शान्ति पर्व · अध्याय 270
जाजलि के सिर के पक्षी और श्रद्धा की महिमा
अपनी शिक्षा को प्रमाणित करने के लिए तुलाधार जाजलि से कहते हैं कि वे अपने सिर पर घोंसला बनाए हुए पक्षियों को बुलाएँ, और धर्म के कहने पर पक्षी बोलते हैं। वे बताते हैं कि हर आहुति की जड़ श्रद्धा है: श्रद्धा से रहित वाणी और मन को यज्ञ नहीं बचा सकता; देवताओं ने उदार पुरुष के और कंजूस सूदखोर के अन्न का विचार किया, और केवल श्रद्धाहीन ही हवि देने के अयोग्य है। श्रद्धा पाप से वैसे ही छुड़ाती है जैसे साँप केंचुली छोड़ता है, और मनुष्य वही है जैसी उसकी श्रद्धा है। जाजलि एक और प्रश्न करते हैं, जिसका संक्षिप्त उत्तर मिलता है; फिर दोनों स्वर्ग जाते हैं। अन्त में भीष्म युधिष्ठिर से पूछते हैं कि अब और क्या सुनना चाहते हैं।
तुलाधार उवाच
श्लोक 1 (12.270.1)
सद्भिर्वा यदि वाऽसद्भिः पन्थानमिममाश्रितः । प्रत्यक्षं क्रियतां साधु ततो ज्ञास्यसि तद्यथा ॥
sadbhirvā yadi vā'sadbhiḥ panthānamimamāśritaḥ | pratyakṣaṃ kriyatāṃ sādhu tato jñāsyasi tadyathā
"इस मार्ग को सज्जनों ने अपनाया हो या दुर्जनों ने, इसे प्रत्यक्ष कर लो; तब तुम जान जाओगे कि बात कैसी है।"
श्लोक 2 (12.270.2)
एते शकुन्ता बहवः समन्ताद्विचरन्ति ह । तवोत्तमाङ्गे संभूताः श्येनाश्चान्याश्च जातयः ॥
ete śakuntā bahavaḥ samantādvicaranti ha | tavottamāṅge saṃbhūtāḥ śyenāścānyāśca jātayaḥ
"ये बहुत-से पक्षी चारों ओर घूम रहे हैं, जो तुम्हारे सिर पर उत्पन्न हुए हैं: बाज़ और दूसरी जातियों के भी।"
श्लोक 3 (12.270.3)
आहूयैनान्महाब्रह्मन्विशमानांस्ततस्ततः । पश्येमान्हस्तपादैश्च श्लिष्टान्देहेषु सर्वशः ॥
āhūyainānmahābrahmanviśamānāṃstatastataḥ | paśyemānhastapādaiśca śliṣṭāndeheṣu sarvaśaḥ
"हे महाब्रह्मन्, इन्हें बुलाओ, जो जगह-जगह अपने घोंसलों में घुस रहे हैं, और देखो कि हाथ-पैर समेटे हुए ये चारों ओर चिपके हुए हैं।"
श्लोक 4 (12.270.4)
संभावयन्ति पितरं त्वया संभाविताः स्वगाः । असंशयं पिता वै त्वं पुत्रानाह्वय जाजले ॥
saṃbhāvayanti pitaraṃ tvayā saṃbhāvitāḥ svagāḥ | asaṃśayaṃ pitā vai tvaṃ putrānāhvaya jājale
"तुमसे सम्मान पाए हुए ये पक्षी अपने पिता का सम्मान करते हैं। निस्सन्देह तुम उनके पिता हो; जाजलि, अपने पुत्रों को बुलाओ।"
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (12.270.5)
ततो जाजलिना तेन समाहूताः पतत्रिणः । वाचमुच्चारयन्ति स्म धर्मस्य वचनात्किल ॥
tato jājalinā tena samāhūtāḥ patatriṇaḥ | vācamuccārayanti sma dharmasya vacanātkila
तब जाजलि के बुलाने पर पक्षियों ने वाणी उच्चारित की, कहा जाता है कि धर्म के वचन से।
तुलाधार उवाच
श्लोक 6 (12.270.6)
अहिंसादि कृतं कर्म इह चैव परत्र च । श्रद्धां निहन्ति वै ब्रह्मन्सा हता हन्ति तं नरम् ॥
ahiṃsādi kṛtaṃ karma iha caiva paratra ca | śraddhāṃ nihanti vai brahmansā hatā hanti taṃ naram
"हिंसा से आरम्भ हुआ कर्म, इस लोक में और परलोक में, श्रद्धा को मार देता है, हे ब्राह्मण; और मारी गई श्रद्धा उस मनुष्य को मार देती है।"
श्लोक 7 (12.270.7)
समानां श्रद्दधानानां संयतानां सुचेतसाम् । कुर्वतां यज्ञ इत्येव न यज्ञो जातु नेष्यते ॥
samānāṃ śraddadhānānāṃ saṃyatānāṃ sucetasām | kurvatāṃ yajña ityeva na yajño jātu neṣyate
"जो सम, श्रद्धावान्, संयमी और शुद्ध चित्तवाले हैं और 'यह यज्ञ है' इसी भाव से कर्म करते हैं, उनका कोई यज्ञ कभी अस्वीकार नहीं होता।"
श्लोक 8 (12.270.8)
श्रद्धा वै सात्विकी देवी सूर्यस्य दुहिता द्विज । सावित्री प्रसवित्री च हविर्वाङ्मनसी ततः ॥
śraddhā vai sātvikī devī sūryasya duhitā dvija | sāvitrī prasavitrī ca havirvāṅmanasī tataḥ
"हे द्विज, श्रद्धा सात्त्विकी देवी है, सूर्य की पुत्री; वही सावित्री और प्रसवित्री है, और उसके बाद हवि, वाणी और मन आते हैं।"
श्लोक 9 (12.270.9)
वाग्वृद्धं त्रायते श्रद्धा मनोवृद्धं च जाजले । श्रद्धावृद्धं वाङ्मनसी न यज्ञस्त्रातुमर्हति ॥
vāgvṛddhaṃ trāyate śraddhā manovṛddhaṃ ca jājale | śraddhāvṛddhaṃ vāṅmanasī na yajñastrātumarhati
"जाजलि, वाणी से बिगड़े हुए और मन से बिगड़े हुए की श्रद्धा रक्षा करती है; पर श्रद्धा में बिगड़ी हुई वाणी और मन को यज्ञ नहीं बचा सकता।"
श्लोक 10 (12.270.10)
अत्र गाथा ब्रह्मगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः । शुचेरश्रद्दधानस्य श्रद्दधानस्य चाशुचेः ॥
atra gāthā brahmagītāḥ kīrtayanti purāvidaḥ | śuceraśraddadhānasya śraddadhānasya cāśuceḥ
"इस विषय में पुरानी कथाओं के जानकार ब्रह्मा के गाए हुए श्लोक सुनाते हैं: उस पुरुष के विषय में जो शुद्ध है पर श्रद्धाहीन, और उसके विषय में जो श्रद्धावान् है पर अशुद्ध।"
श्लोक 11 (12.270.11)
देवा वित्तममन्यन्त सदृशं यज्ञकर्मणि । श्रोत्रियस्य कदर्यस्य वदान्यस्य च वार्धुषेः ॥
devā vittamamanyanta sadṛśaṃ yajñakarmaṇi | śrotriyasya kadaryasya vadānyasya ca vārdhuṣeḥ
"यज्ञकर्म में देवताओं ने दोनों के धन को एक-सा माना: विद्वान् पर कंजूस ब्राह्मण के और उदार पर सूदखोर के।"
श्लोक 12 (12.270.12)
मीमांसित्वोभयं देवाः सममन्नमकल्पयन् । प्रजापतिस्तानुवाच विषमं कृतमित्युत ॥
mīmāṃsitvobhayaṃ devāḥ samamannamakalpayan | prajāpatistānuvāca viṣamaṃ kṛtamityuta
"दोनों पर विचार करके देवताओं ने उनके अन्न को समान ठहराया। प्रजापति ने उनसे कहा, 'तुमने यह असमान कर दिया है।'"
श्लोक 13 (12.270.13)
श्रद्धापूतं वदान्यस्य हतमश्रद्धयेतरत् । भोज्यमन्नं वदान्यस्य कदर्यस्य न वार्धुषेः ॥
śraddhāpūtaṃ vadānyasya hatamaśraddhayetarat | bhojyamannaṃ vadānyasya kadaryasya na vārdhuṣeḥ
"उदार पुरुष का अन्न श्रद्धा से पवित्र होता है; दूसरे का श्रद्धा के अभाव से नष्ट हो जाता है। उदार पुरुष का अन्न खाने योग्य है, कंजूस या सूदखोर का नहीं।"
श्लोक 14 (12.270.14)
अश्रद्दधान एवैको देवानां नार्हते हविः । तस्यैवान्नं न भोक्तव्यमिति धर्मविदो विदुः ॥
aśraddadhāna evaiko devānāṃ nārhate haviḥ | tasyaivānnaṃ na bhoktavyamiti dharmavido viduḥ
"केवल श्रद्धाहीन ही देवताओं को हवि देने के योग्य नहीं है, और उसका अन्न नहीं खाना चाहिए: ऐसा धर्म के जाननेवाले कहते हैं।"
श्लोक 15 (12.270.15)
अश्रद्धा परमं पापं श्रद्धा पापप्रमोचनी । जहाति पापं श्रद्धावान्सर्पो जीर्णामिव त्वचम् ॥
aśraddhā paramaṃ pāpaṃ śraddhā pāpapramocanī | jahāti pāpaṃ śraddhāvānsarpo jīrṇāmiva tvacam
"श्रद्धा का न होना सबसे बड़ा पाप है; श्रद्धा पाप से छुड़ानेवाली है। श्रद्धावान् पाप को वैसे ही छोड़ देता है जैसे साँप पुरानी केंचुली को।"
श्लोक 16 (12.270.16)
ज्यायसी या पवित्राणां निवृत्तिः श्रद्धया सह । निवृत्तशीलदोषो यः श्रद्धावान्पूत एव सः ॥
jyāyasī yā pavitrāṇāṃ nivṛttiḥ śraddhayā saha | nivṛttaśīladoṣo yaḥ śraddhāvānpūta eva saḥ
"पवित्र करनेवाले साधनों में श्रद्धा के साथ निवृत्ति सबसे श्रेष्ठ है। जिसके आचरण के दोष मिट गए हैं और जो श्रद्धावान् है, वह निश्चय ही पवित्र है।"
श्लोक 17 (12.270.17)
किं तस्य तपसा कार्यं किं वृत्तेन किमात्मना । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
kiṃ tasya tapasā kāryaṃ kiṃ vṛttena kimātmanā | śraddhāmayo'yaṃ puruṣo yo yacchraddhaḥ sa eva saḥ
"उसे तप से, आचरण से या आत्मा से क्या प्रयोजन? यह पुरुष श्रद्धामय है; जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही है।"
श्लोक 18 (12.270.18)
इति धर्मः समाख्यातः सद्भिर्धर्मार्थदर्शिभिः । वयं जिज्ञासमानास्तु संप्राप्ता धर्मदर्शनात् ॥
iti dharmaḥ samākhyātaḥ sadbhirdharmārthadarśibhiḥ | vayaṃ jijñāsamānāstu saṃprāptā dharmadarśanāt
"इस प्रकार धर्म और उसके अर्थ को देखनेवाले सज्जनों ने धर्म बताया है; और हम, जानने की इच्छा से, धर्म के दर्शन के लिए यहाँ आए हैं।"
श्लोक 19 (12.270.19)
श्रद्धां कुरु महाप्राज्ञ ततः प्राप्स्यसि यत्परम् ॥
śraddhāṃ kuru mahāprājña tataḥ prāpsyasi yatparam
"हे महाप्राज्ञ, श्रद्धा करो; तब तुम परम पद को पाओगे।"
जाजलिरुवाच
श्लोक 20 (12.270.20)
न वै मुनीनां शृणुमः स्म तत्वं । पृच्छामि ते वाणिज तत्वमेतत् । पूर्वे हि पूर्वेऽप्यनवेक्षमाणा । नातः परं ते ऋषयः स्थापयन्ति ॥
na vai munīnāṃ śṛṇumaḥ sma tatvaṃ | pṛcchāmi te vāṇija tatvametat | pūrve hi pūrve'pyanavekṣamāṇā | nātaḥ paraṃ te ṛṣayaḥ sthāpayanti
"हमने मुनियों से सचमुच यह तत्त्व नहीं सुना। हे वणिक्, मैं तुमसे इसके विषय में पूछता हूँ; जो पहले हुए उन्होंने इसके आगे नहीं देखा, और ऋषि इससे आगे कुछ स्थापित नहीं करते।"
श्लोक 21 (12.270.21)
यस्मिन्नेवानुतीर्थेन पशवः प्राप्नुयुः सुखम् । पत्नीव्रतेन विधिना प्रकरोति नियोजयन् । श्रद्धावाञ्श्रद्दधानश्च धर्मश्चैव हि वाणिज ॥
yasminnevānutīrthena paśavaḥ prāpnuyuḥ sukham | patnīvratena vidhinā prakaroti niyojayan | śraddhāvāñśraddadhānaśca dharmaścaiva hi vāṇija
"जिसमें तीर्थ के मार्ग से पशु भी सुख पा जाएँ, उसे वह पत्नी-व्रत और विधि से करता है, नियोजन करता हुआ। हे वणिक्, श्रद्धावान्, विश्वास करनेवाला, और धर्म भी।"
तुलाधार उवाच
श्लोक 22 (12.270.22)
स्ववर्त्मनि स्थितश्चैव गरीयानेव जाजले ॥
svavartmani sthitaścaiva garīyāneva jājale
"अपने मार्ग पर स्थित रहनेवाला ही, जाजलि, निश्चय श्रेष्ठ है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 23 (12.270.23)
ततोऽचिरेण कालेन तुलाधारः स एव च । दिवं गत्वा महाप्राज्ञौ विहरेतां यथासुखम् । स्वंस्वं स्थानमुपागम्य स्वकर्मफलनिर्मितम् ॥
tato'cireṇa kālena tulādhāraḥ sa eva ca | divaṃ gatvā mahāprājñau viharetāṃ yathāsukham | svaṃsvaṃ sthānamupāgamya svakarmaphalanirmitam
फिर थोड़े ही समय में तुलाधार और वे दूसरे, दोनों महाबुद्धिमान, स्वर्ग जाकर सुखपूर्वक विहार करने लगे; प्रत्येक अपने कर्मों के फल से रचे हुए अपने-अपने स्थान को पहुँचा।
श्लोक 24 (12.270.24)
एवं बहुविधार्थं च तुलाधारेण भाषितम् । सम्यक्चैवमुपालब्धो धर्मश्चोक्तः सनातनः ॥
evaṃ bahuvidhārthaṃ ca tulādhāreṇa bhāṣitam | samyakcaivamupālabdho dharmaścoktaḥ sanātanaḥ
इस प्रकार तुलाधार ने अनेक विषयों पर कहा, और इसी तरह सनातन धर्म भलीभाँति समझा और कहा गया।
श्लोक 25 (12.270.25)
तस्य विख्यातवीर्यस्य श्रुत्वा वाक्यानि जाजलिः । तुलाधारस्य कौन्तेय शान्तिमेवान्वपद्यत ॥
tasya vikhyātavīryasya śrutvā vākyāni jājaliḥ | tulādhārasya kaunteya śāntimevānvapadyata
हे कुन्तीपुत्र, विख्यात पराक्रमवाले तुलाधार के वचन सुनकर जाजलि को शान्ति प्राप्त हुई।
श्लोक 26 (12.270.26)
समानां श्रद्दधानानां युक्तानां च यथाबलम् । कुर्वतां यज्ञ इत्येव नायज्ञो जातु नेष्यते ॥
samānāṃ śraddadhānānāṃ yuktānāṃ ca yathābalam | kurvatāṃ yajña ityeva nāyajño jātu neṣyate
जो सम, श्रद्धावान् और अपने बल के अनुसार संयमी हैं और 'यह यज्ञ है' इसी भाव से कर्म करते हैं, उनके लिए जो यज्ञ नहीं है वह भी कभी यज्ञ मानने से अस्वीकार नहीं किया जाता।
श्लोक 27 (12.270.27)
एवं बहुमतार्थं च तुलाधारेण भाषितम् । यथौपम्योपदेशेन किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
evaṃ bahumatārthaṃ ca tulādhāreṇa bhāṣitam | yathaupamyopadeśena kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
"इस प्रकार तुलाधार ने बहुत-सी मान्य बातें दृष्टान्तों के द्वारा कहीं। अब और क्या सुनना चाहते हो?"