शान्ति पर्व · अध्याय 277
कुण्डधार और धन चाहने वाला ब्राह्मण
युधिष्ठिर पूछते हैं कि धर्म, अर्थ और काम में किसे पाना सबसे श्रेष्ठ है, और भीष्म एक पुरानी कथा से उत्तर देते हैं। एक निर्धन ब्राह्मण धन के लिए देवताओं की व्यर्थ पूजा करने के बाद यक्ष मणिभद्र के अनुचर, मेघरूप कुण्डधार की सेवा करता है। उसकी भक्ति से द्रवित कुण्डधार प्रार्थना करता है कि ब्राह्मण को धन के बदले धर्म दिया जाए। वन में ब्राह्मण तप करके दिव्य दृष्टि पाता है, नरक में डूबे राजाओं को और स्वर्ग का द्वार रोकने वाली शक्तियों को देखता है, कुण्डधार से मेल करता है और फिर लोकों में विचरण करता है। भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि देवता धर्मात्माओं का आदर करते हैं, धनवानों का नहीं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.277.1)
धर्ममर्थं च कामं च वेदाः शंसन्ति भारत । कस्य लाभो विशिष्टोऽत्र तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
dharmamarthaṃ ca kāmaṃ ca vedāḥ śaṃsanti bhārata | kasya lābho viśiṣṭo'tra tanme brūhi pitāmaha
हे भारत, वेद धर्म, अर्थ और काम की प्रशंसा करते हैं। इनमें से किसका लाभ सबसे श्रेष्ठ है? हे पितामह, यह मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.277.2)
अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् । कुण्डधारेण यत्प्रीत्या भक्तायोपकृतं पुरा ॥
atra te vartayiṣyāmi itihāsaṃ purātanam | kuṇḍadhāreṇa yatprītyā bhaktāyopakṛtaṃ purā
इस विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा — कुण्डधार ने प्रेमवश एक बार अपने भक्त का जो उपकार किया था।
श्लोक 3 (12.277.3)
अधनो ब्राह्मणः कश्चित्कामाद्धनमवैक्षत । यज्ञार्थं सततोऽर्थार्थी तपोऽतप्यत दारुणम् ॥
adhano brāhmaṇaḥ kaścitkāmāddhanamavaikṣata | yajñārthaṃ satato'rthārthī tapo'tapyata dāruṇam
कोई एक निर्धन ब्राह्मण था, जिसने कामना के वश धन की ओर दृष्टि की; यज्ञ के लिए निरन्तर धन चाहता हुआ वह घोर तप करने लगा।
श्लोक 4 (12.277.4)
स निश्चयमथो कृत्वा पूजयामास देवताः । भक्त्या न चैवाध्यगच्छद्धनं संपूज्य देवताः ॥
sa niścayamatho kṛtvā pūjayāmāsa devatāḥ | bhaktyā na caivādhyagacchaddhanaṃ saṃpūjya devatāḥ
निश्चय करके उसने देवताओं की पूजा की; परन्तु भक्ति से देवताओं का पूजन करने पर भी उसे धन नहीं मिला।
श्लोक 5 (12.277.5)
ततश्चिन्तामनुप्राप्तः कतमद्दैवतं तु तत् । यन्मे द्रुतं प्रसीदेत मानुषैरजडीकृतम् ॥
tataścintāmanuprāptaḥ katamaddaivataṃ tu tat | yanme drutaṃ prasīdeta mānuṣairajaḍīkṛtam
तब वह चिन्ता में पड़ गया — "वह कौन-सा देवता है जो मुझ पर शीघ्र प्रसन्न होगा और जिसे मनुष्यों ने जड़ नहीं बना दिया है?"
श्लोक 6 (12.277.6)
सोऽथ सौम्येन मनसा देवानुचरमन्तिके । प्रत्यपश्यज्जलधरं कुण्डधारमवस्थितम् ॥
so'tha saumyena manasā devānucaramantike | pratyapaśyajjaladharaṃ kuṇḍadhāramavasthitam
तब उसने शान्त मन से अपने समीप देवताओं के अनुचर, मेघरूप कुण्डधार को खड़ा देखा।
श्लोक 7 (12.277.7)
दृष्ट्वैव तं महाबाहुं तस्य भक्तिरजायत । अयं मे धास्यति श्रेयो वपुरेतद्धि तादृशम् ॥
dṛṣṭvaiva taṃ mahābāhuṃ tasya bhaktirajāyata | ayaṃ me dhāsyati śreyo vapuretaddhi tādṛśam
उस महाबाहु को देखते ही उसके मन में भक्ति उत्पन्न हुई — "यह मुझे कल्याण देगा; इसका स्वरूप ही ऐसा है।"
श्लोक 8 (12.277.8)
संनिकृष्टश्च देवस्य न चान्यैर्मानुषैर्वृतः । एष मे दास्यति धनं प्रभूतं शीघ्रमेव च ॥
saṃnikṛṣṭaśca devasya na cānyairmānuṣairvṛtaḥ | eṣa me dāsyati dhanaṃ prabhūtaṃ śīghrameva ca
"यह देवता के निकट है और अन्य मनुष्यों से घिरा नहीं है। यह मुझे बहुत-सा धन देगा, और शीघ्र ही।"
श्लोक 9 (12.277.9)
ततो धूपैश्च गन्धैश्च माल्यैरुच्चावचैरपि । बलिभिर्विविधाभिश्च पूजयामास तं द्विजः ॥
tato dhūpaiśca gandhaiśca mālyairuccāvacairapi | balibhirvividhābhiśca pūjayāmāsa taṃ dvijaḥ
तब उस ब्राह्मण ने धूप, गन्ध, नाना प्रकार की मालाओं और भाँति-भाँति की बलियों से उसकी पूजा की।
श्लोक 10 (12.277.10)
ततस्त्वल्पेन कालेन तुष्टो जलधरस्तदा । तस्योपकारनियतामिमां वाचमुवाच ह ॥
tatastvalpena kālena tuṣṭo jaladharastadā | tasyopakāraniyatāmimāṃ vācamuvāca ha
थोड़े ही समय में मेघरूप कुण्डधार प्रसन्न हुआ और उसकी सेवा का प्रतिकार करने में तत्पर होकर उसने ये वचन कहे।
कुण्डधार उवाच
श्लोक 11 (12.277.11)
ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चोरे भग्नव्रते तथा । निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥
brahmaghne ca surāpe ca core bhagnavrate tathā | niṣkṛtirvihitā sadbhiḥ kṛtaghne nāsti niṣkṛtiḥ
ब्रह्महत्यारे, मद्यप, चोर और व्रतभंग करने वाले के लिए सज्जनों ने प्रायश्चित्त का विधान किया है; कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है।
श्लोक 12 (12.277.12)
आशायास्तनयोऽधर्मः क्रोधोऽसूयासुतः स्मृतः । लोभः पुत्रो निकृत्यास्तु कृतघ्नो नार्हति प्रजां ॥
āśāyāstanayo'dharmaḥ krodho'sūyāsutaḥ smṛtaḥ | lobhaḥ putro nikṛtyāstu kṛtaghno nārhati prajāṃ
अधर्म आशा का पुत्र है; क्रोध असूया का पुत्र कहा गया है; लोभ निकृति (छल) का पुत्र है; कृतघ्न सन्तान के योग्य नहीं होता।
भीष्म उवाच
श्लोक 13 (12.277.13)
ततः स ब्राह्मणः स्वप्ने कुण्डधारस्य तेजसा । अपश्यत्सर्वभूतानि कुशेषु शयितस्तदा ॥
tataḥ sa brāhmaṇaḥ svapne kuṇḍadhārasya tejasā | apaśyatsarvabhūtāni kuśeṣu śayitastadā
तब कुशों पर सोये हुए उस ब्राह्मण ने स्वप्न में कुण्डधार के तेज से समस्त प्राणियों को देखा।
श्लोक 14 (12.277.14)
शमेन तपसा चैव भक्त्या च निरुपस्कृतः । शुद्धात्मा ब्राह्मणो रात्रौ निदर्शनमपश्यत ॥
śamena tapasā caiva bhaktyā ca nirupaskṛtaḥ | śuddhātmā brāhmaṇo rātrau nidarśanamapaśyata
शम, तप और भक्ति से भोगों से रहित और शुद्ध आत्मा वाले उस ब्राह्मण ने रात में एक दृश्य देखा।
श्लोक 15 (12.277.15)
मणिभद्रं स तत्रस्थं देवतानां महाद्युतिम् । अपश्यत महात्मानं व्यादिशन्तं युधिष्ठिर ॥
maṇibhadraṃ sa tatrasthaṃ devatānāṃ mahādyutim | apaśyata mahātmānaṃ vyādiśantaṃ yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर, उसने वहाँ देवताओं के बीच स्थित महातेजस्वी महात्मा मणिभद्र को आदेश देते हुए देखा।
श्लोक 16 (12.277.16)
तत्र देवाः प्रयच्छन्ति राज्यानि च धनानि च । शुभैः कर्मभिरारब्धाः प्रच्छिदन्त्यशुभेषु च ॥
tatra devāḥ prayacchanti rājyāni ca dhanāni ca | śubhaiḥ karmabhirārabdhāḥ pracchidantyaśubheṣu ca
वहाँ देवता शुभ कर्मों से आरम्भ करने वालों को राज्य और धन देते हैं, और अशुभ कर्म आने पर उन्हें फिर छीन लेते हैं।
श्लोक 17 (12.277.17)
पश्यतामथ यक्षाणां कुण्डधारो महाद्युतिः । निष्पत्य पतितो भूमौ देवानां भरतर्षभ ॥
paśyatāmatha yakṣāṇāṃ kuṇḍadhāro mahādyutiḥ | niṣpatya patito bhūmau devānāṃ bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, यक्षों के देखते-देखते महातेजस्वी कुण्डधार निकलकर देवताओं के सामने भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 18 (12.277.18)
ततस्तु देववचनान्मणिभद्रो महामनाः । उवाच पतितं भूमौ कुण्डधार किमिच्छसि ॥
tatastu devavacanānmaṇibhadro mahāmanāḥ | uvāca patitaṃ bhūmau kuṇḍadhāra kimicchasi
तब देवताओं की आज्ञा से उदार मन वाले मणिभद्र ने भूमि पर पड़े कुण्डधार से कहा — "कुण्डधार, तुम क्या चाहते हो?"
कुण्डधार उवाच
श्लोक 19 (12.277.19)
यदि प्रसन्ना देवा मे भक्तोऽयं ब्राह्मणो मम । अस्यानुग्रहमिच्छामि कृतं किंचित्सुखोदयम् ॥
yadi prasannā devā me bhakto'yaṃ brāhmaṇo mama | asyānugrahamicchāmi kṛtaṃ kiṃcitsukhodayam
"यदि देवता मुझ पर प्रसन्न हैं, तो यह ब्राह्मण मेरा भक्त है। मैं इस पर कोई ऐसा अनुग्रह करना चाहता हूँ, जिससे कुछ सुख उत्पन्न हो।"
भीष्म उवाच
श्लोक 20 (12.277.20)
ततस्तं मणिभद्रस्तु पुनर्वचनमब्रवीत् । देवानामेव वचनात्कुण्डधारं महाद्युतिम् ॥
tatastaṃ maṇibhadrastu punarvacanamabravīt | devānāmeva vacanātkuṇḍadhāraṃ mahādyutim
तब मणिभद्र ने देवताओं के ही वचन से उस महातेजस्वी कुण्डधार से फिर कहा।
मणिभद्र उवाच
श्लोक 21 (12.277.21)
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते कृतकृत्यः सुखी भव । धनार्थी यदि विप्रोऽयं धनमस्मै प्रदीयताम् ॥
uttiṣṭhottiṣṭha bhadraṃ te kṛtakṛtyaḥ sukhī bhava | dhanārthī yadi vipro'yaṃ dhanamasmai pradīyatām
"उठो, उठो! तुम्हारा कल्याण हो। तुम कृतकार्य हो, सुखी होओ। यदि यह ब्राह्मण धन चाहता है, तो इसे धन दिया जाए।"
श्लोक 22 (12.277.22)
यावद्धनं प्रार्थयते ब्राह्मणोऽयं सखा तव । देवानां शासनात्तावदसङ्ख्येयं ददाम्यहम् ॥
yāvaddhanaṃ prārthayate brāhmaṇo'yaṃ sakhā tava | devānāṃ śāsanāttāvadasaṅkhyeyaṃ dadāmyaham
"यह ब्राह्मण तुम्हारा मित्र है; यह जितना धन माँगेगा, देवताओं की आज्ञा से उतना ही — असंख्य — मैं इसे दूँगा।"
भीष्म उवाच
श्लोक 23 (12.277.23)
विचार्य कुण्डधारस्तु मानुष्यं चलमध्रुवम् । तपसो मतिमाधत्त ब्राह्मणस्य यशस्विनः ॥
vicārya kuṇḍadhārastu mānuṣyaṃ calamadhruvam | tapaso matimādhatta brāhmaṇasya yaśasvinaḥ
परन्तु कुण्डधार ने यह विचारकर कि मनुष्य-जीवन चंचल और अनित्य है, उस यशस्वी ब्राह्मण की बुद्धि को तप की ओर लगा दिया।
कुण्डधार उवाच
श्लोक 24 (12.277.24)
नाहं धनानि याचामि ब्राह्मणाय धनप्रद । अन्यमेवाहमिच्छामि भक्तायानुग्रहं कृतम् ॥
nāhaṃ dhanāni yācāmi brāhmaṇāya dhanaprada | anyamevāhamicchāmi bhaktāyānugrahaṃ kṛtam
"हे धनप्रद, मैं ब्राह्मण के लिए धन नहीं माँगता। मैं अपने भक्त के लिए कोई दूसरा अनुग्रह चाहता हूँ।"
श्लोक 25 (12.277.25)
पृथिवीं रत्नपूर्णां वा महद्वा रत्नसंचयम् । भक्ताय नाहमिच्छामि भवेदेष तु धार्मिकः ॥
pṛthivīṃ ratnapūrṇāṃ vā mahadvā ratnasaṃcayam | bhaktāya nāhamicchāmi bhavedeṣa tu dhārmikaḥ
"मैं अपने भक्त के लिए रत्नों से भरी पृथ्वी या रत्नों की विशाल राशि नहीं चाहता; वह धार्मिक हो जाए।"
श्लोक 26 (12.277.26)
धर्मेऽस्य रमतां बुद्धिर्धर्मं चैवोपजीवतु । धर्मप्रधानो भवतु ममैषोऽनुग्रहो मतः ॥
dharme'sya ramatāṃ buddhirdharmaṃ caivopajīvatu | dharmapradhāno bhavatu mamaiṣo'nugraho mataḥ
"उसकी बुद्धि धर्म में रमे और वह धर्म से ही जीवन चलाए। वह धर्म को प्रधान माने — यही मेरा अभीष्ट अनुग्रह है।"
मणिभद्र उवाच
श्लोक 27 (12.277.27)
सदा धर्मफलं राज्यं सुखानि विविधानि च । फलान्येवायमश्नातु कायक्लेशविवर्जितः ॥
sadā dharmaphalaṃ rājyaṃ sukhāni vividhāni ca | phalānyevāyamaśnātu kāyakleśavivarjitaḥ
"राज्य सदा धर्म का फल है, और नाना प्रकार के सुख भी; वह शारीरिक क्लेश से रहित होकर केवल उन फलों का भोग करे।"
भीष्म उवाच
श्लोक 28 (12.277.28)
ततस्तदेव बहुशः कुण्डधारो महायशाः । अभ्यासमकरोद्धर्मे ततस्तुष्टास्तु देवताः ॥
tatastadeva bahuśaḥ kuṇḍadhāro mahāyaśāḥ | abhyāsamakaroddharme tatastuṣṭāstu devatāḥ
तब महायशस्वी कुण्डधार ने उसी बात का धर्म में बार-बार अभ्यास किया, और देवता प्रसन्न हुए।
मणिभद्र उवाच
श्लोक 29 (12.277.29)
प्रीतास्ते देवताः सर्वा द्विजस्यास्य तथैव च । भविष्यत्येष धर्मात्मा धर्मे चाधास्यते मतिः ॥
prītāste devatāḥ sarvā dvijasyāsya tathaiva ca | bhaviṣyatyeṣa dharmātmā dharme cādhāsyate matiḥ
"वे सब देवता प्रसन्न हैं, और इस द्विज पर भी उसी प्रकार। यह धर्मात्मा होगा और इसकी बुद्धि धर्म में स्थिर रहेगी।"
भीष्म उवाच
श्लोक 30 (12.277.30)
ततः प्रीतो जलधरः कृतकार्यो युधिष्ठिर । ईप्सितं मनसो लब्ध्वा वरमन्यैः सुदुर्लभम् ॥
tataḥ prīto jaladharaḥ kṛtakāryo yudhiṣṭhira | īpsitaṃ manaso labdhvā varamanyaiḥ sudurlabham
तब हे युधिष्ठिर, मेघरूप कुण्डधार प्रसन्न और कृतकार्य हुआ; उसने मन का अभीष्ट पा लिया, ऐसा वर जो दूसरों के लिए अत्यन्त दुर्लभ है।
श्लोक 31 (12.277.31)
ततोऽपश्यत चीराणि सूक्ष्माणि द्विजसत्तमः । पार्श्वतोऽभ्याशतो न्यस्तान्यथ निर्वेदमागतः ॥
tato'paśyata cīrāṇi sūkṣmāṇi dvijasattamaḥ | pārśvato'bhyāśato nyastānyatha nirvedamāgataḥ
तब उस द्विजश्रेष्ठ ने अपने निकट पास ही रखे हुए पतले चीर देखे और उसे वैराग्य (निर्वेद) हो गया।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 32 (12.277.32)
अयं न सुकृतं वेत्ति को न्वन्यो वेत्स्यते कृतम् । गच्छामि वनमेवाहं परं धर्मेण जीवितुम् ॥
ayaṃ na sukṛtaṃ vetti ko nvanyo vetsyate kṛtam | gacchāmi vanamevāhaṃ paraṃ dharmeṇa jīvitum
"यह सुकृत को नहीं जानता; तब दूसरा कौन मेरे किये को जानेगा? मैं वन में ही जाता हूँ, धर्म से जीवन बिताने के लिए।"
भीष्म उवाच
श्लोक 33 (12.277.33)
निर्वेदाद्देवतानां च प्रसादात्स द्विजोत्तमः । वनं प्रविश्य सुमहत्तप आरब्धवांस्तदा ॥
nirvedāddevatānāṃ ca prasādātsa dvijottamaḥ | vanaṃ praviśya sumahattapa ārabdhavāṃstadā
निर्वेद से और देवताओं की कृपा से वह द्विजश्रेष्ठ वन में प्रवेश करके तब अत्यन्त महान् तप करने लगा।
श्लोक 34 (12.277.34)
देवतातिथिशेषेण फलमूलाशनो द्विजः । धर्मे चास्य महाराज दृढा बुद्धिरजायत ॥
devatātithiśeṣeṇa phalamūlāśano dvijaḥ | dharme cāsya mahārāja dṛḍhā buddhirajāyata
देवताओं और अतिथियों से बचे हुए फल-मूल खाने वाले उस द्विज के मन में, हे महाराज, धर्म के विषय में दृढ़ निश्चय उत्पन्न हुआ।
श्लोक 35 (12.277.35)
त्यक्त्वा मूलफलं सर्वं पर्णाहारोऽभवद्द्विजः । पर्णं त्यक्त्वा जलाहारः पुनरासीद्द्विजस्तदा ॥
tyaktvā mūlaphalaṃ sarvaṃ parṇāhāro'bhavaddvijaḥ | parṇaṃ tyaktvā jalāhāraḥ punarāsīddvijastadā
सब फल-मूल छोड़कर वह द्विज पत्तों पर रहने लगा; पत्ते छोड़कर वह फिर जल पर ही रहने लगा।
श्लोक 36 (12.277.36)
वायुभक्षस्ततः पश्चाद्बहून्वर्षगणानभूत् । न चास्य क्षीयते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
vāyubhakṣastataḥ paścādbahūnvarṣagaṇānabhūt | na cāsya kṣīyate prāṇastadadbhutamivābhavat
उसके बाद वह बहुत वर्षों तक वायु पर रहा; फिर भी उसके प्राण क्षीण नहीं हुए, यह मानो एक आश्चर्य था।
श्लोक 37 (12.277.37)
धर्मे च श्रद्दधानस्य तपस्युग्रे च वर्ततः । कालेन महता तस्य दिव्या दृष्टिरजायत ॥
dharme ca śraddadhānasya tapasyugre ca vartataḥ | kālena mahatā tasya divyā dṛṣṭirajāyata
धर्म में श्रद्धा रखने वाले और उग्र तप में लगे हुए उसको बहुत समय बाद दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई।
श्लोक 38 (12.277.38)
तस्य बुद्धिः प्रादुरासीद्यदि दद्यामहं धनम् । तुष्टः कस्यचिदेवेह मिथ्या वाङ्न भवेन्मम ॥
tasya buddhiḥ prādurāsīdyadi dadyāmahaṃ dhanam | tuṣṭaḥ kasyacideveha mithyā vāṅna bhavenmama
उसके मन में विचार उठा — "यदि मैं यहाँ किसी पर प्रसन्न होकर धन दूँ, तो मेरी वाणी मिथ्या नहीं होगी।"
श्लोक 39 (12.277.39)
ततः प्रहृष्टवदनो भूय आरब्धवांस्तपः । भूयश्चाचिन्तयत्सिद्धो यत्परं सोऽभिमन्यते ॥
tataḥ prahṛṣṭavadano bhūya ārabdhavāṃstapaḥ | bhūyaścācintayatsiddho yatparaṃ so'bhimanyate
तब प्रसन्न मुख होकर उसने फिर तप आरम्भ किया; और फिर सिद्ध होकर उसने जो परम माना, उसका चिन्तन किया।
श्लोक 40 (12.277.40)
यदि दद्यामहं राज्यं तुष्टो वै यस्य कस्यचित् । स भवेदचिराद्राजा न मिथ्या वाग्भवेन्मम ॥
yadi dadyāmahaṃ rājyaṃ tuṣṭo vai yasya kasyacit | sa bhavedacirādrājā na mithyā vāgbhavenmama
"यदि मैं किसी पर भी प्रसन्न होकर राज्य दूँ, तो वह शीघ्र ही राजा हो जाएगा; मेरी वाणी मिथ्या नहीं होगी।"
श्लोक 41 (12.277.41)
तस्य साक्षात्कुण्डधारो दर्शयामास भारत । ब्राह्मणस्य तपोयोगात्सौहृदेनाभिचोदितः ॥
tasya sākṣātkuṇḍadhāro darśayāmāsa bhārata | brāhmaṇasya tapoyogātsauhṛdenābhicoditaḥ
हे भारत, ब्राह्मण के तप के योग से और मित्रभाव से प्रेरित होकर कुण्डधार ने उसे साक्षात् दर्शन दिया।
श्लोक 42 (12.277.42)
समागम्य स तेनाथ पूजां चक्रे यथाविधि । ब्राह्मणः कुण्डधारस्य विस्मितश्चाभवन्नृप ॥
samāgamya sa tenātha pūjāṃ cakre yathāvidhi | brāhmaṇaḥ kuṇḍadhārasya vismitaścābhavannṛpa
हे राजन्, उस ब्राह्मण ने उससे मिलकर विधिपूर्वक कुण्डधार की पूजा की और वह विस्मित हुआ।
श्लोक 43 (12.277.43)
ततोऽब्रवीत्कुण्डधारो दिव्यं ते चक्षुरुत्तमम् । पश्य राज्ञां गतिं विप्र लोकांश्चैव तु चक्षुषा ॥
tato'bravītkuṇḍadhāro divyaṃ te cakṣuruttamam | paśya rājñāṃ gatiṃ vipra lokāṃścaiva tu cakṣuṣā
तब कुण्डधार ने कहा — "तुम्हारा नेत्र दिव्य और उत्तम है; हे विप्र, उससे राजाओं की गति और लोकों को भी देखो।"
श्लोक 44 (12.277.44)
ततो राजसहस्राणि मग्नानि निरये तदा । दूरादपश्यद्विप्रः स दिव्ययुक्तेन चक्षुषा ॥
tato rājasahasrāṇi magnāni niraye tadā | dūrādapaśyadvipraḥ sa divyayuktena cakṣuṣā
तब उस विप्र ने दूर से दिव्य दृष्टि से हज़ारों राजाओं को नरक में डूबे हुए देखा।
कुण्डधार उवाच
श्लोक 45 (12.277.45)
मां पूजयित्वा भावेन यदि त्वं दुःखमाप्नुयाः । कृतं मया भवेत्किं ते कश्च तेऽनुग्रहो भवेत् ॥
māṃ pūjayitvā bhāvena yadi tvaṃ duḥkhamāpnuyāḥ | kṛtaṃ mayā bhavetkiṃ te kaśca te'nugraho bhavet
"यदि मेरी भक्तिपूर्वक पूजा करके तुम दुःख पाते, तो मैंने तुम्हारे लिए क्या किया होता, और तुम्हारे लिए वह कौन-सा अनुग्रह होता?"
श्लोक 46 (12.277.46)
पश्यपश्य च भूयस्त्वं कामानिच्छेत्कथं नरः । स्वर्गद्वारं हि संरुद्धं मानुषेषु विशेषतः ॥
paśyapaśya ca bhūyastvaṃ kāmānicchetkathaṃ naraḥ | svargadvāraṃ hi saṃruddhaṃ mānuṣeṣu viśeṣataḥ
"देखो, फिर देखो — मनुष्य कामनाओं की इच्छा कैसे करे? स्वर्ग का द्वार बन्द है, और मनुष्यों के लिए विशेष रूप से।"
भीष्म उवाच
श्लोक 47 (12.277.47)
ततोऽपश्यत्स कामं च क्रोधं लोभं भयं मदम् । निद्रां तन्द्रीं तथाऽऽलस्यमावृत्त्य पुरुषान्स्थितान् ॥
tato'paśyatsa kāmaṃ ca krodhaṃ lobhaṃ bhayaṃ madam | nidrāṃ tandrīṃ tathā''lasyamāvṛttya puruṣānsthitān
तब उसने काम, क्रोध, लोभ, भय, मद, निद्रा, तन्द्रा और आलस्य को पुरुषों को घेरकर खड़े हुए देखा।
कुण्डधार उवाच
श्लोक 48 (12.277.48)
एतैर्लोकाः सुसंरुद्धा देवानां मानुषाद्भयम् । तथैव देववचनाद्विघ्नं कुर्वन्ति सर्वशः ॥
etairlokāḥ susaṃruddhā devānāṃ mānuṣādbhayam | tathaiva devavacanādvighnaṃ kurvanti sarvaśaḥ
"इन्हीं से लोक भली-भाँति बन्द हैं। देवताओं को मनुष्य से भय है, और इसीलिए देवताओं के वचन से ये सब ओर विघ्न डालते हैं।"
श्लोक 49 (12.277.49)
न देवैरननुज्ञातः कश्चिद्भवति धार्मिकः । एष शक्तोऽस्मि तपसा दातुं राज्यं धनानि च ॥
na devairananujñātaḥ kaścidbhavati dhārmikaḥ | eṣa śakto'smi tapasā dātuṃ rājyaṃ dhanāni ca
"देवताओं की अनुमति के बिना कोई धार्मिक नहीं होता। मैं यहाँ तप के बल से राज्य और धन देने में समर्थ हूँ।"
भीष्म उवाच
श्लोक 50 (12.277.50)
ततः पपात शिरसा ब्राह्मणस्तोयधारिणे । उवाच चैनं धर्मात्मा महान्मेऽनुग्रहः कृतः ॥
tataḥ papāta śirasā brāhmaṇastoyadhāriṇe | uvāca cainaṃ dharmātmā mahānme'nugrahaḥ kṛtaḥ
तब उस धर्मात्मा ब्राह्मण ने मेघरूप कुण्डधार के सामने सिर झुकाया और उससे कहा — "मुझ पर बड़ा अनुग्रह किया गया है।"
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 51 (12.277.51)
कामलोभानुबन्धेन पुरा ते यदसूयितम् । मया स्नेहमविज्ञाय तत्र मे क्षन्तुमर्हसि ॥
kāmalobhānubandhena purā te yadasūyitam | mayā snehamavijñāya tatra me kṣantumarhasi
"काम और लोभ के वश होकर मैंने पहले आपके प्रति असूया की थी; आपका स्नेह न जानकर ऐसा किया। उसके लिए आप मुझे क्षमा करें।"
भीष्म उवाच
श्लोक 52 (12.277.52)
क्षान्तमेव मयेत्युक्त्वा कुण्डधारो द्विजर्षभम् । संपरिष्वज्य बाहुभ्यां तत्रैवान्तरधीयत ॥
kṣāntameva mayetyuktvā kuṇḍadhāro dvijarṣabham | saṃpariṣvajya bāhubhyāṃ tatraivāntaradhīyata
"क्षमा किया" — ऐसा कहकर कुण्डधार ने उस द्विजश्रेष्ठ को बाँहों में भरकर गले लगाया और वहीं अन्तर्धान हो गया।
श्लोक 53 (12.277.53)
ततः सर्वांस्तदा लोकान्ब्राह्मणोऽनुचचार ह । कुण्डधारप्रसादेन तपसा सिद्धिमागतः ॥
tataḥ sarvāṃstadā lokānbrāhmaṇo'nucacāra ha | kuṇḍadhāraprasādena tapasā siddhimāgataḥ
तब वह ब्राह्मण कुण्डधार की कृपा और अपने तप से सिद्धि पाकर सब लोकों में विचरने लगा।
श्लोक 54 (12.277.54)
विहायसा च गमनं तथा संकल्पितार्थता । धर्माच्छक्त्या तथा योगाद्या चैव परमा गतिः ॥
vihāyasā ca gamanaṃ tathā saṃkalpitārthatā | dharmācchaktyā tathā yogādyā caiva paramā gatiḥ
आकाश में गमन, संकल्प की सिद्धि, धर्म से शक्ति, योग से सामर्थ्य, और जो परम गति है — वह सब उसे प्राप्त हुआ।
श्लोक 55 (12.277.55)
देवता ब्राह्मणाः सन्तो यक्षा मानुषचारणाः । धार्मिकान्पूजयन्तीह न धनाढ्यान्न कामिनः ॥
devatā brāhmaṇāḥ santo yakṣā mānuṣacāraṇāḥ | dhārmikānpūjayantīha na dhanāḍhyānna kāminaḥ
देवता, ब्राह्मण, सज्जन, यक्ष, मनुष्य और चारण यहाँ धर्मात्माओं का आदर करते हैं — धनवानों का नहीं और कामियों का नहीं।
श्लोक 56 (12.277.56)
सुप्रसन्ना हि ते देवा यत्ते धर्मे रता मतिः । धने सुखकला काचिद्धर्मे तु परमं सुखम् ॥
suprasannā hi te devā yatte dharme ratā matiḥ | dhane sukhakalā kāciddharme tu paramaṃ sukham
वे देवता तुम पर बहुत प्रसन्न हैं, क्योंकि तुम्हारी बुद्धि धर्म में रमती है। धन में सुख का कोई छोटा-सा अंश है; धर्म में परम सुख है।