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शान्ति पर्व · अध्याय 273

द्युमत्सेन और सत्यवान् का दण्ड पर संवाद

युधिष्ठिर पूछते हैं कि राजा प्रजा को कष्ट दिए बिना उसकी रक्षा कैसे करे। भीष्म द्युमत्सेन और सत्यवान् के पुराने संवाद का स्मरण कराते हैं कि डाकुओं का वध उचित है या नहीं। सत्यवान् का मत है कि वध धर्म नहीं है और ब्राह्मणों द्वारा वर्णों को धर्म के बन्धन में बाँधना चाहिए, दण्ड वध से कम होना चाहिए। द्युमत्सेन उत्तर देते हैं कि मर्यादा तभी टिकती है जब अपराधियों को दण्ड मिले; वे युगों में दण्ड के क्रमशः कठोर होते जाने का वर्णन करते हैं और कहते हैं कि राजा को पहले स्वयं को संयमित करना चाहिए।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.273.1)

कथं राजा प्रजा रक्षेन्न च किंचित्प्रतापयेत् । पृच्छामि त्वां सतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

kathaṃ rājā prajā rakṣenna ca kiṃcitpratāpayet | pṛcchāmi tvāṃ satāṃ śreṣṭha tanme brūhi pitāmaha

राजा किसी को कष्ट पहुँचाए बिना प्रजा की रक्षा कैसे करे? हे सज्जनों में श्रेष्ठ पितामह, मैं आपसे पूछता हूँ; मुझे यह बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.273.2)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । द्युमत्सेनस्य संवादं राज्ञा सत्यवता सह ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | dyumatsenasya saṃvādaṃ rājñā satyavatā saha

इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास सुनाते हैं, द्युमत्सेन का राजा सत्यवान् के साथ संवाद।

श्लोक 3 (12.273.3)

अव्याहृतं व्याजहार सत्यवानिति नः श्रुतम् । वधाय नीयमानेषु पितुरेवानुशासनात् ॥

avyāhṛtaṃ vyājahāra satyavāniti naḥ śrutam | vadhāya nīyamāneṣu piturevānuśāsanāt

हमने सुना है कि अपने ही पिता की आज्ञा से जब लोग वध के लिए ले जाए जा रहे थे, तब सत्यवान् ने वह बात कही जो पहले कभी नहीं कही गई थी।

सत्यवानुवाच

श्लोक 4 (12.273.4)

अधर्मतां याति धर्मो यात्यधर्मश्च धर्मताम् । वधो नाम भवेद्धर्मो नैतद्भवितुमर्हति ॥

adharmatāṃ yāti dharmo yātyadharmaśca dharmatām | vadho nāma bhaveddharmo naitadbhavitumarhati

'धर्म अधर्म बन जाता है और अधर्म धर्म। वध को धर्म कहा जाए, यह उचित नहीं हो सकता।'

द्युमत्सेन उवाच

श्लोक 5 (12.273.5)

अथ चेदवधो धर्मोऽधर्मः को जातुचिद्भवेत् । दस्यवश्चेन्न हन्येरन्सत्यवन्संकरो भवेत् ॥

atha cedavadho dharmo'dharmaḥ ko jātucidbhavet | dasyavaścenna hanyeransatyavansaṃkaro bhavet

'परन्तु यदि वध न करना धर्म है, तो अधर्म कभी क्या होगा? हे सत्यवान्, यदि डाकू न मारे जाएँ, तो संकर उत्पन्न हो जाएगा।

श्लोक 6 (12.273.6)

ममेदमिति नास्यैतत्प्रवर्तेत कलौ युगे । लोकयात्रा न चैव स्यादथ चेद्वेत्थ शंस नः ॥

mamedamiti nāsyaitatpravarteta kalau yuge | lokayātrā na caiva syādatha cedvettha śaṃsa naḥ

कलियुग में 'यह मेरा है' यह भाव टिक नहीं सकेगा और लोकयात्रा भी नहीं चलेगी। यदि तुम कुछ और जानते हो, तो हमें बताओ।'

सत्यवानुवाच

श्लोक 7 (12.273.7)

सर्व एव त्रयो वर्णाः कार्या ब्राह्मणबन्धनाः । धर्मपाशनिबद्धानां नाल्पोऽप्यपचरिष्यति ॥

sarva eva trayo varṇāḥ kāryā brāhmaṇabandhanāḥ | dharmapāśanibaddhānāṃ nālpo'pyapacariṣyati

'तीनों वर्णों को ब्राह्मणों के बन्धन में रखना चाहिए। धर्म के पाश में बँधे हुओं में से शायद ही कोई अपराध करेगा।

श्लोक 8 (12.273.8)

यो यस्तेषामपचरेत्तमाचक्षीत वै द्विजः । अयं मे न शृणोतीति तस्मिन्राजा प्रधारयेत् ॥

yo yasteṣāmapacarettamācakṣīta vai dvijaḥ | ayaṃ me na śṛṇotīti tasminrājā pradhārayet

उनमें से जो कोई अपराध करे, उसके विषय में ब्राह्मण कहे, 'यह मेरी बात नहीं सुनता।' तब राजा उसके विषय में निर्णय करे।

श्लोक 9 (12.273.9)

तत्त्वाभावेन यच्छास्त्रं तत्कुर्यान्नान्यथा वधः । असमीक्ष्यैव कर्माणि नीतिशास्त्रं यथाविधि । दस्यून्निहन्ति वै राजा भूयसो वाऽप्यनागसः ॥

tattvābhāvena yacchāstraṃ tatkuryānnānyathā vadhaḥ | asamīkṣyaiva karmāṇi nītiśāstraṃ yathāvidhi | dasyūnnihanti vai rājā bhūyaso vā'pyanāgasaḥ

जब वास्तविकता प्रमाणित न हो, तब शास्त्र जो कहता है वही करे; अन्यथा वध न करे। जो राजा नीतिशास्त्र के अनुसार विचार किए बिना डाकुओं को मारता है, या बहुत-से निरपराधों को भी,

श्लोक 10 (12.273.10)

भार्या माता पिता पुत्रो हन्यन्ते पुरुषेण ते । परेणापकृतो राजा तस्मात्सम्यक्प्रधारयेत् ॥

bhāryā mātā pitā putro hanyante puruṣeṇa te | pareṇāpakṛto rājā tasmātsamyakpradhārayet

वह उस मनुष्य के द्वारा मारे जाने वाले पत्नी, माता, पिता और पुत्र के विनाश को अपने ऊपर लाता है। इसलिए दूसरे से अपकृत राजा को भली-भाँति विचार करना चाहिए।

श्लोक 11 (12.273.11)

असाधुश्चैव पुरुषो लभते शीलमेकदा । साधोश्चापि ह्यसाधुभ्यः शोभना जायते प्रजाः ॥

asādhuścaiva puruṣo labhate śīlamekadā | sādhoścāpi hyasādhubhyaḥ śobhanā jāyate prajāḥ

दुष्ट मनुष्य भी कभी अच्छा शील पा लेता है, और सज्जन से भी तथा दुष्टों से भी सुन्दर सन्तानें उत्पन्न होती हैं।

श्लोक 12 (12.273.12)

न मूलघातः कर्तव्यो नैष धर्मः सनातनः । अपि खल्ववधेनैव प्रायश्चित्तं विधीयते ॥

na mūlaghātaḥ kartavyo naiṣa dharmaḥ sanātanaḥ | api khalvavadhenaiva prāyaścittaṃ vidhīyate

जड़ नहीं काटनी चाहिए; यह सनातन धर्म नहीं है। वध किए बिना भी प्रायश्चित्त का विधान किया गया है।

श्लोक 13 (12.273.13)

उद्वेजनेन बन्धेन विरूपकरणेन च । वधदण्डेन क्लेश्या न पुरोहितसंसदि ॥

udvejanena bandhena virūpakaraṇena ca | vadhadaṇḍena kleśyā na purohitasaṃsadi

उन्हें उत्पीड़न से, कारावास से, अंग-भंग से और वध-दण्ड से कष्ट दिया जा सकता है, पर पुरोहित की सभा में नहीं।

श्लोक 14 (12.273.14)

यदा पुरोहितं वा ते पर्येयुः शरणैषिणः । करिष्यामः पुनर्ब्रह्मन्न पापमिति वादिनः ॥

yadā purohitaṃ vā te paryeyuḥ śaraṇaiṣiṇaḥ | kariṣyāmaḥ punarbrahmanna pāpamiti vādinaḥ

जब वे शरण की खोज में पुरोहित के पास आएँ और कहें, 'हे ब्राह्मण, हम फिर पाप नहीं करेंगे,'

श्लोक 15 (12.273.15)

तदा विसर्गमर्हाः स्युरितीदं धातृशासनम् । विभ्रद्दण्डाजिनं मुण्डो ब्राह्मणोऽर्हति शासनम् ॥

tadā visargamarhāḥ syuritīdaṃ dhātṛśāsanam | vibhraddaṇḍājinaṃ muṇḍo brāhmaṇo'rhati śāsanam

तब वे छोड़े जाने के योग्य हैं; यह विधाता का विधान है। दण्ड और मृगचर्म धारण करने वाला मुण्डित ब्राह्मण भी शासन के योग्य है।

श्लोक 16 (12.273.16)

गरीयांसो गरीयांसमपराधे पुनः पुनः । तदा विसर्गमर्हन्ति न यथा प्रथमे तथा ॥

garīyāṃso garīyāṃsamaparādhe punaḥ punaḥ | tadā visargamarhanti na yathā prathame tathā

जो बड़े लोग बार-बार अपने से भी बड़े के प्रति अपराध करते हैं, वे फिर छोड़े जाने के योग्य नहीं रहते, जैसे पहली बार थे।'

द्युमत्सेन उवाच

श्लोक 17 (12.273.17)

यत्रयत्रैव शक्येरन्संयन्तुं समये प्रजाः । स तावान्प्रोच्यते धर्मो यावन्न प्रतिलङ्घ्यते । अहन्यमानेषु पुनः सर्वमेव पराभवेत् ॥

yatrayatraiva śakyeransaṃyantuṃ samaye prajāḥ | sa tāvānprocyate dharmo yāvanna pratilaṅghyate | ahanyamāneṣu punaḥ sarvameva parābhavet

'जहाँ-जहाँ प्रजा को नियम में बाँधा जा सकता है, वहाँ तक वही धर्म कहा जाता है, जब तक उसका उल्लंघन न हो। किन्तु अपराधियों को दण्ड न मिलने पर सब कुछ नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 18 (12.273.18)

पूर्वे पूर्वतरे चैव सुशास्या ह्यभवञ्जनाः । मृदवः सत्यभूयिष्ठा अल्पद्रोहाल्पमन्यवः ॥

pūrve pūrvatare caiva suśāsyā hyabhavañjanāḥ | mṛdavaḥ satyabhūyiṣṭhā alpadrohālpamanyavaḥ

पहले के और उससे भी पहले के समय में लोग सरलता से शासित हो जाते थे; वे कोमल, प्रायः सत्यनिष्ठ, अल्प द्रोह और अल्प क्रोध वाले थे।

श्लोक 19 (12.273.19)

पुरा धिग्दण्ड एवासीद्वाग्दण्डस्तदनन्तरम् । आसीदादानदण्डोऽपि वधदण्डोऽद्य वर्तते ॥

purā dhigdaṇḍa evāsīdvāgdaṇḍastadanantaram | āsīdādānadaṇḍo'pi vadhadaṇḍo'dya vartate

पहले केवल धिक्कार का दण्ड था, फिर वाणी का दण्ड हुआ; फिर धन छीनने का दण्ड भी हुआ, और अब वध का दण्ड चलता है।

श्लोक 20 (12.273.20)

वधेनापि न शक्यन्ते नियन्तुमपरे जनाः ॥

vadhenāpi na śakyante niyantumapare janāḥ

वध से भी दूसरे लोग नियन्त्रित नहीं किए जा सकते।

श्लोक 21 (12.273.21)

नैव दस्युर्मनुष्याणां न देवानामिति श्रुतिः । न गन्धर्वपितॄणां च कः कस्येह न कश्चन ॥

naiva dasyurmanuṣyāṇāṃ na devānāmiti śrutiḥ | na gandharvapitṝṇāṃ ca kaḥ kasyeha na kaścana

श्रुति कहती है कि डाकू न मनुष्यों का है, न देवताओं का, और न गन्धर्वों तथा पितरों का। यहाँ कौन किसका है? कोई किसी का नहीं।

श्लोक 22 (12.273.22)

पक्वं श्मशानादादत्ते पिशाचांश्चापि दैवतम् । तेषु यः समयं कश्चित्कुर्वीत हतबुद्धिषु ॥

pakvaṃ śmaśānādādatte piśācāṃścāpi daivatam | teṣu yaḥ samayaṃ kaścitkurvīta hatabuddhiṣu

वे श्मशान से पका अन्न लेते हैं और पिशाचों को भी देवता मानते हैं। जो कोई ऐसे बुद्धिहीन लोगों के साथ कोई समझौता करे,

सत्यवानुवाच

श्लोक 23 (12.273.23)

तान्न शक्नोषि चेत्साधून्परित्रातुमहिंसया । कस्यचिद्भूतभव्यस्य लोभेनान्तं तथा कुरु ॥

tānna śaknoṣi cetsādhūnparitrātumahiṃsayā | kasyacidbhūtabhavyasya lobhenāntaṃ tathā kuru

'यदि तुम सज्जनों को उनसे अहिंसा के द्वारा नहीं बचा सकते, तो किसी प्राणी के हित को ध्यान में रखकर, भूत या भावी, उनका अन्त उसी प्रकार करो।

श्लोक 24 (12.273.24)

राजानो लोकयात्रार्थं तप्यन्ते परमं तपः । तेऽपत्रपन्ति तादृग्भ्यस्तथावृत्ता भवन्ति च ॥

rājāno lokayātrārthaṃ tapyante paramaṃ tapaḥ | te'patrapanti tādṛgbhyastathāvṛttā bhavanti ca

राजा लोकयात्रा के लिए परम तप करते हैं। वे ऐसे लोगों के सामने लज्जित होते हैं और उसी के अनुरूप आचरण करने लगते हैं।

श्लोक 25 (12.273.25)

वित्रास्यमानाः सुकृतो न कामाद्धन्ति दुष्कृतीन् । सुकृतेनैव राजानो भूयिष्ठं शासते प्रजाः ॥

vitrāsyamānāḥ sukṛto na kāmāddhanti duṣkṛtīn | sukṛtenaiva rājāno bhūyiṣṭhaṃ śāsate prajāḥ

भयभीत किए जाने पर भी पुण्यात्मा लोग अपनी इच्छा से दुष्कर्मियों को नहीं मारते। राजा प्रायः सुकृत से ही प्रजा पर शासन करते हैं।

श्लोक 26 (12.273.26)

श्रेयसः श्रेयसोऽप्येवं वृत्तं लोकोऽनुवर्तते । सदैव हि गुरोर्वृत्तमनुवर्तन्ति मानवाः ॥

śreyasaḥ śreyaso'pyevaṃ vṛttaṃ loko'nuvartate | sadaiva hi gurorvṛttamanuvartanti mānavāḥ

संसार श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर के आचरण का अनुसरण करता है; मनुष्य सदा गुरु के आचरण का अनुसरण करते हैं।'

द्युमत्सेन उवाच

श्लोक 27 (12.273.27)

आत्मानमसमाधाय समाधित्सति यः परान् । विषयेष्विन्द्रियवशं मानवाः प्रहसन्ति तम् ॥

ātmānamasamādhāya samādhitsati yaḥ parān | viṣayeṣvindriyavaśaṃ mānavāḥ prahasanti tam

'जो अपने को संयत किए बिना दूसरों को संयत करना चाहता है और विषयों में इन्द्रियों के वश में है, उस पर लोग हँसते हैं।

श्लोक 28 (12.273.28)

यो राज्ञो दम्भमोहेन किंचित्कुर्यादसांप्रतम् । सर्वोपायैर्नियम्यः स तथा पापान्निवर्तते ॥

yo rājño dambhamohena kiṃcitkuryādasāṃpratam | sarvopāyairniyamyaḥ sa tathā pāpānnivartate

जो कोई राजा के दम्भ और मोह के कारण कुछ अनुचित करे, उसे सब उपायों से रोकना चाहिए, ताकि वह पाप से लौट आए।

श्लोक 29 (12.273.29)

आत्मैवादौ नियन्तव्यो दुष्कृतं संनियच्छता । दण्डयेच्च महादण्डैरपि बन्धूननन्तरान् ॥

ātmaivādau niyantavyo duṣkṛtaṃ saṃniyacchatā | daṇḍayecca mahādaṇḍairapi bandhūnanantarān

पहले अपने आपको संयत करना चाहिए, फिर दुष्कर्म को रोकना चाहिए; और अपने निकटतम बन्धुओं को भी कठोर दण्डों से दण्डित करना चाहिए।

श्लोक 30 (12.273.30)

यो राजा लोभमोहेन किंचित्कुर्यादसांप्रतम् । सर्वोपायैर्नियम्यः स तथा पापान्निवर्तते ॥

yo rājā lobhamohena kiṃcitkuryādasāṃpratam | sarvopāyairniyamyaḥ sa tathā pāpānnivartate

जो राजा लोभ और मोह के कारण कुछ अनुचित करे, उसे सब उपायों से रोकना चाहिए, ताकि वह पाप से लौट आए।

श्लोक 31 (12.273.31)

यत्र वै पापकृन्नीचो न महद्दुःखमर्च्छति । वर्धन्ते तत्र पापानि धर्मो ह्रसति च ध्रुवम् ॥

yatra vai pāpakṛnnīco na mahadduḥkhamarcchati | vardhante tatra pāpāni dharmo hrasati ca dhruvam

जहाँ नीच पापी को बड़ा दुःख नहीं भोगना पड़ता, वहाँ पाप बढ़ते हैं और धर्म निश्चय ही घटता है।

श्लोक 32 (12.273.32)

इति कारुण्यशीलस्तु विद्वान्वै ब्राह्मणोऽन्वशात् । इति चैवानुशिष्टोऽस्मि पूर्वैस्तातपितामहैः । आश्वासयद्भिः सुभृशमनुक्रोशात्तथैव च ॥

iti kāruṇyaśīlastu vidvānvai brāhmaṇo'nvaśāt | iti caivānuśiṣṭo'smi pūrvaistātapitāmahaiḥ | āśvāsayadbhiḥ subhṛśamanukrośāttathaiva ca

इस प्रकार स्वभाव से करुणामय विद्वान ब्राह्मण ने उपदेश दिया था; और इसी प्रकार मुझे भी मेरे पूर्वजों, पिताओं और पितामहों ने उपदेश दिया है, जिन्होंने करुणा से मुझे बहुत आश्वासन दिया।

श्लोक 33 (12.273.33)

एतत्प्रथमकल्पेन राजा कृतयुगे जयेत् । पादोनेनापि धर्मेण गच्छेत्रेतायुगे तथा । द्वापरे तु द्विपादेन पादेन त्ववरे युगे ॥

etatprathamakalpena rājā kṛtayuge jayet | pādonenāpi dharmeṇa gacchetretāyuge tathā | dvāpare tu dvipādena pādena tvavare yuge

इस प्रथम विधि से राजा कृतयुग में विजयी होता है; त्रेतायुग में एक पाद कम धर्म से चलता है; द्वापर में दो पाद से; और अन्तिम युग में एक पाद से।

श्लोक 34 (12.273.34)

तथा कलियुगे प्राप्ते राज्ञो दुश्चरितेन ह । भवेत्कालविशेषेण कला धर्मस्य षोडशी ॥

tathā kaliyuge prāpte rājño duścaritena ha | bhavetkālaviśeṣeṇa kalā dharmasya ṣoḍaśī

फिर कलियुग आने पर राजाओं के दुराचरण से और काल की विशेषता से धर्म की केवल सोलहवीं कला रह जाएगी।

श्लोक 35 (12.273.35)

अथ प्रथमकल्पेन सत्यवन्संकरो भवेत् । आयुः शक्तिं च कालं च निर्दिश्य तप आदिशेत् ॥

atha prathamakalpena satyavansaṃkaro bhavet | āyuḥ śaktiṃ ca kālaṃ ca nirdiśya tapa ādiśet

और तब, हे सत्यवान्, प्रथम विधि से संकर हो जाएगा। आयु, शक्ति और काल का विचार करके तप का विधान करना चाहिए।

श्लोक 36 (12.273.36)

सत्याय हि यथा नेह जह्याद्धर्मफलं महत् । भूतानामनुकम्पार्थं मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत् ॥

satyāya hi yathā neha jahyāddharmaphalaṃ mahat | bhūtānāmanukampārthaṃ manuḥ svāyaṃbhuvo'bravīt

ताकि सत्य के लिए यहाँ धर्म का महान फल नष्ट न हो, प्राणियों पर दया के लिए स्वायम्भुव मनु ने यह कहा।

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