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शान्ति पर्व · अध्याय 279

मनुष्य पापी कैसे बनता है, और धर्म तथा मोक्ष की ओर कैसे मुड़ता है

युधिष्ठिर पूछते हैं कि मनुष्य पापी कैसे बनता है, धर्म का आचरण कैसे करता है, और निर्वेद को अपनाकर मोक्ष कैसे पाता है। भीष्म पाप का मूल राग-द्वेष और लोभ-मोह में बताते हैं, जिनसे घिरा मनुष्य धर्म को केवल बहाने के रूप में करता है और पाप की ओर बढ़ता जाता है। जो इन दोषों को पहले ही देख लेता है, सज्जनों का साथ करता है और धर्म का फल भोगकर भी तृप्त नहीं होता, वह कामना से विरक्त होकर त्याग करता है और धीरे-धीरे मोक्ष पाता है।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.279.1)

कथं भवति पापात्मा कथं धर्मं करोति वा । केन निर्वेदमादत्ते मोक्षं वा केन गच्छति ॥

kathaṃ bhavati pāpātmā kathaṃ dharmaṃ karoti vā | kena nirvedamādatte mokṣaṃ vā kena gacchati

“मनुष्य पापी कैसे बनता है और धर्म का आचरण कैसे करता है? वह किस उपाय से निर्वेद (वैराग्य) को अपनाता है और किस उपाय से मोक्ष को प्राप्त होता है?”

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.279.2)

विदिताः सर्वधर्मास्ते स्थित्यर्थमनुपृच्छसि । शृणु मोक्षं सनिर्वेदं पापं धर्मं च मूलतः ॥

viditāḥ sarvadharmāste sthityarthamanupṛcchasi | śṛṇu mokṣaṃ sanirvedaṃ pāpaṃ dharmaṃ ca mūlataḥ

“तुम्हें सब धर्म ज्ञात हैं; तुम केवल उन्हें दृढ़ करने के लिए पूछ रहे हो। मोक्ष और निर्वेद के साथ-साथ पाप और धर्म का वर्णन जड़ से सुनो।

श्लोक 3 (12.279.3)

विज्ञानार्थं हि पञ्चानामिच्छापूर्वं प्रवर्तते । प्राप्यतां वर्तते कामो द्वेषो वा भरतर्षभ ॥

vijñānārthaṃ hi pañcānāmicchāpūrvaṃ pravartate | prāpyatāṃ vartate kāmo dveṣo vā bharatarṣabha

पाँचों इन्द्रियों के विषयों को जानने के लिए पहले इच्छा उठती है; और हे भरतश्रेष्ठ, जो प्राप्त हो सकता है उसके प्रति राग या द्वेष उत्पन्न होता है।

श्लोक 4 (12.279.4)

ततस्तदर्थं यतते कर्म चारभते महत् । इष्टानां रूपगन्धानामभ्यासं च चिकीर्षति ॥

tatastadarthaṃ yatate karma cārabhate mahat | iṣṭānāṃ rūpagandhānāmabhyāsaṃ ca cikīrṣati

तब वह उसी के लिए प्रयत्न करता है और बड़े-बड़े कर्म आरम्भ करता है; अपने प्रिय रूप, गन्ध आदि विषयों का बार-बार भोग करना चाहता है।

श्लोक 5 (12.279.5)

ततो रागः प्रभवति द्वेषश्च तदनन्तरम् । ततो लोभः प्रभवति मोहश्च तदनन्तरम् ॥

tato rāgaḥ prabhavati dveṣaśca tadanantaram | tato lobhaḥ prabhavati mohaśca tadanantaram

उससे राग उत्पन्न होता है और उसके तुरन्त बाद द्वेष; फिर लोभ उत्पन्न होता है और उसके तुरन्त बाद मोह।

श्लोक 6 (12.279.6)

लोभमोहाभिभूतस्य रागद्वेषान्वितस्य च । न धर्मे जायते बुद्धिर्व्याजाद्धर्मं करोति च ॥

lobhamohābhibhūtasya rāgadveṣānvitasya ca | na dharme jāyate buddhirvyājāddharmaṃ karoti ca

लोभ और मोह से घिरे हुए तथा राग और द्वेष से युक्त मनुष्य की बुद्धि धर्म में नहीं लगती; वह धर्म भी केवल बहाने से करता है।

श्लोक 7 (12.279.7)

व्याजेन चरते धर्ममर्थं व्याजेन रोचते । व्याजेन सिद्ध्यमानेषु धर्मेषु कुरुनन्दन ॥

vyājena carate dharmamarthaṃ vyājena rocate | vyājena siddhyamāneṣu dharmeṣu kurunandana

हे कुरुनन्दन, वह बहाने से धर्म का आचरण करता है और बहाने से ही धन में रुचि लेता है; और बहाने से धर्म-कार्यों के सिद्ध होते रहने पर

श्लोक 8 (12.279.8)

तत्रैव कुरुते बुद्धिं ततः पापं चिकीर्षति । सुहृद्भिर्वार्यमाणोऽपि पण्‍डितैश्चापि भारत ॥

tatraiva kurute buddhiṃ tataḥ pāpaṃ cikīrṣati | suhṛdbhirvāryamāṇo'pi paṇḍitaiścāpi bhārata

वह उसी में अपनी बुद्धि लगा देता है और फिर पाप करना चाहने लगता है, हे भारत, चाहे मित्र और विद्वान् उसे रोकते ही रहें।

श्लोक 9 (12.279.9)

उत्तरं न्यायसंबद्धं ब्रवीति विधिचोदितम् । अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्धते रागमोहजः ॥

uttaraṃ nyāyasaṃbaddhaṃ bravīti vidhicoditam | adharmastrividhastasya vardhate rāgamohajaḥ

वह न्याय से जुड़ा हुआ, विधि से प्रेरित-सा दिखनेवाला उत्तर देता है; इस प्रकार राग और मोह से उत्पन्न उसका तीन प्रकार का अधर्म बढ़ता है।

श्लोक 10 (12.279.10)

पापं चिन्तयते कर्म प्रब्रवीति करोति च । तस्याधर्मप्रवृत्तस्य दोषान्पश्यन्ति साधवः ॥

pāpaṃ cintayate karma prabravīti karoti ca | tasyādharmapravṛttasya doṣānpaśyanti sādhavaḥ

वह पाप का चिन्तन करता है, पाप की बात कहता है और पाप करता है। अधर्म में लगे हुए उस मनुष्य के दोषों को सज्जन देख लेते हैं।

श्लोक 11 (12.279.11)

एकशीलाश्च मित्रत्वं भजन्ते पापकर्मिणः । स नेह सुखमाप्नोति कुत एव परत्र वै ॥

ekaśīlāśca mitratvaṃ bhajante pāpakarmiṇaḥ | sa neha sukhamāpnoti kuta eva paratra vai

एक-से स्वभाववाले पापकर्मी उसके साथ मित्रता कर लेते हैं। ऐसा मनुष्य यहाँ ही सुख नहीं पाता, तो परलोक में कैसे पाएगा?

श्लोक 12 (12.279.12)

एवं भवति पापात्मा धर्मात्मानं तु मे शृणु । यथा कुशलधर्मा स कुशलं प्रतिपद्यते ॥

evaṃ bhavati pāpātmā dharmātmānaṃ tu me śṛṇu | yathā kuśaladharmā sa kuśalaṃ pratipadyate

इस प्रकार पापी मनुष्य बनता है। अब धर्मात्मा के विषय में मुझसे सुनो कि कुशल धर्मवाला पुरुष किस प्रकार कल्याण को प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (12.279.13)

कुशलेनैव धर्मेण गतिमिष्टां प्रपद्यते । य एतान्प्रज्ञया दोषान्पूर्वमेवानुपश्यति ॥

kuśalenaiva dharmeṇa gatimiṣṭāṃ prapadyate | ya etānprajñayā doṣānpūrvamevānupaśyati

जो इन दोषों को बुद्धि से पहले ही देख लेता है, वह कुशल धर्म से ही अपनी अभीष्ट गति को पाता है।

श्लोक 14 (12.279.14)

कुशलस्तु सुखार्थाय साधूंश्चाप्युपसेवते । तस्य साधुसमाचारादभ्यासाच्चैव वर्धते ॥

kuśalastu sukhārthāya sādhūṃścāpyupasevate | tasya sādhusamācārādabhyāsāccaiva vardhate

वह कुशल पुरुष सुख के लिए सज्जनों की भी सेवा करता है; सज्जनों के आचरण और अभ्यास से वह इसमें बढ़ता जाता है।

श्लोक 15 (12.279.15)

प्राज्ञो धर्मे च रमते धर्मं चैवोपजीवति । सोऽथ धर्मादवाप्तेषु धनेषु कुरुनन्दन ॥

prājño dharme ca ramate dharmaṃ caivopajīvati | so'tha dharmādavāpteṣu dhaneṣu kurunandana

वह प्रज्ञावान् धर्म में रमता है और धर्म से ही जीविका चलाता है। फिर हे कुरुनन्दन, धर्म से प्राप्त धन में

श्लोक 16 (12.279.16)

तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान्पश्यति यत्र वै । धर्मात्मा भवति ह्येवं मित्रं च लभते शुभम् ॥

tasyaiva siñcate mūlaṃ guṇānpaśyati yatra vai | dharmātmā bhavati hyevaṃ mitraṃ ca labhate śubham

जहाँ वह गुण देखता है, उसी की जड़ को सींचता है। इस प्रकार वह धर्मात्मा बनता है और शुभ मित्र पाता है।

श्लोक 17 (12.279.17)

स मित्रधनलाभात्तु प्रेत्य चेह च नन्दति । शब्दे स्पर्शे रसे रूपे तथा गन्धे च भारत ॥

sa mitradhanalābhāttu pretya ceha ca nandati | śabde sparśe rase rūpe tathā gandhe ca bhārata

मित्रों और धन के लाभ से वह इस लोक में भी और मरने के बाद भी आनन्द पाता है; और हे भारत, शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्ध में

श्लोक 18 (12.279.18)

प्रभुत्वं लभते जन्तुर्धर्मस्यैतत्फलं विदुः । स तु धर्मफलं लब्ध्वा न तृष्यति युधिष्ठिर ॥

prabhutvaṃ labhate janturdharmasyaitatphalaṃ viduḥ | sa tu dharmaphalaṃ labdhvā na tṛṣyati yudhiṣṭhira

प्राणी प्रभुत्व पाता है; इसे ही ज्ञानी धर्म का फल कहते हैं। परन्तु हे युधिष्ठिर, धर्म का फल पाकर भी वह तृप्त नहीं होता।

श्लोक 19 (12.279.19)

धर्मे स्थितानां कौन्तेय सर्वभोगक्रियासु च । अतृप्यमाणो निर्वेदमादत्ते ज्ञानचक्षुषा । प्रज्ञाचक्षुर्यदा कामे दोषमेवानुपश्यति ॥

dharme sthitānāṃ kaunteya sarvabhogakriyāsu ca | atṛpyamāṇo nirvedamādatte jñānacakṣuṣā | prajñācakṣuryadā kāme doṣamevānupaśyati

हे कुन्तीपुत्र, धर्म में स्थित रहनेवालों में भी, सब भोग-क्रियाओं में तृप्त न होता हुआ वह ज्ञानरूपी नेत्र से निर्वेद को अपनाता है, जब प्रज्ञारूपी नेत्र से वह कामना में केवल दोष ही देखता है।

श्लोक 20 (12.279.20)

शब्दे स्पर्शे तथा रूपे न च भावयते मनः । विमुच्यते तदा कामान्न च धर्मं विमुञ्चति ॥

śabde sparśe tathā rūpe na ca bhāvayate manaḥ | vimucyate tadā kāmānna ca dharmaṃ vimuñcati

तब शब्द, स्पर्श और रूप में उसका मन नहीं रमता; वह कामनाओं से मुक्त हो जाता है, किन्तु धर्म को नहीं छोड़ता।

श्लोक 21 (12.279.21)

सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षयात्मकम् । ततो मोक्षाय यतते नानुपायादुपायतः ॥

sarvatyāge ca yatate dṛṣṭvā lokaṃ kṣayātmakam | tato mokṣāya yatate nānupāyādupāyataḥ

संसार को नाशवान् देखकर वह पूर्ण त्याग के लिए यत्न करता है; तब वह मोक्ष के लिए यत्न करता है, अनुचित उपाय से नहीं, उचित उपाय से।

श्लोक 22 (12.279.22)

शनैर्निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च । धर्मात्मा चैव भवति मोक्षं च लभते परम् ॥

śanairnirvedamādatte pāpaṃ karma jahāti ca | dharmātmā caiva bhavati mokṣaṃ ca labhate param

धीरे-धीरे वह निर्वेद को अपनाता है और पापकर्म छोड़ देता है; वह धर्मात्मा बनता है और परम मोक्ष को प्राप्त करता है।

श्लोक 23 (12.279.23)

एतत्ते कथितं तात यन्मां त्वं परिपृच्छसि । पापं धर्मस्तथा मोक्षो निर्वेदश्चैव भारत ॥

etatte kathitaṃ tāta yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi | pāpaṃ dharmastathā mokṣo nirvedaścaiva bhārata

हे तात, तुमने मुझसे जो पूछा था वह मैंने कह दिया: पाप, धर्म, मोक्ष और निर्वेद, हे भारत।

श्लोक 24 (12.279.24)

तस्माद्धर्मे प्रवर्तेथाः सर्वावस्थं युधिष्ठिर । धर्मे स्थितानां कौन्तेय सिद्धिर्भवति शाश्वती ॥

tasmāddharme pravartethāḥ sarvāvasthaṃ yudhiṣṭhira | dharme sthitānāṃ kaunteya siddhirbhavati śāśvatī

इसलिए हे युधिष्ठिर, सभी अवस्थाओं में धर्म में ही लगे रहो; हे कुन्तीपुत्र, जो धर्म में स्थित रहते हैं उन्हें शाश्वत सिद्धि प्राप्त होती है।”

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