Skip to main content

शान्ति पर्व · अध्याय 281

असित देवल का नारद को तत्त्वों, इन्द्रियों और आत्मा का उपदेश

भीष्म नारद और असित देवल का पुराना संवाद सुनाते हैं। नारद पूछते हैं कि यह जगत् किससे उत्पन्न होता है और प्रलय में किसमें जाता है। देवल पाँच महाभूतों और काल, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों, मन और बुद्धि, तीन प्रकार के भावों और अठारहवें क्षेत्रज्ञ का वर्णन करते हैं। देही एक देह से दूसरी देह में जाता है और पुण्य-पाप का क्षय होने पर साङ्ख्यज्ञान से ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।

अध्याय 280अध्याय-सूचीअध्याय 282

भीष्म उवाच

श्लोक 1 (12.281.1)

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदस्य च संवादं देवलस्यासितस्य च ॥

atraivodāharantīmamitihāsaṃ purātanam | nāradasya ca saṃvādaṃ devalasyāsitasya ca

“इसी विषय में लोग इस पुराने वृत्तान्त को सुनाते हैं, नारद और असित देवल के संवाद को।

श्लोक 2 (12.281.2)

आसीनं देवलं वृद्धं बुद्ध्वा बुद्धिमतां वरम् । नारदः परिपप्रच्छ भूतानां प्रभवाप्ययम् ॥

āsīnaṃ devalaṃ vṛddhaṃ buddhvā buddhimatāṃ varam | nāradaḥ paripapraccha bhūtānāṃ prabhavāpyayam

बुद्धिमानों में श्रेष्ठ वृद्ध देवल को बैठा हुआ जानकर नारद ने उनसे प्राणियों की उत्पत्ति और लय के विषय में पूछा।”

नारद उवाच

श्लोक 3 (12.281.3)

कुतः सृष्टमिदं विश्वं ब्रह्मन्स्थावरजङ्गमम् । प्रलये च कमभ्येति तद्भवान्प्रब्रवीतु मे ॥

kutaḥ sṛṣṭamidaṃ viśvaṃ brahmansthāvarajaṅgamam | pralaye ca kamabhyeti tadbhavānprabravītu me

“हे ब्रह्मन्, यह चर-अचर सारा जगत् किससे रचा गया? और प्रलय के समय यह किसमें जाता है? वह आप मुझे बताइए।”

असित उवाच

श्लोक 4 (12.281.4)

येभ्यः सृजति भूतानि कालो भावप्रचोदितः । महाभूतानि पञ्चेति तान्याहुर्भूतचिन्तकाः ॥

yebhyaḥ sṛjati bhūtāni kālo bhāvapracoditaḥ | mahābhūtāni pañceti tānyāhurbhūtacintakāḥ

“जिनसे स्वभाव से प्रेरित काल प्राणियों की सृष्टि करता है, उन्हें प्राणियों पर विचार करनेवाले पाँच महाभूत कहते हैं।

श्लोक 5 (12.281.5)

तेभ्यः सृजति भूतानि काल आत्मप्रचोदितः । एतेभ्यो यः परं ब्रूयादसद्ब्रूयादसंशयम् ॥

tebhyaḥ sṛjati bhūtāni kāla ātmapracoditaḥ | etebhyo yaḥ paraṃ brūyādasadbrūyādasaṃśayam

उन्हीं से आत्मा से प्रेरित काल प्राणियों की सृष्टि करता है। जो इनसे परे कुछ और कहे, वह निःसन्देह असत् कहता है।

श्लोक 6 (12.281.6)

विद्धि नारद पञ्चैताञ्शाश्वतानचलान्ध्रुवान् । महतस्तेजसो राशीन्कालषष्ठान्स्वभावतः ॥

viddhi nārada pañcaitāñśāśvatānacalāndhruvān | mahatastejaso rāśīnkālaṣaṣṭhānsvabhāvataḥ

हे नारद, इन पाँचों को शाश्वत, अचल और ध्रुव जानो; ये महान् तेज की राशियाँ हैं, और स्वभाव से काल इनमें छठा है।

श्लोक 7 (12.281.7)

आपश्चैवान्तरिक्षं च पृथिवी वायुपावकौ । असिद्धिः परमेतेभ्यो भूतेभ्यो मुक्तसंशयम् ॥

āpaścaivāntarikṣaṃ ca pṛthivī vāyupāvakau | asiddhiḥ parametebhyo bhūtebhyo muktasaṃśayam

ये हैं जल, आकाश, पृथ्वी, वायु और अग्नि। इन भूतों से परे कुछ सिद्ध नहीं है; यह निःसन्देह है।

श्लोक 8 (12.281.8)

नोपपत्त्या न वा युक्त्या त्वसद्ब्रूयादसंशयम् । वेत्थैतानभिनिर्वृत्तान्षडेते यस्य राशयः ॥

nopapattyā na vā yuktyā tvasadbrūyādasaṃśayam | vetthaitānabhinirvṛttānṣaḍete yasya rāśayaḥ

न प्रमाण से, न युक्ति से कोई इससे भिन्न बात निःसन्देह असत्य कहे बिना कह सकता है। तुम इन्हें उत्पन्न हुआ जानते हो: ये छह ही उसकी राशियाँ हैं।

श्लोक 9 (12.281.9)

पञ्चैव तानि कालश्च भावाभावौ च केवलौ । अष्टौ भूतानि भूतानां शाश्वतानि भवाव्ययौ ॥

pañcaiva tāni kālaśca bhāvābhāvau ca kevalau | aṣṭau bhūtāni bhūtānāṃ śāśvatāni bhavāvyayau

केवल वे पाँच, काल, और केवल भाव तथा अभाव: ये आठ प्राणियों के शाश्वत भूत हैं, जो उत्पत्ति और लय के कारण हैं।

श्लोक 10 (12.281.10)

अभावभावितेष्वेव तेभ्यश्च प्रभवन्त्यपि । विनष्टोऽप्यनुतान्येव जन्तुर्भवति पञ्चधा ॥

abhāvabhāviteṣveva tebhyaśca prabhavantyapi | vinaṣṭo'pyanutānyeva janturbhavati pañcadhā

अभाव से उत्पन्न हुई वस्तुओं में भी वे इन्हीं से उत्पन्न होते हैं; और नष्ट होने पर भी जीव उन्हीं का अनुसरण करता है और पाँच प्रकार का हो जाता है।

श्लोक 11 (12.281.11)

तस्य भूमिमयो देहः श्रोत्रमाकाशसंभवम् । सूर्याच्चक्षुरसुर्वायोरद्भ्यस्तु खलु शोणितम् ॥

tasya bhūmimayo dehaḥ śrotramākāśasaṃbhavam | sūryāccakṣurasurvāyoradbhyastu khalu śoṇitam

उसका शरीर पृथ्वीमय है, श्रोत्र आकाश से उत्पन्न है, चक्षु सूर्य से, प्राण वायु से, और रक्त जल से उत्पन्न है।

श्लोक 12 (12.281.12)

चक्षुषी नासिकाकर्णौ त्वक् जिह्वेति च पञ्चमी । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थानां ज्ञानानि कवयो विदुः ॥

cakṣuṣī nāsikākarṇau tvak jihveti ca pañcamī | indriyāṇīndriyārthānāṃ jñānāni kavayo viduḥ

दोनों नेत्र, नासिका, कान, त्वचा और पाँचवीं जिह्वा: ज्ञानी इन्हें इन्द्रियाँ और इन्द्रियों के विषयों को जानने के साधन कहते हैं।

श्लोक 13 (12.281.13)

दर्शनं श्रवणं घ्राणं स्पर्शनं रसनं तथा । उपपत्त्या गुणान्विद्धि पञ्च पञ्चसु धातुषु ॥

darśanaṃ śravaṇaṃ ghrāṇaṃ sparśanaṃ rasanaṃ tathā | upapattyā guṇānviddhi pañca pañcasu dhātuṣu

देखना, सुनना, सूँघना, छूना और चखना: तर्क से इन गुणों को पाँच धातुओं (तत्त्वों) में पाँच-पाँच जानो।

श्लोक 14 (12.281.14)

रूपं गन्धो रसः स्पर्शः शब्दश्चैवाथ तद्गुणाः । इन्द्रियैरुपलभ्यन्ते पञ्चधा पञ्च पञ्चभिः ॥

rūpaṃ gandho rasaḥ sparśaḥ śabdaścaivātha tadguṇāḥ | indriyairupalabhyante pañcadhā pañca pañcabhiḥ

रूप, गन्ध, रस, स्पर्श और शब्द उनके गुण हैं; ये इन्द्रियों से पाँच प्रकार से, पाँच-पाँच करके ग्रहण किए जाते हैं।

श्लोक 15 (12.281.15)

रूपं गन्धं रसं स्पर्शं शब्दं चैवाथ तद्गुणान् । इन्द्रियाणि न बुध्यन्ते क्षेत्रज्ञस्तैस्तु बुध्यते ॥

rūpaṃ gandhaṃ rasaṃ sparśaṃ śabdaṃ caivātha tadguṇān | indriyāṇi na budhyante kṣetrajñastaistu budhyate

रूप, गन्ध, रस, स्पर्श, शब्द और उनके गुणों को इन्द्रियाँ नहीं जानतीं; क्षेत्रज्ञ उन्हीं के द्वारा जानता है।

श्लोक 16 (12.281.16)

चित्तमिन्द्रियसंघातात्परं तस्मात्परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिः क्षेत्रज्ञो बुद्धितः परः ॥

cittamindriyasaṃghātātparaṃ tasmātparaṃ manaḥ | manasastu parā buddhiḥ kṣetrajño buddhitaḥ paraḥ

इन्द्रियों के समूह से परे चित्त है, उससे परे मन है; मन से परे बुद्धि है और बुद्धि से परे क्षेत्रज्ञ है।

श्लोक 17 (12.281.17)

पूर्वं चेतयते जन्तुरिन्द्रियैर्विषयान्पृथक् । विचार्य मनसा पश्चादथ बुद्ध्या व्यवस्यति । इन्द्रियैरुपसृष्टार्थान्मत्वा यस्त्वध्यवस्यति ॥

pūrvaṃ cetayate janturindriyairviṣayānpṛthak | vicārya manasā paścādatha buddhyā vyavasyati | indriyairupasṛṣṭārthānmatvā yastvadhyavasyati

पहले प्राणी इन्द्रियों से विषयों को अलग-अलग जानता है; फिर मन से विचारकर बुद्धि से निश्चय करता है; और जो इन्द्रियों द्वारा उपस्थित विषयों पर मनन करके निश्चय करता है,

श्लोक 18 (12.281.18)

चित्तमिन्द्रियसंघातं मनो बुद्धिस्तथाऽष्टमी । अष्टौ ज्ञानेन्द्रियाण्याहुरेतान्यध्यात्मचिन्तकाः ॥

cittamindriyasaṃghātaṃ mano buddhistathā'ṣṭamī | aṣṭau jñānendriyāṇyāhuretānyadhyātmacintakāḥ

चित्त, इन्द्रियों का समूह, मन और आठवीं बुद्धि: इन्हें अध्यात्म पर विचार करनेवाले आठ ज्ञान के साधन कहते हैं।

श्लोक 19 (12.281.19)

पाणिं पादं च पायुं च मेहनं पञ्चमं मुखम् । इति संशब्द्यमानानि शृणु कर्मेन्द्रियाण्यपि ॥

pāṇiṃ pādaṃ ca pāyuṃ ca mehanaṃ pañcamaṃ mukham | iti saṃśabdyamānāni śṛṇu karmendriyāṇyapi

हाथ, पैर, गुदा, जननेन्द्रिय और पाँचवाँ मुख: इस प्रकार नाम लिए जानेवाले कर्मेन्द्रियों को भी अब सुनो।

श्लोक 20 (12.281.20)

जल्पनाभ्यवहारार्थं मुखमिन्द्रियमुच्यते । गमनेन्द्रियं तथा पादौ कर्मणः करणे करौ ॥

jalpanābhyavahārārthaṃ mukhamindriyamucyate | gamanendriyaṃ tathā pādau karmaṇaḥ karaṇe karau

बोलने और खाने के लिए मुख इन्द्रिय कहा जाता है; पैर गमन की इन्द्रिय हैं और हाथ कर्म करने के साधन हैं।

श्लोक 21 (12.281.21)

पायूपस्थं विसर्गार्थमिन्द्रिये तुल्यकर्मणी । विसर्गे च पुरीषस्य विसर्गे चापि कामिके ॥

pāyūpasthaṃ visargārthamindriye tulyakarmaṇī | visarge ca purīṣasya visarge cāpi kāmike

गुदा और जननेन्द्रिय विसर्जन के लिए तुल्य कर्मवाली दो इन्द्रियाँ हैं: मल का विसर्जन, और काम-सुख का विसर्जन भी।

श्लोक 22 (12.281.22)

मनः षष्ठान्यथैतानि वाचा सम्यग्यथागमम् । ज्ञानचेष्टेन्द्रियगुणाः सर्वेषां शब्दिता मया ॥

manaḥ ṣaṣṭhānyathaitāni vācā samyagyathāgamam | jñānaceṣṭendriyaguṇāḥ sarveṣāṃ śabditā mayā

मन को छठा लेकर ये सब मैंने वाणी से ठीक-ठीक और शास्त्र के अनुसार कहे हैं; ज्ञान और कर्म की इन्द्रियों के सब गुण मैंने बता दिए।

श्लोक 23 (12.281.23)

इन्द्रियाणां स्वकर्मभ्यः श्रमादुपरमो यदा । भवतीन्द्रियसंन्यासादथ स्वपिति वै नरः ॥

indriyāṇāṃ svakarmabhyaḥ śramāduparamo yadā | bhavatīndriyasaṃnyāsādatha svapiti vai naraḥ

जब इन्द्रियाँ अपने कर्मों से थककर रुक जाती हैं, तब इन्द्रियों के त्याग से मनुष्य सो जाता है।

श्लोक 24 (12.281.24)

इन्द्रियाणां व्युपरमे मनोऽव्युपरतं यदि । सेवते विषयानेव तं विद्यात्स्वप्नदर्शनम् ॥

indriyāṇāṃ vyuparame mano'vyuparataṃ yadi | sevate viṣayāneva taṃ vidyātsvapnadarśanam

परन्तु जब इन्द्रियाँ रुकी हों और मन न रुके तथा विषयों का ही सेवन करता रहे, तो उसे स्वप्न देखना जानो।

श्लोक 25 (12.281.25)

सात्विकाश्चैव ये भावास्तथा राजसतामसाः । कर्मयुक्ताः प्रशंसन्ति सात्विकान्नेतरांस्तथा ॥

sātvikāścaiva ye bhāvāstathā rājasatāmasāḥ | karmayuktāḥ praśaṃsanti sātvikānnetarāṃstathā

जो भाव सात्त्विक हैं, और जो राजस तथा तामस हैं: कर्म में लगे लोग सात्त्विक की प्रशंसा करते हैं, दूसरों की नहीं।

श्लोक 26 (12.281.26)

आनन्दः कर्मणां सिद्धिः प्रतिपत्तिः परा गतिः । सात्विकस्य निमित्तानि भावान्संश्रयसे स्मृतिः ॥

ānandaḥ karmaṇāṃ siddhiḥ pratipattiḥ parā gatiḥ | sātvikasya nimittāni bhāvānsaṃśrayase smṛtiḥ

आनन्द, कर्मों की सिद्धि, बोध और परम गति सात्त्विक के लक्षण हैं; तुम इन भावों का आश्रय लेते हो, ऐसी स्मृति है।

श्लोक 27 (12.281.27)

जन्तुष्वेकतमेष्वेवं भावं यो वा समास्थितः । भावयोरीप्सितं नित्यं प्रत्यक्षं गमनं द्वयोः ॥

jantuṣvekatameṣvevaṃ bhāvaṃ yo vā samāsthitaḥ | bhāvayorīpsitaṃ nityaṃ pratyakṣaṃ gamanaṃ dvayoḥ

प्राणियों में जो इस प्रकार किसी एक भाव में स्थित हो गया है, उन दोनों भावों में से अभीष्ट सदा वही रहता है, और दोनों की गति प्रत्यक्ष है।

श्लोक 28 (12.281.28)

इन्द्रियाणि च भावाश्च गुणाः सप्तदश स्मृताः । तेषामष्टादशो देही यः शरीरे स शाश्वतः ॥

indriyāṇi ca bhāvāśca guṇāḥ saptadaśa smṛtāḥ | teṣāmaṣṭādaśo dehī yaḥ śarīre sa śāśvataḥ

इन्द्रियाँ और भाव गुण हैं, जो सत्रह माने गए हैं; उनमें अठारहवाँ देही है जो शरीर में रहता है, और वह शाश्वत है।

श्लोक 29 (12.281.29)

अथवा सशरीरास्ते गुणाः सर्वे शरीरिणाम् । संश्रितास्तद्वियोगे हि सशरीरा न सन्ति ते ॥

athavā saśarīrāste guṇāḥ sarve śarīriṇām | saṃśritāstadviyoge hi saśarīrā na santi te

अथवा वे सब गुण देहधारियों में शरीर-सहित रहते हैं; वे उसी के आश्रित हैं, और उसके चले जाने पर वे शरीर-सहित नहीं रहते।

श्लोक 30 (12.281.30)

अथवा संविभागेन शरीरं पाञ्चभौतिकम् । एकश्च दश चाष्टौ च गुणाः सह शरीरिणाम् । ऊष्मणा सह विंशो वा संघातः पाञ्चभौतिकः ॥

athavā saṃvibhāgena śarīraṃ pāñcabhautikam | ekaśca daśa cāṣṭau ca guṇāḥ saha śarīriṇām | ūṣmaṇā saha viṃśo vā saṃghātaḥ pāñcabhautikaḥ

अथवा विभाग करने पर शरीर पाँच भूतों का बना है। एक, दस और आठ: ये गुण देहधारियों के साथ रहते हैं; ऊष्मा के साथ, अथवा बीसवें रूप में, पाँच भूतों का यह समूह है।

श्लोक 31 (12.281.31)

महान्संधारयत्येतच्छरीरं वायुना सह । सत्यप्रभावयुक्तस्य निमित्तं देहभेदने ॥

mahānsaṃdhārayatyetaccharīraṃ vāyunā saha | satyaprabhāvayuktasya nimittaṃ dehabhedane

महान् (आत्मा) वायु के साथ इस शरीर को धारण करता है; सत्य के प्रभाव से युक्त उस (पुरुष) के लिए देह के भेदन का कारण है।

श्लोक 32 (12.281.32)

तथैवोत्पद्यते किंचित्पञ्चत्वं गच्छते तथा । पुण्यपापविनाशान्ते पुण्यपापसमीरितः । देहं विशति कालेन ततोऽयं कर्मसंभवम् ॥

tathaivotpadyate kiṃcitpañcatvaṃ gacchate tathā | puṇyapāpavināśānte puṇyapāpasamīritaḥ | dehaṃ viśati kālena tato'yaṃ karmasaṃbhavam

इसी प्रकार कुछ उत्पन्न होता है और इसी प्रकार वह पंचत्व को प्राप्त होता है। पुण्य और पाप के नाश के अन्त में, पुण्य और पाप से प्रेरित होकर वह समय पर देह में प्रवेश करता है; इस प्रकार यह कर्म से उत्पन्न हुआ (देहधारी) होता है।

श्लोक 33 (12.281.33)

हित्वाहित्वा ह्ययं प्रैति देहाद्देहं कृताश्रयः । कालसंचोदितः क्षेत्री विशीर्णाद्वा गृहाद्गृहम् ॥

hitvāhitvā hyayaṃ praiti dehāddehaṃ kṛtāśrayaḥ | kālasaṃcoditaḥ kṣetrī viśīrṇādvā gṛhādgṛham

एक देह को छोड़-छोड़कर यह देह से देह में जाता है, आश्रय बनाता हुआ, काल से प्रेरित; जैसे खेत का स्वामी जीर्ण-शीर्ण घर से दूसरे घर में जाता है।

श्लोक 34 (12.281.34)

तं तु नैवानुतप्यन्ते प्राज्ञा निश्चितनिश्चयाः । कृपणास्त्वनुतप्यन्ते जनाः संबन्धिमानिनः ॥

taṃ tu naivānutapyante prājñā niścitaniścayāḥ | kṛpaṇāstvanutapyante janāḥ saṃbandhimāninaḥ

निश्चय में दृढ़ ज्ञानी लोग उसके लिए शोक नहीं करते; किन्तु सम्बन्धियों का अभिमान करनेवाले दीन लोग शोक करते हैं।

श्लोक 35 (12.281.35)

न ह्ययं कस्यचित्कश्चिन्नास्य कश्चन विद्यते । भवत्येको ह्ययं नित्यं शरीरे सुखदुःखकृत् ॥

na hyayaṃ kasyacitkaścinnāsya kaścana vidyate | bhavatyeko hyayaṃ nityaṃ śarīre sukhaduḥkhakṛt

यह किसी का नहीं है और इसका कोई नहीं है। यह शरीर में सदा अकेला रहनेवाला, सुख-दुःख का करनेवाला है।

श्लोक 36 (12.281.36)

नैव संजायते जन्तुर्न च जातु विपद्यते । याति देहमयं मुक्त्वा कदाचित्परमां गतिम् ॥

naiva saṃjāyate janturna ca jātu vipadyate | yāti dehamayaṃ muktvā kadācitparamāṃ gatim

जीव न कभी उत्पन्न होता है, न कभी नष्ट होता है; देह को छोड़कर वह कभी परम गति को जाता है।

श्लोक 37 (12.281.37)

पुण्यपापमयं देहं क्षपयन्कर्मसंक्षयात् । क्षीणदेहः पुनर्देही ब्रह्मत्वमुपगच्छति ॥

puṇyapāpamayaṃ dehaṃ kṣapayankarmasaṃkṣayāt | kṣīṇadehaḥ punardehī brahmatvamupagacchati

कर्मों के क्षय से पुण्य-पापमय देह को क्षीण करता हुआ देही, देह के क्षीण हो जाने पर, ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।

श्लोक 38 (12.281.38)

पुण्यपापक्षयार्थं हि साङ्ख्यज्ञानं विधीयते । तत्क्षये हृदि पश्यन्ति ब्रह्मभावे परां गतिम् ॥

puṇyapāpakṣayārthaṃ hi sāṅkhyajñānaṃ vidhīyate | tatkṣaye hṛdi paśyanti brahmabhāve parāṃ gatim

पुण्य और पाप के क्षय के लिए साङ्ख्यज्ञान का विधान है; उनके क्षय होने पर लोग हृदय में ब्रह्मभाव में परम गति को देखते हैं।”

अध्याय 280अध्याय-सूचीअध्याय 282