शान्ति पर्व · अध्याय 269
तुलाधार का जाजलि को यज्ञ का सच्चा स्वरूप बताना
जाजलि शिकायत करते हैं कि तुलाधार की शिक्षा स्वर्ग का द्वार बन्द कर देगी और खेती तथा यज्ञ से मिलने वाली जीविका को रोक देगी। तुलाधार उत्तर देते हैं कि वे यज्ञ की निन्दा नहीं करते, केवल लोभी लोगों और लोभी ऋत्विजों के यज्ञ की निन्दा करते हैं; वे प्राचीन ज्ञानियों का वर्णन करते हैं जो सत्य और संयम से यज्ञ करते थे, किसी प्राणी को पीड़ा नहीं देते थे और ब्रह्म के धाम को पाते थे। जब जाजलि पूछते हैं कि किस कर्म से सुख मिलता है, तो तुलाधार गौ का उदाहरण देते हैं, जिसके दूध-घी से हर यज्ञ पूरा होता है, और यह सत्य बताते हैं कि आत्मा ही सबसे पवित्र तीर्थ है। अन्त में भीष्म कहते हैं कि तुलाधार ऐसे ही युक्तिसंगत और अहिंसक धर्मों की प्रशंसा करते हैं।
जाजलिरुवाच
श्लोक 1 (12.269.1)
यथा प्रवर्तितो धर्मस्तुलां धारयता त्वया । स्वर्गद्वारं च वृत्तिं च भूतानामवरोत्स्यते ॥
yathā pravartito dharmastulāṃ dhārayatā tvayā | svargadvāraṃ ca vṛttiṃ ca bhūtānāmavarotsyate
"तराजू थामे हुए तुमने जिस ढंग से धर्म को चलाया है, उससे प्राणियों के लिए स्वर्ग का द्वार और उनकी जीविका रुक जाएगी।"
श्लोक 2 (12.269.2)
कृष्या ह्यन्नं प्रभवति ततस्त्वमपि जीवसि । पशुभिश्चौषधीभिश्च मर्त्या जीवन्ति वाणिज ॥
kṛṣyā hyannaṃ prabhavati tatastvamapi jīvasi | paśubhiścauṣadhībhiśca martyā jīvanti vāṇija
"खेती से अन्न उत्पन्न होता है और उसी से तुम भी जीते हो; हे वणिक्, पशुओं और ओषधियों से ही मनुष्य जीवित रहते हैं।"
श्लोक 3 (12.269.3)
ततो यज्ञः प्रभवति नास्तिक्यमपि जल्पसि । न हि वर्तेदयं लोको वार्तामुत्सृज्य केवलाम् ॥
tato yajñaḥ prabhavati nāstikyamapi jalpasi | na hi vartedayaṃ loko vārtāmutsṛjya kevalām
"उसी से यज्ञ उत्पन्न होता है, फिर भी तुम नास्तिकता की बातें करते हो। यदि यह संसार खेती-व्यापार की जीविका को पूरी तरह छोड़ दे, तो टिक नहीं सकता।"
तुलाधार उवाच
श्लोक 4 (12.269.4)
वक्ष्यामि जाजले वृत्तिं नास्मि ब्राह्मण नास्तिकः । न यज्ञं च विनिन्दामि यज्ञवित्तु सुदुर्लभः ॥
vakṣyāmi jājale vṛttiṃ nāsmi brāhmaṇa nāstikaḥ | na yajñaṃ ca vinindāmi yajñavittu sudurlabhaḥ
"जाजलि, मैं अपनी जीविका का मार्ग तुम्हें बताता हूँ। हे ब्राह्मण, मैं नास्तिक नहीं हूँ और यज्ञ की निन्दा नहीं करता; किन्तु यज्ञ को सचमुच जाननेवाला बहुत दुर्लभ है।"
श्लोक 5 (12.269.5)
नमो ब्राह्मण यज्ञाय ये च यज्ञविदो जनाः । स्वयज्ञं ब्राह्मणा हित्वा क्षत्रयज्ञमनुष्ठिताः ॥
namo brāhmaṇa yajñāya ye ca yajñavido janāḥ | svayajñaṃ brāhmaṇā hitvā kṣatrayajñamanuṣṭhitāḥ
"हे ब्राह्मण, यज्ञ को नमस्कार है और उन लोगों को भी जो यज्ञ को जानते हैं। ब्राह्मणों ने अपना यज्ञ छोड़कर क्षत्रियों के यज्ञ को अपना लिया है।"
श्लोक 6 (12.269.6)
लुब्धैर्वित्तपरैर्ब्रह्मन्नास्तिकैः संप्रवर्तितम् । वेदवादानभिज्ञानां सत्याभासमिवानृतम् ॥
lubdhairvittaparairbrahmannāstikaiḥ saṃpravartitam | vedavādānabhijñānāṃ satyābhāsamivānṛtam
"हे ब्राह्मण, इसे उन लोभी, धन में ही लगे हुए नास्तिकों ने चलाया है जो वेद के वचनों को नहीं जानते; यह सत्य जैसा दिखनेवाला असत्य है।"
श्लोक 7 (12.269.7)
इदं देयमिदं देयमिति नान्यच्चिकीर्षति । अतः स्तैन्यं प्रभवति विकर्माणि च जाजले ॥
idaṃ deyamidaṃ deyamiti nānyaccikīrṣati | ataḥ stainyaṃ prabhavati vikarmāṇi ca jājale
"'यह देना है, यह देना है', इसके सिवा वे और कुछ करना नहीं चाहते। जाजलि, इसी से चोरी और कुकर्म पैदा होते हैं।"
श्लोक 8 (12.269.8)
यदेव सुकृतं हव्यं तेन तुष्यन्ति देवताः । नमस्कारेण हविषा स्वाध्यायैरौषधैस्तथा । पूजा स्याद्देवतानां हि यथाशास्त्रनिदर्शनम् ॥
yadeva sukṛtaṃ havyaṃ tena tuṣyanti devatāḥ | namaskāreṇa haviṣā svādhyāyairauṣadhaistathā | pūjā syāddevatānāṃ hi yathāśāstranidarśanam
"जो हव्य भलीभाँति तैयार किया गया हो, उसी से देवता तृप्त होते हैं: नमस्कार, हविष्य, स्वाध्याय और ओषधियों से। देवताओं की पूजा शास्त्र के दिखाए अनुसार ही होती है।"
श्लोक 9 (12.269.9)
इष्टापूर्तादसाधूनां विदुषां जायते प्रजा । लुब्धेभ्यो जायते लुब्धः समेभ्यो जायते समः ॥
iṣṭāpūrtādasādhūnāṃ viduṣāṃ jāyate prajā | lubdhebhyo jāyate lubdhaḥ samebhyo jāyate samaḥ
"दुष्टों और विद्वानों के इष्ट और पूर्त कर्मों से सन्तान उत्पन्न होती है; लोभी से लोभी उत्पन्न होता है और समदर्शी से समदर्शी।"
श्लोक 10 (12.269.10)
यजमाना यथाऽऽत्मानमृत्विजश्च तथा प्रजाः । यज्ञात्प्रजा प्रभवति नभसोऽम्भ इवामलम् ॥
yajamānā yathā''tmānamṛtvijaśca tathā prajāḥ | yajñātprajā prabhavati nabhaso'mbha ivāmalam
"यजमान जैसे अपने-आप में होते हैं और ऋत्विज भी, वैसी ही प्रजा होती है; यज्ञ से प्रजा उत्पन्न होती है, जैसे आकाश से निर्मल जल।"
श्लोक 11 (12.269.11)
अग्नौ प्रास्ताहुतिर्ब्रह्मन्नादित्यमुपगच्छति । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥
agnau prāstāhutirbrahmannādityamupagacchati | ādityājjāyate vṛṣṭirvṛṣṭerannaṃ tataḥ prajāḥ
"हे ब्राह्मण, अग्नि में डाली हुई आहुति सूर्य तक पहुँचती है; सूर्य से वर्षा होती है, वर्षा से अन्न और अन्न से प्रजा।"
श्लोक 12 (12.269.12)
तस्मात्सुनिष्ठिताः पूर्वे सर्वान्कामांश्च लेभिरे । अकृष्टपच्या पृथिवी आशीर्भिर्वीरुधोऽभवन् ॥
tasmātsuniṣṭhitāḥ pūrve sarvānkāmāṃśca lebhire | akṛṣṭapacyā pṛthivī āśīrbhirvīrudho'bhavan
"इसीलिए पूर्वजों ने, उसमें भलीभाँति स्थिर रहकर, सब इच्छित वस्तुएँ पा लीं। पृथ्वी बिना जोते ही अन्न देती थी और उनके आशीर्वादों से लताएँ और ओषधियाँ उग आती थीं।"
श्लोक 13 (12.269.13)
न ते यज्ञेष्वात्मसु वा फलं पश्यन्ति किंचन । शङ्कमानाः फलं यज्ञे ये यजेरन्कथंचन ॥
na te yajñeṣvātmasu vā phalaṃ paśyanti kiṃcana | śaṅkamānāḥ phalaṃ yajñe ye yajerankathaṃcana
"जो लोग फल के विषय में शंका रखते हुए किसी भी तरह यज्ञ करते हैं, वे यज्ञों में या अपने में कोई फल नहीं देखते।"
श्लोक 14 (12.269.14)
जानन्तः सर्वथा साधु लुब्धा वित्तप्रयोजनाः । स स्म पापकृतां लोकान्गच्छेदशुभकर्मणा ॥
jānantaḥ sarvathā sādhu lubdhā vittaprayojanāḥ | sa sma pāpakṛtāṃ lokāngacchedaśubhakarmaṇā
"सब प्रकार से भली-भाँति जानते हुए भी जो लोभी और धन के प्रयोजन में लगे रहते हैं, वह मनुष्य अपने अशुभ कर्म से पापियों के लोकों में जाता है।"
श्लोक 15 (12.269.15)
प्रमाणमप्रमाणेन यः कुर्यादशुभं नरः । पापात्मा सोऽकृतप्रज्ञः सदैवेह द्विजोत्तम ॥
pramāṇamapramāṇena yaḥ kuryādaśubhaṃ naraḥ | pāpātmā so'kṛtaprajñaḥ sadaiveha dvijottama
"जो मनुष्य अप्रमाण को प्रमाण मानकर अशुभ कर्म करता है, वह पापात्मा और अविवेकी ही रहता है, हे द्विजश्रेष्ठ।"
श्लोक 16 (12.269.16)
कर्तव्यमिति कर्तव्यं वेत्ति वै ब्राह्मणोऽभयम् । ब्रह्मैव वर्तते लोके नैव कर्तव्यतां पुनः ॥
kartavyamiti kartavyaṃ vetti vai brāhmaṇo'bhayam | brahmaiva vartate loke naiva kartavyatāṃ punaḥ
"जो ब्राह्मण 'यह करने योग्य है' इस प्रकार करणीय को करणीय जानता है, वह अभय को जानता है। वह संसार में ब्रह्मरूप होकर ही रहता है और फिर कभी कर्तव्य की अधीनता में नहीं पड़ता।"
श्लोक 17 (12.269.17)
विगुणं च पुनः कर्म ज्याय इत्यनुशुश्रुम् । सर्वभूतोपकारश्च फलभावे च संयमः ॥
viguṇaṃ ca punaḥ karma jyāya ityanuśuśrum | sarvabhūtopakāraśca phalabhāve ca saṃyamaḥ
"हमने यह भी सुना है कि अपना कर्म दोषयुक्त हो तो भी श्रेष्ठ है; और सब प्राणियों का उपकार तथा फल की इच्छा में संयम भी।"
श्लोक 18 (12.269.18)
सत्ययज्ञा दमयज्ञा अलुब्धाश्चात्मवृत्तयः । उत्पन्नत्यागिनः सर्वे जना आसन्नमत्सराः ॥
satyayajñā damayajñā alubdhāścātmavṛttayaḥ | utpannatyāginaḥ sarve janā āsannamatsarāḥ
"वे सत्य के यज्ञ और दम के यज्ञ करनेवाले थे, लोभरहित और आत्मा में ही सन्तुष्ट; वे सब प्राप्त वस्तु का त्याग करनेवाले और मत्सर से रहित थे।"
श्लोक 19 (12.269.19)
क्षेत्रक्षेत्रज्ञतत्त्वज्ञाः स्वयज्ञपरिनिष्ठिताः । ब्राह्मं वेदमधीयन्तस्तोषयन्त्यपरानपि ॥
kṣetrakṣetrajñatattvajñāḥ svayajñapariniṣṭhitāḥ | brāhmaṃ vedamadhīyantastoṣayantyaparānapi
"वे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के तत्त्व को जाननेवाले, अपने ही यज्ञ में पूरी तरह लगे हुए थे; ब्रह्म-वेद का अध्ययन करते हुए वे दूसरों को भी सन्तुष्ट करते थे।"
श्लोक 20 (12.269.20)
अखिलं दैवतं सर्वं ब्रह्म ब्रह्मणि संश्रितम् । तृप्यन्ति तृप्यतो देवास्तृप्तास्तृप्तस्य जाजले ॥
akhilaṃ daivataṃ sarvaṃ brahma brahmaṇi saṃśritam | tṛpyanti tṛpyato devāstṛptāstṛptasya jājale
"सारा दैवत ब्रह्म ही है, जो ब्रह्म में आश्रित है। जब वह तृप्त होता है तब देवता तृप्त होते हैं: जाजलि, तृप्त देवता तृप्त पुरुष के साथ तृप्त होते हैं।"
श्लोक 21 (12.269.21)
यथा सर्वरसैस्तृप्तो नाभिनन्दति किंचन । तथा प्रज्ञानतृप्तस्य नित्यतृप्तिः सुखोदया ॥
yathā sarvarasaistṛpto nābhinandati kiṃcana | tathā prajñānatṛptasya nityatṛptiḥ sukhodayā
"जैसे सब रसों से तृप्त मनुष्य किसी और वस्तु से आनन्दित नहीं होता, वैसे ही प्रज्ञान से तृप्त पुरुष को नित्य तृप्ति मिलती है, जिससे सुख उत्पन्न होता है।"
श्लोक 22 (12.269.22)
धर्माधारा धर्मसुखाः कृत्स्नव्यवसितास्तथा । अस्ति नस्तत्त्वतो भूय इति प्राज्ञस्त्ववेक्षते ॥
dharmādhārā dharmasukhāḥ kṛtsnavyavasitāstathā | asti nastattvato bhūya iti prājñastvavekṣate
"धर्म को आधार बनाए हुए, धर्म में ही सुख पानेवाले और उसमें पूरी तरह निश्चय रखनेवाले प्राज्ञ पुरुष देखते रहते हैं: 'हमारे लिए वास्तव में अभी और भी है।'"
श्लोक 23 (12.269.23)
ज्ञानविज्ञानिनः केचित्परं पारं तितीर्षवः । अतीव पुण्यदं पुण्यं पुण्याभिजनसंहितम् ॥
jñānavijñāninaḥ kecitparaṃ pāraṃ titīrṣavaḥ | atīva puṇyadaṃ puṇyaṃ puṇyābhijanasaṃhitam
"ज्ञान और विज्ञान में निपुण कुछ लोग परले पार जाना चाहते हैं: वह अत्यन्त पुण्य देनेवाला, पवित्र और पुण्यात्माओं के कुल से जुड़ा हुआ पद है।"
श्लोक 24 (12.269.24)
यत्र गत्वा न शोचन्ति न च्यवन्ति व्यथन्ति च । ते तु तद्ब्रह्मणः स्थानं प्राप्नुवन्तीह सात्विकाः ॥
yatra gatvā na śocanti na cyavanti vyathanti ca | te tu tadbrahmaṇaḥ sthānaṃ prāpnuvantīha sātvikāḥ
"वे सात्त्विक पुरुष यहीं उस ब्रह्मधाम को पा लेते हैं, जहाँ पहुँचकर वे न शोक करते हैं, न गिरते हैं और न व्यथित होते हैं।"
श्लोक 25 (12.269.25)
नैव ते स्वर्गमिच्छन्ति न यजन्ति यशोधनाः । सतां वर्त्मानुवर्तन्ते यथाबलमहिंसया ॥
naiva te svargamicchanti na yajanti yaśodhanāḥ | satāṃ vartmānuvartante yathābalamahiṃsayā
"वे स्वर्ग नहीं चाहते और यज्ञ भी नहीं करते, यश ही जिनका धन है; वे अपनी शक्ति के अनुसार अहिंसा के साथ सज्जनों के मार्ग पर चलते हैं।"
श्लोक 26 (12.269.26)
वनस्पतीनोषधीश्च फलमूलानि ते विदुः । न चैतानृत्विजो लुब्धा याजयन्ति फलार्थिनः ॥
vanaspatīnoṣadhīśca phalamūlāni te viduḥ | na caitānṛtvijo lubdhā yājayanti phalārthinaḥ
"वे वनस्पतियों, ओषधियों, फलों और मूलों को जानते हैं; और फल चाहनेवाले लोभी ऋत्विज उनसे यज्ञ नहीं करवाते।"
श्लोक 27 (12.269.27)
स्वमेव चार्थं कुर्वाणा यज्ञं चक्रुः पुनर्द्विजाः । परिनिष्ठितकर्माणः प्रजानुग्रहकाम्यया ॥
svameva cārthaṃ kurvāṇā yajñaṃ cakruḥ punardvijāḥ | pariniṣṭhitakarmāṇaḥ prajānugrahakāmyayā
"द्विजों ने केवल अपना ही प्रयोजन साधते हुए फिर यज्ञ किया; उनके कर्म पूर्ण रूप से सम्पन्न थे और वे प्रजा पर अनुग्रह की कामना रखते थे।"
श्लोक 28 (12.269.28)
तस्मात्तानृत्विजो लुब्धा याजयन्त्यशुभान्नरान् । प्रापयेयुः प्रजाः स्वर्गे स्वधर्माचरणेन वै । इति मे वर्तते बुद्धिः समा सर्वत्र जाजले ॥
tasmāttānṛtvijo lubdhā yājayantyaśubhānnarān | prāpayeyuḥ prajāḥ svarge svadharmācaraṇena vai | iti me vartate buddhiḥ samā sarvatra jājale
"इसलिए वे लोभी ऋत्विज अशुभ मनुष्यों से यज्ञ करवाते हैं। प्रजा तो अपने ही धर्म के आचरण से स्वर्ग पहुँचाई जा सकती है। जाजलि, मेरी बुद्धि यही कहती है, जो सब जगह एक-सी रहती है।"
श्लोक 29 (12.269.29)
प्रयुञ्जते येन यज्ञे सदा प्राज्ञा द्विजर्षभाः । तेन ते देवयानेन पथा यान्ति महामुने ॥
prayuñjate yena yajñe sadā prājñā dvijarṣabhāḥ | tena te devayānena pathā yānti mahāmune
"हे महामुनि, ज्ञानी द्विजश्रेष्ठ यज्ञ में जिस साधन का सदा प्रयोग करते हैं, उसी से वे देवयान मार्ग से जाते हैं।"
श्लोक 30 (12.269.30)
आवृत्तिस्तस्य चैकस्य नास्त्यावृत्तिर्मनीषिणाम् । उभौ तौ देवयानेन गच्छतो जाजले यथा ॥
āvṛttistasya caikasya nāstyāvṛttirmanīṣiṇām | ubhau tau devayānena gacchato jājale yathā
"उनमें एक का लौटना होता है; मनीषियों का लौटना नहीं होता। फिर भी, जाजलि, वे दोनों देवयान से ही जाते हैं, जैसा कहा गया है।"
श्लोक 31 (12.269.31)
स्वयं चैषामनडुहो युञ्जन्ति च वहन्ति च । स्वयमुस्राश्च दुह्यन्ते मनःसंकल्पसिद्धिभिः ॥
svayaṃ caiṣāmanaḍuho yuñjanti ca vahanti ca | svayamusrāśca duhyante manaḥsaṃkalpasiddhibhiḥ
"उनके बैल अपने-आप जुतते और बोझ ढोते हैं, और उनकी गायें अपने-आप दुही जाती हैं, मन के संकल्पों की सिद्धि से।"
श्लोक 32 (12.269.32)
स्वयं यूपानुपादाय यजन्ते स्वाप्तदक्षिणाः । यस्तथा भावितात्मा स्यात्स गामालब्धुमर्हति ॥
svayaṃ yūpānupādāya yajante svāptadakṣiṇāḥ | yastathā bhāvitātmā syātsa gāmālabdhumarhati
"वे स्वयं यूप उठाकर यज्ञ करते हैं और भलीभाँति कमाई हुई दक्षिणा देते हैं। जिसका अन्तःकरण ऐसा संस्कारित हो, वही गौ को यज्ञ के लिए ग्रहण करने योग्य है।"
श्लोक 33 (12.269.33)
ओषधीभिस्तथा ब्रह्मन्यजेरंस्ते न तादृशाः । श्रद्धया गां पुरस्कृत्य तदृतं प्रब्रवीमि ते ॥
oṣadhībhistathā brahmanyajeraṃste na tādṛśāḥ | śraddhayā gāṃ puraskṛtya tadṛtaṃ prabravīmi te
"हे ब्राह्मण, वे ओषधियों से भी यज्ञ कर सकते हैं, पर जो वैसे नहीं हैं वे नहीं करते। श्रद्धा से गौ को आगे रखकर मैं तुम्हें यह सत्य बताता हूँ।"
श्लोक 34 (12.269.34)
निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कारमस्तुतिम् । अक्षीणं क्षीणकर्माणं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥
nirāśiṣamanārambhaṃ nirnamaskāramastutim | akṣīṇaṃ kṣīṇakarmāṇaṃ taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ
"जो आशीर्वाद की इच्छा से रहित, आरम्भ से रहित, नमस्कार और स्तुति से रहित है, और जिसके कर्म क्षीण होने पर भी वह अक्षीण रहता है, उसे देवता ब्राह्मण जानते हैं।"
श्लोक 35 (12.269.35)
न श्रावयन्न च यजन्न ददद्ब्राह्मणेषु च । काम्यां वृत्तिं लिप्समानः कां गतिं याति जाजले । इदं तु दैवतं कृत्वा यथा यज्ञमवाप्नुयात् ॥
na śrāvayanna ca yajanna dadadbrāhmaṇeṣu ca | kāmyāṃ vṛttiṃ lipsamānaḥ kāṃ gatiṃ yāti jājale | idaṃ tu daivataṃ kṛtvā yathā yajñamavāpnuyāt
"जो न पुकार लगाता है, न यज्ञ करता है, न ब्राह्मणों को देता है और कामना की जीविका चाहता है, जाजलि, वह किस गति को पाता है? फिर भी यदि वह इसी को अपना देवता बना ले, तो यज्ञ का फल पा सकता है।"
जाजलिरुवाच
श्लोक 36 (12.269.36)
न वै मुनीनां शृणुमः स्म तत्त्वं । पृच्छामि ते वाणिज कष्टमेतत् । पूर्वेपूर्वे चास्य नावेक्षमाणा । नातः परं तमृषयः स्थापयन्ति ॥
na vai munīnāṃ śṛṇumaḥ sma tattvaṃ | pṛcchāmi te vāṇija kaṣṭametat | pūrvepūrve cāsya nāvekṣamāṇā | nātaḥ paraṃ tamṛṣayaḥ sthāpayanti
"हमने मुनियों से सचमुच यह तत्त्व नहीं सुना। हे वणिक्, मैं तुमसे यह कठिन बात पूछता हूँ: जो पहले हुए उन्होंने इसे नहीं परखा, और ऋषि इससे आगे कुछ स्थापित नहीं करते।"
श्लोक 37 (12.269.37)
यस्मिन्नेवात्मतीर्थेन पशवः प्राप्नुयुर्मखम् । अथ स्म कर्मणा केन वाणिज प्राप्नुयात्सुखम् । शंस मे तन्महाप्राज्ञ भृशं वै श्रद्दधामि ते ॥
yasminnevātmatīrthena paśavaḥ prāpnuyurmakham | atha sma karmaṇā kena vāṇija prāpnuyātsukham | śaṃsa me tanmahāprājña bhṛśaṃ vai śraddadhāmi te
"जहाँ आत्मतीर्थ से ही पशु भी यज्ञ का फल पा जाएँ, तो हे वणिक्, अपने किस कर्म से मनुष्य सुख पा सकता है? हे महाप्राज्ञ, वह मुझे बताओ; मुझे तुम पर बहुत श्रद्धा है।"
तुलाधार उवाच
श्लोक 38 (12.269.38)
उत यज्ञा उतायज्ञा मखं नार्हन्ति ते क्वचित् । आज्येन पयसा दध्ना सत्कृत्यामिक्षया त्वचा । बालैः शृङ्गेण पादेन संभरत्येव गौर्मखम् ॥
uta yajñā utāyajñā makhaṃ nārhanti te kvacit | ājyena payasā dadhnā satkṛtyāmikṣayā tvacā | bālaiḥ śṛṅgeṇa pādena saṃbharatyeva gaurmakham
"यज्ञ हों या अयज्ञ, वे कहीं भी यज्ञ कहलाने योग्य नहीं हैं। घी, दूध और दही से, आदर के साथ, आमिक्षा और चर्म से, बालों, सींग और खुर से गौ स्वयं यज्ञ को पूरा करती है।"
श्लोक 39 (12.269.39)
पत्नीव्रतेन विधिना प्रकरोति नियोजयन् । इष्टं तु दैवतं कृत्वा यथा यज्ञमवाप्नुयात् ॥
patnīvratena vidhinā prakaroti niyojayan | iṣṭaṃ tu daivataṃ kṛtvā yathā yajñamavāpnuyāt
"पत्नी-व्रत की विधि से वह इसे सम्पन्न करता है और नियोजन करता है; और अपने इष्ट देवता को लक्ष्य बनाकर वह यज्ञ का फल पा सकता है।"
श्लोक 40 (12.269.40)
पुरोडाशो हि सर्वेषां पशूनां मेध्य उच्यते । सर्वा नद्यः सरस्वत्यः सर्वे पुण्याः शिलोच्चयाः । जाजले तीर्थमात्मेव मा स्म देशातिथिर्भव ॥
puroḍāśo hi sarveṣāṃ paśūnāṃ medhya ucyate | sarvā nadyaḥ sarasvatyaḥ sarve puṇyāḥ śiloccayāḥ | jājale tīrthamātmeva mā sma deśātithirbhava
"पुरोडाश को सब पशुओं की ओर से पवित्र आहुति कहा गया है। सब नदियाँ सरस्वती हैं, सब शिलाशिखर पुण्य हैं। जाजलि, आत्मा ही तीर्थ है; दूर-दूर के स्थानों का अतिथि मत बनो।"
श्लोक 41 (12.269.41)
एतानीदृशकान्धर्मानाचरन्निह जाजले । कारणैर्धर्ममन्विच्छन्स लोकानाप्नुते शुभान् ॥
etānīdṛśakāndharmānācaranniha jājale | kāraṇairdharmamanvicchansa lokānāpnute śubhān
"जाजलि, ऐसे धर्मों का यहाँ आचरण करते हुए और युक्तियों से धर्म की खोज करते हुए मनुष्य शुभ लोकों को पाता है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 42 (12.269.42)
एतानीदृशकान्धर्मांस्तुलाधारः प्रशंसति । उपपत्त्याऽभिसंपन्नान्नित्यं सद्भिर्निषेवितान् ॥
etānīdṛśakāndharmāṃstulādhāraḥ praśaṃsati | upapattyā'bhisaṃpannānnityaṃ sadbhirniṣevitān
"ऐसे ही धर्मों की तुलाधार प्रशंसा करते हैं, जो युक्ति से भलीभाँति सम्पन्न हैं और जिनका सज्जन सदा पालन करते हैं।"