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शान्ति पर्व · अध्याय 280

मोक्ष का एकमात्र मार्ग: दोषों पर विजय

युधिष्ठिर मोक्ष के उपाय के विषय में पूछते हैं। भीष्म कहते हैं कि मोक्ष का मार्ग एक ही है, और बताते हैं कि प्रत्येक दोष को कैसे जीता जाए: क्रोध को क्षमा से, कामना को संकल्प त्यागकर, भय को सावधानी से, लोभ और मोह को सन्तोष और तत्त्वदर्शन से। वे योग के पाँच दोष और योग के साधन गिनाते हैं और अन्त में मोक्ष के मार्ग को निर्मल, शुद्ध और संयमयुक्त बताते हैं।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.280.1)

मोक्षः पितामहेनोक्त उपायान्नानुपायतः । तमुपायं यथान्यायं श्रोतुमिच्छामि भारत ॥

mokṣaḥ pitāmahenokta upāyānnānupāyataḥ | tamupāyaṃ yathānyāyaṃ śrotumicchāmi bhārata

“आपने कहा कि मोक्ष उपाय से मिलता है, बिना उपाय के नहीं। हे भारत, मैं उस उपाय को यथोचित रूप से सुनना चाहता हूँ।”

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.280.2)

त्वय्येवैतन्महाप्राज्ञ युक्तं निपुणदर्शनम् । यदुपायेन सर्वार्थं नित्यं मृगयसेऽनघ ॥

tvayyevaitanmahāprājña yuktaṃ nipuṇadarśanam | yadupāyena sarvārthaṃ nityaṃ mṛgayase'nagha

“हे महाप्राज्ञ, तुम्हारे जैसे सूक्ष्मदर्शी के लिए यही उचित है कि हे निष्पाप, तुम सब प्रयोजनों को सदा उपाय से ही खोजते हो।

श्लोक 3 (12.280.3)

करणे घटस्य या बुद्धिर्घटोत्पत्तौ न सा मता । एवं धर्माभ्युपायेषु नान्यद्धर्मेषु कारणम् ॥

karaṇe ghaṭasya yā buddhirghaṭotpattau na sā matā | evaṃ dharmābhyupāyeṣu nānyaddharmeṣu kāraṇam

घड़े के बनाने में जो बुद्धि लगती है, वही घड़े के बन जाने पर नहीं मानी जाती। इसी प्रकार धर्म के उपायों में, धर्म के विषय में, कोई और कारण नहीं है।

श्लोक 4 (12.280.4)

पूर्वे समुद्रे यः पन्थाः स न गच्छति पश्चिमम् । एकः पन्था हि मोक्षस्य तन्मे विस्तरतः शृणु ॥

pūrve samudre yaḥ panthāḥ sa na gacchati paścimam | ekaḥ panthā hi mokṣasya tanme vistarataḥ śṛṇu

जो मार्ग पूर्व के समुद्र को जाता है, वह पश्चिम को नहीं जाता। मोक्ष का मार्ग एक ही है; उसे मुझसे विस्तार से सुनो।

श्लोक 5 (12.280.5)

क्षमया क्रोधमुच्छिन्द्यात्कामं संकल्पवर्जनात् । सत्वसंसेवनाद्धीरो निद्रामुच्छेत्तुमर्हति ॥

kṣamayā krodhamucchindyātkāmaṃ saṃkalpavarjanāt | satvasaṃsevanāddhīro nidrāmucchettumarhati

क्षमा से क्रोध को काटे, संकल्प त्यागकर कामना को; सत्त्वगुण का सेवन करके धीर पुरुष को निद्रा को काट देना चाहिए।

श्लोक 6 (12.280.6)

अप्रमादाद्भयं रक्षेच्छ्वासं क्षेत्रज्ञशीलनात् । इच्छां द्वेषं च कामं च धैर्येण विनिवर्तयेत् ॥

apramādādbhayaṃ rakṣecchvāsaṃ kṣetrajñaśīlanāt | icchāṃ dveṣaṃ ca kāmaṃ ca dhairyeṇa vinivartayet

सावधानी से भय से अपनी रक्षा करे, क्षेत्रज्ञ के अनुशीलन से श्वास (की चंचलता) से बचे; इच्छा, द्वेष और कामना को धैर्य से लौटा दे।

श्लोक 7 (12.280.7)

भ्रमं संमोहमावर्तमभ्यासाद्विनिवर्तयेत् । निद्रां चाप्रतिभां चैव ज्ञानाभ्यासेन तत्त्ववित् ॥

bhramaṃ saṃmohamāvartamabhyāsādvinivartayet | nidrāṃ cāpratibhāṃ caiva jñānābhyāsena tattvavit

भ्रम, मोह और आवर्त (चक्कर) को अभ्यास से, और निद्रा तथा प्रतिभा के अभाव को ज्ञान के अभ्यास से, तत्त्व को जाननेवाला पुरुष लौटा दे।

श्लोक 8 (12.280.8)

उपद्रवांस्तथा रोगान्हितजीर्णमिताशनात् । लोभं मोहं च संतोषाद्विषयांस्तत्त्वदर्शनात् ॥

upadravāṃstathā rogānhitajīrṇamitāśanāt | lobhaṃ mohaṃ ca saṃtoṣādviṣayāṃstattvadarśanāt

उपद्रवों और रोगों को हितकारी, सुपाच्य और परिमित भोजन से; लोभ और मोह को सन्तोष से; और विषयों को तत्त्वदर्शन से (लौटा दे)।

श्लोक 9 (12.280.9)

अनुक्रोशादधर्मं च जयेद्धर्ममवेक्षया । आयत्या च जयेदाशामर्थं सङ्गविवर्जनात् ॥

anukrośādadharmaṃ ca jayeddharmamavekṣayā | āyatyā ca jayedāśāmarthaṃ saṅgavivarjanāt

अधर्म को दया से जीते और धर्म को सूक्ष्म विचार से; आशा को भविष्य-दृष्टि से और अर्थ को आसक्ति के त्याग से।

श्लोक 10 (12.280.10)

अनित्यत्वेन च स्नेहं क्षुधं योगेन पण्डितः । कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः ॥

anityatvena ca snehaṃ kṣudhaṃ yogena paṇḍitaḥ | kāruṇyenātmano mānaṃ tṛṣṇāṃ ca paritoṣataḥ

विद्वान् पुरुष स्नेह को अनित्यता के बोध से, भूख को योग से, अभिमान को करुणा से और तृष्णा को सन्तोष से जीते।

श्लोक 11 (12.280.11)

उत्थानेन जयेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत् । मौनेन बहुभाषां च शौर्येण च भयं जयेत् ॥

utthānena jayettandrīṃ vitarkaṃ niścayājjayet | maunena bahubhāṣāṃ ca śauryeṇa ca bhayaṃ jayet

आलस्य को उद्योग से जीते, वितर्क को निश्चय से; बहुत बोलने को मौन से और भय को शूरता से जीते।

श्लोक 12 (12.280.12)

यच्छेद्वाङ्मनसी बुद्ध्या तां यच्छेज्ज्ञानचक्षुषा । ज्ञानमात्मा महान्यच्छेत्तं यच्छेज्ज्ञानमात्मनः ॥

yacchedvāṅmanasī buddhyā tāṃ yacchejjñānacakṣuṣā | jñānamātmā mahānyacchettaṃ yacchejjñānamātmanaḥ

वाणी और मन को बुद्धि से रोके और बुद्धि को ज्ञानरूपी नेत्र से। महान् आत्मा ज्ञान को रोके, और आत्मा का ज्ञान उस (आत्मा) को रोके।

श्लोक 13 (12.280.13)

तदेतदुपशान्तेन बोद्धव्यं शुचिकर्मणा । योगदोषान्समुच्छिद्यात्पञ्च यान्कवयो विदुः ॥

tadetadupaśāntena boddhavyaṃ śucikarmaṇā | yogadoṣānsamucchidyātpañca yānkavayo viduḥ

इसे शान्त और शुद्ध कर्मवाले पुरुष को समझना चाहिए, योग के उन पाँच दोषों को, जिन्हें कवि (ज्ञानी) जानते हैं, काटकर।

श्लोक 14 (12.280.14)

कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्वप्नं च पञ्चमम् । परित्यज्य निषेवेत तथेमान्योगसाधनान् ॥

kāmaṃ krodhaṃ ca lobhaṃ ca bhayaṃ svapnaṃ ca pañcamam | parityajya niṣeveta tathemānyogasādhanān

काम, क्रोध, लोभ, भय और पाँचवीं निद्रा, इन्हें छोड़कर वह योग के इन साधनों का सेवन करे।

श्लोक 15 (12.280.15)

ध्यानमध्ययनं दानं सत्यं ह्रीरार्जवं क्षमा । शौचमाहारतः शुद्धिरिन्द्रियाणां च संयमः ॥

dhyānamadhyayanaṃ dānaṃ satyaṃ hrīrārjavaṃ kṣamā | śaucamāhārataḥ śuddhirindriyāṇāṃ ca saṃyamaḥ

ध्यान, अध्ययन, दान, सत्य, लज्जा, सरलता, क्षमा, शौच, आहार से इन्द्रियों की शुद्धि और इन्द्रियों का संयम।

श्लोक 16 (12.280.16)

एतैर्विवर्धते तेजः पाप्मानमपहन्ति च । सिध्यन्ति चास्य संकल्पा विज्ञानं च प्रवर्तते ॥

etairvivardhate tejaḥ pāpmānamapahanti ca | sidhyanti cāsya saṃkalpā vijñānaṃ ca pravartate

इनसे उसका तेज बढ़ता है और वह पाप का नाश करता है; उसके संकल्प सिद्ध होते हैं और विज्ञान प्रकट होता है।

श्लोक 17 (12.280.17)

धूतपापः स तेजस्वी लध्वाहारो जितेन्द्रियः । कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद्ब्रह्मणः पदम् ॥

dhūtapāpaḥ sa tejasvī ladhvāhāro jitendriyaḥ | kāmakrodhau vaśe kṛtvā ninīṣedbrahmaṇaḥ padam

पाप को झाड़कर, तेजस्वी, हल्का आहार करनेवाला और इन्द्रियों को जीतनेवाला पुरुष काम और क्रोध को वश में करके ब्रह्म के पद तक पहुँचना चाहे।

श्लोक 18 (12.280.18)

अमूढत्वमसङ्गित्वं कामक्रोधविवर्जनम् । अदैन्यमनुदीर्णत्वमनुद्वेगो व्यवस्थितिः ॥

amūḍhatvamasaṅgitvaṃ kāmakrodhavivarjanam | adainyamanudīrṇatvamanudvego vyavasthitiḥ

मूढ़ता का अभाव, अनासक्ति, काम और क्रोध का त्याग, दीनता का अभाव, उद्वेलन का अभाव, उद्वेग का अभाव और स्थिरता।

श्लोक 19 (12.280.19)

एष मार्गो हि मोक्षस्य प्रसन्नो विमलः शुचिः । तथा वाक्कायमनसां नियमः कामतोऽन्यथा ॥

eṣa mārgo hi mokṣasya prasanno vimalaḥ śuciḥ | tathā vākkāyamanasāṃ niyamaḥ kāmato'nyathā

यही मोक्ष का मार्ग है, प्रसन्न, निर्मल और पवित्र; और वैसा ही वाणी, शरीर तथा मन का नियम है, जो कामना से नहीं किया जाता।”

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