शान्ति पर्व · अध्याय 271
विचख्यु का अहिंसा का उपदेश
युधिष्ठिर पूछते हैं कि जो कोई आरम्भ नहीं करता और किसी को हानि नहीं पहुँचाता, उसके शरीर का निर्वाह कैसे होगा; भीष्म उत्तर देते हैं कि समर्थ पुरुष ऐसे कर्म करे कि शरीर न क्षीण हो और न मृत्यु के वश में जाए। फिर वे राजा विचख्यु का पुराना श्लोक सुनाते हैं, जिन्होंने यज्ञ में मारे गए बैल और रँभाती गायों को देखकर अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म कहा। यज्ञों में पशुवध, मांस, मद्य और मछली को धूर्तों ने काम, मोह और लोभ से चलाया है; वेदों में इनका विधान नहीं है, और विष्णु की पूजा खीर और फूलों से होती है। अन्त में युधिष्ठिर का प्रश्न और भीष्म का उत्तर दोहराया गया है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.271.1)
शरीरमापदश्चैव न विदन्त्यविहिंसकाः । कथं यात्रा शरीरस्य निरारम्भस्य सेत्स्यते ॥
śarīramāpadaścaiva na vidantyavihiṃsakāḥ | kathaṃ yātrā śarīrasya nirārambhasya setsyate
"जो किसी की हिंसा नहीं करते, वे न शरीर को जानते हैं और न आपत्तियों को। जो कोई आरम्भ ही नहीं करता, उसके शरीर का निर्वाह कैसे सिद्ध होगा?"
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.271.2)
यथा शरीरं न म्लायेन्नैव मृत्युवशं भवेत् । तथा कर्मसु वर्तेत समर्थो धर्ममाचरेत् ॥
yathā śarīraṃ na mlāyennaiva mṛtyuvaśaṃ bhavet | tathā karmasu varteta samartho dharmamācaret
"जिस प्रकार शरीर क्षीण न हो और मृत्यु के वश में न जाए, उसी प्रकार समर्थ पुरुष कर्मों में लगा रहे और धर्म का आचरण करे।"
श्लोक 3 (12.271.3)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । प्रजानामनुकम्पार्थं गीतं राज्ञा विचख्युना ॥
atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | prajānāmanukampārthaṃ gītaṃ rājñā vicakhyunā
"इस विषय में भी लोग यह पुराना इतिहास सुनाते हैं, जिसे राजा विचख्यु ने प्राणियों पर दया करके गाया था।"
श्लोक 4 (12.271.4)
छिन्नस्थूणं वृषं दृष्ट्वा विरावं च गवां भृशम् । गोगृहे यज्ञवाटे च प्रेक्षमाणः स पार्थिवः ॥
chinnasthūṇaṃ vṛṣaṃ dṛṣṭvā virāvaṃ ca gavāṃ bhṛśam | gogṛhe yajñavāṭe ca prekṣamāṇaḥ sa pārthivaḥ
"गोशाला में और यज्ञभूमि पर कटे हुए बैल को और गायों के ज़ोर से रँभाने को देखकर वह राजा देखता रहा।"
श्लोक 5 (12.271.5)
स्वस्ति गोभ्योऽस्तु लोकेषु ततो निर्वचनं कृतम् । हिंसायां हि प्रवृत्तायामाशीरेषा तु कल्पिता ॥
svasti gobhyo'stu lokeṣu tato nirvacanaṃ kṛtam | hiṃsāyāṃ hi pravṛttāyāmāśīreṣā tu kalpitā
"'लोकों में गायों का कल्याण हो', ऐसा उसने कहा। जहाँ हिंसा चल रही थी, वहाँ यह आशीर्वाद रचा गया।"
श्लोक 6 (12.271.6)
अव्यवस्थितमर्यादैर्विमूढैर्नास्तिकैर्नरैः । संशयात्मभिरव्यक्तैर्हिंसा समनुदर्शिता ॥
avyavasthitamaryādairvimūḍhairnāstikairnaraiḥ | saṃśayātmabhiravyaktairhiṃsā samanudarśitā
"हिंसा का उपदेश उन मूढ़, नास्तिक, मर्यादाहीन, संशयग्रस्त और अप्रकट लोगों ने दिया है।"
श्लोक 7 (12.271.7)
सर्वकर्मस्वहिंसां हि धर्मात्मा मनुरब्रवीत् । कामकाराद्विहिंसन्ति बहिर्वेद्यां पशून्नराः ॥
sarvakarmasvahiṃsāṃ hi dharmātmā manurabravīt | kāmakārādvihiṃsanti bahirvedyāṃ paśūnnarāḥ
"सब कर्मों में धर्मात्मा मनु ने अहिंसा ही बताई है। अपनी इच्छा के वश में होकर मनुष्य वेदी के बाहर पशुओं की हिंसा करते हैं।"
श्लोक 8 (12.271.8)
तस्मात्प्रमाणतः कार्यो धर्मः सूक्ष्मो विजानता । अहिंसा ह्येव सर्वेभ्यो धर्मेभ्यो ज्यायसी मता ॥
tasmātpramāṇataḥ kāryo dharmaḥ sūkṣmo vijānatā | ahiṃsā hyeva sarvebhyo dharmebhyo jyāyasī matā
"इसलिए जाननेवाले को चाहिए कि प्रमाण के आधार पर सूक्ष्म धर्म का पालन करे। सब धर्मों में अहिंसा ही श्रेष्ठ मानी गई है।"
श्लोक 9 (12.271.9)
उपोष्य संशितो भूत्वा हित्वा वेदकृतां शुचिः । आचार इत्यनाचारः कृपणाः फलहेतवः ॥
upoṣya saṃśito bhūtvā hitvā vedakṛtāṃ śuciḥ | ācāra ityanācāraḥ kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ
"उपवास करके, तीक्ष्ण संकल्प लेकर और वेद के विहित कर्म को छोड़कर, शुद्ध होते हुए भी फल के लिए काम करनेवाले दीन लोग अनाचार को 'आचार' कहते हैं।"
श्लोक 10 (12.271.10)
यदि च्छिन्दन्ति वृक्षांश्च यूपांश्चोद्दिश्य मानवाः । वृथा मांसानि खादन्ति नैष धर्मः प्रशस्यते ॥
yadi cchindanti vṛkṣāṃśca yūpāṃścoddiśya mānavāḥ | vṛthā māṃsāni khādanti naiṣa dharmaḥ praśasyate
"यदि मनुष्य यूप के उद्देश्य से वृक्षों को काटते हैं और व्यर्थ ही मांस खाते हैं, तो इस धर्म की प्रशंसा नहीं की जाती।"
श्लोक 11 (12.271.11)
सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवं कृसरौदनम् । धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद्वेदेषु कल्पितम् । कामान्मोहाच्च लोभाच्च लौल्यमेतत्प्रवर्तितम् ॥
surāṃ matsyānmadhu māṃsamāsavaṃ kṛsaraudanam | dhūrtaiḥ pravartitaṃ hyetannaitadvedeṣu kalpitam | kāmānmohācca lobhācca laulyametatpravartitam
"सुरा, मछली, मधु, मांस, आसव और तिल-चावल की खिचड़ी: इसे धूर्तों ने चलाया है; वेदों में इसका विधान नहीं है। काम, मोह और लोभ से यह लोलुपता चलाई गई है।"
श्लोक 12 (12.271.12)
विष्णुमेवाभिजानन्ति सर्वयज्ञेषु ब्राह्मणाः । पायसैः सुमनोभिश्च तस्यैव यजनं स्मृतम् ॥
viṣṇumevābhijānanti sarvayajñeṣu brāhmaṇāḥ | pāyasaiḥ sumanobhiśca tasyaiva yajanaṃ smṛtam
"सब यज्ञों में ब्राह्मण केवल विष्णु को ही पहचानते हैं; उन्हीं की पूजा खीर और फूलों से कही गई है।"
श्लोक 13 (12.271.13)
यज्ञियाश्चैव ये वृक्षा वेदेषु परिकल्पिताः । यच्चापि किंचित्कर्तव्यमन्यच्चोक्षैः सुसंस्कृतम् । महासत्वैः शुद्धभावैः सर्वं देवार्हमेव तत् ॥
yajñiyāścaiva ye vṛkṣā vedeṣu parikalpitāḥ | yaccāpi kiṃcitkartavyamanyaccokṣaiḥ susaṃskṛtam | mahāsatvaiḥ śuddhabhāvaiḥ sarvaṃ devārhameva tat
"जो वृक्ष यज्ञ के योग्य हैं और वेदों में निर्धारित हैं, और जो कुछ और भी करने योग्य है और पवित्र जनों द्वारा भलीभाँति तैयार किया गया है, महान् सत्त्ववाले शुद्ध भाववाले पुरुषों द्वारा: वह सब देवताओं के योग्य ही है।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 14 (12.271.14)
शरीरमापदश्चापि विवदन्त्यविहिंसतः । कथं यात्रा शरीरस्य निरारम्भस्य सेत्स्यते ॥
śarīramāpadaścāpi vivadantyavihiṃsataḥ | kathaṃ yātrā śarīrasya nirārambhasya setsyate
"जो हिंसा नहीं करता, उससे शरीर और आपत्तियाँ झगड़ती हैं। जो कोई आरम्भ ही नहीं करता, उसके शरीर का निर्वाह कैसे सिद्ध होगा?"
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (12.271.15)
यथा शरीरं न ग्लायेन्नेयान्मृत्युवशं यथा । तथा कर्मसु वर्तेत समर्थो धर्ममाचरेत् ॥
yathā śarīraṃ na glāyenneyānmṛtyuvaśaṃ yathā | tathā karmasu varteta samartho dharmamācaret
"जिस प्रकार शरीर थके नहीं और मृत्यु के वश में न जाए, उसी प्रकार समर्थ पुरुष कर्मों में लगा रहे और धर्म का आचरण करे।"