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शान्ति पर्व · अध्याय 287

इन्द्र और वृत्र का युद्ध

युधिष्ठिर वृत्र की धर्मनिष्ठा पर विस्मय करते हुए पूछते हैं कि विष्णु का भक्त इन्द्र के हाथों कैसे मारा गया। भीष्म युद्ध का वर्णन करते हैं: वृत्र का विशाल रूप देवताओं को भयभीत कर देता है और वृत्र की माया से मोहित इन्द्र को वसिष्ठ और ऋषि जगाते हैं। उनकी प्रार्थना पर महेश्वर अपना तेज ज्वर बनाकर वृत्र में प्रविष्ट कराते हैं, विष्णु इन्द्र के वज्र में प्रवेश करते हैं, और देवता तथा ऋषि इन्द्र को प्रेरित करते हैं।

अध्याय 286अध्याय-सूचीअध्याय 288

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.287.1)

अहो धर्मिष्ठता तस्य वृत्रस्यामिततेजसः । यस्य विज्ञानमतुलं विष्णोर्भक्तिश्च तादृशी ॥

aho dharmiṣṭhatā tasya vṛtrasyāmitatejasaḥ | yasya vijñānamatulaṃ viṣṇorbhaktiśca tādṛśī

अपरिमित तेजवाले उस वृत्र की धर्मनिष्ठा कैसी अद्भुत थी, जिसका ज्ञान अतुलनीय था और जिसकी विष्णु के प्रति भक्ति भी वैसी ही थी!

श्लोक 2 (12.287.2)

दुर्विज्ञेयमिदं तस्य विष्णोरमिततेजसः । कथं वा राजशार्दूल पदं तु ज्ञातवानसौ ॥

durvijñeyamidaṃ tasya viṣṇoramitatejasaḥ | kathaṃ vā rājaśārdūla padaṃ tu jñātavānasau

अपरिमित तेजवाले विष्णु का वह पद जानना कठिन है। हे राजाओं में सिंह, उसने उसे कैसे जान लिया?

श्लोक 3 (12.287.3)

भवता कथितं ह्येतच्छ्रद्दधे चाहमच्युत । भूयश्च मे समुत्पन्ना बुद्धिरव्यक्तदर्शना ॥

bhavatā kathitaṃ hyetacchraddadhe cāhamacyuta | bhūyaśca me samutpannā buddhiravyaktadarśanā

आपने जो कहा, उस पर मुझे विश्वास है, हे अच्युत; फिर भी मेरे मन में एक और प्रश्न उठा है, जिसका उत्तर मुझे स्पष्ट नहीं दीखता।

श्लोक 4 (12.287.4)

कथं विनिहतो वृत्रः शक्रेण भरतर्षभ । धार्मिको विष्णुभक्तश्च तत्त्वज्ञश्च तदन्वये ॥

kathaṃ vinihato vṛtraḥ śakreṇa bharatarṣabha | dhārmiko viṣṇubhaktaśca tattvajñaśca tadanvaye

हे भरतश्रेष्ठ, धर्मात्मा, विष्णुभक्त और अपने वंश में तत्त्व को जाननेवाले उस वृत्र को शक्र ने कैसे मारा?

श्लोक 5 (12.287.5)

एतन्मे संशयं ब्रूहि पृच्छते भरतर्षभ । वृत्रः स राजशार्दूल यथा शक्रेण निर्जितः ॥

etanme saṃśayaṃ brūhi pṛcchate bharatarṣabha | vṛtraḥ sa rājaśārdūla yathā śakreṇa nirjitaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, मैं पूछता हूँ, मेरा यह संशय दूर कीजिए: हे राजाओं में सिंह, वह वृत्र शक्र से कैसे पराजित हुआ?

श्लोक 6 (12.287.6)

यथा चैवाभवद्युद्धं तच्चाचक्ष्व पितामह । विस्तरेण महाबाहो परं कौतूहलं हि मे ॥

yathā caivābhavadyuddhaṃ taccācakṣva pitāmaha | vistareṇa mahābāho paraṃ kautūhalaṃ hi me

और हे पितामह, यह भी बताइए कि वह युद्ध कैसे हुआ था, हे महाबाहु, विस्तार से; मुझे बड़ा कौतूहल है।

भीष्म उवाच

श्लोक 7 (12.287.7)

रथेनेन्द्रः प्रयातो वै सार्धं सुरगणैः पुरा । ददर्शाथाग्रतो वृत्रं विष्ठितं पर्वतोपमम् ॥

rathenendraḥ prayāto vai sārdhaṃ suragaṇaiḥ purā | dadarśāthāgrato vṛtraṃ viṣṭhitaṃ parvatopamam

बहुत पहले इन्द्र देवगणों के साथ रथ पर चढ़कर चले और उन्होंने अपने सामने पर्वत के समान खड़े वृत्र को देखा।

श्लोक 8 (12.287.8)

योजनानां शतान्यूर्ध्वं पञ्चोच्छ्रितमरिंदम । शतानि विस्तरेणाथ त्रीणि चाभ्यधिकानि वै ॥

yojanānāṃ śatānyūrdhvaṃ pañcocchritamariṃdama | śatāni vistareṇātha trīṇi cābhyadhikāni vai

हे शत्रुदमन, वह पाँच सौ योजन ऊँचा था और चौड़ाई में तीन सौ योजन और भी।

श्लोक 9 (12.287.9)

तत्प्रेक्ष्य तादृशं रूपं त्रैलोक्येनापि दुर्जयम् । वृत्रस्य देवाः संत्रस्ता न शान्तिमुपलेभिरे ॥

tatprekṣya tādṛśaṃ rūpaṃ trailokyenāpi durjayam | vṛtrasya devāḥ saṃtrastā na śāntimupalebhire

तीनों लोकों के लिए भी अजेय वृत्र का वह रूप देखकर भयभीत देवताओं को शान्ति नहीं मिली।

श्लोक 10 (12.287.10)

शक्रस्य तु तदा राजन्नूरुस्तम्भो व्यजायत । भयाद्वृत्रस्य सहसा दृष्ट्वा तद्रूपमुत्तमम् ॥

śakrasya tu tadā rājannūrustambho vyajāyata | bhayādvṛtrasya sahasā dṛṣṭvā tadrūpamuttamam

हे राजन्, तब वृत्र का वह विशाल रूप देखकर भय से अचानक शक्र की जाँघें जकड़ गईं।

श्लोक 11 (12.287.11)

ततो नादः समभवद्वादित्राणां च निःस्वनः । देवासुराणां सर्वेषां तस्मिन्युद्धे ह्युपस्थिते ॥

tato nādaḥ samabhavadvāditrāṇāṃ ca niḥsvanaḥ | devāsurāṇāṃ sarveṣāṃ tasminyuddhe hyupasthite

तब युद्ध के उपस्थित होने पर सभी देवताओं और असुरों की ओर से कोलाहल उठा और वाद्यों की ध्वनि गूँज उठी।

श्लोक 12 (12.287.12)

अथ वृत्रस्य कौरव्य दृष्ट्वा शक्रमवस्थितम् । न संभ्रमो न भीः काचिदास्था वा समजायत ॥

atha vṛtrasya kauravya dṛṣṭvā śakramavasthitam | na saṃbhramo na bhīḥ kācidāsthā vā samajāyata

परन्तु हे कौरव्य, शक्र को सामने खड़ा देखकर वृत्र को न घबराहट हुई, न भय, और न कोई चिन्ता ही।

श्लोक 13 (12.287.13)

ततः समभवद्युद्धं त्रैलोक्यस्य भयंकरम् । शक्रस्य च सुरेन्द्रस्य वृत्रस्य च महात्मनः ॥

tataḥ samabhavadyuddhaṃ trailokyasya bhayaṃkaram | śakrasya ca surendrasya vṛtrasya ca mahātmanaḥ

तब तीनों लोकों को भयभीत करनेवाला युद्ध छिड़ गया, देवेन्द्र शक्र और महात्मा वृत्र के बीच।

श्लोक 14 (12.287.14)

असिभिः पट्टसैः शूलैः शक्तितोमरमुद्गरैः । शिलाभिर्विविधाभिश्च कार्मुकैश्च महास्वनैः ॥

asibhiḥ paṭṭasaiḥ śūlaiḥ śaktitomaramudgaraiḥ | śilābhirvividhābhiśca kārmukaiśca mahāsvanaiḥ

तलवारों, पट्टिशों, शूलों, शक्तियों, तोमरों और मुद्गरों से, भाँति-भाँति की शिलाओं से और बड़े टंकारवाले धनुषों से,

श्लोक 15 (12.287.15)

अस्त्रैश्च विविधैर्दिव्यैः पावकोल्काभिरेव च । देवासुरैस्ततः सैन्यैः सर्वमासीत्समाकुलम् ॥

astraiśca vividhairdivyaiḥ pāvakolkābhireva ca | devāsuraistataḥ sainyaiḥ sarvamāsītsamākulam

अनेक प्रकार के दिव्य अस्त्रों से और अग्नि की उल्काओं से भी, देवताओं और असुरों की सेनाओं ने सब कुछ व्याकुल कर दिया।

श्लोक 16 (12.287.16)

पितामहपुरोगाश्च सर्वे देवगणास्तदा । ऋषयश्च महाभागास्तद्युद्धं द्रष्टुमागमन् ॥

pitāmahapurogāśca sarve devagaṇāstadā | ṛṣayaśca mahābhāgāstadyuddhaṃ draṣṭumāgaman

तब पितामह ब्रह्मा को आगे करके सब देवगण और महाभाग ऋषि उस युद्ध को देखने आए।

श्लोक 17 (12.287.17)

विमानाग्र्यैर्महाराज सिद्धाश्च भरतर्षभ । गन्धर्वाश्च विमानाग्रैरप्सरोभिः समागमन् ॥

vimānāgryairmahārāja siddhāśca bharatarṣabha | gandharvāśca vimānāgrairapsarobhiḥ samāgaman

हे महाराज, हे भरतश्रेष्ठ, सिद्ध उत्तम विमानों में आए; और गन्धर्व भी अप्सराओं के साथ श्रेष्ठ विमानों में आ पहुँचे।

श्लोक 18 (12.287.18)

ततोऽन्तरिक्षमावृत्य वृत्रो धर्मभृतां वरः । अश्मवर्षेण देवेन्द्रं सर्वतः समवाकिरत् ॥

tato'ntarikṣamāvṛtya vṛtro dharmabhṛtāṃ varaḥ | aśmavarṣeṇa devendraṃ sarvataḥ samavākirat

तब धर्म धारण करनेवालों में श्रेष्ठ वृत्र ने आकाश को घेरकर देवेन्द्र को चारों ओर से पत्थरों की वर्षा से ढक दिया।

श्लोक 19 (12.287.19)

ततो देवगणाः क्रुद्धाः सर्वतः शरवृष्टिभिः । अश्मवर्षमपोहन्त वृत्रप्रेरितमाहवे ॥

tato devagaṇāḥ kruddhāḥ sarvataḥ śaravṛṣṭibhiḥ | aśmavarṣamapohanta vṛtrapreritamāhave

तब क्रुद्ध देवगणों ने चारों ओर बाणों की वर्षा से, युद्ध में वृत्र की भेजी हुई पत्थरों की वर्षा को दूर हटा दिया।

श्लोक 20 (12.287.20)

वृत्रस्तु कुरुशार्दूल महामायो महाबलः । मोहयामास देवेन्द्रं मायायुद्धेन सर्वशः ॥

vṛtrastu kuruśārdūla mahāmāyo mahābalaḥ | mohayāmāsa devendraṃ māyāyuddhena sarvaśaḥ

परन्तु हे कुरुश्रेष्ठ, महामायावी और महाबली वृत्र ने मायायुद्ध से देवेन्द्र को चारों ओर से मोहित कर दिया।

श्लोक 21 (12.287.21)

तस्य वृत्रार्दितस्याथ मोह आसीच्छतक्रतोः । रथन्तरेण तं तत्र वसिष्ठः समबोधयत् ॥

tasya vṛtrārditasyātha moha āsīcchatakratoḥ | rathantareṇa taṃ tatra vasiṣṭhaḥ samabodhayat

वृत्र से पीड़ित शतक्रतु इन्द्र पर मोह छा गया; तब वहाँ वसिष्ठ ने रथन्तर साम से उन्हें जगाया।

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 22 (12.287.22)

देवश्रेष्ठोऽसि देवेन्द्र दैत्यासुरनिबर्हण । त्रैलोक्यबलसंयुक्तः कस्माच्छक्र विषीदसि ॥

devaśreṣṭho'si devendra daityāsuranibarhaṇa | trailokyabalasaṃyuktaḥ kasmācchakra viṣīdasi

'हे देवेन्द्र, तुम देवताओं में श्रेष्ठ हो, दैत्यों और असुरों का संहार करनेवाले हो; तीनों लोकों के बल से युक्त होकर भी, हे शक्र, तुम क्यों विषाद कर रहे हो?'

श्लोक 23 (12.287.23)

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवश्चैव जगत्पतिः । सोमश्च भगवान्देवः सर्वे च परमर्षयः ॥

eṣa brahmā ca viṣṇuśca śivaścaiva jagatpatiḥ | somaśca bhagavāndevaḥ sarve ca paramarṣayaḥ

'ये ब्रह्मा और विष्णु हैं, और जगत्पति शिव हैं, भगवान् सोम देव हैं और सभी परमर्षि भी।'

श्लोक 24 (12.287.24)

समुद्विग्नं समीक्ष्य त्वां स्वस्तीत्यूचुर्जयाय ते । मा कार्षीः कश्मलं शक्र कश्चिदेवेतरो यथा । आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा जहि शत्रून्सुराधिप ॥

samudvignaṃ samīkṣya tvāṃ svastītyūcurjayāya te | mā kārṣīḥ kaśmalaṃ śakra kaścidevetaro yathā | āryāṃ yuddhe matiṃ kṛtvā jahi śatrūnsurādhipa

'तुम्हें व्याकुल देखकर उन्होंने कहा है, "तुम्हारी विजय के लिए कल्याण हो।" हे शक्र, किसी साधारण मनुष्य की तरह तुम मोह में न पड़ो। युद्ध में श्रेष्ठ पुरुष के योग्य निश्चय करके, हे देवाधिप, शत्रुओं को मार डालो।'

श्लोक 25 (12.287.25)

एष लोकगुरुस्त्र्यक्षः सर्वलोकनमस्कृतः । निरीक्षते त्वां भगवांस्त्यज मोहं सुराधिप ॥

eṣa lokagurustryakṣaḥ sarvalokanamaskṛtaḥ | nirīkṣate tvāṃ bhagavāṃstyaja mohaṃ surādhipa

'ये लोकगुरु त्रिनेत्र हैं, जिन्हें सारे लोक प्रणाम करते हैं; भगवान् तुम्हें देख रहे हैं। हे सुराधिप, मोह को त्याग दो।'

श्लोक 26 (12.287.26)

एते ब्रह्मर्षयश्चैव बृहस्पतिपुरोगमाः । स्तवेन शक्र दिव्येन स्तुवन्ति त्वां जयाय वै ॥

ete brahmarṣayaścaiva bṛhaspatipurogamāḥ | stavena śakra divyena stuvanti tvāṃ jayāya vai

'और ये बृहस्पति को आगे किए हुए ब्रह्मर्षि हैं; हे शक्र, ये दिव्य स्तोत्र से तुम्हारी विजय के लिए तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं।'

भीष्म उवाच

श्लोक 27 (12.287.27)

एवं संबोध्यमानस्य वसिष्ठेन महात्मना । अतीव वासवस्यासीद्बलमुत्तमतेजसः ॥

evaṃ saṃbodhyamānasya vasiṣṭhena mahātmanā | atīva vāsavasyāsīdbalamuttamatejasaḥ

महात्मा वसिष्ठ के इस प्रकार जगाने पर परम तेजस्वी इन्द्र का बल बहुत बढ़ गया।

श्लोक 28 (12.287.28)

ततो बुद्धिमुपागम्य भगवान्पाकशासनः । योगेन महता युक्तस्तां मायां व्यपकर्षत ॥

tato buddhimupāgamya bhagavānpākaśāsanaḥ | yogena mahatā yuktastāṃ māyāṃ vyapakarṣata

तब भगवान् पाकशासन ने चेत पाकर, महान् योग से युक्त होकर, उस माया को खींचकर हटा दिया।

श्लोक 29 (12.287.29)

ततोऽङ्गिरः सुतः श्रीमांस्ते चैव सुमहर्षयः । दृष्ट्वा वृत्रस्य विक्रान्तमुपागम्य महेश्वरम् ॥

tato'ṅgiraḥ sutaḥ śrīmāṃste caiva sumaharṣayaḥ | dṛṣṭvā vṛtrasya vikrāntamupāgamya maheśvaram

तब अङ्गिरा के तेजस्वी पुत्र और वे महर्षि वृत्र का पराक्रम देखकर महेश्वर के पास गए

श्लोक 30 (12.287.30)

ऊचुर्वृत्रविनाशार्थं लोकानां हितकाम्यया । ततो भगवतस्तेजो ज्वरो भूत्वा जगत्पतेः ॥

ūcurvṛtravināśārthaṃ lokānāṃ hitakāmyayā | tato bhagavatastejo jvaro bhūtvā jagatpateḥ

और लोकों के हित की इच्छा से वृत्र के विनाश के लिए उनसे प्रार्थना की। तब जगत्पति भगवान् का तेज ज्वर बनकर

श्लोक 31 (12.287.31)

समाविशत्तदा रौद्रं वृत्रं लोकपतिं तदा । विष्णुश्च भगवान्देवः सर्वलोकाभिपूजितः ॥

samāviśattadā raudraṃ vṛtraṃ lokapatiṃ tadā | viṣṇuśca bhagavāndevaḥ sarvalokābhipūjitaḥ

उस भयंकर वृत्र में प्रविष्ट हो गया, जो उस समय लोकपति था। और सब लोकों से पूजित भगवान् विष्णु,

श्लोक 32 (12.287.32)

ऐन्द्रं समाविशद्वज्रं लोकसंरक्षणे रतः । ततो बृहस्पतिर्धीमानुपागम्य शतक्रतुम् । वसिष्ठश्च महातेजाः सर्वे च परमर्षयः ॥

aindraṃ samāviśadvajraṃ lokasaṃrakṣaṇe rataḥ | tato bṛhaspatirdhīmānupāgamya śatakratum | vasiṣṭhaśca mahātejāḥ sarve ca paramarṣayaḥ

लोकरक्षा में लगे हुए, इन्द्र के वज्र में प्रविष्ट हुए। तब बुद्धिमान् बृहस्पति शतक्रतु के पास पहुँचे, और महातेजस्वी वसिष्ठ तथा सब परमर्षि भी,

श्लोक 33 (12.287.33)

ते समासाद्य वरदं वासवं लोकपूजितम् । ऊचुरेकाग्रमनसो जहि वृत्रमिति प्रभो ॥

te samāsādya varadaṃ vāsavaṃ lokapūjitam | ūcurekāgramanaso jahi vṛtramiti prabho

वरदाता और लोकपूजित इन्द्र के पास पहुँचकर, एकाग्र मन से बोले, 'हे प्रभो, वृत्र को मार डालिए।'

महेश्वर उवाच

श्लोक 34 (12.287.34)

एष वृत्रो महाञ्शक्र बलेन महता वृतः । विश्वात्मा सर्वगश्चैव बहुमायश्च विश्रुतः ॥

eṣa vṛtro mahāñśakra balena mahatā vṛtaḥ | viśvātmā sarvagaścaiva bahumāyaśca viśrutaḥ

'हे शक्र, यह वृत्र बड़े भारी बल से घिरा हुआ है; वह विश्वात्मा है, सर्वव्यापी है और बहुत मायाओं के लिए प्रसिद्ध है।'

श्लोक 35 (12.287.35)

तदेनमसुरश्रेष्ठं त्रैलोक्येनापि दुर्जयम् । जहि त्वं योगमास्थाय मावमंस्थाः सुरेश्वर ॥

tadenamasuraśreṣṭhaṃ trailokyenāpi durjayam | jahi tvaṃ yogamāsthāya māvamaṃsthāḥ sureśvara

'इसलिए योग का आश्रय लेकर तीनों लोकों के लिए भी अजेय इस असुरश्रेष्ठ को मार डालो; हे सुरेश्वर, इसकी अवज्ञा मत करो।'

श्लोक 36 (12.287.36)

अनेन हि तपस्तप्तं बलार्थममराधिप । षष्टिं वर्षसहस्राणि ब्रह्मा चास्मै वरं ददौ ॥

anena hi tapastaptaṃ balārthamamarādhipa | ṣaṣṭiṃ varṣasahasrāṇi brahmā cāsmai varaṃ dadau

'हे अमराधिप, इसने बल के लिए साठ हजार वर्ष तप किया था, और ब्रह्मा ने इसे वर दिया था:'

श्लोक 37 (12.287.37)

महत्त्वं योगिनां चैव महामायत्वमेव च । महाबलत्वं च तथा तेजश्चाग्र्यं सुरेश्वर ॥

mahattvaṃ yogināṃ caiva mahāmāyatvameva ca | mahābalatvaṃ ca tathā tejaścāgryaṃ sureśvara

'योगियों में महत्ता, महामायावी होना, महाबलशाली होना और श्रेष्ठ तेज, हे सुरेश्वर।'

श्लोक 38 (12.287.38)

एतत्त्वां मामकं तेजः समाविशति वासव । वृत्रमेवं त्ववध्यं तं वज्रेण जहि दानवम् ॥

etattvāṃ māmakaṃ tejaḥ samāviśati vāsava | vṛtramevaṃ tvavadhyaṃ taṃ vajreṇa jahi dānavam

'मेरा यह तेज तुममें प्रवेश कर रहा है, हे वासव। इस प्रकार अवध्य वृत्र दानव को तुम वज्र से मार डालो।'

शक्र उवाच

श्लोक 39 (12.287.39)

भगवंस्त्वत्प्रसादेन दितिजं सुदुरासदम् । वज्रेण निहनिष्यामि पश्यतस्ते सुरर्षभ ॥

bhagavaṃstvatprasādena ditijaṃ sudurāsadam | vajreṇa nihaniṣyāmi paśyataste surarṣabha

'भगवन्, आपकी कृपा से मैं इस अत्यन्त दुर्जेय दैत्य को आपके देखते-देखते वज्र से मार डालूँगा, हे देवश्रेष्ठ।'

भीष्म उवाच

श्लोक 40 (12.287.40)

आविश्यमाने दैत्ये तु ज्वरेणाथ महासुरे । देवतानामृषीणां च हर्षान्नादो महानभूत् ॥

āviśyamāne daitye tu jvareṇātha mahāsure | devatānāmṛṣīṇāṃ ca harṣānnādo mahānabhūt

जब ज्वर उस महान् असुर दैत्य में प्रवेश कर रहा था, तब देवताओं और ऋषियों की ओर से हर्ष का बड़ा नाद उठा।

श्लोक 41 (12.287.41)

ततो दुन्दुभयश्चैव शङ्खाश्च सुमहास्वनाः । मुरजा डिण्डिभाश्चैव प्रावाद्यन्त सहस्रशः ॥

tato dundubhayaścaiva śaṅkhāśca sumahāsvanāḥ | murajā ḍiṇḍibhāścaiva prāvādyanta sahasraśaḥ

तब दुन्दुभियाँ, बड़े नादवाले शंख, मुरज और डिण्डिम हजारों की संख्या में बजने लगे।

श्लोक 42 (12.287.42)

असुराणां तु सर्वेषां स्मृतिलोपो महानभूत् । मायानाशश्च बलवान्क्षणेन समपद्यत ॥

asurāṇāṃ tu sarveṣāṃ smṛtilopo mahānabhūt | māyānāśaśca balavānkṣaṇena samapadyata

सब असुरों की स्मृति का भारी लोप हो गया और क्षण भर में उनकी बलवती माया नष्ट हो गई।

श्लोक 43 (12.287.43)

तमाविष्टमथो ज्ञात्वा ऋषयो देवतास्तथा । स्तुवन्तः शक्रमीशानं तथा प्राचोदयन्नपि ॥

tamāviṣṭamatho jñātvā ṛṣayo devatāstathā | stuvantaḥ śakramīśānaṃ tathā prācodayannapi

तब वृत्र को आविष्ट हुआ जानकर ऋषियों और देवताओं ने स्वामी शक्र की स्तुति की और उन्हें प्रेरित किया।

श्लोक 44 (12.287.44)

रथस्थस्य हि शक्रस्य युद्धकाले महात्मनः । ऋषिभिः स्तूयमानस्य रूपमासीन्सुदुर्दृशम् ॥

rathasthasya hi śakrasya yuddhakāle mahātmanaḥ | ṛṣibhiḥ stūyamānasya rūpamāsīnsudurdṛśam

युद्ध के समय रथ पर खड़े और ऋषियों से स्तुति पाते हुए महात्मा शक्र का रूप देखने में अत्यन्त कठिन हो गया।

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