूतेषु सर्वं वसति दैवतम् ॥
ātmanaścāpi jānāti yadduḥkhaṃ vadhabandhane | pañcendriyeṣu bhūteṣu sarvaṃ vasati daivatam
मारे और बाँधे जाने में कितना दुःख होता है, यह तुम स्वयं भी जानते हो। पाँच इन्द्रियोंवाले प्राणियों में सब देवता निवास करते हैं:
श्लोक 41 (12.268.41)
आदित्यश्चन्द्रमा वायुर्ब्रह्मा प्राणः क्रतुर्यमः । तानि जीवानि विक्रीय का मृतेषु विचारणा ॥
ādityaścandramā vāyurbrahmā prāṇaḥ kraturyamaḥ | tāni jīvāni vikrīya kā mṛteṣu vicāraṇā
आदित्य, चन्द्रमा, वायु, ब्रह्मा, प्राण, यज्ञ और यम। ऐसे जीवित प्राणियों को बेचकर मरे हुओं के विषय में क्या विचार करना रह जाता है?
श्लोक 42 (12.268.42)
अजोऽग्निर्वरुणो मेषः सूर्योऽश्वः पृथिवी विराट् । धेनुर्वत्सश्च सोमो वै विक्रीयैतन्न सिध्यति ॥
ajo'gnirvaruṇo meṣaḥ sūryo'śvaḥ pṛthivī virāṭ | dhenurvatsaśca somo vai vikrīyaitanna sidhyati
बकरा अग्नि है, मेढ़ा वरुण है, घोड़ा सूर्य है, पृथ्वी विराट् है, और गाय तथा बछड़ा सोम हैं। इन्हें बेचने से सिद्धि नहीं मिलती।
श्लोक 43 (12.268.43)
का तैले का धृते ब्रह्मन्मधुन्यप्स्वोषधीषु वा ॥
kā taile kā dhṛte brahmanmadhunyapsvoṣadhīṣu vā
हे ब्रह्मन्, तेल, घी, शहद, जल या ओषधियों में क्या दोष है?
श्लोक 44 (12.268.44)
अदंशमशके देशे सुखसंवर्धितान्पशून् । तांश्च मातुः प्रियाञ्जानन्नाक्रम्य बहुधा नराः ॥
adaṃśamaśake deśe sukhasaṃvardhitānpaśūn | tāṃśca mātuḥ priyāñjānannākramya bahudhā narāḥ
जिन पशुओं को बिना डाँस-मच्छर वाले स्थान में सुख से पाला गया है, वे अपनी माताओं को कितने प्रिय हैं, यह जानते हुए भी मनुष्य उन्हें अनेक प्रकार से दबाकर पकड़ लेते हैं
श्लोक 45 (12.268.45)
बहुदंशाकुलान्देशान्नयन्ति बहुकर्दमान् । वाहसंपीडिता धुर्याः सीदन्त्यविधिना परे ॥
bahudaṃśākulāndeśānnayanti bahukardamān | vāhasaṃpīḍitā dhuryāḥ sīdantyavidhinā pare
और बहुत डाँसों से भरे और कीचड़वाले प्रदेशों में ले जाते हैं। बोझ से दबे हुए भारवाही पशु अनुचित व्यवहार से गिर पड़ते हैं।
श्लोक 46 (12.268.46)
न मन्ये भ्रूणहत्याऽपि विशिष्टा तेन कर्मणा । कृषिं साध्विति मन्यन्ते सा च वृत्तिः सुदारुणा ॥
na manye bhrūṇahatyā'pi viśiṣṭā tena karmaṇā | kṛṣiṃ sādhviti manyante sā ca vṛttiḥ sudāruṇā
मैं नहीं मानता कि भ्रूणहत्या भी उस कर्म से बढ़कर है। लोग खेती को अच्छा मानते हैं, पर वह जीविका अत्यन्त कठोर है।
श्लोक 47 (12.268.47)
भूमिं भूमिशयांश्चैव हन्ति काष्ठैरयोमुखैः । तथैवानडुहो युक्तान्क्षुत्तृष्णाश्रमकर्शितान् ॥
bhūmiṃ bhūmiśayāṃścaiva hanti kāṣṭhairayomukhaiḥ | tathaivānaḍuho yuktānkṣuttṛṣṇāśramakarśitān
लोहे के मुखवाले हल पृथ्वी को और पृथ्वी में रहनेवाले जीवों को मारते हैं, और इसी प्रकार भूख, प्यास और परिश्रम से दुर्बल हुए जुते हुए बैलों को भी।
श्लोक 48 (12.268.48)
अध्न्या इति गवां नाम क एता हन्तुमर्हति । महच्चकाराकुशलं वृथा यो गां निहन्ति ह ॥
adhnyā iti gavāṃ nāma ka etā hantumarhati | mahaccakārākuśalaṃ vṛthā yo gāṃ nihanti ha
गायों का नाम "अघ्न्या" है, अर्थात् जिन्हें मारा न जाए। उन्हें कौन मार सकता है? जो व्यर्थ ही गाय को मारता है, वह बड़ा अकल्याण करता है।
श्लोक 49 (12.268.49)
ऋषयो यतयो ह्येतन्नहुषे प्रत्यवेदयन् । गां मातरं चाप्यवधीर्वृषभं च प्रजापतिम् । अकार्यं नहुषाकार्षीर्लप्स्यामस्त्वत्कृते व्यथाम् ॥
ṛṣayo yatayo hyetannahuṣe pratyavedayan | gāṃ mātaraṃ cāpyavadhīrvṛṣabhaṃ ca prajāpatim | akāryaṃ nahuṣākārṣīrlapsyāmastvatkṛte vyathām
ऋषियों और यतियों ने नहुष से यही कहा: "तुमने माता गाय को मार डाला और प्रजापति रूप बैल को भी। हे नहुष, तुमने अकरणीय कर्म किया है; तुम्हारे कारण हमें कष्ट भोगना पड़ेगा।"
श्लोक 50 (12.268.50)
शतं चैकं च रोगाणां सर्वभूतेष्वपातयन् । ऋषयस्ते महाभागाः प्रशस्तास्ते च जाजले ॥
śataṃ caikaṃ ca rogāṇāṃ sarvabhūteṣvapātayan | ṛṣayaste mahābhāgāḥ praśastāste ca jājale
हे जाजले, उन महाभाग और प्रशंसित ऋषियों ने सब प्राणियों पर एक सौ एक रोग गिरा दिए।
श्लोक 51 (12.268.51)
भ्रूणहं नहुषं त्वाहुर्न तं भोक्ष्यामहे वयम् । इत्युक्त्वा ते महात्मानः सर्वे तत्त्वार्थदर्शिनः । ऋषयो यतयः शान्तास्तपसा प्रत्यवेदयन् ॥
bhrūṇahaṃ nahuṣaṃ tvāhurna taṃ bhokṣyāmahe vayam | ityuktvā te mahātmānaḥ sarve tattvārthadarśinaḥ | ṛṣayo yatayaḥ śāntāstapasā pratyavedayan
"लोग नहुष को भ्रूणहत्यारा कहते हैं; हम उससे भोजन नहीं लेंगे।" ऐसा कहकर तत्त्व को देखनेवाले उन सब महात्मा, शान्त ऋषियों और यतियों ने अपने तप से यही बात फिर प्रकट की।
श्लोक 52 (12.268.52)
ईदृशानशिवान्घोरानाचारानिह जाजले । केवलाचरितत्वात्तु निपुणो नावबुध्यसे ॥
īdṛśānaśivānghorānācārāniha jājale | kevalācaritatvāttu nipuṇo nāvabudhyase
हे जाजले, यहाँ ऐसे अशुभ और भयंकर आचार प्रचलित हैं; तुम निपुण होकर भी इन्हें नहीं समझते, क्योंकि तुम केवल चली आती परम्परा का पालन करते हो।
श्लोक 53 (12.268.53)
कारणाद्धर्ममन्विच्छन्न लोकं विरसं चरेत् ॥
kāraṇāddharmamanvicchanna lokaṃ virasaṃ caret
कारण के आधार पर धर्म की खोज करनेवाले को संसार में नीरस ढंग से नहीं चलना चाहिए।
श्लोक 54 (12.268.54)
यो हन्याद्यश्च मां स्तौति तत्रापि शृणु जाजले । समौ तावपि मे स्थातां न हि मे स्तः प्रियाप्रिये । एतदीदृशकं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः ॥
yo hanyādyaśca māṃ stauti tatrāpi śṛṇu jājale | samau tāvapi me sthātāṃ na hi me staḥ priyāpriye | etadīdṛśakaṃ dharmaṃ praśaṃsanti manīṣiṇaḥ
हे जाजले, इस विषय में भी सुनो: जो मुझे मारे और जो मेरी स्तुति करे, वे दोनों मेरे लिए समान होंगे, क्योंकि मेरे लिए कोई प्रिय या अप्रिय नहीं है। ऐसे ही धर्म की विद्वान् लोग प्रशंसा करते हैं।
श्लोक 55 (12.268.55)
उपपत्त्या हि संपन्नो यतिभिश्चैव सेव्यते । सततं धर्मशीलैश्च निपुणेनोपलक्षितः ॥
upapattyā hi saṃpanno yatibhiścaiva sevyate | satataṃ dharmaśīlaiśca nipuṇenopalakṣitaḥ
वह युक्ति से सम्पन्न है, यतियों द्वारा उसका सेवन किया जाता है, और सदा धर्म में लगे रहनेवाले निपुण लोग उसे पहचानते हैं।"