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शान्ति पर्व · अध्याय 284

हारीत की परिव्राजक-शिक्षा

युधिष्ठिर पूछते हैं कि कैसा स्वभाव, आचरण और विद्या मनुष्य को प्रकृति से परे के अचल धाम तक पहुँचाती है। भीष्म उत्तर देते हैं कि वहाँ वही पहुँचता है जो मोक्ष-धर्मों में लगा हो, थोड़ा आहार करता हो और इन्द्रियों को जीत चुका हो, और वे परिव्राजक के विषय में हारीत का प्राचीन गीत सुनाते हैं। वह घर छोड़कर निकलता है, किसी को दोष या कष्ट नहीं देता, गाली सह लेता है, रसोइयाँ शान्त होने पर ही भिक्षा माँगता है, जीवन-निर्वाह भर लेता है, वाणी, क्रोध, हिंसा, पेट और काम के वेगों को रोकता है और प्रशंसा-निन्दा में सम रहता है। जो सब प्राणियों को अभय देकर प्रव्रज्या लेता है, उसे तेजोमय लोक प्राप्त होते हैं।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.284.1)

किंशीलः किंसमाचारः किंविद्यः किंपरायणः । प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं यत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥

kiṃśīlaḥ kiṃsamācāraḥ kiṃvidyaḥ kiṃparāyaṇaḥ | prāpnoti brahmaṇaḥ sthānaṃ yatparaṃ prakṛterdhruvam

"कैसे स्वभाव, कैसे आचरण, कैसी विद्या और कैसे आश्रय वाला मनुष्य ब्रह्म के उस धाम को पाता है, जो प्रकृति से परे और अचल है?"

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.284.2)

मोक्षधर्मेषु निरतो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । प्राप्नोति परमं स्थानं यत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥

mokṣadharmeṣu nirato laghvāhāro jitendriyaḥ | prāpnoti paramaṃ sthānaṃ yatparaṃ prakṛterdhruvam

"जो मोक्ष-धर्मों में लगा रहता है, थोड़ा आहार करता है और इन्द्रियों को जीत चुका है, वह उस परम धाम को पाता है जो प्रकृति से परे और अचल है।"

श्लोक 3 (12.284.3)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । हारीतेन पुरा गीतं तं निबोध युधिष्ठिर ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | hārītena purā gītaṃ taṃ nibodha yudhiṣṭhira

"इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं, जिसे बहुत पहले हारीत ने गाया था। हे युधिष्ठिर, उसे सुनो।"

श्लोक 4 (12.284.4)

स्वगृहादभिनिःसृत्य लाभेऽलाभे समो मुनिः । समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥

svagṛhādabhiniḥsṛtya lābhe'lābhe samo muniḥ | samupoḍheṣu kāmeṣu nirapekṣaḥ parivrajet

"मुनि अपने घर से निकलकर परिव्रज्या करे; लाभ और हानि में सम रहे, और कामनाएँ सामने आ जाने पर भी उनसे निरपेक्ष रहे।"

श्लोक 5 (12.284.5)

न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषयेत्परम् । न प्रत्यक्षं परोक्षं वा दूषणं व्याहरेत्क्वचित् ॥

na cakṣuṣā na manasā na vācā dūṣayetparam | na pratyakṣaṃ parokṣaṃ vā dūṣaṇaṃ vyāharetkvacit

"वह न आँख से, न मन से, न वाणी से किसी दूसरे को दोष दे; और न सामने, न पीठ पीछे कभी किसी की निन्दा करे।"

श्लोक 6 (12.284.6)

न हिंस्यात्सर्वभूतानि मैत्रायणगतिश्चरेत् । नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥

na hiṃsyātsarvabhūtāni maitrāyaṇagatiścaret | nedaṃ jīvitamāsādya vairaṃ kurvīta kenacit

"वह किसी प्राणी की हिंसा न करे; सूर्य की भाँति एक स्थान से दूसरे स्थान को जाता हुआ विचरे। इस जीवन को पाकर किसी से वैर न करे।"

श्लोक 7 (12.284.7)

अतिवादांस्तितिक्षेत नाभिमन्येत कंचन । क्रोध्यमानः प्रियं ब्रूयादाक्रुष्टः कुशलं वदेत् ॥

ativādāṃstitikṣeta nābhimanyeta kaṃcana | krodhyamānaḥ priyaṃ brūyādākruṣṭaḥ kuśalaṃ vadet

"कठोर बातों को सह ले और किसी का अपमान न करे। जब कोई उस पर क्रोध करे तो प्रिय बोले, और जब कोई गाली दे तो मंगल वचन कहे।"

श्लोक 8 (12.284.8)

प्रदक्षिणं च सव्यं च ग्राममध्ये च नाचरेत् । भैक्षचर्यामनापन्नो न गच्छेत्पूर्वकेतनम् ॥

pradakṣiṇaṃ ca savyaṃ ca grāmamadhye ca nācaret | bhaikṣacaryāmanāpanno na gacchetpūrvaketanam

"गाँव के बीच न किसी के अनुकूल चले, न प्रतिकूल। जब भिक्षा के लिए न निकला हो, तब ऐसे घर पर न जाए जहाँ पहले जा चुका हो।"

श्लोक 9 (12.284.9)

अवकीर्णः सुगुप्तश्च न वाचाऽप्यप्रियं चरेत् । मृदुः स्यादप्रतीकारो विस्रब्धः स्यादरोषणः ॥

avakīrṇaḥ suguptaśca na vācā'pyapriyaṃ caret | mṛduḥ syādapratīkāro visrabdhaḥ syādaroṣaṇaḥ

"तिरस्कृत होने पर भी वह अपने को भली-भाँति सँभाले रखे और वाणी से भी अप्रिय बात न कहे। वह कोमल हो, बदला न ले, विश्वासी और क्रोधरहित रहे।"

श्लोक 10 (12.284.10)

विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने । अतीते पात्रसंचारे भिक्षां लिप्सेत वै मुनिः ॥

vidhūme nyastamusale vyaṅgāre bhuktavajjane | atīte pātrasaṃcāre bhikṣāṃ lipseta vai muniḥ

"जब धुआँ उठना बंद हो गया हो, मूसल रख दिया गया हो, अंगारे बुझ गए हों, घर के लोग भोजन कर चुके हों और बर्तनों का आना-जाना थम गया हो, तब मुनि भिक्षा की इच्छा करे।"

श्लोक 11 (12.284.11)

प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रालाभेष्वनादृतः । अलाभे न विहन्येत लाभश्चैनं न हर्षयेत् ॥

prāṇayātrikamātraḥ syānmātrālābheṣvanādṛtaḥ | alābhe na vihanyeta lābhaścainaṃ na harṣayet

"वह केवल प्राण-यात्रा भर का भोजन ले और मिली हुई मात्रा की परवाह न करे। न मिलने पर व्याकुल न हो, और मिल जाने पर हर्षित न हो।"

श्लोक 12 (12.284.12)

लाभं साधारणां नेच्छेन्न भुञ्जीताभिपूजितः । अभिपूजितलाभं हि जुगुप्सेतैव तादृशः ॥

lābhaṃ sādhāraṇāṃ necchenna bhuñjītābhipūjitaḥ | abhipūjitalābhaṃ hi jugupsetaiva tādṛśaḥ

"वह ऐसे लाभ की इच्छा न करे जो सबको सुलभ हो, और सम्मानपूर्वक दिया हुआ भोजन न खाए। ऐसा मनुष्य सम्मान के साथ मिले लाभ से घृणा ही करे।"

श्लोक 13 (12.284.13)

न चान्नदोषान्निन्देत न गुणानभिपूजयेत् । शय्यासने विविक्ते च नित्यमेवाभिपूजयेत् ॥

na cānnadoṣānnindeta na guṇānabhipūjayet | śayyāsane vivikte ca nityamevābhipūjayet

"वह अन्न के दोषों की निन्दा न करे, न उसके गुणों की प्रशंसा करे; किन्तु एकान्त शय्या और आसन को सदा आदर दे।"

श्लोक 14 (12.284.14)

शून्यागारं वृक्षमूलमरण्यमथवा गुहाम् । अज्ञातचर्यां गत्वाऽन्यां ततोऽन्यत्रैव संविशेत् ॥

śūnyāgāraṃ vṛkṣamūlamaraṇyamathavā guhām | ajñātacaryāṃ gatvā'nyāṃ tato'nyatraiva saṃviśet

"सूना घर, वृक्ष की जड़, वन या गुफा, इनमें से किसी में अज्ञात भाव से रह लेने के बाद वह किसी और ही स्थान में जा ठहरे।"

श्लोक 15 (12.284.15)

अनुरोधविरोधाभ्यां समः स्यादचलो ध्रुवः । सुकृतं दुष्कृतं चोभे नानुरुध्येत कर्मणि ॥

anurodhavirodhābhyāṃ samaḥ syādacalo dhruvaḥ | sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ cobhe nānurudhyeta karmaṇi

"अनुकूलता और प्रतिकूलता में वह सम, अचल और स्थिर रहे। कर्म में पुण्य और पाप, दोनों का अनुसरण न करे।"

श्लोक 16 (12.284.16)

नित्यतृप्तः सुसंतृष्टः प्रसन्नवदनेन्द्रियः । विभीर्जप्यपरो मौनी वैराग्यं समुपाश्रितः ॥

nityatṛptaḥ susaṃtṛṣṭaḥ prasannavadanendriyaḥ | vibhīrjapyaparo maunī vairāgyaṃ samupāśritaḥ

"वह सदा तृप्त, भली-भाँति सन्तुष्ट, प्रसन्न मुख और इन्द्रियों वाला, निर्भय, जप में लगा हुआ, मौन रखने वाला और वैराग्य का आश्रय लिए हुए हो,"

श्लोक 17 (12.284.17)

अभ्यस्तं भौतिकं पश्यन्भूतानामागतिं गतिम् । विस्मितः सर्वदर्शी च पक्वापक्वेन वर्तयन् । आत्मारामः प्रशान्तात्मा लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ॥

abhyastaṃ bhautikaṃ paśyanbhūtānāmāgatiṃ gatim | vismitaḥ sarvadarśī ca pakvāpakvena vartayan | ātmārāmaḥ praśāntātmā laghvāhāro jitendriyaḥ

"भूतों से बने इस जगत् का बार-बार चिन्तन करता हुआ, प्राणियों के आने-जाने को देखता हुआ, विस्मित, सबको समान दृष्टि से देखने वाला, पके या कच्चे अन्न से निर्वाह करता हुआ, आत्मा में रमण करने वाला, शान्तचित्त, थोड़ा आहार करने वाला और जितेन्द्रिय हो,"

श्लोक 18 (12.284.18)

वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं । हिंसावेगमुदरोपस्थवेगम् । एतान्वेगान्विनयेद्वै तपस्वी । निन्दा चास्य हृदयं नोपहन्यात् ॥

vāco vegaṃ manasaḥ krodhavegaṃ | hiṃsāvegamudaropasthavegam | etānvegānvinayedvai tapasvī | nindā cāsya hṛdayaṃ nopahanyāt

"वाणी का वेग, मन और क्रोध का वेग, हिंसा का वेग, पेट और उपस्थ का वेग, तपस्वी इन वेगों को रोके, और निन्दा उसके हृदय को चोट न पहुँचाए।"

श्लोक 19 (12.284.19)

मध्यस्थ एव तिष्ठेत प्रशंसानिन्दयोः समः । एतत्पवित्रं परमं परिव्राजक आश्रयेत् ॥

madhyastha eva tiṣṭheta praśaṃsānindayoḥ samaḥ | etatpavitraṃ paramaṃ parivrājaka āśrayet

"वह बीच में स्थित रहे और प्रशंसा तथा निन्दा में सम रहे। परिव्राजक इसी परम पवित्र साधन का आश्रय ले।"

श्लोक 20 (12.284.20)

महात्मा सर्वतो दान्तः सर्वत्रैवानपाश्रितः । अपूर्वचारकः सौम्यो ह्यनिकेतः समाहितः ॥

mahātmā sarvato dāntaḥ sarvatraivānapāśritaḥ | apūrvacārakaḥ saumyo hyaniketaḥ samāhitaḥ

"वह महात्मा सब ओर से संयमी हो, कहीं आसक्त न हो, ऐसे मार्ग पर चले जिस पर पहले कोई न चला हो, और सौम्य, बिना घर का तथा एकाग्र रहे,"

श्लोक 21 (12.284.21)

वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां न संसृज्येत कर्हिचित् । अज्ञातलिप्सां लिप्सेत न चैनं हर्ष आविशेत् ॥

vānaprasthagṛhasthābhyāṃ na saṃsṛjyeta karhicit | ajñātalipsāṃ lipseta na cainaṃ harṣa āviśet

"वानप्रस्थों और गृहस्थों से वह कभी मेल-जोल न रखे। अज्ञात रहकर ही लाभ की इच्छा करे, और हर्ष उसमें प्रवेश न करे।"

श्लोक 22 (12.284.22)

विजानतां मोक्ष एष श्रमः स्यादविजानताम् । मोक्षयानमिदं कृत्स्नं विदुषां हारितोऽब्रवीत् ॥

vijānatāṃ mokṣa eṣa śramaḥ syādavijānatām | mokṣayānamidaṃ kṛtsnaṃ viduṣāṃ hārito'bravīt

"यह मोक्ष जानने वालों के लिए है; न जानने वालों के लिए तो केवल परिश्रम है। मोक्ष का यह सम्पूर्ण साधन हारीत ने विद्वानों के लिए कहा था।"

श्लोक 23 (12.284.23)

अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यः प्रव्रजेद्गृहात् । लोकास्तेजोमयास्तस्य तथाऽनन्त्याय कल्पते ॥

abhayaṃ sarvabhūtebhyo dattvā yaḥ pravrajedgṛhāt | lokāstejomayāstasya tathā'nantyāya kalpate

"जो सब प्राणियों को अभय देकर घर से प्रव्रज्या ले लेता है, उसे तेजोमय लोक मिलते हैं और वह अनन्त पद के योग्य होता है।"

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