शान्ति पर्व · अध्याय 285
पराजय में वृत्र की शान्ति
युधिष्ठिर विलाप करते हैं कि सब लोग पाण्डवों को धन्य कहते हैं, फिर भी वे मनुष्यों में सबसे दुखी हैं, और पूछते हैं कि वे राज्य छोड़कर उस अवस्था को कब पाएँगे जहाँ से मुनि नहीं लौटते। भीष्म कहते हैं कि सब कुछ, पुनर्जन्म भी, गिना हुआ है, उद्योग से समय आने पर वे वहाँ पहुँचेंगे, और जीव कर्मों से रँगा जाता है तथा ज्ञान से मुक्त होता है। फिर वे बताते हैं कि ऐश्वर्य से गिरे दैत्य वृत्र से उशना ने पूछा कि वह शोक क्यों नहीं करता; वृत्र समझाता है कि प्राणी अपने कर्मों के अनुसार कैसे भटकते हैं, अपना पुराना बल और विष्णु का दर्शन स्मरण करता है, और मुनि से पूछता है कि ऐश्वर्य कैसे मिलता और खोता है तथा किस कर्म या ज्ञान से परम फल पाया जाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.285.1)
धन्याधन्या इति जनाः सर्वेऽस्मान्प्रवदन्त्युत । न दुःखिततरः कश्चित्पुमानस्माभिरस्ति ह ॥
dhanyādhanyā iti janāḥ sarve'smānpravadantyuta | na duḥkhitataraḥ kaścitpumānasmābhirasti ha
"सब लोग हमें 'धन्य, धन्य' कहते हैं, किन्तु हमसे अधिक दुखी कोई मनुष्य नहीं है।"
श्लोक 2 (12.285.2)
लोकसंभावितैर्दुःखं यत्प्राप्तं कुरुसत्तम । प्राप्य जातिं मनुष्येषु देवैरपि पितामह ॥
lokasaṃbhāvitairduḥkhaṃ yatprāptaṃ kurusattama | prāpya jātiṃ manuṣyeṣu devairapi pitāmaha
"हे कुरुश्रेष्ठ पितामह, हम संसार से और देवताओं से भी सम्मान पाए हुए हैं, फिर भी मनुष्यों में जन्म लेकर हमने जो दुःख पाया है, वह हमारे हिस्से में आया है।"
श्लोक 3 (12.285.3)
कदा वयं करिष्यामः संन्यासं दुःखभेषजम् । दुःखमेतच्छरीराणां धारणं कुरुसत्तम ॥
kadā vayaṃ kariṣyāmaḥ saṃnyāsaṃ duḥkhabheṣajam | duḥkhametaccharīrāṇāṃ dhāraṇaṃ kurusattama
"दुःख की औषधि संन्यास हम कब लेंगे? हे कुरुश्रेष्ठ, शरीर धारण किए रहना ही दुःख है।"
श्लोक 4 (12.285.4)
विमुक्ताः सप्तदशभिर्हेतुभूतैश्च पञ्चभिः । इन्द्रियार्थैर्गुणैश्चैव अष्टाभिश्च पितामह ॥
vimuktāḥ saptadaśabhirhetubhūtaiśca pañcabhiḥ | indriyārthairguṇaiścaiva aṣṭābhiśca pitāmaha
"हे पितामह, सत्रह से, कारणरूप पाँच से, इन्द्रियों के विषयों से और आठ गुणों से मुक्त होकर"
श्लोक 5 (12.285.5)
न गच्छन्ति पुनर्भावं मुनयः संशितव्रताः । कदा वयं गमिष्यामो राज्यं हित्वा परंतप ॥
na gacchanti punarbhāvaṃ munayaḥ saṃśitavratāḥ | kadā vayaṃ gamiṣyāmo rājyaṃ hitvā paraṃtapa
"दृढ़ व्रत वाले मुनि फिर जन्म नहीं लेते। हे परंतप, राज्य छोड़कर हम वहाँ कब जाएँगे?"
भीष्म उवाच
श्लोक 6 (12.285.6)
नास्त्यनन्तं महाराज सर्वं सङ्ख्यानगोचरम् । पुनर्भावोऽपि संख्यातो नास्ति किंचिदिहाचलम् ॥
nāstyanantaṃ mahārāja sarvaṃ saṅkhyānagocaram | punarbhāvo'pi saṃkhyāto nāsti kiṃcidihācalam
"हे महाराज, कुछ भी अनन्त नहीं है; सब कुछ गणना के भीतर आता है। पुनर्जन्म भी गिना हुआ है; यहाँ कुछ भी अचल नहीं है।"
श्लोक 7 (12.285.7)
न चापि गम्यते राजन्नैष दोषः प्रसङ्गतः । उद्योगादेव धर्मज्ञाः कालेनैव गमिष्यथ ॥
na cāpi gamyate rājannaiṣa doṣaḥ prasaṅgataḥ | udyogādeva dharmajñāḥ kālenaiva gamiṣyatha
"हे राजन्, वह लक्ष्य अप्राप्य भी नहीं है; यह कोई ऐसा दोष नहीं जो वस्तुओं के स्वभाव से आता हो। हे धर्म के ज्ञाता, उद्योग से ही तुम समय आने पर वहाँ पहुँचोगे।"
श्लोक 8 (12.285.8)
नेशेऽयं सततं देही नृपते पुण्यपापयोः । तत एव समुत्थेन तमसा रुध्यतेऽपि च ॥
neśe'yaṃ satataṃ dehī nṛpate puṇyapāpayoḥ | tata eva samutthena tamasā rudhyate'pi ca
"हे राजन्, यह देहधारी जीव अपने पुण्य और पाप का स्वामी नहीं है। उन्हीं कर्मों से उठे हुए अन्धकार से वह रोक लिया जाता है।"
श्लोक 9 (12.285.9)
यथाञ्जनमयो वायुः पुनर्मानःशिलं रजः । अनुप्रविश्य तद्वर्णो दृश्यते रञ्जयन्दिशः ॥
yathāñjanamayo vāyuḥ punarmānaḥśilaṃ rajaḥ | anupraviśya tadvarṇo dṛśyate rañjayandiśaḥ
"जैसे वायु अंजन और फिर मैनसिल की धूल में प्रवेश करके उन्हीं के रंग की हो जाती है और दिशाओं को रँगती हुई दिखाई देती है,"
श्लोक 10 (12.285.10)
तथा कर्मफलैर्देही रञ्जितस्तमसा वृतः । विवर्णो वर्णमाश्रित्य देहेषु परिवर्तते ॥
tathā karmaphalairdehī rañjitastamasā vṛtaḥ | vivarṇo varṇamāśritya deheṣu parivartate
"वैसे ही देहधारी जीव कर्मफलों से रँगा हुआ और अन्धकार से ढका हुआ, स्वयं वर्णहीन होते हुए भी एक वर्ण धारण करके शरीर-शरीर में घूमता रहता है।"
श्लोक 11 (12.285.11)
ज्ञानेन हि यदा जन्तुरज्ञानप्रभवं तमः । व्यपोहति तदा ब्रह्म प्रकाशेत सनातनम् ॥
jñānena hi yadā janturajñānaprabhavaṃ tamaḥ | vyapohati tadā brahma prakāśeta sanātanam
"जब प्राणी ज्ञान से अज्ञान से उपजे अन्धकार को दूर कर देता है, तब सनातन ब्रह्म प्रकाशित होता है।"
श्लोक 12 (12.285.12)
अयत्नसाध्यं मुनयो वदन्ति । ये चापि मुक्तास्तदुपासितव्याः । त्वया च लोकेन च सामरेण । तस्मान्न शाम्यन्ति महर्षिसङ्घाः ॥
ayatnasādhyaṃ munayo vadanti | ye cāpi muktāstadupāsitavyāḥ | tvayā ca lokena ca sāmareṇa | tasmānna śāmyanti maharṣisaṅghāḥ
"मुनि कहते हैं कि वह बिना प्रयास के भी सिद्ध हो जाता है; और जो मुक्त हैं, उनकी उपासना तुम्हें और देवताओं सहित संसार को करनी चाहिए। इसीलिए महर्षियों के समूह शान्त होकर बैठ नहीं जाते।"
श्लोक 13 (12.285.13)
अस्मिन्नर्थे पुरा गीतं शृणुष्वैकमना नृप । यथा दैत्येन वृत्रेण भ्रष्टैश्वर्येण चेष्टितम् ॥
asminnarthe purā gītaṃ śṛṇuṣvaikamanā nṛpa | yathā daityena vṛtreṇa bhraṣṭaiśvaryeṇa ceṣṭitam
"हे राजन्, इस विषय में पुराना गीत एकाग्र मन से सुनो कि ऐश्वर्य से गिरे हुए दैत्य वृत्र ने कैसा आचरण किया था।"
श्लोक 14 (12.285.14)
निर्जितेनासहायेन हृतराज्येन भारत । अशोचता शत्रुमध्ये बुद्धिमास्थाय केवलाम् ॥
nirjitenāsahāyena hṛtarājyena bhārata | aśocatā śatrumadhye buddhimāsthāya kevalām
"हे भारत, पराजित, सहायकहीन और राज्य से वंचित होकर भी वह शत्रुओं के बीच शुद्ध एकाग्र बुद्धि का सहारा लेकर शोक नहीं कर रहा था।"
श्लोक 15 (12.285.15)
भ्रष्टैश्वर्यं पुरा वृत्रमुशना वाक्यमब्रवीत् । कच्चित्पराजितस्याद्य न व्यथा तेऽस्ति दानव ॥
bhraṣṭaiśvaryaṃ purā vṛtramuśanā vākyamabravīt | kaccitparājitasyādya na vyathā te'sti dānava
"ऐश्वर्य से गिरे हुए वृत्र से उशना ने कहा: 'हे दानव, पराजित हो जाने पर भी तुम्हें कोई व्यथा तो नहीं है?'"
वृत्र उवाच
श्लोक 16 (12.285.16)
सत्येन तपसा चैव विदित्वा संक्षयं ह्यहम् । न शोचामि न हृष्यामि भूतानामागतिं गतिम् ॥
satyena tapasā caiva viditvā saṃkṣayaṃ hyaham | na śocāmi na hṛṣyāmi bhūtānāmāgatiṃ gatim
"सत्य और तप से मैंने सब वस्तुओं के क्षय को जान लिया है, इसलिए मैं न शोक करता हूँ, न हर्ष; मैं प्राणियों के आने और जाने को जानता हूँ।"
श्लोक 17 (12.285.17)
कालसंचोदिता जीवा मज्जन्ति नरकेऽवशाः । परिहृष्टानि सर्वाणि दिव्यान्याहुर्मनीषिणः ॥
kālasaṃcoditā jīvā majjanti narake'vaśāḥ | parihṛṣṭāni sarvāṇi divyānyāhurmanīṣiṇaḥ
"काल से प्रेरित असहाय प्राणी नरक में डूबते हैं। मनीषी कहते हैं कि दिव्य लोक सब आनन्द से भरे हैं।"
श्लोक 18 (12.285.18)
क्षपयित्वा तु तं कालं गणितं कालचोदिताः । सावशेषेण कालेन संधावन्ति पुनःपुनः ॥
kṣapayitvā tu taṃ kālaṃ gaṇitaṃ kālacoditāḥ | sāvaśeṣeṇa kālena saṃdhāvanti punaḥpunaḥ
"नियत गिने हुए काल को बिताकर, काल से प्रेरित होकर वे अपने बचे हुए काल के साथ बार-बार दौड़ते हुए नए जन्मों में जाते हैं।"
श्लोक 19 (12.285.19)
तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च । निर्गच्छन्त्यवशा जीवाः कालबन्धनबन्धनाः ॥
tiryagyonisahasrāṇi gatvā narakameva ca | nirgacchantyavaśā jīvāḥ kālabandhanabandhanāḥ
"हज़ारों पशु-योनियों और नरक में भी जाकर, काल के बन्धनों में बँधे हुए असहाय प्राणी बाहर निकलते हैं।"
श्लोक 20 (12.285.20)
एवं संसरमाणानि ह्यहं भूतानि दृष्टवान् । यथा कर्म तथा लाभ इति शास्त्रनिदर्शनम् ॥
evaṃ saṃsaramāṇāni hyahaṃ bhūtāni dṛṣṭavān | yathā karma tathā lābha iti śāstranidarśanam
"इस प्रकार मैंने प्राणियों को जन्म से जन्म में भटकते देखा है: जैसा कर्म, वैसा फल। यही शास्त्र का उपदेश है।"
श्लोक 21 (12.285.21)
तिर्यग्गच्छन्ति नरकं मानुष्यं दैवमेव च । सुखदुःखे प्रिये द्वेष्ये चरित्वा पूर्वमेव च ॥
tiryaggacchanti narakaṃ mānuṣyaṃ daivameva ca | sukhaduḥkhe priye dveṣye caritvā pūrvameva ca
"पहले सुख-दुःख और प्रिय-अप्रिय को भोगकर वे तिर्यक् योनि, नरक, मनुष्य-जन्म या देव-जन्म में जाते हैं।"
श्लोक 22 (12.285.22)
कृतान्तविधिसंयुक्तः सर्वो लोकः प्रपद्यते । गतं गच्छन्ति चाध्वानं सर्वभूतानि सर्वदा ॥
kṛtāntavidhisaṃyuktaḥ sarvo lokaḥ prapadyate | gataṃ gacchanti cādhvānaṃ sarvabhūtāni sarvadā
"सारा संसार अन्तक के विधान से बँधा हुआ आगे बढ़ता है; सब प्राणी सदा उसी मार्ग पर चलते हैं जिस पर पहले चल चुके हैं।"
भीष्म उवाच
श्लोक 23 (12.285.23)
कालसङ्ख्यानसङ्ख्येयं सृष्टिस्थितिपरायणम् । तं भाषमाणं भगवानुशना प्रत्यभाषत । इमान्दुष्टप्रलापांस्त्वं तात कस्मात्प्रभाषते ॥
kālasaṅkhyānasaṅkhyeyaṃ sṛṣṭisthitiparāyaṇam | taṃ bhāṣamāṇaṃ bhagavānuśanā pratyabhāṣata | imānduṣṭapralāpāṃstvaṃ tāta kasmātprabhāṣate
वृत्र ने यह सब काल की गणना से मापा हुआ और सृष्टि तथा स्थिति पर टिका हुआ बताया। उसके यह कहने पर भगवान् उशना ने उत्तर दिया: "वत्स, तुम ऐसी दुष्ट बातें क्यों कह रहे हो?"
वृत्र उवाच
श्लोक 24 (12.285.24)
प्रत्यक्षमेतद्भवतस्तथाऽन्येषां मनीषिणाम् । मया यज्जयलुब्धेन पुरा तप्तं महत्तपः ॥
pratyakṣametadbhavatastathā'nyeṣāṃ manīṣiṇām | mayā yajjayalubdhena purā taptaṃ mahattapaḥ
"आपको और अन्य मनीषियों को भी प्रत्यक्ष है कि विजय के लोभ से मैंने पहले महान तप किया था।"
श्लोक 25 (12.285.25)
गन्धानादाय भूतानां रसांश्च विविधानपि । अवर्धं त्रीन्समाक्रम्य लोकान्वै स्वेन तेजसा ॥
gandhānādāya bhūtānāṃ rasāṃśca vividhānapi | avardhaṃ trīnsamākramya lokānvai svena tejasā
"प्राणियों के गन्ध और नाना प्रकार के रस लेकर मैं बढ़ा और अपने तेज से तीनों लोकों पर छा गया।"
श्लोक 26 (12.285.26)
ज्वालामालापरिक्षिप्तो वैहायसगतिस्तथा । अजेयः सर्वभूतानामासं नित्यमपेतभीः ॥
jvālāmālāparikṣipto vaihāyasagatistathā | ajeyaḥ sarvabhūtānāmāsaṃ nityamapetabhīḥ
"ज्वालाओं की माला से घिरा हुआ, आकाश में विचरता हुआ मैं सब प्राणियों के लिए अजेय था और सदा निर्भय रहता था।"
श्लोक 27 (12.285.27)
ऐश्वर्यं तपसा प्राप्तं भ्रष्टं तच्च स्वकर्मभिः । धृतिमास्थाय भगवन्न शोचामि ततस्त्वहम् ॥
aiśvaryaṃ tapasā prāptaṃ bhraṣṭaṃ tacca svakarmabhiḥ | dhṛtimāsthāya bhagavanna śocāmi tatastvaham
"मैंने तप से ऐश्वर्य पाया और अपने ही कर्मों से उसे खो दिया। हे भगवन्, इसीलिए मैं धैर्य धारण करके शोक नहीं करता।"
श्लोक 28 (12.285.28)
युयुत्सता महेन्द्रेण पुरा सार्धं महात्मना । ततो मे भगवान्दृष्टो हरिर्नारायणः प्रभुः ॥
yuyutsatā mahendreṇa purā sārdhaṃ mahātmanā | tato me bhagavāndṛṣṭo harirnārāyaṇaḥ prabhuḥ
"बहुत पहले जब मैं महात्मा महेन्द्र से युद्ध करने को उत्सुक था, तब मैंने भगवान् प्रभु हरि नारायण को देखा था।"
श्लोक 29 (12.285.29)
वैकुण्ठः पुरुषोऽनन्तः शुक्लो विष्णुः सनातनः । मुञ्जकेशो हरिश्मश्रुः सर्वभूतपितामहः ॥
vaikuṇṭhaḥ puruṣo'nantaḥ śuklo viṣṇuḥ sanātanaḥ | muñjakeśo hariśmaśruḥ sarvabhūtapitāmahaḥ
"वैकुण्ठ, पुरुष, अनन्त, शुक्ल, सनातन विष्णु, मुँज-जैसे केशों और हरे-पीले रंग की दाढ़ी वाले, सब प्राणियों के पितामह।"
श्लोक 30 (12.285.30)
नूनं तु तस्य तपसः सावशेषं ममास्ति वै । यदहं प्रष्टुमिच्छामि भवन्तं कर्मणः फलम् ॥
nūnaṃ tu tasya tapasaḥ sāvaśeṣaṃ mamāsti vai | yadahaṃ praṣṭumicchāmi bhavantaṃ karmaṇaḥ phalam
"निश्चय ही उस तप का कुछ अंश अब भी मेरे पास बचा है, क्योंकि मैं आपसे कर्म के फल के विषय में पूछना चाहता हूँ।"
श्लोक 31 (12.285.31)
ऐश्वर्यं वै महद्ब्रह्मन्वर्णे कस्मिन्प्रतिष्ठितम् । निवर्तते चापि पुनः कथमैश्वर्यमुत्तमम् ॥
aiśvaryaṃ vai mahadbrahmanvarṇe kasminpratiṣṭhitam | nivartate cāpi punaḥ kathamaiśvaryamuttamam
"हे ब्रह्मन्, महान ऐश्वर्य किस वर्ण में स्थित है? और वह उत्तम ऐश्वर्य फिर कैसे लौट जाता है?"
श्लोक 32 (12.285.32)
भवन्ति कस्माद्भूतानि प्रवर्तन्ते यथा पुनः । किं वा फलं परं प्राप्य जीवस्तिष्ठति शाश्वतः ॥
bhavanti kasmādbhūtāni pravartante yathā punaḥ | kiṃ vā phalaṃ paraṃ prāpya jīvastiṣṭhati śāśvataḥ
"प्राणी कैसे उत्पन्न होते हैं और फिर कैसे प्रवृत्त होते हैं? और वह परम फल कौन-सा है जिसे पाकर जीव शाश्वत रूप से स्थित रहता है?"
श्लोक 33 (12.285.33)
केन वा कर्मणा शक्यमथ ज्ञानेन केन वा । ब्रह्मर्षे तत्फलं प्राप्तुं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
kena vā karmaṇā śakyamatha jñānena kena vā | brahmarṣe tatphalaṃ prāptuṃ tanme vyākhyātumarhasi
"हे ब्रह्मर्षि, किस कर्म से या किस ज्ञान से उस फल को पाया जा सकता है? कृपया मुझे यह समझाइए।"
भीष्म उवाच
श्लोक 34 (12.285.34)
इतीदमुक्तः स मुनिस्तदानीं । प्रत्याह यत्तच्छृणु राजसिंह । मयोच्यमानं पुरुषर्षभ त्व । मनन्यचित्तः सह सोदरीयैः ॥
itīdamuktaḥ sa munistadānīṃ | pratyāha yattacchṛṇu rājasiṃha | mayocyamānaṃ puruṣarṣabha tva | mananyacittaḥ saha sodarīyaiḥ
यह कहे जाने पर उन मुनि ने तब उत्तर दिया। हे राजसिंह, हे पुरुषश्रेष्ठ, मैं जो कहता हूँ उसे अपने भाइयों के साथ एकाग्र मन से सुनो।