शान्ति पर्व · अध्याय 276
कपिल का उपदेश: वेद और कर्म का मार्ग
भीष्म युधिष्ठिर को ऋषि कपिल और स्यूमरश्मि का संवाद सुनाते हैं। कपिल वेद का प्रामाण्य स्थापित करते हैं और प्राचीन काल के शुद्ध, निष्काम गृहस्थों का वर्णन करते हैं, जिन्हें प्रायश्चित्त की आवश्यकता नहीं थी और जिनका चतुर्विध धर्म अनन्तता की ओर ले जाता था; इसके साथ संन्यास का चौथा, औपनिषद धर्म है, जिसका सेवन सब अपनी शक्ति के अनुसार कर सकते हैं। स्यूमरश्मि पूछते हैं कि भोगने वालों, दान देने वालों, यज्ञ करने वालों, अध्ययन करने वालों और त्यागियों में स्वर्ग किसे सबसे अच्छी तरह मिलता है; कपिल उत्तर देते हैं कि कर्म शरीर को परिपक्व करते हैं और ज्ञान परम गति है, ब्रह्म के मार्ग बनने वाले गुण गिनाते हैं, और ब्रह्म की स्तुति से समाप्त करते हैं।
कपिल उवाच
श्लोक 1 (12.276.1)
वेदाः प्रमाणं लोकानां न वेदाः पृष्ठतः कृताः । द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् ॥
vedāḥ pramāṇaṃ lokānāṃ na vedāḥ pṛṣṭhataḥ kṛtāḥ | dve brahmaṇī veditavye śabdabrahma paraṃ ca yat
वेद लोक के लिए प्रमाण हैं; वेदों को कभी पीछे नहीं डाला गया है। दो ब्रह्म जानने योग्य हैं — शब्दब्रह्म और जो उससे परे है, वह परब्रह्म।
श्लोक 2 (12.276.2)
शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति । शरीरमेतत्कुरुते यद्वेदे कुरुते तनुम् ॥
śabdabrahmaṇi niṣṇātaḥ paraṃ brahmādhigacchati | śarīrametatkurute yadvede kurute tanum
जो शब्दब्रह्म में निष्णात है, वह परब्रह्म को प्राप्त होता है। वह इस शरीर को उसी योग्य बनाता है — उस शरीर को, जिसे वह वेद में लगाता है।
श्लोक 3 (12.276.3)
कृतशुद्धशरीरो हि पात्रं भवति ब्राह्मणः । आनन्त्यमनुचिन्त्येदं कर्मणां तद्ब्रवीमि ते ॥
kṛtaśuddhaśarīro hi pātraṃ bhavati brāhmaṇaḥ | ānantyamanucintyedaṃ karmaṇāṃ tadbravīmi te
जिस ब्राह्मण का शरीर शुद्ध हो चुका है, वही सुपात्र होता है। कर्मों से प्राप्त होने वाली अनन्तता का चिन्तन करके मैं उसे तुमसे कहता हूँ।
श्लोक 4 (12.276.4)
निरागममनैतिह्यं प्रत्यक्षं लोकसाक्षिकम् । धर्म इत्येव ये यज्ञान्वितन्वन्ति निराशिषः ॥
nirāgamamanaitihyaṃ pratyakṣaṃ lokasākṣikam | dharma ityeva ye yajñānvitanvanti nirāśiṣaḥ
जो लोग किसी फल की आशा न रखकर केवल "यह धर्म है" — यही मानकर यज्ञों का विस्तार करते हैं — वह धर्म, जिसे न शास्त्र की अपेक्षा है, न परम्परा की, जो प्रत्यक्ष है और जिसका साक्षी लोक है —
श्लोक 5 (12.276.5)
उत्पन्नत्यागिनोऽलुब्धाः कृपासूयाविवर्जिताः । धनिनामेष वै पन्थास्तीर्थेषु प्रतिपादनम् ॥
utpannatyāgino'lubdhāḥ kṛpāsūyāvivarjitāḥ | dhanināmeṣa vai panthāstīrtheṣu pratipādanam
वे अर्जित धन का त्याग करने वाले, लोभरहित तथा दया और असूया से मुक्त होते हैं। धनवानों का यही मार्ग है — तीर्थों में दान देना।
श्लोक 6 (12.276.6)
अनाश्रिताः पापकृत्याः कदाचित्कर्मयोगिनः । मनः संकल्पसंसिद्धा विशुद्धज्ञाननिश्चयाः ॥
anāśritāḥ pāpakṛtyāḥ kadācitkarmayoginaḥ | manaḥ saṃkalpasaṃsiddhā viśuddhajñānaniścayāḥ
वे कभी पापकर्मों का आश्रय नहीं लेते थे; वे सदा कर्मयोगी थे, मन के संकल्प से सिद्ध और शुद्ध ज्ञान के निश्चय में दृढ़ थे।
श्लोक 7 (12.276.7)
अक्रुध्यन्तोऽनसूयन्तो निरहंकारमत्सराः । ज्ञाननिष्ठास्त्रिशुक्लाश्च सर्वभूतहिते रताः ॥
akrudhyanto'nasūyanto nirahaṃkāramatsarāḥ | jñānaniṣṭhāstriśuklāśca sarvabhūtahite ratāḥ
वे क्रोध और असूया से रहित, अहंकार और मत्सर से मुक्त, ज्ञान में निष्ठावान, तीन प्रकार से शुद्ध और सब प्राणियों के हित में रत थे।
श्लोक 8 (12.276.8)
आसन्गृहस्था भूयिष्ठा अव्युत्क्रान्ताः स्वकर्मसु । राजानश्च तथा युक्ता ब्राह्मणाश्च यथाविधि ॥
āsangṛhasthā bhūyiṣṭhā avyutkrāntāḥ svakarmasu | rājānaśca tathā yuktā brāhmaṇāśca yathāvidhi
उनमें अधिकतर गृहस्थ थे, जो अपने कर्मों से कभी विचलित नहीं होते थे; राजा और ब्राह्मण भी विधि के अनुसार संयमी थे।
श्लोक 9 (12.276.9)
समा ह्यार्जवसंपन्नाः संतुष्टा ज्ञाननिश्चयाः । प्रत्यक्षधर्माः शुचयः श्रद्दधानाः परावरे ॥
samā hyārjavasaṃpannāḥ saṃtuṣṭā jñānaniścayāḥ | pratyakṣadharmāḥ śucayaḥ śraddadhānāḥ parāvare
वे समदृष्टि और सरल, सन्तुष्ट, ज्ञान में निश्चयवाले, धर्म को प्रत्यक्ष देखने वाले, पवित्र तथा ऊँचे और नीचे दोनों के विषय में श्रद्धालु थे।
श्लोक 10 (12.276.10)
पुरस्ताद्भावितात्मानो यथावच्चरितव्रताः । चरन्ति धर्मं कृच्छ्रेऽपि दुर्गे चैवापि संहताः ॥
purastādbhāvitātmāno yathāvaccaritavratāḥ | caranti dharmaṃ kṛcchre'pi durge caivāpi saṃhatāḥ
उनकी आत्मा पहले से ही संस्कारित थी और उन्होंने व्रतों का यथावत् पालन किया था; वे कठिनाई में भी और संकट में भी एकजुट होकर धर्म का आचरण करते थे।
श्लोक 11 (12.276.11)
संहत्य धर्मं चरतां पुराऽऽसीत्सुखमेव तत् । तेषां नासीद्विधातव्यं प्रायश्चित्तं कथंचन ॥
saṃhatya dharmaṃ caratāṃ purā''sītsukhameva tat | teṣāṃ nāsīdvidhātavyaṃ prāyaścittaṃ kathaṃcana
प्राचीन काल में मिलकर धर्म का आचरण करने वालों के लिए वह सुख ही सुख था; उनके लिए किसी प्रायश्चित्त का विधान कभी करना ही नहीं पड़ा।
श्लोक 12 (12.276.12)
सत्यं हि धर्ममास्थाय दुराधर्षतमा मताः । न मात्रामनुरुध्यन्ते न धर्मच्छलमन्ततः ॥
satyaṃ hi dharmamāsthāya durādharṣatamā matāḥ | na mātrāmanurudhyante na dharmacchalamantataḥ
सत्य और धर्म का आश्रय लेकर वे सबसे अधिक दुर्धर्ष माने जाते थे; वे न मात्रा (सीमा) के अधीन चलते थे और न अन्त में धर्म की आड़ के।
श्लोक 13 (12.276.13)
य एव प्रथमः कल्पस्तमेवात्र चरन्महान् ॥
ya eva prathamaḥ kalpastamevātra caranmahān
महान् पुरुष यहाँ केवल उसी का आचरण करता है, जो प्रथम मार्ग (प्रथम कल्प) है।
श्लोक 14 (12.276.14)
अस्यां स्थितौ स्थितानां हि प्रायश्चित्तं न विद्यते । यदा तु दुर्बलात्मानः प्रायश्चित्तं तदा भवेत् ॥
asyāṃ sthitau sthitānāṃ hi prāyaścittaṃ na vidyate | yadā tu durbalātmānaḥ prāyaścittaṃ tadā bhavet
जो इस स्थिति में स्थित हैं, उनके लिए प्रायश्चित्त नहीं होता। प्रायश्चित्त तभी होता है, जब मनुष्य दुर्बल मन के हो जाते हैं।
श्लोक 15 (12.276.15)
एत एवंविधाः प्राहुः पुराणा यज्ञवाहनाः । त्रैविद्यवृद्धाः शुचयो वृत्तवन्तो यशस्विनः ॥
eta evaṃvidhāḥ prāhuḥ purāṇā yajñavāhanāḥ | traividyavṛddhāḥ śucayo vṛttavanto yaśasvinaḥ
कहते हैं, ऐसे ही थे प्राचीन यज्ञवाहक — तीनों वेदों में वृद्ध, शुद्ध, सदाचारी और यशस्वी।
श्लोक 16 (12.276.16)
यजन्तोऽहरहर्यज्ञैर्निराशीर्बन्धना बुधाः । तेषां यज्ञाश्च वेदाश्च कर्माणि च यथागमम् ॥
yajanto'haraharyajñairnirāśīrbandhanā budhāḥ | teṣāṃ yajñāśca vedāśca karmāṇi ca yathāgamam
वे विद्वान् प्रतिदिन यज्ञों से यजन करते थे, फल की आशा के बन्धन से मुक्त; उनके यज्ञ, उनके वेद और उनके कर्म सब शास्त्र के अनुसार थे।
श्लोक 17 (12.276.17)
आगमाश्च यथाकामं संकल्पाश्च यथाव्रतम् । अपेतकामक्रोधानां दुश्चराचारकर्मणाम् ॥
āgamāśca yathākāmaṃ saṃkalpāśca yathāvratam | apetakāmakrodhānāṃ duścarācārakarmaṇām
उनके आगम (शास्त्र) उनकी इच्छा के अनुसार थे और उनके संकल्प उनके व्रतों के अनुसार — उन पुरुषों के, जिनसे काम और क्रोध दूर हो चुके थे और जिनका आचरण तथा कर्म दूसरों के लिए कठिनाई से अपनाने योग्य था।
श्लोक 18 (12.276.18)
स्वकर्मभिः शंसितानां प्रकृत्या शंसितात्मनाम् । ऋजूनां शमनित्यानां स्वेषु कर्मसु वर्तताम् ॥
svakarmabhiḥ śaṃsitānāṃ prakṛtyā śaṃsitātmanām | ṛjūnāṃ śamanityānāṃ sveṣu karmasu vartatām
वे अपने कर्मों से प्रशंसित और स्वभाव से ही प्रशंसनीय आत्मा वाले, सरल, सदा शान्त तथा अपने कर्मों में लगे रहने वाले थे।
श्लोक 19 (12.276.19)
सर्वमानन्त्यमेवासीदिति नः शाश्वती श्रुतिः । तेषामदीनसत्वानां दुश्चराचारकर्मणाम् ॥
sarvamānantyamevāsīditi naḥ śāśvatī śrutiḥ | teṣāmadīnasatvānāṃ duścarācārakarmaṇām
"सब कुछ अनन्त ही था" — ऐसी हमारी सनातन श्रुति है — उन अदीन-हृदय पुरुषों के विषय में, जिनका आचरण और कर्म कठिनाई से अपनाने योग्य था।
श्लोक 20 (12.276.20)
स्वकर्मभिः संसितानां तपो घोरत्वमागतम् । तं सदाचारमाश्चर्यं पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् ॥
svakarmabhiḥ saṃsitānāṃ tapo ghoratvamāgatam | taṃ sadācāramāścaryaṃ purāṇaṃ śāśvataṃ dhruvam
अपने कर्मों से घिरे हुए उन लोगों के लिए तप कठोर हो गया। वह सदाचार आश्चर्यजनक, पुरातन, शाश्वत और अटल है।
श्लोक 21 (12.276.21)
अशक्नुवद्भिश्चरितुं किंचिद्धर्मेषु सूचितम् । निरापद्धर्म आचारो ह्यप्रमादोऽपराभवः ॥
aśaknuvadbhiścarituṃ kiṃciddharmeṣu sūcitam | nirāpaddharma ācāro hyapramādo'parābhavaḥ
जो कुछ धर्मों का आचरण करने में असमर्थ हैं, उनके लिए यह सूचित किया गया है — ऐसा आचार जो आपद्धर्म पर निर्भर न हो, जिसमें प्रमाद न हो और पराभव न हो।
श्लोक 22 (12.276.22)
सर्ववर्णेषु यत्तेषु नासीत्कश्चिद्व्यतिक्रमः । धर्ममेकं चतुष्पादमाश्रितास्ते नरा विभो ॥
sarvavarṇeṣu yatteṣu nāsītkaścidvyatikramaḥ | dharmamekaṃ catuṣpādamāśritāste narā vibho
उन सब वर्णों में कभी कोई मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता था; हे विभो, वे लोग एक ही चतुष्पाद धर्म के आश्रित थे।
श्लोक 23 (12.276.23)
तं सन्तो विधिवत्प्राप्य गच्छन्ति परमां गतिम् । गृहेभ्य एव निष्क्रम्य वनमन्ये समाश्रिताः ॥
taṃ santo vidhivatprāpya gacchanti paramāṃ gatim | gṛhebhya eva niṣkramya vanamanye samāśritāḥ
सज्जन उसे विधिपूर्वक प्राप्त करके परम गति को जाते हैं। कुछ घर छोड़कर वन में आश्रित हुए;
श्लोक 24 (12.276.24)
गृहमेवाभिसंश्रित्य ततोऽन्ये ब्रह्मचारिणः । व्यस्तमेकं चतुर्धा तु ब्राह्मणा आश्रमं विदुः ॥
gṛhamevābhisaṃśritya tato'nye brahmacāriṇaḥ | vyastamekaṃ caturdhā tu brāhmaṇā āśramaṃ viduḥ
अन्य घर में ही रहकर ब्रह्मचारी बने। ब्राह्मण एक ही आश्रम को चार भागों में बँटा हुआ जानते हैं।
श्लोक 25 (12.276.25)
सर्वे सर्वत्र तिष्ठन्तो गच्छन्ति परमां गतिम् । एत एवंविधाः प्राहुः पुराणा ब्रह्मचारिणः ॥
sarve sarvatra tiṣṭhanto gacchanti paramāṃ gatim | eta evaṃvidhāḥ prāhuḥ purāṇā brahmacāriṇaḥ
सब, जहाँ कहीं भी स्थित हों, परम गति को जाते हैं। कहते हैं, प्राचीन ब्रह्मचारी ऐसे ही थे।
श्लोक 26 (12.276.26)
त एते दिवि दृश्यन्ते ज्योतिर्भूता द्विजातयः । नक्षत्राणीव धिष्ण्येषु बहवस्तारकागणाः । आनन्त्यमुपसंप्राप्ताः संतोषादिति वैदिकम् ॥
ta ete divi dṛśyante jyotirbhūtā dvijātayaḥ | nakṣatrāṇīva dhiṣṇyeṣu bahavastārakāgaṇāḥ | ānantyamupasaṃprāptāḥ saṃtoṣāditi vaidikam
वे द्विज आकाश में ज्योतिर्मय होकर दिखाई देते हैं — अपने-अपने स्थानों में स्थित नक्षत्रों के समान, तारों के बहुत-से समूह; सन्तोष के कारण वे अनन्तता को प्राप्त हुए हैं — ऐसा वेद कहता है।
श्लोक 27 (12.276.27)
यद्यागच्छन्ति संसारं पुनर्योनिषु तादृशाः । न लिप्यन्ते पापकृत्यैः कदाचित्कर्मयोनितः ॥
yadyāgacchanti saṃsāraṃ punaryoniṣu tādṛśāḥ | na lipyante pāpakṛtyaiḥ kadācitkarmayonitaḥ
यदि ऐसे लोग फिर संसार में आकर योनियों में जन्म लेते हैं, तो कर्मयोनि के कारण उत्पन्न होने वाले पापकर्मों से वे कभी लिप्त नहीं होते।
श्लोक 28 (12.276.28)
एवमेव ब्रह्मचारी शुश्रूषुर्घोरनिश्चयः । एवंयुक्तो ब्राह्मणः स्यादन्यो ब्राह्मणको भवेत् ॥
evameva brahmacārī śuśrūṣurghoraniścayaḥ | evaṃyukto brāhmaṇaḥ syādanyo brāhmaṇako bhavet
इसी प्रकार सेवा-परायण और कठोर निश्चयवाला ब्रह्मचारी, इन गुणों से युक्त होने पर ही ब्राह्मण होगा; इनके बिना दूसरा तो नाममात्र का ब्राह्मण होगा।
श्लोक 29 (12.276.29)
कर्मैव पुरुषस्याह शुभं वा यदि वाऽशुभम् । एवं पक्वकषायाणामानन्त्येन श्रुतेन च ॥
karmaiva puruṣasyāha śubhaṃ vā yadi vā'śubham | evaṃ pakvakaṣāyāṇāmānantyena śrutena ca
कहा जाता है कि पुरुष का अपना कर्म ही उसके लिए शुभ या अशुभ होता है। इसी प्रकार जिनके कषाय (दोष) परिपक्व हो चुके हैं, उनके लिए अनन्तता और श्रुत (सुने हुए ज्ञान) के द्वारा भी।
श्लोक 30 (12.276.30)
सर्वमानन्त्यमेवासीदिति नः शाश्वती श्रुतिः । तेषामपेततृष्णानां निर्णिक्तानां शुभात्मनाम् ॥
sarvamānantyamevāsīditi naḥ śāśvatī śrutiḥ | teṣāmapetatṛṣṇānāṃ nirṇiktānāṃ śubhātmanām
"सब कुछ अनन्त ही था" — ऐसी हमारी सनातन श्रुति है — उनके विषय में, जिनकी तृष्णा चली गई है, जो निर्मल और शुद्ध आत्मा वाले हैं।
श्लोक 31 (12.276.31)
चतुर्थ औपनिषदो धर्मः साधारणः स्मृतः । संसिद्धैः सेव्यते नित्यं ब्राह्मणैर्नियतात्मभिः ॥
caturtha aupaniṣado dharmaḥ sādhāraṇaḥ smṛtaḥ | saṃsiddhaiḥ sevyate nityaṃ brāhmaṇairniyatātmabhiḥ
चौथा औपनिषद धर्म है, जिसे सबके लिए सामान्य माना गया है; सिद्ध और संयतचित्त ब्राह्मण उसका निरन्तर सेवन करते हैं।
श्लोक 32 (12.276.32)
संतोषमूलस्त्यागात्मा ज्ञानाधिष्ठानमुच्यते । अपवर्गमतिर्नित्यो यतिधर्मः सनातनः ॥
saṃtoṣamūlastyāgātmā jñānādhiṣṭhānamucyate | apavargamatirnityo yatidharmaḥ sanātanaḥ
सन्तोष उसका मूल है, त्याग उसका स्वरूप है; उसे ज्ञान का आधार कहा जाता है। उसकी मति अपवर्ग (मोक्ष) की ओर रहती है; वह यतियों का नित्य, सनातन धर्म है।
श्लोक 33 (12.276.33)
साधारणः केवलो वा यथाबलमुपास्यते । गच्छन्ते बलिनः क्षेमं दुर्बलोऽत्रावसीदति । ब्राह्मणः पदमन्विच्छन्संसारान्मुच्यते शुचिः ॥
sādhāraṇaḥ kevalo vā yathābalamupāsyate | gacchante balinaḥ kṣemaṃ durbalo'trāvasīdati | brāhmaṇaḥ padamanvicchansaṃsārānmucyate śuciḥ
उसका सेवन अन्य धर्मों के साथ भी किया जाता है और अकेले भी, अपनी शक्ति के अनुसार। बलवान कल्याण को पहुँचते हैं, दुर्बल यहाँ थककर बैठ जाता है। परम पद की इच्छा करने वाला शुद्ध ब्राह्मण संसार से मुक्त हो जाता है।
स्यूमरश्मिरुवाच
श्लोक 34 (12.276.34)
ये भुञ्जते ये ददते यजन्तेऽधीयते च ये । मात्राभिर्धर्मलुब्धाभिर्ये वा त्यागं समाश्रिताः ॥
ye bhuñjate ye dadate yajante'dhīyate ca ye | mātrābhirdharmalubdhābhirye vā tyāgaṃ samāśritāḥ
जो भोगते हैं, जो दान देते हैं, जो यज्ञ करते हैं और जो अध्ययन करते हैं, तथा जो धर्म के लिए उत्सुक अपनी सीमित सामर्थ्य से त्याग का आश्रय ले चुके हैं —
श्लोक 35 (12.276.35)
एतेषां प्रेत्यभावे तु कतमः स्वर्गजित्तमः । एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मन्याथातथ्येन पृच्छतः ॥
eteṣāṃ pretyabhāve tu katamaḥ svargajittamaḥ | etadācakṣva me brahmanyāthātathyena pṛcchataḥ
इनमें से परलोक में कौन स्वर्ग को सबसे अच्छी तरह जीतता है? हे ब्रह्मन्, यह मुझे ठीक-ठीक बताइए; मैं यथार्थ जानने के लिए पूछ रहा हूँ।
कपिल उवाच
श्लोक 36 (12.276.36)
परिग्रहाः शुभाः सर्वे गुणतोऽभ्युदयाश्च ते । न तु त्यागसुखं प्राप्ता एतत्त्वमपि पश्यसि ॥
parigrahāḥ śubhāḥ sarve guṇato'bhyudayāśca te | na tu tyāgasukhaṃ prāptā etattvamapi paśyasi
सब परिग्रह शुभ हैं और अपने गुणों के कारण अभ्युदय देने वाले हैं; परन्तु उन्होंने त्याग का सुख नहीं पाया है। यह तुम भी देखते हो।
स्यूमरश्मिरुवाच
श्लोक 37 (12.276.37)
भवन्तो ज्ञाननिष्ठा वै गृहस्थाः कर्मनिश्चयाः । आश्रमाणां च सर्वेषां निष्ठायामैक्यमुच्यते ॥
bhavanto jñānaniṣṭhā vai gṛhasthāḥ karmaniścayāḥ | āśramāṇāṃ ca sarveṣāṃ niṣṭhāyāmaikyamucyate
आप लोग ज्ञान में निष्ठा रखने वाले हैं और गृहस्थ कर्म के निश्चय वाले; फिर भी कहा जाता है कि सभी आश्रमों की अन्तिम निष्ठा में एकता है।
श्लोक 38 (12.276.38)
एकत्वेन पृथक्त्वेन विशेषो नान्य उच्यते । तद्यथावद्यथान्यायं भगवान्प्रब्रवीतु मे ॥
ekatvena pṛthaktvena viśeṣo nānya ucyate | tadyathāvadyathānyāyaṃ bhagavānprabravītu me
एकत्व और पृथक्त्व के विषय में कोई और भेद नहीं कहा जाता। भगवान् मुझे यह यथार्थ रूप से और न्यायपूर्वक समझाएँ।
कपिल उवाच
श्लोक 39 (12.276.39)
शरीरपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः । पक्वे कषायविज्ञानं यथा ज्ञानं च तिष्ठति ॥
śarīrapaktiḥ karmāṇi jñānaṃ tu paramā gatiḥ | pakve kaṣāyavijñānaṃ yathā jñānaṃ ca tiṣṭhati
कर्म शरीर का परिपाक हैं, परन्तु ज्ञान परम गति है। कषाय (दोष) के परिपक्व हो जाने पर उसका विवेक बना रहता है, और ज्ञान यथोचित रूप में स्थित रहता है।
श्लोक 40 (12.276.40)
आनृशंस्यं क्षमा शान्तिरहिंसा सत्यमार्जवम् । अद्रोहोऽनभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा शमस्तथा ॥
ānṛśaṃsyaṃ kṣamā śāntirahiṃsā satyamārjavam | adroho'nabhimānaśca hrīstitikṣā śamastathā
करुणा (क्रूरता का अभाव), क्षमा, शान्ति, अहिंसा, सत्य, सरलता, द्रोह का अभाव, अभिमान का अभाव, लज्जा, सहनशीलता और इसी प्रकार शम —
श्लोक 41 (12.276.41)
पन्थानो ब्रह्मणस्त्वेत एतैः प्राप्नोति यत्परम् । तद्विद्वाननुबुद्ध्येत मनसा कर्मनिश्चयम् ॥
panthāno brahmaṇastveta etaiḥ prāpnoti yatparam | tadvidvānanubuddhyeta manasā karmaniścayam
ये ही ब्रह्म के मार्ग हैं; इनसे मनुष्य परम को प्राप्त होता है। ज्ञानी को चाहिए कि इसे कर्म के निश्चित मार्ग के रूप में मन से समझे।
श्लोक 42 (12.276.42)
यां विप्राः सर्वतः शान्ता विशुद्धा ज्ञाननिश्चयाः । गतिं गच्छन्ति संतुष्टास्तामाहुः परमां गतिम् ॥
yāṃ viprāḥ sarvataḥ śāntā viśuddhā jñānaniścayāḥ | gatiṃ gacchanti saṃtuṣṭāstāmāhuḥ paramāṃ gatim
जिस गति को सब ओर से शान्त, शुद्ध, ज्ञान में निश्चयवाले और सन्तुष्ट ब्राह्मण प्राप्त करते हैं, उसी को परम गति कहते हैं।
श्लोक 43 (12.276.43)
वेदांश्च वेदितव्यं च विदित्वा च यथास्थितिम् । एवं वेदविदित्याहुरतोऽन्यो वातरेचकः ॥
vedāṃśca veditavyaṃ ca viditvā ca yathāsthitim | evaṃ vedavidityāhurato'nyo vātarecakaḥ
जो वेदों को और जानने योग्य को जानकर उन्हें यथार्थ रूप में जानता है, उसे वेदवेत्ता कहते हैं; इससे भिन्न तो केवल बकवादी (हवा निकालने वाला) है।
श्लोक 44 (12.276.44)
सर्वं विदुर्वेदविदो वेदे सर्वं प्रतिष्ठितम् । वेदे हि निष्ठा सर्वस्य यद्यदस्ति च नास्ति च ॥
sarvaṃ vidurvedavido vede sarvaṃ pratiṣṭhitam | vede hi niṣṭhā sarvasya yadyadasti ca nāsti ca
वेद को जानने वाले सब कुछ जानते हैं; सब कुछ वेद में प्रतिष्ठित है। वेद ही सबकी अन्तिम निष्ठा है — जो कुछ है और जो कुछ नहीं है, उस सबकी।
श्लोक 45 (12.276.45)
एषैव निष्ठा सर्वत्र यत्तदस्ति च नास्ति च । एतदन्तं च मध्यं च सच्चाऽसच्च विजानतः ॥
eṣaiva niṣṭhā sarvatra yattadasti ca nāsti ca | etadantaṃ ca madhyaṃ ca saccā'sacca vijānataḥ
यही सर्वत्र अन्तिम आधार है — जो है और जो नहीं है, उसका। सत् और असत् को जानने वाले के लिए यही अन्त है और यही मध्य।
श्लोक 46 (12.276.46)
समाप्तं त्याग इत्येव शम इत्येव निश्चितम् । संतोष इत्यनुगतमपवर्गे प्रतिष्ठितम् ॥
samāptaṃ tyāga ityeva śama ityeva niścitam | saṃtoṣa ityanugatamapavarge pratiṣṭhitam
यह निश्चित है कि यह सब त्याग ही है, शम ही है; सन्तोष उसके साथ चलता है, और वह अपवर्ग (मोक्ष) में प्रतिष्ठित है।
श्लोक 47 (12.276.47)
ऋतं सत्यं विदितं वेदितव्यं । सर्वस्यात्मा स्थावरं जङ्गमं च । सर्वं सुखं यच्छिवमुत्तरं च । ब्रह्माव्यक्तं प्रभवश्चाव्ययं च ॥
ṛtaṃ satyaṃ viditaṃ veditavyaṃ | sarvasyātmā sthāvaraṃ jaṅgamaṃ ca | sarvaṃ sukhaṃ yacchivamuttaraṃ ca | brahmāvyaktaṃ prabhavaścāvyayaṃ ca
ऋत, सत्य, जो जाना हुआ है और जो जानने योग्य है; सबका आत्मा, चर और अचर; समस्त सुख, जो शिव (कल्याणकारी) है और जो उससे भी उत्तम है; अव्यक्त ब्रह्म, उत्पत्ति का मूल और अविनाशी —
श्लोक 48 (12.276.48)
तेजः क्षमा शान्तिरनामयं शुभं । तथाविधं व्योम सनातनं ध्रुवम् । एतैः शब्दैर्गम्यते बुद्धिनेत्रै । स्तस्मै नमो ब्रह्मणे ब्राह्मणाय ॥
tejaḥ kṣamā śāntiranāmayaṃ śubhaṃ | tathāvidhaṃ vyoma sanātanaṃ dhruvam | etaiḥ śabdairgamyate buddhinetrai | stasmai namo brahmaṇe brāhmaṇāya
तेज, क्षमा, शान्ति, आरोग्य, शुभ; तथा सनातन और अटल आकाश — इन शब्दों से बुद्धि के नेत्रों द्वारा उस तक पहुँचा जाता है। उस ब्रह्म को, उस ब्राह्मण को नमस्कार।