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शान्ति पर्व · अध्याय 282

विदेहराज का तृष्णा-त्याग पर गीत

धन के लिए स्वजनों के मारे जाने पर शोक करते हुए युधिष्ठिर पूछते हैं कि तृष्णा और उससे हुए पापों को कैसे लौटाया जाए। भीष्म विदेहराज का वह गीत सुनाते हैं जो उसने माण्डव्य से कहा था: वह इसलिए सुखी है कि उसका कुछ नहीं है, अतः मिथिला जलने पर भी उसका कुछ नहीं जलता। तृष्णा धन के साथ वैसे ही बढ़ती है जैसे गाय के साथ उसका सींग, और सुख उसे त्यागने में है। यह सुनकर माण्डव्य मोक्ष की शरण में गया।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.282.1)

भ्रातरः पितरः पौत्रा ज्ञातयः सुहृदः सुताः । अर्थहेतोर्हताः क्रूरैरस्माभिः पापबुद्धिभिः ॥

bhrātaraḥ pitaraḥ pautrā jñātayaḥ suhṛdaḥ sutāḥ | arthahetorhatāḥ krūrairasmābhiḥ pāpabuddhibhiḥ

“भाई, पिता, पौत्र, स्वजन, मित्र और पुत्र धन के लिए हम क्रूर और पापबुद्धि लोगों द्वारा मारे गए।

श्लोक 2 (12.282.2)

येयमर्थोद्भवा तृष्णा कथमेतां पितामह । निवर्तयेयं पापानि तृष्णया कारिता वयम् ॥

yeyamarthodbhavā tṛṣṇā kathametāṃ pitāmaha | nivartayeyaṃ pāpāni tṛṣṇayā kāritā vayam

यह जो धन से उत्पन्न तृष्णा है, हे पितामह, इसे और इससे हुए पापों को मैं कैसे लौटाऊँ? तृष्णा ने ही हमसे ये कर्म कराए।”

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (12.282.3)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । गीतं विदेहराजेन माण्डव्यायानुपृच्छते ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | gītaṃ videharājena māṇḍavyāyānupṛcchate

“इसी विषय में लोग इस पुराने वृत्तान्त को सुनाते हैं, विदेहराज का वह गीत जो उसने प्रश्न करनेवाले माण्डव्य के लिए गाया था।”

विदेहराज उवाच

श्लोक 4 (12.282.4)

सुसुखं बत जीवामि यस्य मे नास्ति किंचन । मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किंचन ॥

susukhaṃ bata jīvāmi yasya me nāsti kiṃcana | mithilāyāṃ pradīptāyāṃ na me dahyati kiṃcana

“मैं बड़े सुख से जीता हूँ, क्योंकि मेरा कुछ भी नहीं है। मिथिला के जल उठने पर भी मेरा कुछ नहीं जलता।

श्लोक 5 (12.282.5)

अर्थाः खलु समृद्धा हि गाढं दुःखं विजानताम् । असमृद्धास्त्वपि सदा मोहयन्त्यविचक्षणान् ॥

arthāḥ khalu samṛddhā hi gāḍhaṃ duḥkhaṃ vijānatām | asamṛddhāstvapi sadā mohayantyavicakṣaṇān

धन जब बढ़ा हुआ हो, तो समझनेवालों को गहरा दुःख देता है; और जब कम हो, तो नासमझ लोगों को सदा मोह में डाले रखता है।

श्लोक 6 (12.282.6)

यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥

yacca kāmasukhaṃ loke yacca divyaṃ mahatsukham | tṛṣṇākṣayasukhasyaite nārhataḥ ṣoḍaśīṃ kalām

लोक में जो कामसुख है और जो स्वर्ग का महान् सुख है, ये दोनों तृष्णा के क्षय के सुख की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं।

श्लोक 7 (12.282.7)

यथैव शृङ्गं गोः काले वर्धमानस्य वर्धते । तथैव तृष्णा वित्तेन वर्धमानेन वर्धते ॥

yathaiva śṛṅgaṃ goḥ kāle vardhamānasya vardhate | tathaiva tṛṣṇā vittena vardhamānena vardhate

जैसे बढ़ती हुई गाय का सींग समय पर बढ़ता है, वैसे ही बढ़ते हुए धन के साथ तृष्णा बढ़ती है।

श्लोक 8 (12.282.8)

किंचिदेव ममत्वेन यदा भवति कल्पितम् । तदेव परितापाय नाशे संपद्यते पुनः ॥

kiṃcideva mamatvena yadā bhavati kalpitam | tadeva paritāpāya nāśe saṃpadyate punaḥ

जब कोई भी वस्तु ममत्व से “मेरी” मान ली जाती है, तो वही उसके नष्ट होने पर सन्ताप का कारण बन जाती है।

श्लोक 9 (12.282.9)

न कामाननुरुध्येत दुःखं कामेषु वै रतिः । प्राप्यार्थमुपयुञ्जीत धर्मं कामान्विवर्जयेत् ॥

na kāmānanurudhyeta duḥkhaṃ kāmeṣu vai ratiḥ | prāpyārthamupayuñjīta dharmaṃ kāmānvivarjayet

कामनाओं के पीछे न चले; कामनाओं में रति दुःख ही है। धन पाकर उसे धर्म में लगाए और कामनाओं को त्याग दे।

श्लोक 10 (12.282.10)

विद्वान्सर्वेषु भूतेषु व्याघ्रमांसोपमो भवेत् । कृतकृत्यो विशुद्धात्मा सर्वं त्यजति वै स्वयम् ॥

vidvānsarveṣu bhūteṣu vyāghramāṃsopamo bhavet | kṛtakṛtyo viśuddhātmā sarvaṃ tyajati vai svayam

विद्वान् सब प्राणियों के बीच बाघ के मांस के समान हो। कृतकृत्य और शुद्ध आत्मावाला वह सब कुछ अपने आप छोड़ देता है।

श्लोक 11 (12.282.11)

उभे सत्यानृते त्यक्त्वा शोकानन्दौ प्रियाप्रिये । भयाभये च संत्यज्य भव शान्तो निरामयः ॥

ubhe satyānṛte tyaktvā śokānandau priyāpriye | bhayābhaye ca saṃtyajya bhava śānto nirāmayaḥ

सत्य और असत्य दोनों को, शोक और आनन्द को, प्रिय और अप्रिय को, और भय तथा अभय को छोड़कर शान्त और निरोग हो जाओ।

श्लोक 12 (12.282.12)

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः । योसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखं ॥

yā dustyajā durmatibhiryā na jīryati jīryataḥ | yosau prāṇāntiko rogastāṃ tṛṣṇāṃ tyajataḥ sukhaṃ

जो तृष्णा मन्दबुद्धियों से कठिनाई से छूटती है, जो जीर्ण होते शरीर के साथ जीर्ण नहीं होती, जो प्राण के अन्त तक रहनेवाला रोग है, उसे त्यागनेवाले को सुख मिलता है।

श्लोक 13 (12.282.13)

चारित्रमात्मनः पश्यंश्चन्द्रशुद्धमनामयम् । धर्मात्मा लभते कीर्ति प्रेत्य चेह यथासुखम् ॥

cāritramātmanaḥ paśyaṃścandraśuddhamanāmayam | dharmātmā labhate kīrti pretya ceha yathāsukham

अपने आचरण को चन्द्रमा के समान उज्ज्वल और निर्दोष देखता हुआ धर्मात्मा इस लोक में और मरकर परलोक में भी यथासुख कीर्ति पाता है।”

भीष्म उवाच

श्लोक 14 (12.282.14)

राज्ञस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रीतिमानभवद्द्विजः । पूजयित्वा च तद्वाक्यं माण्डव्यो मोक्षमाश्रितः ॥

rājñastadvacanaṃ śrutvā prītimānabhavaddvijaḥ | pūjayitvā ca tadvākyaṃ māṇḍavyo mokṣamāśritaḥ

“राजा के वचन सुनकर वह ब्राह्मण प्रसन्न हुआ; और उसके वाक्य का आदर करके माण्डव्य ने मोक्ष का आश्रय लिया।”

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