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शान्ति पर्व · अध्याय 272

चिरकारिक और पिता की आज्ञा

युधिष्ठिर पूछते हैं कि किसी कार्य की परीक्षा शीघ्रता से करनी चाहिए या देर तक विचारकर। भीष्म गौतम के पुत्र चिरकारिक की कथा सुनाते हैं, जिसे क्रोधित पिता ने अपनी माता को मार डालने का आदेश दिया था। पुत्र पिता और माता के प्रति अपने कर्तव्यों को तौलता हुआ देर तक सोचता रहता है और कुछ नहीं करता। पश्चात्ताप में डूबे गौतम लौटकर पुत्र को शस्त्र त्यागे हुए पाते हैं और सोच-विचारकर काम करने की प्रशंसा करते हैं।

अध्याय 271अध्याय-सूचीअध्याय 273

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.272.1)

कथं कार्यं परीक्षेत शीघ्रं वाऽथ चिरेण वा । सर्वथा कार्यदुर्गेऽस्मिन्भवान्नः परमो गुरुः ॥

kathaṃ kāryaṃ parīkṣeta śīghraṃ vā'tha cireṇa vā | sarvathā kāryadurge'sminbhavānnaḥ paramo guruḥ

किसी करणीय कार्य की परीक्षा कैसे करनी चाहिए, शीघ्र या देर तक विचारकर? कर्तव्य के इस कठिन स्थल पर आप ही हर प्रकार से हमारे परम गुरु हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.272.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । चिरकारेस्तु यत्पूर्वं वृत्तमाङ्गिरसां कुले ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | cirakārestu yatpūrvaṃ vṛttamāṅgirasāṃ kule

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, जो बहुत पहले आङ्गिरसों के कुल में चिरकारिक के साथ घटित हुआ था।

श्लोक 3 (12.272.3)

गौतमस्य सुता ह्यासन्ज्यायांश्चिरकारिकः । चिरकारिक भद्रं ते भद्रं ते चिरकारिक । चिरकारी हि मेधावी नापराध्यति कर्मसु ॥

gautamasya sutā hyāsanjyāyāṃścirakārikaḥ | cirakārika bhadraṃ te bhadraṃ te cirakārika | cirakārī hi medhāvī nāparādhyati karmasu

गौतम के पुत्र थे, और उनमें ज्येष्ठ चिरकारिक था। 'चिरकारिक, तुम्हारा कल्याण हो, चिरकारिक, तुम्हारा कल्याण हो! जो देर तक सोच-विचार करता है, वही बुद्धिमान है, और वह अपने कर्मों में चूक नहीं करता।'

श्लोक 4 (12.272.4)

चिरकारी महाप्राज्ञो गौतमस्याभवत्सुतः । चिरेण सर्वकार्याणि विमृश्यार्थान्प्रपद्यते ॥

cirakārī mahāprājño gautamasyābhavatsutaḥ | cireṇa sarvakāryāṇi vimṛśyārthānprapadyate

महाप्राज्ञ चिरकारिक गौतम का पुत्र था। वह प्रत्येक कार्य पर देर तक विचार करता है और तभी अपने अभीष्ट अर्थों को अपनाता है।

श्लोक 5 (12.272.5)

चिरं स चिन्तयत्यर्थांश्चिरं जाग्रच्चिरं स्वपन् । चिरं कार्याभिपत्तिं च चिरकारी तथोच्यते ॥

ciraṃ sa cintayatyarthāṃściraṃ jāgracciraṃ svapan | ciraṃ kāryābhipattiṃ ca cirakārī tathocyate

वह अपने प्रयोजनों पर देर तक सोचता है, देर तक जागता और देर तक सोता है, और किसी काम को हाथ में लेने में भी देर लगाता है; इसीलिए वह चिरकारिक कहलाता है।

श्लोक 6 (12.272.6)

अलसग्रहणं प्राप्तो दुर्मेधावीति चोच्यते । बुद्धिलाघवयुक्तेन जनेनादीर्घदर्शिना ॥

alasagrahaṇaṃ prāpto durmedhāvīti cocyate | buddhilāghavayuktena janenādīrghadarśinā

हलकी बुद्धि वाले और दूर तक न देखने वाले लोग उसे आलसी समझते थे और मन्दबुद्धि कहा करते थे।

श्लोक 7 (12.272.7)

व्यभिचारे तु कस्मिंश्चिद्व्यतिक्रम्यापरान्सुतान् । पित्रोक्तः कुपितेनाथ जहीमां जननीमिति ॥

vyabhicāre tu kasmiṃścidvyatikramyāparānsutān | pitroktaḥ kupitenātha jahīmāṃ jananīmiti

एक बार किसी अपराध के होने पर पिता ने क्रुद्ध होकर अपने दूसरे पुत्रों को छोड़कर उससे कहा, 'इस अपनी माता को मार डालो।'

श्लोक 8 (12.272.8)

इत्युक्त्वा स तदा विप्रो गौतमो जपतां वरः । अविमृश्य महाभागो वनमेव जगाम सः ॥

ityuktvā sa tadā vipro gautamo japatāṃ varaḥ | avimṛśya mahābhāgo vanameva jagāma saḥ

यह कहकर जपियों में श्रेष्ठ महाभाग गौतम बिना कुछ सोचे-विचारे वन को चले गए।

श्लोक 9 (12.272.9)

स तथेति चिरेणोक्त्वा स्वभावाच्चिरकारिकः । विमृश्य चिरकारित्वाच्चिन्तयामास वै चिरम् ॥

sa tatheti cireṇoktvā svabhāvāccirakārikaḥ | vimṛśya cirakāritvāccintayāmāsa vai ciram

चिरकारिक ने अपने स्वभाव के अनुसार देर के बाद 'ऐसा ही हो' कहा। फिर अपनी विचार करने की आदत के अनुसार उसने सोच-विचार किया और बहुत देर तक चिन्तन करता रहा।

श्लोक 10 (12.272.10)

पितुराज्ञां कथं कुर्यां न हन्यां मातरं कथम् । कथं धर्मच्छले नास्मिन्निमज्जेयमसाधुवत् ॥

piturājñāṃ kathaṃ kuryāṃ na hanyāṃ mātaraṃ katham | kathaṃ dharmacchale nāsminnimajjeyamasādhuvat

'पिता की आज्ञा का पालन कैसे करूँ, और माता को कैसे न मारूँ? धर्म के बहाने बने इस जाल में दुष्ट मनुष्य की भाँति मैं कैसे न डूबूँ?

श्लोक 11 (12.272.11)

पितुराज्ञा परो धर्मः स्वधर्मो मातृरक्षणम् । अस्वतन्त्रं च पुत्रत्वं किंतु मां नानुपीडयेत् ॥

piturājñā paro dharmaḥ svadharmo mātṛrakṣaṇam | asvatantraṃ ca putratvaṃ kiṃtu māṃ nānupīḍayet

पिता की आज्ञा परम धर्म है और माता की रक्षा मेरा अपना धर्म है। पुत्र पराधीन होता है; फिर भी यह द्वन्द्व मुझे कैसे पीड़ित न करे?

श्लोक 12 (12.272.12)

स्त्रियं हत्वा मातरं च को हि जातु सुखी भवेत् । पितरं चाप्यवज्ञाय कः प्रतिष्ठामवाप्नुयात् ॥

striyaṃ hatvā mātaraṃ ca ko hi jātu sukhī bhavet | pitaraṃ cāpyavajñāya kaḥ pratiṣṭhāmavāpnuyāt

स्त्री को, और वह भी माता को मारकर कौन कभी सुखी हो सकता है? और पिता की अवज्ञा करके कौन प्रतिष्ठा पा सकता है?

श्लोक 13 (12.272.13)

अनवज्ञा पितुर्युक्ता स्वधर्मो मातृरक्षणम् । युक्तक्षमावुभावेतौ नातिवर्तेतमां कथम् ॥

anavajñā pituryuktā svadharmo mātṛrakṣaṇam | yuktakṣamāvubhāvetau nātivartetamāṃ katham

पिता की अवज्ञा न करना उचित है, और माता की रक्षा मेरा अपना धर्म है। ये दोनों ही योग्य और सहने योग्य हैं। इन दोनों में से किसी का भी उल्लंघन मैं कैसे न करूँ?

श्लोक 14 (12.272.14)

पिता ह्यात्मानमाधत्ते जायायां जायतामिति । शीलचारित्रगोत्रस्य धारणार्थं कुलस्य च ॥

pitā hyātmānamādhatte jāyāyāṃ jāyatāmiti | śīlacāritragotrasya dhāraṇārthaṃ kulasya ca

पिता अपनी पत्नी में अपने आपको स्थापित करता है कि 'पुत्र उत्पन्न हो', ताकि कुल के शील, आचार और गोत्र की परम्परा चलती रहे।

श्लोक 15 (12.272.15)

सोऽहं मात्रा स्वयं पित्रा पुत्रत्वे प्रकृतः पुनः । विज्ञानं मे कथं न स्याद्द्वौ बुद्ध्ये चात्मसंभवम् ॥

so'haṃ mātrā svayaṃ pitrā putratve prakṛtaḥ punaḥ | vijñānaṃ me kathaṃ na syāddvau buddhye cātmasaṃbhavam

इस प्रकार माता और स्वयं पिता ने मुझे पुनः पुत्रत्व में स्थापित किया है। मुझे विवेक कैसे न होगा? मैं जानता हूँ कि मैं दोनों से उत्पन्न हुआ हूँ।

श्लोक 16 (12.272.16)

जातकर्मणि यत्प्राह पिता यच्चोपकर्मणि । पर्याप्तः स दृढीकारः पितुर्गौरवनिश्चये ॥

jātakarmaṇi yatprāha pitā yaccopakarmaṇi | paryāptaḥ sa dṛḍhīkāraḥ piturgauravaniścaye

पिता जो कुछ जातकर्म के समय और उपनयन के समय कहता है, वही पिता के गौरव को दृढ़ता से स्थापित करने के लिए पर्याप्त है।

श्लोक 17 (12.272.17)

गुरुरग्र्यः परो धर्मः पोषणाध्यापनान्वितः । पिता यदाह धर्मः स वेदेष्वपि सुनिश्चितः ॥

gururagryaḥ paro dharmaḥ poṣaṇādhyāpanānvitaḥ | pitā yadāha dharmaḥ sa vedeṣvapi suniścitaḥ

पिता गुरु के रूप में सबसे पहले है और उसका धर्म सर्वोच्च है, क्योंकि वह पालन-पोषण और अध्यापन करता है। पिता जिसे धर्म कहता है, वह वेदों में भी भली-भाँति निश्चित है।

श्लोक 18 (12.272.18)

प्रीतिमात्रं पितुः पुत्रः सर्वं पुत्रस्य वै पिता । शरीरादीनि देयानि पिता त्वेकः प्रयच्छति ॥

prītimātraṃ pituḥ putraḥ sarvaṃ putrasya vai pitā | śarīrādīni deyāni pitā tvekaḥ prayacchati

पुत्र पिता के लिए केवल आनन्द का विषय है, पर पिता पुत्र के लिए सब कुछ है। शरीर आदि देने योग्य वस्तुएँ हैं, और उन्हें अकेला पिता ही देता है।

श्लोक 19 (12.272.19)

तस्मात्पितुर्वचः कार्यं न विचार्यं कदाचन । पातकान्यपि पूयन्ते पितुः शासनकारिणः ॥

tasmātpiturvacaḥ kāryaṃ na vicāryaṃ kadācana | pātakānyapi pūyante pituḥ śāsanakāriṇaḥ

इसलिए पिता का वचन मानना चाहिए, उस पर कभी विचार नहीं करना चाहिए। पिता की आज्ञा का पालन करने वालों के पाप भी शुद्ध हो जाते हैं।

श्लोक 20 (12.272.20)

भाग्यभोगे प्रसवने सर्वलोकनिदर्शने । धात्र्याश्चैव समायोगे सीमन्तोन्नयने तथा ॥

bhāgyabhoge prasavane sarvalokanidarśane | dhātryāścaiva samāyoge sīmantonnayane tathā

भोग और सौभाग्य के समय, जन्म के समय, सारे लोक को दिखाने के समय, धाय के संयोग के समय और सीमन्तोन्नयन के समय भी

श्लोक 21 (12.272.21)

पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः । पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाः प्रीणन्ति देवताः ॥

pitā dharmaḥ pitā svargaḥ pitā hi paramaṃ tapaḥ | pitari prītimāpanne sarvāḥ prīṇanti devatāḥ

पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है, पिता ही परम तप है। पिता के प्रसन्न होने पर सभी देवता प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 22 (12.272.22)

आशिषस्ता भजन्त्येनं पुरुषं प्राह यत्पिता । निष्कृतिः सर्वपापानां पिता यच्चाभिनन्दति ॥

āśiṣastā bhajantyenaṃ puruṣaṃ prāha yatpitā | niṣkṛtiḥ sarvapāpānāṃ pitā yaccābhinandati

पिता जिस मनुष्य के लिए जो आशीर्वाद कहता है, वे उसके पास आते हैं। पिता जिसका अभिनन्दन करता है, वह सब पापों का प्रायश्चित्त है।

श्लोक 23 (12.272.23)

मुच्यते बन्धनात्पुष्पं फलं वृक्षान्प्रमुच्यते । क्लिश्यन्नपि सुतस्नेहैः पिता पुत्रं न मुञ्चति ॥

mucyate bandhanātpuṣpaṃ phalaṃ vṛkṣānpramucyate | kliśyannapi sutasnehaiḥ pitā putraṃ na muñcati

फूल अपने बन्धन से छूट जाता है और फल वृक्ष से अलग हो जाता है, पर पिता पुत्र के स्नेह से कितना ही पीड़ित हो, पुत्र को नहीं छोड़ता।

श्लोक 24 (12.272.24)

एतद्विचिन्तितं तावत्पुत्रस्य पितृगौरवम् । पिता नाल्पतरं स्थानं चिन्तयिष्यामि मातरम् ॥

etadvicintitaṃ tāvatputrasya pitṛgauravam | pitā nālpataraṃ sthānaṃ cintayiṣyāmi mātaram

पुत्र के पिता के प्रति गौरव के विषय में मैंने इतना सोच लिया। पिता का स्थान छोटा नहीं है; अब मैं माता के विषय में विचार करूँगा।

श्लोक 25 (12.272.25)

यो ह्ययं मयि संघातो मर्त्यत्वे पाञ्चभौतिकः । अस्य मे जननी हेतुः पावकस्य यथाऽरणिः ॥

yo hyayaṃ mayi saṃghāto martyatve pāñcabhautikaḥ | asya me jananī hetuḥ pāvakasya yathā'raṇiḥ

मेरे इस मर्त्य रूप में जो यह पाँच भूतों का समूह है, उसकी कारण मेरी माता है, जैसे अग्नि की कारण अरणि है।

श्लोक 26 (12.272.26)

माता देहारणिः पुंसां सर्वस्यार्तस्य निर्वृतिः । मातृलाभे सनाथत्वमनाथत्वं विपर्यये ॥

mātā dehāraṇiḥ puṃsāṃ sarvasyārtasya nirvṛtiḥ | mātṛlābhe sanāthatvamanāthatvaṃ viparyaye

माता सब मनुष्यों के शरीर की अरणि है और हर पीड़ित की शान्ति है। माता के मिलने पर मनुष्य सनाथ होता है और उसके न होने पर अनाथ।

श्लोक 27 (12.272.27)

न च शोचति नाप्येनं स्थाविर्यमपकर्षति । श्रिया हीनोऽपि यो गेहमम्बेति प्रतिपद्यते ॥

na ca śocati nāpyenaṃ sthāviryamapakarṣati | śriyā hīno'pi yo gehamambeti pratipadyate

वह न शोक करता है और न बुढ़ापा उसे खींच ले जाता है, जो धन-वैभव से हीन होकर भी घर में 'माँ!' पुकारता हुआ प्रवेश करता है।

श्लोक 28 (12.272.28)

पुत्रपौत्रोपपन्नोपि जननीं यः समाश्रितः । अपि वर्षशतस्यान्ते स द्विहायनवच्चरेत् ॥

putrapautropapannopi jananīṃ yaḥ samāśritaḥ | api varṣaśatasyānte sa dvihāyanavaccaret

पुत्रों और पौत्रों से भरा-पूरा मनुष्य भी यदि माता के आश्रय में है, तो सौ वर्ष के अन्त में भी दो वर्ष के बालक की तरह विचरता है।

श्लोक 29 (12.272.29)

समर्थं वाऽसमर्थं वा कृशं वाप्यकृशं तथा । रक्षत्येव सुतं माता नान्यः पोष्टा विधानतः ॥

samarthaṃ vā'samarthaṃ vā kṛśaṃ vāpyakṛśaṃ tathā | rakṣatyeva sutaṃ mātā nānyaḥ poṣṭā vidhānataḥ

समर्थ हो या असमर्थ, दुबला हो या मोटा, माता अपने पुत्र की रक्षा करती ही है; विधान के अनुसार उसका दूसरा कोई पोषण करने वाला नहीं।

श्लोक 30 (12.272.30)

तदा स वृद्धो भवति तदा भवति दुःखितः । तदा शून्यं जगत्तस्य यदा मात्रा वियुज्यते ॥

tadā sa vṛddho bhavati tadā bhavati duḥkhitaḥ | tadā śūnyaṃ jagattasya yadā mātrā viyujyate

मनुष्य तभी वृद्ध होता है, तभी दुःखी होता है और तभी उसके लिए संसार सूना हो जाता है, जब वह माता से बिछुड़ जाता है।

श्लोक 31 (12.272.31)

नास्ति मातृसमा च्छाया नास्ति मातृसमा गतिः । नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रिया ॥

nāsti mātṛsamā cchāyā nāsti mātṛsamā gatiḥ | nāsti mātṛsamaṃ trāṇaṃ nāsti mātṛsamā priyā

माता के समान कोई छाया नहीं, माता के समान कोई गति नहीं, माता के समान कोई रक्षा नहीं और माता के समान कोई प्रिय नहीं।

श्लोक 32 (12.272.32)

कुक्षौ संधारणाद्धात्री जननाज्जननी स्मृता । अङ्गानां वर्धनादम्बा वीरसूत्वेन वीरसूः ॥

kukṣau saṃdhāraṇāddhātrī jananājjananī smṛtā | aṅgānāṃ vardhanādambā vīrasūtvena vīrasūḥ

वह कोख में धारण करने से धात्री, जन्म देने से जननी, अंगों को बढ़ाने से अम्बा और वीरों को जन्म देने से वीरसू कहलाती है।

श्लोक 33 (12.272.33)

शिशोः शुश्रूषणाच्छुश्रूर्माता देहमनन्तरम् । चेतनावान्स को हन्याद्यस्य नासुषिरं शिरः ॥

śiśoḥ śuśrūṣaṇācchuśrūrmātā dehamanantaram | cetanāvānsa ko hanyādyasya nāsuṣiraṃ śiraḥ

वह शिशु की सेवा करने से श्वश्रू कहलाती है, और माता क्रम से शरीर ही है। कौन विवेकवान मनुष्य उसे मारेगा, जिसका सिर खोखला न हो?

श्लोक 34 (12.272.34)

दंपत्योः प्राणसंश्लेषे योऽभिसन्धिः कृतः किल । तं माता च पिता चेति भूतार्थो मातरि स्थितः ॥

daṃpatyoḥ prāṇasaṃśleṣe yo'bhisandhiḥ kṛtaḥ kila | taṃ mātā ca pitā ceti bhūtārtho mātari sthitaḥ

पति-पत्नी के प्राणों के मिलन के समय जो संकल्प किया गया, जिससे वे माता और पिता कहलाते हैं, उसकी वास्तविकता माता में ही स्थित है।

श्लोक 35 (12.272.35)

माता जानाति यद्गोत्रं माता जानाति यस्य सः । मातुर्भरणमात्रेण प्रीतिः स्नेहः पितुः प्रजाः ॥

mātā jānāti yadgotraṃ mātā jānāti yasya saḥ | māturbharaṇamātreṇa prītiḥ snehaḥ pituḥ prajāḥ

माता जानती है कि उसका गोत्र क्या है, माता जानती है कि वह किसका है। केवल धारण-पोषण करने से माता का उस पर प्रेम और स्नेह होता है, पर सन्तानें पिता की होती हैं।

श्लोक 36 (12.272.36)

पाणिबन्धं स्वयं कृत्वा सहधर्ममुपेत्य च । यदा यास्यन्ति पुरुषाः स्त्रियो नार्हन्ति याप्यतां ॥

pāṇibandhaṃ svayaṃ kṛtvā sahadharmamupetya ca | yadā yāsyanti puruṣāḥ striyo nārhanti yāpyatāṃ

जो पुरुष पत्नी का हाथ थामकर और उसके साथ सहधर्म में प्रवेश करके फिर उसे छोड़कर चले जाते हैं, उनके द्वारा स्त्रियाँ त्यागे जाने के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 37 (12.272.37)

भरणाद्धि स्त्रियो भर्ता पालनाद्धि पतिस्तथा । गुणस्यास्य निवृत्तौ तु न भर्ता न पुनः पतिः ॥

bharaṇāddhi striyo bhartā pālanāddhi patistathā | guṇasyāsya nivṛttau tu na bhartā na punaḥ patiḥ

पुरुष पत्नी का भरण करने से भर्ता और पालन करने से पति कहलाता है। इस गुण के समाप्त हो जाने पर वह न भर्ता रहता है, न पति।

श्लोक 38 (12.272.38)

एवं स्त्री नापराध्नोति नर एवापराध्यति । व्युच्चरंश्च महादोषं नर एवापराध्यति ॥

evaṃ strī nāparādhnoti nara evāparādhyati | vyuccaraṃśca mahādoṣaṃ nara evāparādhyati

इस प्रकार स्त्री अपराध नहीं करती, पुरुष ही अपराध करता है। और जो पुरुष मर्यादा लाँघता है, वह बड़ा दोष करता है; पुरुष ही अपराधी होता है।

श्लोक 39 (12.272.39)

स्त्रिया हि परमो भर्ता दैवतं परमं स्मृतम् । तस्यात्मना तु सदृशमात्मानं परमं ददौ ॥

striyā hi paramo bhartā daivataṃ paramaṃ smṛtam | tasyātmanā tu sadṛśamātmānaṃ paramaṃ dadau

स्त्री के लिए पति परम है, उसे परम देवता माना गया है। उसने अपना परम आत्मा, जो उसके अपने आत्मा के समान है, उसे सौंप दिया।

श्लोक 40 (12.272.40)

नापराधोऽस्ति नारीणां नर एवापराध्यति । सर्वकार्यापराध्यत्वान्नापराध्यन्ति चाङ्गनाः ॥

nāparādho'sti nārīṇāṃ nara evāparādhyati | sarvakāryāparādhyatvānnāparādhyanti cāṅganāḥ

स्त्रियों का कोई अपराध नहीं है, पुरुष ही अपराध करता है। सब कार्यों में दूसरे के अधीन होने के कारण स्त्रियाँ अपराध नहीं करतीं।

श्लोक 41 (12.272.41)

यश्चनोक्तोऽथ निर्देशः स्त्रिया मैथुनवृद्धये । तस्य स्मारयतो व्यक्तमधर्मो नास्ति संशयः ॥

yaścanokto'tha nirdeśaḥ striyā maithunavṛddhaye | tasya smārayato vyaktamadharmo nāsti saṃśayaḥ

स्त्री को मैथुन बढ़ाने के लिए जो निर्देश कहा नहीं गया, उसकी बार-बार याद दिलाने वाले को स्पष्ट ही अधर्म होता है; इसमें संशय नहीं।

श्लोक 42 (12.272.42)

एवं नारीं मातरं च गौरवे चाधिके स्थिताम् । अवध्यां तु विजानीयुः पशवोऽप्यविचक्षणाः ॥

evaṃ nārīṃ mātaraṃ ca gaurave cādhike sthitām | avadhyāṃ tu vijānīyuḥ paśavo'pyavicakṣaṇāḥ

इस प्रकार स्त्री को और अधिक गौरव में स्थित माता को विवेकहीन पशु भी अवध्य जानते हैं।

श्लोक 43 (12.272.43)

देवतानां समावायमेकस्थं पितरं विदुः । मर्त्यानां देवतानां च स्नेहादभ्येति मातरम् ॥

devatānāṃ samāvāyamekasthaṃ pitaraṃ viduḥ | martyānāṃ devatānāṃ ca snehādabhyeti mātaram

वे पिता को एक स्थान पर इकट्ठे हुए देवताओं के समूह के रूप में जानते हैं, पर मनुष्य और देवता दोनों स्नेह से माता के पास जाते हैं।

श्लोक 44 (12.272.44)

एवं विमृशतस्तस्य चिरकारितया बहु । दीर्घः कालो व्यतिक्रान्तस्ततोस्याभ्यागमत्पिता ॥

evaṃ vimṛśatastasya cirakāritayā bahu | dīrghaḥ kālo vyatikrāntastatosyābhyāgamatpitā

इस प्रकार अपनी चिरकारिता के कारण बहुत सोचते-सोचते उसका बहुत लम्बा समय बीत गया, और तब उसके पिता लौट आए।

श्लोक 45 (12.272.45)

मेधातिथिर्महाप्राज्ञो गौतमस्तपसि स्थितः । विमृश्य तेन कालेन पत्न्याः संस्थाव्यतिक्रमम् ॥

medhātithirmahāprājño gautamastapasi sthitaḥ | vimṛśya tena kālena patnyāḥ saṃsthāvyatikramam

महाप्राज्ञ मेधातिथि गौतम, जो तप में स्थित थे, उस समय के बीतने पर अपनी पत्नी के अनुचित मरण के विषय में विचार करने लगे।

श्लोक 46 (12.272.46)

सोऽब्रवीद्भृशसंतप्तो दुःखेनाश्रूणि वर्तयन् । श्रुतधैर्यप्रसादेन पश्चात्तापमुपागतः ॥

so'bravīdbhṛśasaṃtapto duḥkhenāśrūṇi vartayan | śrutadhairyaprasādena paścāttāpamupāgataḥ

वे अत्यन्त सन्तप्त होकर दुःख से आँसू बहाते हुए बोले; विद्या और धैर्य के प्रसाद से वे पश्चात्ताप को प्राप्त हुए थे।

गौतम उवाच

श्लोक 47 (12.272.47)

आश्रमं मम संप्राप्तस्त्रिलोकेशः पुरंदरः । अतिथिव्रतमास्थाय ब्राह्मण्यं रूपमास्थितः ॥

āśramaṃ mama saṃprāptastrilokeśaḥ puraṃdaraḥ | atithivratamāsthāya brāhmaṇyaṃ rūpamāsthitaḥ

'तीनों लोकों के स्वामी पुरन्दर अतिथि-व्रत धारण करके ब्राह्मण का रूप लेकर मेरे आश्रम में आए थे।

श्लोक 48 (12.272.48)

स मया सान्त्वितो वाग्भिः स्वागतेनाभिपूजितः । अर्ध्यं पाद्यं यथान्यायं मया च प्रतिपादितः ॥

sa mayā sāntvito vāgbhiḥ svāgatenābhipūjitaḥ | ardhyaṃ pādyaṃ yathānyāyaṃ mayā ca pratipāditaḥ

मेरे द्वारा उनको मधुर वाणी से सान्त्वना दी गई, स्वागत से उनका सत्कार किया गया, और मेरे द्वारा ही उन्हें विधिपूर्वक अर्घ्य और पाद्य अर्पित किया गया।

श्लोक 49 (12.272.49)

परवानस्मि चेत्युक्तः प्रणयिष्यति तेन च । अत्र चाकुशले जाते स्त्रिया नास्ति व्यतिक्रमः ॥

paravānasmi cetyuktaḥ praṇayiṣyati tena ca | atra cākuśale jāte striyā nāsti vyatikramaḥ

'मैं दूसरे के वश में हूँ' ऐसा कहकर वह उसके प्रति प्रणय निवेदन करेगा। इस अनिष्ट के घटने पर स्त्री का कोई दोष नहीं है।

श्लोक 50 (12.272.50)

एवं न स्त्री न चैवाहं नाध्वगस्त्रिदशेश्वरः । अपराध्यति धर्मस्य प्रमादस्त्वपराध्यति ॥

evaṃ na strī na caivāhaṃ nādhvagastridaśeśvaraḥ | aparādhyati dharmasya pramādastvaparādhyati

इस प्रकार न स्त्री, न मैं, न वह पथिक देवेश्वर अपराध करता है; धर्म का प्रमाद ही अपराध करता है।

श्लोक 51 (12.272.51)

ईर्ष्याजं व्यसनं प्राहुस्तेन चैवोर्ध्वरेतसः । ईर्ष्यया त्वहमाक्षिप्तो मग्नो दुष्कृतसागरे ॥

īrṣyājaṃ vyasanaṃ prāhustena caivordhvaretasaḥ | īrṣyayā tvahamākṣipto magno duṣkṛtasāgare

कहते हैं कि व्यसन ईर्ष्या से उत्पन्न होता है, और उसी से ऊर्ध्वरेता भी नष्ट होते हैं। ईर्ष्या से अभिभूत होकर मैं दुष्कर्मों के सागर में डूब गया हूँ।

श्लोक 52 (12.272.52)

हत्वा साध्वीं च नारीं च व्यसनित्वाच्च वासिताम् । भर्तव्यत्वेन भार्यां च को नु मां तारयिष्यति ॥

hatvā sādhvīṃ ca nārīṃ ca vyasanitvācca vāsitām | bhartavyatvena bhāryāṃ ca ko nu māṃ tārayiṣyati

एक साध्वी स्त्री को, अपनी पत्नी को, जिसका भरण-पोषण मेरा कर्तव्य था, अपनी आवेशशीलता के कारण नष्ट करके मुझे कौन पार उतारेगा?

श्लोक 53 (12.272.53)

अन्तरेण मयाऽऽज्ञप्तश्चिरकारीत्युदारधीः । यद्यद्य चिरकारी स्यात्स मां त्रायेत पातकात् ॥

antareṇa mayā''jñaptaścirakārītyudāradhīḥ | yadyadya cirakārī syātsa māṃ trāyeta pātakāt

असावधानी के क्षण में मैंने उदार बुद्धि वाले चिरकारिक को आज्ञा दी थी। यदि वह आज चिरकारी हो, तो वह मुझे इस पाप से बचा सकता है।

श्लोक 54 (12.272.54)

चिरकारिक भद्रं ते भद्रं ते चिरकारिक । यद्यद्य चिरकारी त्वं ततोऽसि चिरकारिकः ॥

cirakārika bhadraṃ te bhadraṃ te cirakārika | yadyadya cirakārī tvaṃ tato'si cirakārikaḥ

चिरकारिक, तुम्हारा कल्याण हो, चिरकारिक, तुम्हारा कल्याण हो! यदि तुम आज चिरकारी हो, तभी तुम सच्चे चिरकारिक हो।

श्लोक 55 (12.272.55)

त्राहि मां मातरं चैव तपो यच्चार्जितं त्वया । आत्मानं पातकेभ्यश्च भवाद्य चिरकारिकः ॥

trāhi māṃ mātaraṃ caiva tapo yaccārjitaṃ tvayā | ātmānaṃ pātakebhyaśca bhavādya cirakārikaḥ

मुझे बचाओ, अपनी माता को बचाओ, अपने अर्जित तप को बचाओ और अपने आपको पापों से बचाओ। आज सचमुच चिरकारिक बनो!

श्लोक 56 (12.272.56)

सहजं चिरकारित्वमतिप्रज्ञतया तव । सफलं तत्तथा तेऽस्तु भवाद्य चिरकारिकः ॥

sahajaṃ cirakāritvamatiprajñatayā tava | saphalaṃ tattathā te'stu bhavādya cirakārikaḥ

तुम्हारी देर से काम करने की प्रवृत्ति तुम्हारी महान प्रज्ञा के कारण स्वाभाविक है। वह आज सफल हो। आज सचमुच चिरकारिक बनो!

श्लोक 57 (12.272.57)

चिरमाशंसितो मात्रा चिरं गर्भेण धारितः । सफलं चिरकारित्वं कुरु त्वं चिरकारिक ॥

ciramāśaṃsito mātrā ciraṃ garbheṇa dhāritaḥ | saphalaṃ cirakāritvaṃ kuru tvaṃ cirakārika

माता ने तुम्हें देर तक चाहा, गर्भ में देर तक धारण किया। चिरकारिक, अपनी चिरकारिता को सफल करो!

श्लोक 58 (12.272.58)

चिरायते च संतापाच्चिरं स्वपिति धारितः । आवयोश्चिरसंतापादवेक्ष्य चिरकारिक ॥

cirāyate ca saṃtāpācciraṃ svapiti dhāritaḥ | āvayościrasaṃtāpādavekṣya cirakārika

सन्ताप के कारण वह देर लगाता है, रोके जाने पर देर तक सोता है। चिरकारिक, देखो कि हम दोनों कितने लम्बे समय से सन्तप्त हैं।'

भीष्म उवाच

श्लोक 59 (12.272.59)

एवं स दुःखितो राजन्महर्षिर्गौतमस्तदा । चिरकारिं ददर्शाथ पुत्रं स्थितमथान्तिके ॥

evaṃ sa duḥkhito rājanmaharṣirgautamastadā | cirakāriṃ dadarśātha putraṃ sthitamathāntike

हे राजन्, इस प्रकार दुःखी महर्षि गौतम ने तब अपने पुत्र चिरकारिक को पास ही खड़ा देखा।

श्लोक 60 (12.272.60)

चिरकारी तु पितरं दृष्ट्वा परमदुःखितः । शस्त्रं त्यक्त्वा ततो मूर्ध्ना प्रसादायोपचक्रमे ॥

cirakārī tu pitaraṃ dṛṣṭvā paramaduḥkhitaḥ | śastraṃ tyaktvā tato mūrdhnā prasādāyopacakrame

चिरकारिक अपने पिता को देखकर अत्यन्त दुःखी हुआ। उसने शस्त्र फेंक दिया और सिर झुकाकर पिता को प्रसन्न करने लगा।

श्लोक 61 (12.272.61)

गौतमस्तं ततो दृष्ट्वा शिरसा पतितं भुवि । पत्नीं चैव निराकारां परामभ्यागमन्मुदम् ॥

gautamastaṃ tato dṛṣṭvā śirasā patitaṃ bhuvi | patnīṃ caiva nirākārāṃ parāmabhyāgamanmudam

गौतम ने पुत्र को सिर के बल भूमि पर पड़ा देखा और अपनी पत्नी को निराकार, पत्थर बनी हुई खड़ी देखा, तो उन्हें परम आनन्द हुआ।

श्लोक 62 (12.272.62)

न हि सा तेन संभेदं पत्नी नीता महात्मना । विजने चाश्रमस्थेन पुत्रश्चापि समाहितः ॥

na hi sā tena saṃbhedaṃ patnī nītā mahātmanā | vijane cāśramasthena putraścāpi samāhitaḥ

क्योंकि उन महात्मा ने, जो निर्जन आश्रम में रहते थे, अपनी पत्नी को नष्ट नहीं किया था; और पुत्र भी शान्तचित्त खड़ा था।

श्लोक 63 (12.272.63)

हन्या इति समादेशः शस्त्रपाणौ सुते स्थिते । विनीते प्रसवत्यर्थे विवासे चात्मकर्मसु ॥

hanyā iti samādeśaḥ śastrapāṇau sute sthite | vinīte prasavatyarthe vivāse cātmakarmasu

आज्ञा थी कि 'उसे मार डालो', और पुत्र हाथ में शस्त्र लिए खड़ा था, सुशिक्षित, जबकि बात अपने परिणाम पर पहुँच रही थी, पिता दूर जा चुके थे और वह अपने कर्तव्यों में लगा था।

श्लोक 64 (12.272.64)

बुद्धिश्चासीत्सुतं दृष्ट्वा पितुश्चरणयोर्नतम् । शस्त्रग्रहणचापल्यं संवृणोति भयादिति ॥

buddhiścāsītsutaṃ dṛṣṭvā pituścaraṇayornatam | śastragrahaṇacāpalyaṃ saṃvṛṇoti bhayāditi

पिता के चरणों में झुके हुए पुत्र को देखकर गौतम के मन में विचार आया कि 'यह भय के कारण शस्त्र उठाने की चपलता को रोक रहा है।'

श्लोक 65 (12.272.65)

ततः पित्रा चिरं स्तुत्वा चिरं चाघ्राय मूर्धनि । चिरं दोर्भ्यां परिष्वज्य चिरं जीवेत्युदाहृतः ॥

tataḥ pitrā ciraṃ stutvā ciraṃ cāghrāya mūrdhani | ciraṃ dorbhyāṃ pariṣvajya ciraṃ jīvetyudāhṛtaḥ

तब पिता ने बहुत देर तक उसकी प्रशंसा करके, बहुत देर तक उसका मस्तक सूँघकर और बहुत देर तक दोनों भुजाओं में कसकर उससे कहा, 'चिरंजीवी हो।'

श्लोक 66 (12.272.66)

एवं स गौतमः पुत्रं प्रीतिहर्षगुणैर्युतः । अभिनन्द्य महाप्रज्ञ इदं वचनमब्रवीत् ॥

evaṃ sa gautamaḥ putraṃ prītiharṣaguṇairyutaḥ | abhinandya mahāprajña idaṃ vacanamabravīt

इस प्रकार प्रेम और हर्ष से भरे महाप्राज्ञ गौतम ने पुत्र का अभिनन्दन करके ये वचन कहे।

गौतम उवाच

श्लोक 67 (12.272.67)

चिरकारिक भद्रं ते चिरकारी चिरं भव । चिराय यदि ते सौम्य चिरमस्मि न दुःखितः ॥

cirakārika bhadraṃ te cirakārī ciraṃ bhava | cirāya yadi te saumya ciramasmi na duḥkhitaḥ

'चिरकारिक, तुम्हारा कल्याण हो; तुम देर तक चिरकारी बने रहो। हे सौम्य, यदि तुम देर लगाओगे, तो मैं देर तक दुःखी नहीं रहूँगा।'

भीष्म उवाच

श्लोक 68 (12.272.68)

गाथाश्चाप्यब्रवीद्विद्वान्गौतमो मुनिसत्तमः । चिरकारिषु धीरेषु गुणोद्देशसमाश्रयाः ॥

gāthāścāpyabravīdvidvāngautamo munisattamaḥ | cirakāriṣu dhīreṣu guṇoddeśasamāśrayāḥ

विद्वान मुनिश्रेष्ठ गौतम ने उन धीर चिरकारियों के गुणों के निर्देश पर आधारित गाथाएँ भी कहीं।

गौतम उवाच

श्लोक 69 (12.272.69)

चिरेण मित्रं बध्नीयाच्चिरेण च कृतं त्यजेत् । चिरेण हि कृतं मित्रं चिरं धारणमर्हति ॥

cireṇa mitraṃ badhnīyāccireṇa ca kṛtaṃ tyajet | cireṇa hi kṛtaṃ mitraṃ ciraṃ dhāraṇamarhati

'मित्र देर से बनाना चाहिए, और बनाए हुए मित्र को देर से छोड़ना चाहिए; क्योंकि देर से बनाया हुआ मित्र देर तक निभाए जाने योग्य होता है।

श्लोक 70 (12.272.70)

रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि । अप्रिये चैव कर्तव्ये चिरकारी प्रशस्यते ॥

rāge darpe ca māne ca drohe pāpe ca karmaṇi | apriye caiva kartavye cirakārī praśasyate

राग में, दर्प में, अभिमान में, द्रोह में, पापकर्म में और अप्रिय कार्य करने में देर करने वाले की प्रशंसा होती है।

श्लोक 71 (12.272.71)

बन्धूनां सुहृदां चैव भृत्यानां स्त्रीजनस्य च । अव्यक्तेष्वपराधेषु चिरकारी प्रशस्यते ॥

bandhūnāṃ suhṛdāṃ caiva bhṛtyānāṃ strījanasya ca | avyakteṣvaparādheṣu cirakārī praśasyate

बन्धुओं, मित्रों, भृत्यों और स्त्रीजन के अस्पष्ट अपराधों में देर करने वाले की प्रशंसा होती है।'

भीष्म उवाच

श्लोक 72 (12.272.72)

एवं स गौतमस्तत्र प्रीतः पुत्रस्य भारत । कर्मणा तेन कौरव्य चिरकारितया तथा ॥

evaṃ sa gautamastatra prītaḥ putrasya bhārata | karmaṇā tena kauravya cirakāritayā tathā

हे भारत, हे कौरव्य, इस प्रकार गौतम वहाँ अपने पुत्र के उस कर्म से और उसकी चिरकारिता से प्रसन्न हुए।

श्लोक 73 (12.272.73)

एवं सर्वेषु कार्येषु विमृश्य पुरुषस्ततः । चिरेण निश्चयं कृत्वा चिरं न परितप्यते ॥

evaṃ sarveṣu kāryeṣu vimṛśya puruṣastataḥ | cireṇa niścayaṃ kṛtvā ciraṃ na paritapyate

इस प्रकार जो पुरुष सब कार्यों में विचार करके देर से निश्चय करता है, वह देर तक पश्चात्ताप नहीं करता।

श्लोक 74 (12.272.74)

चिरं धारयते रोषं चिरं कर्म नियच्छति । पश्चात्तापकरं कर्म न किंचिदुपपद्यते ॥

ciraṃ dhārayate roṣaṃ ciraṃ karma niyacchati | paścāttāpakaraṃ karma na kiṃcidupapadyate

वह क्रोध को देर तक रोके रखता है, कर्म को देर तक रोके रखता है; पीछे पछतावा देने वाला कोई कर्म उससे कभी नहीं होता।

श्लोक 75 (12.272.75)

चिरं वृद्धानुपासीत चिरमन्यांश्च पूजयेत् । चिरं धर्मं निषेवेत कुर्याच्चान्वेषणं चिरम् ॥

ciraṃ vṛddhānupāsīta ciramanyāṃśca pūjayet | ciraṃ dharmaṃ niṣeveta kuryāccānveṣaṇaṃ ciram

वह देर तक वृद्धों की उपासना करे, देर तक दूसरों का सम्मान करे, देर तक धर्म का सेवन करे और देर तक अनुसन्धान करे।

श्लोक 76 (12.272.76)

चिरमन्वास्य विदुषश्चिरं शिष्टान्निषेव्य च । चिरं विनीय चात्मानं चिरं चात्यनवज्ञताम् ॥

ciramanvāsya viduṣaściraṃ śiṣṭānniṣevya ca | ciraṃ vinīya cātmānaṃ ciraṃ cātyanavajñatām

देर तक विद्वानों के पास बैठकर, देर तक सज्जनों की सेवा करके और देर तक अपने को अनुशासित करके वह देर तक अपमान से मुक्त रहता है।

श्लोक 77 (12.272.77)

ब्रुवतश्च परस्यापि वाक्यं धर्मोपसंहितम् । चिरं पृष्टोऽपि च ब्रूयाच्चिरं न परितप्यते ॥

bruvataśca parasyāpi vākyaṃ dharmopasaṃhitam | ciraṃ pṛṣṭo'pi ca brūyācciraṃ na paritapyate

जब दूसरा भी धर्म से युक्त वचन बोले, तब स्वयं पूछे जाने पर भी वह देर से उत्तर दे; तब उसे देर तक पछताना नहीं पड़ता।

श्लोक 78 (12.272.78)

उपास्य बहुलास्तस्मिन्नाश्रमे सुमहातपाः । समाः स्वर्गं गतो विप्रः पुत्रेण सहितस्तदा ॥

upāsya bahulāstasminnāśrame sumahātapāḥ | samāḥ svargaṃ gato vipraḥ putreṇa sahitastadā

उस आश्रम में बहुत वर्षों तक रहकर महातपस्वी ब्राह्मण गौतम तब अपने पुत्र के साथ स्वर्ग को चले गए।

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