शान्ति पर्व · अध्याय 286
सनत्कुमार का वृत्र को विष्णु-माहात्म्य का उपदेश
उशना और वृत्र की बातचीत के बीच मुनि सनत्कुमार आ पहुँचते हैं और उशना के कहने पर वृत्र को विष्णु का माहात्म्य सुनाते हैं। सारा जगत् विष्णु में स्थित है, जो इन्द्रियों के संयम और अनेक जन्मों की शुद्धि से प्राप्त होता है। सनत्कुमार जीवों के काले से शुक्ल तक छः वर्ण बताते हैं और यह भी कि अनगिनत संहार-सृष्टियों में जीव निम्नतम से उच्चतम तक कैसे चढ़ता है। सन्तुष्ट वृत्र प्राण त्याग देता है और परम धाम को पाता है। फिर युधिष्ठिर वर्णों और पाण्डवों की गति के विषय में पूछते हैं, और भीष्म उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि वे देवलोकों में जाएँगे, फिर मनुष्य होकर जन्म लेंगे और अन्त में सिद्धों में पहुँचेंगे।
उशना उवाच
श्लोक 1 (12.286.1)
नमस्तस्मै भगवते देवाय प्रभविष्णवे । यस्य पृथ्वी तलं तात साकाशं बाहुगोचरः ॥
namastasmai bhagavate devāya prabhaviṣṇave | yasya pṛthvī talaṃ tāta sākāśaṃ bāhugocaraḥ
"उस भगवान् देव, उस सर्वसमर्थ को नमस्कार है, जिसका तल पृथ्वी है, हे तात, और जिसकी भुजाओं का क्षेत्र आकाश-सहित सब कुछ है,"
श्लोक 2 (12.286.2)
मूर्धा यस्य त्वनन्तं च स्थानं दानवसत्तम । तस्याहं ते प्रवक्ष्यामि विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ॥
mūrdhā yasya tvanantaṃ ca sthānaṃ dānavasattama | tasyāhaṃ te pravakṣyāmi viṣṇormāhātmyamuttamam
"और जिसका मस्तक अनन्त परम धाम है, हे दानवश्रेष्ठ। उन्हीं विष्णु का परम माहात्म्य मैं तुमसे कहूँगा।"
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.286.3)
तयोः संवदतोरेवमाजगाम महामुनिः । सनत्कुमारो धर्मात्मा संशयच्छेदनाय वै ॥
tayoḥ saṃvadatorevamājagāma mahāmuniḥ | sanatkumāro dharmātmā saṃśayacchedanāya vai
जब वे दोनों इस प्रकार बातचीत कर रहे थे, तब धर्मात्मा महामुनि सनत्कुमार उनके संशय दूर करने के लिए वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 4 (12.286.4)
स पूजितोऽसुरेन्द्रेण मुनिनोशनसा तथा । निषसादासने राजन्महार्हे मुनिपुङ्गवः ॥
sa pūjito'surendreṇa muninośanasā tathā | niṣasādāsane rājanmahārhe munipuṅgavaḥ
हे राजन्, असुरों के स्वामी और मुनि उशना से सम्मान पाकर वे मुनिश्रेष्ठ एक उत्तम आसन पर बैठे।
श्लोक 5 (12.286.5)
तमासीनं महाप्रज्ञमुशना वाक्यमब्रवीत् । ब्रूह्यस्मै दानवेन्द्राय विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ॥
tamāsīnaṃ mahāprajñamuśanā vākyamabravīt | brūhyasmai dānavendrāya viṣṇormāhātmyamuttamam
वहाँ बैठे हुए उन महाप्राज्ञ से उशना ने कहा: "इन दानवेन्द्र को विष्णु का परम माहात्म्य बताइए।"
श्लोक 6 (12.286.6)
सनत्कुमारस्तु वचः श्रुत्वा प्राह वचोऽर्थवत् । विष्णोर्माहात्म्यसंयुक्तं दानवेन्द्राय धीमते ॥
sanatkumārastu vacaḥ śrutvā prāha vaco'rthavat | viṣṇormāhātmyasaṃyuktaṃ dānavendrāya dhīmate
यह सुनकर सनत्कुमार ने बुद्धिमान दानवेन्द्र से अर्थपूर्ण वचन कहे, जो विष्णु के माहात्म्य से भरे थे।
सनत्कुमार उवाच
श्लोक 7 (12.286.7)
शृणु सर्वमिदं दैत्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् । विष्णौ जगत्स्थितं सर्वमिति विद्धि परंतप ॥
śṛṇu sarvamidaṃ daitya viṣṇormāhātmyamuttamam | viṣṇau jagatsthitaṃ sarvamiti viddhi paraṃtapa
"हे दैत्य, विष्णु का यह सम्पूर्ण परम माहात्म्य सुनो। हे परंतप, जान लो कि सारा जगत् विष्णु में ही स्थित है।"
श्लोक 8 (12.286.8)
अस्मिन्गच्छन्ति विलयमस्माच्च प्रभवन्त्युत । अवत्येष महाबाहुर्भूतग्रामं चराचरम् । एष चाक्षिपते काले काले च सृजते पुनः ॥
asmingacchanti vilayamasmācca prabhavantyuta | avatyeṣa mahābāhurbhūtagrāmaṃ carācaram | eṣa cākṣipate kāle kāle ca sṛjate punaḥ
"उसी में सब लय को प्राप्त होते हैं और उसी से उत्पन्न होते हैं। यह महाबाहु चर-अचर प्राणिसमूह की रक्षा करता है। यही समय आने पर उन्हें समेट लेता है और समय आने पर फिर रचता है।"
श्लोक 9 (12.286.9)
नैष दानव ते शक्यस्तपसा नैव चेज्यया । संप्राप्तुमिन्द्रियाणां तु संयमेनैव शक्यते ॥
naiṣa dānava te śakyastapasā naiva cejyayā | saṃprāptumindriyāṇāṃ tu saṃyamenaiva śakyate
"हे दानव, वह न तप से पाया जा सकता है, न यज्ञ से; उसे केवल इन्द्रियों के संयम से पाया जा सकता है।"
श्लोक 10 (12.286.10)
बाह्ये चाभ्यन्तरे चैव कर्मणा मनसि स्थितः । निर्मलीकुरुते बुद्ध्या सोऽमुत्रानन्त्यमश्नुते ॥
bāhye cābhyantare caiva karmaṇā manasi sthitaḥ | nirmalīkurute buddhyā so'mutrānantyamaśnute
"जो मन में स्थिर रहकर बाहर और भीतर के कर्म से बुद्धि द्वारा अपने को निर्मल कर लेता है, वह परलोक में अनन्त पद पाता है।"
श्लोक 11 (12.286.11)
यथा हिरण्यकर्ता वै रूप्यमग्नौ विशोधयेत् । बहुशोऽतिप्रयत्नेन महताऽऽत्मकृतेन ह ॥
yathā hiraṇyakartā vai rūpyamagnau viśodhayet | bahuśo'tiprayatnena mahatā''tmakṛtena ha
"जैसे सुनार बड़े प्रयत्न और अपने ही परिश्रम से चाँदी को आग में बार-बार शुद्ध करता है,"
श्लोक 12 (12.286.12)
तद्वज्जातिशतैर्जीवः शुद्ध्यतेऽल्पेन कर्मणा । यत्नेन महता चैवाप्येकजातौ विशुद्ध्यते ॥
tadvajjātiśatairjīvaḥ śuddhyate'lpena karmaṇā | yatnena mahatā caivāpyekajātau viśuddhyate
"वैसे ही जीव सैकड़ों जन्मों में थोड़े-थोड़े कर्म से शुद्ध होता है; और बड़े प्रयत्न से तो वह एक ही जन्म में शुद्ध हो जाता है।"
श्लोक 13 (12.286.13)
लीलयाऽल्पं यथा गात्रात्प्रमृज्यादात्मनो रजः । बहुयत्नेन महता दोषनिर्हरणं तथा ॥
līlayā'lpaṃ yathā gātrātpramṛjyādātmano rajaḥ | bahuyatnena mahatā doṣanirharaṇaṃ tathā
"शरीर की थोड़ी-सी धूल खेल-खेल में पोंछी जा सकती है, पर दोषों को दूर करने के लिए बहुत और बड़ा प्रयत्न चाहिए।"
श्लोक 14 (12.286.14)
यथा चाल्पेन माल्येन वासितं तिलसर्षपम् । न मुञ्चति स्वकं गन्धं तथा सूक्ष्मस्य दर्शनम् ॥
yathā cālpena mālyena vāsitaṃ tilasarṣapam | na muñcati svakaṃ gandhaṃ tathā sūkṣmasya darśanam
"जैसे थोड़ी-सी माला से सुवासित किए गए तिल और सरसों अपनी गन्ध नहीं छोड़ते, वैसे ही सूक्ष्म तत्त्व का दर्शन भी है।"
श्लोक 15 (12.286.15)
तदेव बहुभिर्माल्यैर्वास्यमानं पुनः पुनः । विमुच्य तं स्वकं गन्धं माल्यगन्धेऽवतिष्ठते ॥
tadeva bahubhirmālyairvāsyamānaṃ punaḥ punaḥ | vimucya taṃ svakaṃ gandhaṃ mālyagandhe'vatiṣṭhate
"पर वही तिल-सरसों जब बहुत-सी मालाओं से बार-बार सुवासित किए जाते हैं, तब वे अपनी गन्ध छोड़कर मालाओं की गन्ध में ही बने रहते हैं।"
श्लोक 16 (12.286.16)
एवं जातिशतैर्युक्तो गुणैरेव प्रसङ्गिषु । बुद्ध्या निवर्तते दोषो यत्नेनाभ्यासजेन ह ॥
evaṃ jātiśatairyukto guṇaireva prasaṅgiṣu | buddhyā nivartate doṣo yatnenābhyāsajena ha
"इसी प्रकार सैकड़ों जन्मों में आसक्ति के विषयों के बीच भी गुणों से युक्त रहने पर, बुद्धि और अभ्यास से उपजे प्रयत्न द्वारा मनुष्य का दोष दूर हो जाता है।"
श्लोक 17 (12.286.17)
कर्मणा स्वेन रक्तानि विरक्तानि च दानव । यथा कर्मविशेषांश्च प्राप्नुवन्ति तथा शृणु ॥
karmaṇā svena raktāni viraktāni ca dānava | yathā karmaviśeṣāṃśca prāpnuvanti tathā śṛṇu
"हे दानव, प्राणी अपने ही कर्म से आसक्त या विरक्त होते हैं। और यह भी सुनो कि वे अपने कर्मों के भिन्न-भिन्न फल कैसे पाते हैं।"
श्लोक 18 (12.286.18)
यथावत्संप्रवर्तन्ते यस्मिंस्तिष्ठति चानिशम् । तत्तेऽनुपूर्व्या व्याख्यास्ये तदिहैकमनाः शृणु ॥
yathāvatsaṃpravartante yasmiṃstiṣṭhati cāniśam | tatte'nupūrvyā vyākhyāsye tadihaikamanāḥ śṛṇu
"वे ठीक-ठीक कैसे चलते हैं और किसमें स्थित रहते हैं, यह मैं तुम्हें क्रम से बताऊँगा। उसे अब एकाग्र मन से सुनो।"
श्लोक 19 (12.286.19)
अनादिनिधनः श्रीमान्हरिर्नारायणः प्रभुः । देवः सृजति भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥
anādinidhanaḥ śrīmānharirnārāyaṇaḥ prabhuḥ | devaḥ sṛjati bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca
"अनादि और अनन्त, श्रीमान् प्रभु देव हरि नारायण स्थावर और जंगम प्राणियों की सृष्टि करते हैं।"
श्लोक 20 (12.286.20)
एष सर्वेषु भूतेषु क्षरश्चाक्षर एव च । एकादश विकारात्मा जगत्पिबति रश्मिभिः ॥
eṣa sarveṣu bhūteṣu kṣaraścākṣara eva ca | ekādaśa vikārātmā jagatpibati raśmibhiḥ
"वही सब प्राणियों में क्षर भी है और अक्षर भी। ग्यारह विकारों से युक्त स्वरूप वाला वह अपनी किरणों से जगत् को पी लेता है।"
श्लोक 21 (12.286.21)
पादौ तस्य महीं विद्धि मूर्धानं दिवमेव च । बाहवस्तु दिशो दैत्य श्रोत्रमाकाशमेव च ॥
pādau tasya mahīṃ viddhi mūrdhānaṃ divameva ca | bāhavastu diśo daitya śrotramākāśameva ca
"पृथ्वी को उसके चरण और स्वर्ग को उसका मस्तक जानो; हे दैत्य, दिशाएँ उसकी भुजाएँ हैं और आकाश उसका कान है।"
श्लोक 22 (12.286.22)
तस्य तेजोमयः सूर्यो मनश्चन्द्रमसि स्थितम् । बुद्धिर्ज्ञानगता नित्यं रसस्त्वप्सु प्रवर्तते ॥
tasya tejomayaḥ sūryo manaścandramasi sthitam | buddhirjñānagatā nityaṃ rasastvapsu pravartate
"तेजोमय सूर्य उसका है, चन्द्रमा में स्थित मन उसका है; ज्ञान में बसने वाली बुद्धि सदा उसकी है और रस जल में प्रवृत्त होता है।"
श्लोक 23 (12.286.23)
भ्रुवोरनन्तरास्तस्य ग्रहा दानवसत्तम । नक्षत्रचक्रं नेत्रं च आस्यमग्निं च दानव । तं विश्वभूतं विश्वादिं परमं विद्धि चेश्वरम् ॥
bhruvoranantarāstasya grahā dānavasattama | nakṣatracakraṃ netraṃ ca āsyamagniṃ ca dānava | taṃ viśvabhūtaṃ viśvādiṃ paramaṃ viddhi ceśvaram
"हे दानवश्रेष्ठ, ग्रह उसकी भौंहों के निकट हैं; नक्षत्र-चक्र, नेत्र और मुख, ये अग्नि हैं, हे दानव। उसे विश्वरूप, विश्व का आदि और परम ईश्वर जानो।"
श्लोक 24 (12.286.24)
रजस्तमश्च सत्वं च विद्धि नारायणात्मकम् । सोऽऽश्रमाणां मुखं तात कर्मणस्तत्फलं विदुः ॥
rajastamaśca satvaṃ ca viddhi nārāyaṇātmakam | so''śramāṇāṃ mukhaṃ tāta karmaṇastatphalaṃ viduḥ
"रजस्, तमस् और सत्त्व को नारायण का ही स्वरूप जानो। हे तात, वही आश्रमों का मुख है; विद्वान् उसी को कर्म का फल मानते हैं।"
श्लोक 25 (12.286.25)
अकर्मणः फलं चैव स एव परमोऽव्ययः । छन्दांसि यस्य रोमाणि ह्यक्षरं च सरस्वती ॥
akarmaṇaḥ phalaṃ caiva sa eva paramo'vyayaḥ | chandāṃsi yasya romāṇi hyakṣaraṃ ca sarasvatī
"और अकर्म का फल भी वही है; वही परम और अविनाशी है। छन्द उसके रोम हैं, और अक्षर तथा सरस्वती उसी की हैं।"
श्लोक 26 (12.286.26)
बह्वाश्रयो बहुमुखो धर्मो हृदि समाश्रितः । स ब्रह्मपरमो धर्मस्तपश्च सदसच्च सः ॥
bahvāśrayo bahumukho dharmo hṛdi samāśritaḥ | sa brahmaparamo dharmastapaśca sadasacca saḥ
"अनेक आश्रयों और अनेक मुखों वाला धर्म हृदय में स्थित है। वही परम ब्रह्मरूप धर्म है; वही तप है, वही सत् और असत् है।"
श्लोक 27 (12.286.27)
श्रोत्रशास्त्रग्रहोपेतः षोडशर्त्विक्क्रतुश्च सः । पितामहश्च रुद्रश्च सोऽश्विनौ स पुरंदरः ॥
śrotraśāstragrahopetaḥ ṣoḍaśartvikkratuśca saḥ | pitāmahaśca rudraśca so'śvinau sa puraṃdaraḥ
"वह श्रवण, शास्त्र और यज्ञ-पात्रों से युक्त है, और सोलह ऋत्विजों वाला यज्ञ भी वही है। वही पितामह है, वही रुद्र है, वही दोनों अश्विनीकुमार है, वही पुरन्दर है।"
श्लोक 28 (12.286.28)
मित्रोऽथ वरुणश्चैव यमोऽथ धनदस्तथा । ते पृथग्दर्शनास्तस्य संविदन्ति तथैकताम् । एकस्य विद्धि देवस्य सर्वं जगदिदं वशे ॥
mitro'tha varuṇaścaiva yamo'tha dhanadastathā | te pṛthagdarśanāstasya saṃvidanti tathaikatām | ekasya viddhi devasya sarvaṃ jagadidaṃ vaśe
"मित्र और वरुण, यम और कुबेर, ये अलग-अलग दिखाई देते हुए भी उसमें एकता को प्राप्त होते हैं। जान लो कि यह सारा जगत् एक ही देव के वश में है।"
श्लोक 29 (12.286.29)
नानाभूतस्य दैत्येन्द्र तस्यैकत्वं वदन्त्यपि । जन्तुः पश्यति विज्ञानात्ततः सत्वं प्रकाशते ॥
nānābhūtasya daityendra tasyaikatvaṃ vadantyapi | jantuḥ paśyati vijñānāttataḥ satvaṃ prakāśate
"हे दैत्येन्द्र, अनेक रूप होने पर भी लोग उसकी एकता कहते हैं। जीव उसे विज्ञान से देखता है, तब सत्त्व प्रकाशित होता है।"
श्लोक 30 (12.286.30)
संहारविक्षेपसहस्रकोटी । स्तिष्ठन्ति जीवाः प्रचरन्ति चान्ये । प्रजाविसर्गस्य च पारिमाण्यं । वापीसहस्राणि बहूनि दैत्य ॥
saṃhāravikṣepasahasrakoṭī | stiṣṭhanti jīvāḥ pracaranti cānye | prajāvisargasya ca pārimāṇyaṃ | vāpīsahasrāṇi bahūni daitya
"संहार और सृष्टि के हज़ारों करोड़ चक्र हैं; कुछ जीव ठहरे रहते हैं और दूसरे विचरते हैं। और हे दैत्य, प्राणियों की सृष्टि के परिमाण के लिए बहुत-से हज़ारों सरोवर हैं।"
श्लोक 31 (12.286.31)
वाप्यः पुनर्योजनविस्तृतास्ताः । क्रोशं च गम्भीरतयाऽवगाढाः । आयामतः पञ्चशताश्च सर्वाः । प्रत्येकशो योजनतः प्रवृद्धाः ॥
vāpyaḥ punaryojanavistṛtāstāḥ | krośaṃ ca gambhīratayā'vagāḍhāḥ | āyāmataḥ pañcaśatāśca sarvāḥ | pratyekaśo yojanataḥ pravṛddhāḥ
"वे सरोवर प्रत्येक एक योजन चौड़े, एक कोस गहरे और पाँच सौ लम्बे हैं, और हर एक योजन-योजन करके बढ़ता जाता है।"
श्लोक 32 (12.286.32)
वाप्या जलं क्षिप्यति वालकोट्या । त्वह्ना सकृच्चाप्यथ न द्वितीयम् । तासां क्षये विद्धि परं विसर्गं । संहारमेकं च तथा प्रजानाम् ॥
vāpyā jalaṃ kṣipyati vālakoṭyā | tvahnā sakṛccāpyatha na dvitīyam | tāsāṃ kṣaye viddhi paraṃ visargaṃ | saṃhāramekaṃ ca tathā prajānām
"सरोवर से जल बाल की नोक से दिन में एक बार निकाला जाता है, दूसरी बार नहीं। जब वे सरोवर समाप्त हो जाएँ, तब उसे परम सृष्टि और प्राणियों का एक संहार जानो।"
श्लोक 33 (12.286.33)
षड्जीववर्णाः परमं प्रमाणं । कृष्णो धूम्रो नीलमथास्य मध्यम् । रक्तं पुनः सह्यतरं सुखं तु । हारिद्रवर्णं सुसुखं च शुक्लम् ॥
ṣaḍjīvavarṇāḥ paramaṃ pramāṇaṃ | kṛṣṇo dhūmro nīlamathāsya madhyam | raktaṃ punaḥ sahyataraṃ sukhaṃ tu | hāridravarṇaṃ susukhaṃ ca śuklam
"जीवों के छः वर्ण परम प्रमाण हैं: काला, धूम्र और नीला, जो उनके बीच का है; फिर लाल, जो अधिक सहने योग्य और सुखद है; हल्दी जैसा पीला, जो बहुत सुखद है; और शुक्ल।"
श्लोक 34 (12.286.34)
परं तु शुक्लं विमलं विशोकं । गतक्लमं सिद्ध्यति दानवेन्द्र । गत्वा तु योनिप्रभवाणि दैत्य । सहस्रशः सिद्धिमुपैति जीवः ॥
paraṃ tu śuklaṃ vimalaṃ viśokaṃ | gataklamaṃ siddhyati dānavendra | gatvā tu yoniprabhavāṇi daitya | sahasraśaḥ siddhimupaiti jīvaḥ
"सबसे ऊँचा शुक्ल वर्ण है, निर्मल, शोकहीन और क्लेशरहित; हे दानवेन्द्र, उसी में जीव सिद्ध होता है। हे दैत्य, योनियों से उत्पन्न हज़ारों जन्मों से गुज़रकर जीव सिद्धि पाता है।"
श्लोक 35 (12.286.35)
गतिं च यां दर्शनमाह देवो । गत्वा शुभं दर्शनमेव चापि । गतिः पुनर्वर्णकृता प्रजानां । वर्णस्तथा कालकृतोऽसुरेन्द्र ॥
gatiṃ ca yāṃ darśanamāha devo | gatvā śubhaṃ darśanameva cāpi | gatiḥ punarvarṇakṛtā prajānāṃ | varṇastathā kālakṛto'surendra
"जिस गति को देव ने दर्शन कहा है, और शुभ दर्शन को पाकर भी: प्राणियों की गति वर्ण से बनती है, और वर्ण काल से बनता है, हे असुरेन्द्र।"
श्लोक 36 (12.286.36)
शतं सहस्राणि चतुर्दशेह । परा गतिर्जीवगणस्य दैत्य । आरोहणं तत्कृतमेव विद्धि । स्थानं तथा निःसरणं च तेषाम् ॥
śataṃ sahasrāṇi caturdaśeha | parā gatirjīvagaṇasya daitya | ārohaṇaṃ tatkṛtameva viddhi | sthānaṃ tathā niḥsaraṇaṃ ca teṣām
"हे दैत्य, यहाँ जीवसमूह की परम गति चौदह लाख है। उन्हीं से उनका आरोहण बना हुआ जानो, और उनका ठहरना तथा निकलना भी।"
श्लोक 37 (12.286.37)
योऽस्मादथ भ्रश्यति कालयोगा । त्कृष्णे वर्णे तिष्ठति सर्वकृष्टे । अतिप्रसक्तो निरयाच्च दैत्य । ततस्ततः संपरिवर्तते च ॥
yo'smādatha bhraśyati kālayogā | tkṛṣṇe varṇe tiṣṭhati sarvakṛṣṭe | atiprasakto nirayācca daitya | tatastataḥ saṃparivartate ca
"जो काल के योग से इससे गिरता है, वह सबसे निकृष्ट काले वर्ण में रहता है। अत्यन्त आसक्त होकर, हे दैत्य, वह नरक से नरक में घूमता रहता है।"
श्लोक 38 (12.286.38)
कृष्णस्य वर्णस्य गतिर्निकृष्टा । स मज्जते नरके पच्यमानः । स्थानं तथा दुर्गतिभिस्तु तस्य । प्रजाविसर्गान्सुबहून्वदन्ति ॥
kṛṣṇasya varṇasya gatirnikṛṣṭā | sa majjate narake pacyamānaḥ | sthānaṃ tathā durgatibhistu tasya | prajāvisargānsubahūnvadanti
"काले वर्ण की गति सबसे निकृष्ट है। वह नरक में पकता हुआ डूबता है; और कहते हैं कि उसके ठहराव कुगतियों में होते हैं, प्राणियों की बहुत-सी सृष्टियों तक।"
श्लोक 39 (12.286.39)
शतं सहस्राणि ततश्चरित्वा । प्राप्नोति वर्णं हरितं तु पश्चात् । स चैव तस्मिन्निवसत्यनिशो । युगक्षयं तमसा संवृतात्मा ॥
śataṃ sahasrāṇi tataścaritvā | prāpnoti varṇaṃ haritaṃ tu paścāt | sa caiva tasminnivasatyaniśo | yugakṣayaṃ tamasā saṃvṛtātmā
"एक लाख जन्मों में घूमकर वह बाद में हरे वर्ण को पाता है, और वहीं निरन्तर युगान्त तक रहता है, उसकी आत्मा अन्धकार से ढकी रहती है।"
श्लोक 40 (12.286.40)
स वै यदा सत्वगुणेन युक्त । स्तमो व्यपोहन्घटते स्वबुद्ध्या । स लोहितं वर्णमुपैति नीला । न्मनुष्यलोके परिवर्तते च ॥
sa vai yadā satvaguṇena yukta | stamo vyapohanghaṭate svabuddhyā | sa lohitaṃ varṇamupaiti nīlā | nmanuṣyaloke parivartate ca
"जब वह सत्त्वगुण से युक्त होकर अपनी बुद्धि से अन्धकार को हटाने का यत्न करता है, तब नीले से लाल वर्ण में आता है और मनुष्यलोक में घूमता है।"
श्लोक 41 (12.286.41)
स तत्र संहारविसर्गमेकं । स्वकर्मजैर्बन्धनैः क्लिश्यमानः । ततः स हारिद्रमुपैति वर्णं । संहारविक्षेपशते व्यतीते ॥
sa tatra saṃhāravisargamekaṃ | svakarmajairbandhanaiḥ kliśyamānaḥ | tataḥ sa hāridramupaiti varṇaṃ | saṃhāravikṣepaśate vyatīte
"वहाँ वह अपने कर्मों से उपजे बन्धनों से पीड़ित होकर एक संहार और सृष्टि बिताता है; फिर सौ संहार और सृष्टियाँ बीत जाने पर वह पीले वर्ण को पाता है।"
श्लोक 42 (12.286.42)
हारिद्रवर्णस्तु प्रजाविसर्गा । त्सहस्रशस्तिष्ठति संचरन्वै । अविप्रमुक्तो निरये च दैत्य । ततः सहस्राणि दशापराणि ॥
hāridravarṇastu prajāvisargā | tsahasraśastiṣṭhati saṃcaranvai | avipramukto niraye ca daitya | tataḥ sahasrāṇi daśāparāṇi
"पीले वर्ण में वह विचरता हुआ प्राणियों की हज़ारों सृष्टियों तक रहता है, और हे दैत्य, नरक से मुक्त नहीं होता; उसके बाद दस हज़ार और।"
श्लोक 43 (12.286.43)
गतीः सहस्राणि च पञ्च तस्य । चत्वारि संवर्तकृतानि चैव । विमुक्तमेनं निरयाच्च विद्धि । सर्वेषु चान्येषु च संभवेषु ॥
gatīḥ sahasrāṇi ca pañca tasya | catvāri saṃvartakṛtāni caiva | vimuktamenaṃ nirayācca viddhi | sarveṣu cānyeṣu ca saṃbhaveṣu
"उसकी पाँच हज़ार गतियाँ होती हैं, और चार प्रलयों से बनी हुई भी। तब उसे नरक से और अन्य सब जन्मों से मुक्त जानो।"
श्लोक 44 (12.286.44)
स देवलोके विहरत्यभीक्ष्णं । ततश्च्युतो मानुषतामुपैति । संहारविक्षेपशतानि चाष्टौ । मर्त्येषु तिष्ठन्नमृतत्वमेति ॥
sa devaloke viharatyabhīkṣṇaṃ | tataścyuto mānuṣatāmupaiti | saṃhāravikṣepaśatāni cāṣṭau | martyeṣu tiṣṭhannamṛtatvameti
"वह देवलोक में निरन्तर विहार करता है, फिर वहाँ से गिरकर मनुष्यता को पाता है; वहाँ आठ सौ संहार और सृष्टियों तक मर्त्यों के बीच रहकर वह अमृतत्व को पाता है।"
श्लोक 45 (12.286.45)
सोऽस्मादथ भ्रश्यति कालयोगा । त्कृष्णे तले तिष्ठति सर्वकृष्टे । यथा त्वयं सिध्यति जीवलोक । स्तत्तेऽभिधास्याम्यसुरप्रवीर ॥
so'smādatha bhraśyati kālayogā | tkṛṣṇe tale tiṣṭhati sarvakṛṣṭe | yathā tvayaṃ sidhyati jīvaloka | statte'bhidhāsyāmyasurapravīra
"फिर वह काल के योग से इससे गिरकर सबसे निकृष्ट काली भूमि पर रहता है। यह जीवलोक जैसे सिद्ध होता है, वह मैं तुम्हें बताऊँगा, हे असुरवीर।"
श्लोक 46 (12.286.46)
दैवानि स व्यूहशतानि सप्त । रक्तो हरिद्रोऽथ तथैव शुक्लः । संश्रित्य संधावति शुक्लमेत । मष्टावरानर्च्यतमान्स लोकान् ॥
daivāni sa vyūhaśatāni sapta | rakto haridro'tha tathaiva śuklaḥ | saṃśritya saṃdhāvati śuklameta | maṣṭāvarānarcyatamānsa lokān
"सात सौ दैवी व्यूह हैं: लाल, पीला और वैसे ही शुक्ल। उनका आश्रय लेकर वह इस शुक्ल की ओर और सबसे पूज्य आठ निचले लोकों की ओर दौड़ता है।"
श्लोक 47 (12.286.47)
अष्टौ च षष्टिं च शतानि चैव । मनोविरुद्धानि महाद्युतीनाम् । शुक्लस्य वर्णस्य परा गतिर्या । त्रीण्येव रुद्धानि महानुभाव ॥
aṣṭau ca ṣaṣṭiṃ ca śatāni caiva | manoviruddhāni mahādyutīnām | śuklasya varṇasya parā gatiryā | trīṇyeva ruddhāni mahānubhāva
"महान तेजस्वियों में आठ, साठ और सैकड़ों और मन के विरुद्ध हैं। शुक्ल वर्ण की जो परम गति है, उसमें, हे महानुभाव, केवल तीन ही रुके हुए हैं।"
श्लोक 48 (12.286.48)
संहारविक्षेपमनिष्टमेकं । चत्वारि चान्यानि वसत्यनीशः । षष्ठस्य वर्णस्य परा गतिर्या । सिद्धावसिद्धस्य गतक्लमस्य ॥
saṃhāravikṣepamaniṣṭamekaṃ | catvāri cānyāni vasatyanīśaḥ | ṣaṣṭhasya varṇasya parā gatiryā | siddhāvasiddhasya gataklamasya
"एक अनिष्ट संहार-सृष्टि और चार अन्य वह बिना स्वामित्व के बिताता है। छठे वर्ण की जो परम गति है, वह क्लेशरहित, सिद्ध होकर भी पूर्ण सिद्ध न हुए जीव की है।"
श्लोक 49 (12.286.49)
सप्तोत्तरं तेषु वसत्यनीशः । संहारविक्षेपशतं सशेषम् । तस्मादुपावृत्य मनुष्यलोके । ततो महान्मानुषतामुपैति ॥
saptottaraṃ teṣu vasatyanīśaḥ | saṃhāravikṣepaśataṃ saśeṣam | tasmādupāvṛtya manuṣyaloke | tato mahānmānuṣatāmupaiti
"इनमें वह बिना स्वामित्व के एक सौ सात संहार-सृष्टियों तक रहता है, कुछ शेष रहते हुए। वहाँ से मनुष्यलोक में लौटकर वह महान जीव फिर मनुष्य-भाव को पाता है।"
श्लोक 50 (12.286.50)
तस्मादुपावृत्य ततः क्रमेण । सोऽग्रेण संतिष्ठति भूतसर्गम् । स सप्तकृत्वश्च परैति लोका । न्संहारविक्षेपकृतप्रवासः ॥
tasmādupāvṛtya tataḥ krameṇa | so'greṇa saṃtiṣṭhati bhūtasargam | sa saptakṛtvaśca paraiti lokā | nsaṃhāravikṣepakṛtapravāsaḥ
"वहाँ से लौटकर वह क्रम से प्राणियों की सृष्टि में सबसे आगे स्थित रहता है। वह सात बार लोकों से गुज़रता है, उसके प्रवास संहार और सृष्टि से बने हुए हैं।"
श्लोक 51 (12.286.51)
सप्तैव संहारमुपप्लवानि । संभाव्य संतिष्ठति सिद्धलोके । ततोऽव्ययं स्थानमनन्तमेति । देवस्य विष्णोरथ ब्रह्मणश्च । शेषस्य चैवाथ नरस्य चैव । देवस्य विष्णोः परमस्य चैव ॥
saptaiva saṃhāramupaplavāni | saṃbhāvya saṃtiṣṭhati siddhaloke | tato'vyayaṃ sthānamanantameti | devasya viṣṇoratha brahmaṇaśca | śeṣasya caivātha narasya caiva | devasya viṣṇoḥ paramasya caiva
"सात संहारों और प्रलयों से गुज़रकर वह सिद्धलोक में स्थित होता है। तब वह देव विष्णु, ब्रह्मा, शेष और नर के, तथा परम देव विष्णु के अविनाशी और अनन्त धाम को पाता है।"
श्लोक 52 (12.286.52)
संहारकाले परिदग्धकाया । ब्रह्माणमायान्ति सदा प्रजाहि । चेष्टात्मनो देवगणाश्च सर्वे । ये ब्रह्मलोके ह्यमराः स्म तेऽपि ॥
saṃhārakāle paridagdhakāyā | brahmāṇamāyānti sadā prajāhi | ceṣṭātmano devagaṇāśca sarve | ye brahmaloke hyamarāḥ sma te'pi
"संहार के समय अपने शरीर जल जाने पर प्राणी सदा ब्रह्मा के पास आते हैं; वैसे ही कर्मस्वभाव वाले सब देवगण भी, जो ब्रह्मलोक में अमर हैं।"
श्लोक 53 (12.286.53)
प्रजानिसर्गे तु स शेषकाले । स्थानानि स्वान्येव सरन्ति जीवाः । निःशेषतस्तत्पदं वान्ति चान्ते । सर्वे देवा ये सदृशा मनुष्याः ॥
prajānisarge tu sa śeṣakāle | sthānāni svānyeva saranti jīvāḥ | niḥśeṣatastatpadaṃ vānti cānte | sarve devā ye sadṛśā manuṣyāḥ
"प्राणियों की सृष्टि के समय, शेष काल में, जीव अपने-अपने स्थानों को चले जाते हैं। अन्त में वे सब देवता, जो मनुष्यों के समान हैं, पूरी तरह उस पद को पहुँच जाते हैं।"
श्लोक 54 (12.286.54)
ये तु च्युताः सिद्धलोकात्क्रमेण । तेषां गतिं यान्ति यथाऽऽनुपूर्व्या । जीवाः परे तद्बलवेषरूपाः । स्वकं विधिं यान्ति विपर्ययेण ॥
ye tu cyutāḥ siddhalokātkrameṇa | teṣāṃ gatiṃ yānti yathā''nupūrvyā | jīvāḥ pare tadbalaveṣarūpāḥ | svakaṃ vidhiṃ yānti viparyayeṇa
"जो सिद्धलोक से क्रम से गिरते हैं, और दूसरे जीव भी, अपने बल, वेश और रूप के साथ, उसी क्रम से अपनी गति पाते हैं, और विपरीत क्रम से अपने-अपने विधान को पहुँचते हैं।"
श्लोक 55 (12.286.55)
स यावदेवास्ति सशेषभुक्तिः । प्रजाश्च देव्यौ च तथैव शुक्ले । तावत्तदङ्गेषु विशुद्धभावः । संयम्य पञ्चेन्द्रियरूपमेतत् ॥
sa yāvadevāsti saśeṣabhuktiḥ | prajāśca devyau ca tathaiva śukle | tāvattadaṅgeṣu viśuddhabhāvaḥ | saṃyamya pañcendriyarūpametat
"जब तक उसका भोग शेष है, प्राणियों और दोनों देवियों के बीच, और वैसे ही शुक्ल में, तब तक उसके अंगों में शुद्ध भाव वाला होकर, पाँच इन्द्रियों के इस रूप को संयम में रखकर,"
श्लोक 56 (12.286.56)
शुद्धां गतिं तां परमां परैति । शुद्धेन नित्यं मनसा विचिन्वन् । ततोऽव्ययं स्थानमुपैति ब्रह्म । दुष्प्रापमभ्येति स शाश्वतं वै । इत्येतदाख्यातमहीनसत्त्व । नारायणस्येह बलं मया ते ॥
śuddhāṃ gatiṃ tāṃ paramāṃ paraiti | śuddhena nityaṃ manasā vicinvan | tato'vyayaṃ sthānamupaiti brahma | duṣprāpamabhyeti sa śāśvataṃ vai | ityetadākhyātamahīnasattva | nārāyaṇasyeha balaṃ mayā te
"वह शुद्ध मन से निरन्तर विचार करता हुआ उस शुद्ध परम गति को पाता है; फिर अविनाशी धाम ब्रह्म को पाता है, जो दुर्लभ है, और शाश्वत को पहुँचता है। हे अक्षीण बल वाले, इस प्रकार नारायण का बल मैंने तुमसे यहाँ कह दिया।"
वृत्र उवाच
श्लोक 57 (12.286.57)
एवं गते मे न विषादोऽस्ति कश्चि । त्सम्यक्च पश्यामि वचस्तथैतत् । श्रुत्वा तु ते वाचमदीनसत्व । विकल्मषोऽस्म्यद्य तथा विपाप्मा ॥
evaṃ gate me na viṣādo'sti kaści | tsamyakca paśyāmi vacastathaitat | śrutvā tu te vācamadīnasatva | vikalmaṣo'smyadya tathā vipāpmā
"ऐसा होने पर मुझे कोई विषाद नहीं है, और मैं आपके इन वचनों की सच्चाई को ठीक-ठीक देखता हूँ। हे अटल धैर्य वाले, आपकी वाणी सुनकर मैं आज निष्कलंक और पापरहित हो गया हूँ।"
श्लोक 58 (12.286.58)
प्रवृत्तमेतद्भगवन्महर्षे । महाद्युतेश्चक्रमनन्तवीर्यम् । विष्णोरनन्तस्य सनातनं तत् । स्थानं सर्गा यत्र सर्वे प्रवृत्ताः । स वै महात्मा पुरुषोत्तमो वै । तस्मिञ्जगत्सर्वमिदं प्रतिष्ठितम् ॥
pravṛttametadbhagavanmaharṣe | mahādyuteścakramanantavīryam | viṣṇoranantasya sanātanaṃ tat | sthānaṃ sargā yatra sarve pravṛttāḥ | sa vai mahātmā puruṣottamo vai | tasmiñjagatsarvamidaṃ pratiṣṭhitam
"हे भगवन् महर्षि, अनन्त पराक्रम वाले उस महातेजस्वी का यह चक्र चल पड़ा है। वह अनन्त विष्णु का सनातन धाम है, जिसमें सब सृष्टियाँ प्रवृत्त हुई हैं। वही महात्मा पुरुषोत्तम है; उसी में यह सारा जगत् प्रतिष्ठित है।"
भीष्म उवाच
श्लोक 59 (12.286.59)
एवमुक्त्वा स कौन्तेय वृत्रः प्राणानवासृजत् । योजयित्वा तथाऽऽत्मानं परं स्थानमवाप्तवान् ॥
evamuktvā sa kaunteya vṛtraḥ prāṇānavāsṛjat | yojayitvā tathā''tmānaṃ paraṃ sthānamavāptavān
हे कुन्तीपुत्र, यह कहकर वृत्र ने प्राण त्याग दिए; अपने आत्मा को परम में जोड़कर उसने परम धाम पा लिया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 60 (12.286.60)
अयं स भगवान्देवः पितामह जनार्दनः । सनत्कुमारो वृत्राय यत्तदाख्यातवान्पुरा ॥
ayaṃ sa bhagavāndevaḥ pitāmaha janārdanaḥ | sanatkumāro vṛtrāya yattadākhyātavānpurā
"हे पितामह, क्या ये भगवान् देव जनार्दन ही हैं, जिनका वर्णन सनत्कुमार ने बहुत पहले वृत्र से किया था?"
भीष्म उवाच
श्लोक 61 (12.286.61)
मूलस्थायी स भगवान्स्वेनानन्तेन तेजसा । तत्स्थः सृजति तान्भावानात्मरूपान्महामनाः ॥
mūlasthāyī sa bhagavānsvenānantena tejasā | tatsthaḥ sṛjati tānbhāvānātmarūpānmahāmanāḥ
"जो भगवान् मूल में स्थित रहते हैं, अपने अनन्त तेज से, वहीं स्थित रहकर वे महामना उन प्राणियों को अपने ही रूप में रचते हैं।"
श्लोक 62 (12.286.62)
तुरीयांशेन तस्येमं विद्धि केशवमच्युतम् । तुरीयांशेन ब्रह्माणं तस्य विद्धि महात्मनः । तुरीयार्धेन लोकांस्त्रीन्भावयत्येव बुद्धिमान् ॥
turīyāṃśena tasyemaṃ viddhi keśavamacyutam | turīyāṃśena brahmāṇaṃ tasya viddhi mahātmanaḥ | turīyārdhena lokāṃstrīnbhāvayatyeva buddhimān
"उसके चौथे अंश से इस अच्युत केशव को जानो; उस महात्मा के चौथे अंश से ब्रह्मा को जानो; और चौथाई के आधे से वह बुद्धिमान तीनों लोकों की रचना करता है।"
श्लोक 63 (12.286.63)
अर्वाक्स्थितस्तु यः स्थायी कल्पान्ते परिवर्तते । स शेते भगवानप्सु योऽसावतिबलः प्रभुः । तान्विधाता प्रसन्नात्मा लोकांश्चरति शाश्वतान् ॥
arvāksthitastu yaḥ sthāyī kalpānte parivartate | sa śete bhagavānapsu yo'sāvatibalaḥ prabhuḥ | tānvidhātā prasannātmā lokāṃścarati śāśvatān
"जो समीप स्थित रहकर टिका रहता है और कल्प के अन्त में पलटता है, वह अतिबलवान भगवान् प्रभु जल में शयन करता है; और विधाता प्रसन्न चित्त होकर उन शाश्वत लोकों में विचरता है।"
श्लोक 64 (12.286.64)
सर्वाण्यशून्यानि करोत्यनन्तः । सनातनः संचरते च लोकान् । स चानिरुद्धः सृजते महात्मा । तत्स्थं जगत्सर्वमिदं विचित्रम् ॥
sarvāṇyaśūnyāni karotyanantaḥ | sanātanaḥ saṃcarate ca lokān | sa cāniruddhaḥ sṛjate mahātmā | tatsthaṃ jagatsarvamidaṃ vicitram
"अनन्त सबको भरा-पूरा करता है; सनातन लोकों में विचरता है। वही महात्मा अनिरुद्ध रचना करता है; उसी में यह सारा विचित्र जगत् टिका है।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 65 (12.286.65)
वृत्रेण परमार्थज्ञ दृष्टा मन्येऽऽत्मनो गतिः । सुखात्तस्मात्स सुखितो न शोचति पितामह ॥
vṛtreṇa paramārthajña dṛṣṭā manye''tmano gatiḥ | sukhāttasmātsa sukhito na śocati pitāmaha
"हे परमार्थ के ज्ञाता, मेरा मानना है कि वृत्र ने आत्मा की गति को देख लिया था; इसीलिए उस सुख से वह सुखी था और शोक नहीं करता था, हे पितामह।"
श्लोक 66 (12.286.66)
शुक्लः शुक्लाभिजातीयः साध्यो नावर्ततेऽनघ । तिर्यग्गतेश्च निर्मुक्तो निरयाच्च पितामह ॥
śuklaḥ śuklābhijātīyaḥ sādhyo nāvartate'nagha | tiryaggateśca nirmukto nirayācca pitāmaha
"हे निष्पाप, जो शुक्ल है और शुक्ल कुल में उत्पन्न है, जो सिद्धि के मार्ग पर है, वह नहीं लौटता; हे पितामह, वह पशु-योनि और नरक से मुक्त हो जाता है।"
श्लोक 67 (12.286.67)
हारिद्रवर्णे रक्ते वा वर्तमानस्तु पार्थिव । तिर्यगेवानुपश्येत कर्मभिस्तामसैर्वृतः ॥
hāridravarṇe rakte vā vartamānastu pārthiva | tiryagevānupaśyeta karmabhistāmasairvṛtaḥ
"पर हे राजन्, जो पीले या लाल वर्ण में रहता है, वह अन्धकार के कर्मों से घिरा हुआ केवल पशु-योनि को ही आगे देखता है।"
श्लोक 68 (12.286.68)
वयं तु भृशमापन्ना रक्ताः कष्टाः सुखेऽसुखे । कां गतिं प्रतिपत्स्यामो नीलां कृष्णाधमामथ ॥
vayaṃ tu bhṛśamāpannā raktāḥ kaṣṭāḥ sukhe'sukhe | kāṃ gatiṃ pratipatsyāmo nīlāṃ kṛṣṇādhamāmatha
"पर हम तो अत्यन्त विपत्ति में हैं, लाल वर्ण के, कष्ट में, सुख के बीच भी असुख में। हम कौन-सी गति पाएँगे, नीली, या सबसे निकृष्ट काली?"
भीष्म उवाच
श्लोक 69 (12.286.69)
शुद्धाभिजनसंपन्नाः पाण्डवाः संशितव्रताः । विहत्य देवलोकेषु पुनर्मानुषमेष्यथ ॥
śuddhābhijanasaṃpannāḥ pāṇḍavāḥ saṃśitavratāḥ | vihatya devalokeṣu punarmānuṣameṣyatha
"तुम पाण्डव शुद्ध कुल वाले और दृढ़ व्रत वाले हो; देवलोकों में विहार करके तुम फिर मनुष्य बनोगे।"
श्लोक 70 (12.286.70)
प्रजाविसर्गं च सुखेन लोके । प्रेत्यान्येदेहेषु सुखानि भुक्त्वा । सुखेन संयास्यथ सिद्धसङ्ख्यां । मा वो भयं भवतु न वोऽस्तु पापम् ॥
prajāvisargaṃ ca sukhena loke | pretyānyedeheṣu sukhāni bhuktvā | sukhena saṃyāsyatha siddhasaṅkhyāṃ | mā vo bhayaṃ bhavatu na vo'stu pāpam
"संसार में सृष्टि के चक्र को सुख से बिताकर और मरने के बाद दूसरे शरीरों में सुख भोगकर तुम सुखपूर्वक सिद्धों की गणना में पहुँचोगे। तुम्हें भय न हो और पाप न लगे।"