शान्ति पर्व · अध्याय 288
वृत्र का वध और ब्रह्महत्या का विभाजन
भीष्म बताते हैं कि ज्वर से ग्रस्त वृत्र इन्द्र के वज्र से मारा गया। वृत्र के शरीर से ब्रह्महत्या निकली और उसने इन्द्र को पकड़ लिया, जो वर्षों तक कमलनाल में छिपे रहे। ब्रह्मा के कहने पर ब्रह्महत्या के चार भाग किए गए, जिन्हें अग्नि, वृक्ष-ओषधि-तृण, अप्सराओं और जल ने ग्रहण किया, और सबके छुटकारे की एक-एक शर्त रखी गई। मुक्त होकर इन्द्र ने अश्वमेध से शुद्धि पाई; भीष्म युधिष्ठिर को ब्राह्मणों का सम्मान करने को कहते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.288.1)
वृत्रस्य तु महाराज ज्वराविष्टस्य सर्वशः । अभवन्यानि लिङ्गानि शरीरे तानि मे शृणु ॥
vṛtrasya tu mahārāja jvarāviṣṭasya sarvaśaḥ | abhavanyāni liṅgāni śarīre tāni me śṛṇu
हे महाराज, जब वृत्र को सब ओर से ज्वर ने जकड़ लिया, तब उसके शरीर में जो लक्षण प्रकट हुए, उन्हें मुझसे सुनिए।
श्लोक 2 (12.288.2)
ज्वलितास्योऽभवद्घोरो वैवर्ण्यं चागमत्परम् । गात्रकम्पश्च सुमहाञ्श्वासश्चाप्यभवन्महान् ॥
jvalitāsyo'bhavadghoro vaivarṇyaṃ cāgamatparam | gātrakampaśca sumahāñśvāsaścāpyabhavanmahān
उसका मुख जल उठा, वह भयंकर हो गया, उस पर अत्यन्त विवर्णता छा गई, उसके अंग बहुत काँपने लगे और साँस भारी हो गई।
श्लोक 3 (12.288.3)
रोमहर्षश्च तीव्रोऽभून्निःश्वासश्च महान्नृप । शिवा चाशिवसंकाशा तस्य वक्त्रात्सुदारुणा ॥
romaharṣaśca tīvro'bhūnniḥśvāsaśca mahānnṛpa | śivā cāśivasaṃkāśā tasya vaktrātsudāruṇā
उसके रोंगटे तीखे होकर खड़े हो गए और उसकी निःश्वासें बहुत भारी थीं, हे राजन्; और अमंगल रूपवाली, अत्यन्त भयानक एक सियारिन,
श्लोक 4 (12.288.4)
निष्पपात महाघोरा स्मृतिर्नष्टास्य भारत । उल्काश्च ज्वलितास्तस्य दीप्ताः पार्श्वे प्रपेदिरे ॥
niṣpapāta mahāghorā smṛtirnaṣṭāsya bhārata | ulkāśca jvalitāstasya dīptāḥ pārśve prapedire
बड़ी घोर, उसके मुँह से निकल पड़ी; उसकी स्मृति नष्ट हो गई, हे भारत, और जलती हुई उल्काएँ उसके पार्श्वों में आ गिरीं।
श्लोक 5 (12.288.5)
गृध्राः कङ्का बलाकाश्च वाचोऽमुञ्चन्सुदारुणाः । वृत्रस्योपरि संहृष्टाश्चक्रवत्परिबभ्रमुः ॥
gṛdhrāḥ kaṅkā balākāśca vāco'muñcansudāruṇāḥ | vṛtrasyopari saṃhṛṣṭāścakravatparibabhramuḥ
गिद्ध, बगुले और सारस भयानक बोली बोलते हुए हर्षित होकर वृत्र के ऊपर चक्कर काटने लगे।
श्लोक 6 (12.288.6)
ततस्तं रथमास्थाय देवाप्यायित आहवे । वज्रोद्यतकरः शक्रस्तं दैत्यं प्रत्यवैक्षत ॥
tatastaṃ rathamāsthāya devāpyāyita āhave | vajrodyatakaraḥ śakrastaṃ daityaṃ pratyavaikṣata
तब रथ पर चढ़कर, युद्ध में देवताओं से बल पाए हुए शक्र ने वज्र उठाए हुए उस दैत्य की ओर देखा।
श्लोक 7 (12.288.7)
अमानुषमथो नादं स मुमोच महासुरः । व्यजृम्भच्चैव राजेन्द्र तीव्रज्वरसमन्वितः ॥
amānuṣamatho nādaṃ sa mumoca mahāsuraḥ | vyajṛmbhaccaiva rājendra tīvrajvarasamanvitaḥ
उस महान् असुर ने अमानुषी नाद किया और, हे राजेन्द्र, तीव्र ज्वर से ग्रस्त होकर जम्हाई ली।
श्लोक 8 (12.288.8)
अथास्य जृम्भतः शक्रस्ततो वज्रमवासृजत् । स वज्रः सुमहातेजा कालान्तकयमोपमः ॥
athāsya jṛmbhataḥ śakrastato vajramavāsṛjat | sa vajraḥ sumahātejā kālāntakayamopamaḥ
उसके जम्हाई लेते ही शक्र ने वज्र छोड़ दिया; और वह महातेजस्वी वज्र काल, अन्तक और यम के समान,
श्लोक 9 (12.288.9)
क्षिप्रमेव महाकायं वृत्रं दैत्यमपातयत् । ततो नादः समभवत्पुनरेव समन्ततः ॥
kṣiprameva mahākāyaṃ vṛtraṃ daityamapātayat | tato nādaḥ samabhavatpunareva samantataḥ
विशालकाय दैत्य वृत्र को तुरन्त गिरा बैठा। तब फिर चारों ओर नाद उठा,
श्लोक 10 (12.288.10)
वृत्रं विनिहितं दृष्ट्वा देवानां भरतर्षभ । वृत्रं तु हत्वा मघवा दानवारिर्महायशाः ॥
vṛtraṃ vinihitaṃ dṛṣṭvā devānāṃ bharatarṣabha | vṛtraṃ tu hatvā maghavā dānavārirmahāyaśāḥ
देवताओं का, हे भरतश्रेष्ठ, जब उन्होंने वृत्र को मरा हुआ देखा। और दानवों के शत्रु महायशस्वी मघवा वृत्र को मारकर,
श्लोक 11 (12.288.11)
वज्रेण विष्णुयुक्तेन दिवमेव समाविशत् । अथ वृत्रस्य कौरव्य शरीरादभिनिःसृता ॥
vajreṇa viṣṇuyuktena divameva samāviśat | atha vṛtrasya kauravya śarīrādabhiniḥsṛtā
विष्णु से युक्त वज्र के साथ स्वर्ग में प्रविष्ट हो गए। तभी, हे कौरव्य, वृत्र के शरीर से निकल पड़ी
श्लोक 12 (12.288.12)
ब्रह्महत्या महाघोरा रौद्रा लोकभयावहा । करालदशना भीमा विकृता कृष्णपिङ्गला ॥
brahmahatyā mahāghorā raudrā lokabhayāvahā | karāladaśanā bhīmā vikṛtā kṛṣṇapiṅgalā
ब्रह्महत्या, अत्यन्त घोर, रौद्र, लोकों को भयभीत करनेवाली, विकराल दाँतोंवाली, भीषण, विकृत और काली-पीली,
श्लोक 13 (12.288.13)
प्रकीर्णमूर्धजा चैव घोरनेत्रा च भारत । कपालमालिनी चैव कृत्येव भरतर्षभ ॥
prakīrṇamūrdhajā caiva ghoranetrā ca bhārata | kapālamālinī caiva kṛtyeva bharatarṣabha
बिखरे केशोंवाली और भयंकर नेत्रोंवाली, हे भारत, कपालों की माला पहने हुए, कृत्या के समान, हे भरतश्रेष्ठ,
श्लोक 14 (12.288.14)
रुधिरार्द्रा च धर्मज्ञ चीरवल्कलवासिनी । साऽभिनिष्क्रम्य राजेन्द्र तादृग्रूपा भयावहा ॥
rudhirārdrā ca dharmajña cīravalkalavāsinī | sā'bhiniṣkramya rājendra tādṛgrūpā bhayāvahā
रक्त से भीगी हुई, हे धर्मज्ञ, चीर और वल्कल पहने हुए। हे राजेन्द्र, वह ऐसा रूप लेकर बाहर आई और भयावनी थी,
श्लोक 15 (12.288.15)
वज्रिणं मृगयामास तदा भरतसत्तम । कस्यचित्त्वथ कालस्य वृत्रहा कुरुनन्दन ॥
vajriṇaṃ mṛgayāmāsa tadā bharatasattama | kasyacittvatha kālasya vṛtrahā kurunandana
वह वज्रधारी को खोजने लगी, हे भरतश्रेष्ठ। कुछ समय बाद, हे कुरुनन्दन, वृत्र को मारनेवाले इन्द्र
श्लोक 16 (12.288.16)
स्वर्गायाभिमुखः प्रायाल्लोकानां हितकाम्यया । सा विनिःसरमाणं तु दृष्ट्वा शक्रं महौजसम् ॥
svargāyābhimukhaḥ prāyāllokānāṃ hitakāmyayā | sā viniḥsaramāṇaṃ tu dṛṣṭvā śakraṃ mahaujasam
लोकों के हित की इच्छा से स्वर्ग की ओर चले। बाहर निकलते हुए महातेजस्वी शक्र को देखकर उसने
श्लोक 17 (12.288.17)
कण्ठे जग्राह देवेन्द्रं सुलग्ना चाभवत्तदा । स हि तस्मिन्समुत्पन्ने ब्रह्मवध्याकृते भये ॥
kaṇṭhe jagrāha devendraṃ sulagnā cābhavattadā | sa hi tasminsamutpanne brahmavadhyākṛte bhaye
देवेन्द्र का गला पकड़ लिया और उनसे चिपक गई। तब ब्रह्महत्या से उत्पन्न उस भय के आ पड़ने पर वे
श्लोक 18 (12.288.18)
नलिन्या विसमध्यस्थ उवासाब्दगणान्बहून् । अनुसृत्य तु यत्नात्स तया वै ब्रह्महत्यया ॥
nalinyā visamadhyastha uvāsābdagaṇānbahūn | anusṛtya tu yatnātsa tayā vai brahmahatyayā
कमलिनी में, कमलनाल के तन्तुओं के बीच छिपकर, बहुत वर्षों तक रहे। उस ब्रह्महत्या ने यत्न से उनका पीछा किया,
श्लोक 19 (12.288.19)
तदा गृहीतः कौरव्य निस्तेजाः समपद्यत । तस्या व्यपोहने शक्रः परं यत्नं चकार ह ॥
tadā gṛhītaḥ kauravya nistejāḥ samapadyata | tasyā vyapohane śakraḥ paraṃ yatnaṃ cakāra ha
और तब, हे कौरव्य, वे उसकी पकड़ में आ गए और तेजहीन हो गए। शक्र ने उसे छुड़ाने का बड़ा प्रयत्न किया,
श्लोक 20 (12.288.20)
न चाशकत्तां देवेन्द्रो ब्रह्मवध्यां व्यपोहितुम् । गृहीत एव तु तया देवेन्द्रो भरतर्षभ ॥
na cāśakattāṃ devendro brahmavadhyāṃ vyapohitum | gṛhīta eva tu tayā devendro bharatarṣabha
पर देवेन्द्र उस ब्रह्महत्या को हटा न सके; उससे जकड़े हुए ही देवेन्द्र, हे भरतश्रेष्ठ,
श्लोक 21 (12.288.21)
पितामहमुपागम्य शिरसा प्रत्यपूजयत् । ज्ञात्वा गृहीतं शक्रं स द्विजप्रवरवध्यया ॥
pitāmahamupāgamya śirasā pratyapūjayat | jñātvā gṛhītaṃ śakraṃ sa dvijapravaravadhyayā
पितामह के पास पहुँचे और सिर झुकाकर उनका सम्मान किया। श्रेष्ठ द्विज के वध की उस हत्या से इन्द्र को पकड़ा हुआ जानकर ब्रह्मा
श्लोक 22 (12.288.22)
ब्रह्मा स चिन्तयामास तदा भरतसत्तम । तामुवाच महाबाहो ब्रह्मवध्यां पितामहः ॥
brahmā sa cintayāmāsa tadā bharatasattama | tāmuvāca mahābāho brahmavadhyāṃ pitāmahaḥ
विचार में पड़ गए, हे भरतश्रेष्ठ। तब हे महाबाहु, पितामह ने ब्रह्महत्या से कहा,
श्लोक 23 (12.288.23)
स्वरेण मधुरेणाथ सान्त्वयन्निव भारत । मुच्यतां त्रिदशेन्द्रोऽयं मत्प्रियं कुरु भामिनि ॥
svareṇa madhureṇātha sāntvayanniva bhārata | mucyatāṃ tridaśendro'yaṃ matpriyaṃ kuru bhāmini
मधुर स्वर में, मानो उसे सान्त्वना देते हुए, हे भारत: 'इस त्रिदशेन्द्र को छोड़ दो; हे भामिनी, मेरा प्रिय करो।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 24 (12.288.24)
ब्रूहि किं ते करोम्यद्य कामं किं त्वमिहेच्छसि ॥
brūhi kiṃ te karomyadya kāmaṃ kiṃ tvamihecchasi
बताओ, आज मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ? यहाँ तुम्हारी क्या इच्छा है?'
ब्रह्महत्योवाच
श्लोक 25 (12.288.25)
त्रिलोकपूजिते देवे प्रीते त्रैलोक्यकर्तरि । कृतमेव हि मन्यामि निवासं तु विधत्स्व मे ॥
trilokapūjite deve prīte trailokyakartari | kṛtameva hi manyāmi nivāsaṃ tu vidhatsva me
'तीनों लोकों में पूजित, तीनों लोकों के रचयिता देव के प्रसन्न होने पर मैं कार्य को हुआ ही मानती हूँ; पर मेरे लिए निवास निश्चित कर दीजिए।'
श्लोक 26 (12.288.26)
त्वया कृतेयं मर्यादा लोकसंरक्षणार्थिना । स्थापना वै सुमहती त्वया देव प्रवर्तिता ॥
tvayā kṛteyaṃ maryādā lokasaṃrakṣaṇārthinā | sthāpanā vai sumahatī tvayā deva pravartitā
'लोकों की रक्षा चाहनेवाले आपने यह मर्यादा बाँधी है; हे देव, आपने एक बहुत बड़ी व्यवस्था चलाई है।'
श्लोक 27 (12.288.27)
प्रीते तु त्वयि धर्मज्ञ सर्वलोकेश्वर प्रभो । शक्रादपगमिष्यामि निवासं संविधत्स्व मे ॥
prīte tu tvayi dharmajña sarvalokeśvara prabho | śakrādapagamiṣyāmi nivāsaṃ saṃvidhatsva me
'हे धर्मज्ञ, हे सर्वलोकेश्वर प्रभो, आपके प्रसन्न होने पर मैं शक्र को छोड़ दूँगी; मेरे लिए निवास निश्चित कर दीजिए।'
भीष्म उवाच
श्लोक 28 (12.288.28)
तथेति तां प्राह तदा ब्रह्मवध्यां पितामहः । उपायतः स शक्रस्य ब्रह्मवध्यां व्यपोहितुम् ॥
tatheti tāṃ prāha tadā brahmavadhyāṃ pitāmahaḥ | upāyataḥ sa śakrasya brahmavadhyāṃ vyapohitum
पितामह ने तब ब्रह्महत्या से 'ऐसा ही हो' कहा और युक्ति से शक्र पर से ब्रह्महत्या को हटाने में लग गए।
श्लोक 29 (12.288.29)
ततः स्वयंभुवा ध्यातस्तत्र वह्निर्महात्मना । ब्रह्माणमुपसंगम्य ततो वचनमब्रवीत् ॥
tataḥ svayaṃbhuvā dhyātastatra vahnirmahātmanā | brahmāṇamupasaṃgamya tato vacanamabravīt
तब स्वयम्भू महात्मा के स्मरण करने पर वहाँ अग्नि ब्रह्मा के पास पहुँचे और ये वचन बोले।
अग्निरुवाच
श्लोक 30 (12.288.30)
प्राप्तोऽस्मि भगवन्देव त्वत्सकाशमनिन्दित । यत्कर्तव्यं मया देव तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥
prāpto'smi bhagavandeva tvatsakāśamanindita | yatkartavyaṃ mayā deva tadbhavānvaktumarhati
'हे भगवन्, हे निर्दोष देव, मैं आपके पास आ गया हूँ; मुझे जो करना है, हे देव, वह आप बताने योग्य हैं।'
ब्रह्मोवाच
श्लोक 31 (12.288.31)
बहुधा विभजिष्यामि ब्रह्मवध्यामिमामहम् । शक्रस्याद्य विमोक्षार्थं चतुर्भागं प्रतीच्छ वै ॥
bahudhā vibhajiṣyāmi brahmavadhyāmimāmaham | śakrasyādya vimokṣārthaṃ caturbhāgaṃ pratīccha vai
'मैं इस ब्रह्महत्या के अनेक भाग करूँगा; आज शक्र को मुक्त करने के लिए तुम इसका चौथा भाग ले लो।'
अग्निरुवाच
श्लोक 32 (12.288.32)
मम मोक्षस्य कोऽन्तो वै ब्रह्मन्ध्यायस्व वै प्रभो । एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्वतो लोकपूजित ॥
mama mokṣasya ko'nto vai brahmandhyāyasva vai prabho | etadicchāmi vijñātuṃ tatvato lokapūjita
'हे ब्रह्मन्, मेरे छुटकारे का अन्त क्या है? हे प्रभो, विचार कीजिए। हे लोकपूजित, मैं यह यथार्थ में जानना चाहता हूँ।'
ब्रह्मोवाच
श्लोक 33 (12.288.33)
यस्त्वां ज्वलन्तमासाद्य स्वयं वै मानवः क्वचित् । बीजौषधिरसैर्वह्ने न यक्ष्यति तमोवृतः ॥
yastvāṃ jvalantamāsādya svayaṃ vai mānavaḥ kvacit | bījauṣadhirasairvahne na yakṣyati tamovṛtaḥ
'जो मनुष्य तमोगुण से घिरा हुआ, तुम्हें प्रज्वलित देखकर भी कभी स्वयं बीजों और ओषधियों के रस से, हे अग्नि, तुम्हारे लिए यज्ञ नहीं करेगा,'
श्लोक 34 (12.288.34)
तमेषा यास्यति क्षिप्रं तत्रैव च निवत्स्यति । ब्रह्मवध्या हव्यवाह व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥
tameṣā yāsyati kṣipraṃ tatraiva ca nivatsyati | brahmavadhyā havyavāha vyetu te mānaso jvaraḥ
'उसके पास वह शीघ्र जाएगी और वहीं रहेगी। हे हव्यवाहन, यह ब्रह्महत्या है; तुम्हारे मन का ज्वर दूर हो जाए।'
श्लोक 35 (12.288.35)
इत्युक्तः प्रतिजग्राह तद्वचो हव्यकव्यभुक् । पितामहस्य भगवांस्तथा च तदभूत्प्रभो ॥
ityuktaḥ pratijagrāha tadvaco havyakavyabhuk | pitāmahasya bhagavāṃstathā ca tadabhūtprabho
ऐसा कहे जाने पर देवों और पितरों के हव्य-कव्य के भोक्ता अग्नि ने पितामह का वह वचन स्वीकार कर लिया; और हे प्रभो, वैसा ही हुआ।
श्लोक 36 (12.288.36)
ततो वृक्षौषधितृणं समाहूय पितामहः । इममर्थं महाराज वक्तुं समुपचक्रमे ॥
tato vṛkṣauṣadhitṛṇaṃ samāhūya pitāmahaḥ | imamarthaṃ mahārāja vaktuṃ samupacakrame
तब पितामह ने वृक्षों, ओषधियों और तृणों को बुलाकर, हे महाराज, उनसे यह कहना आरम्भ किया:
श्लोक 37 (12.288.37)
इयं पुत्रादनुप्राप्ता ब्रह्महत्या महाभया । पुरुहूतं चतुर्थांशमस्या यूयं प्रतीच्छत ॥
iyaṃ putrādanuprāptā brahmahatyā mahābhayā | puruhūtaṃ caturthāṃśamasyā yūyaṃ pratīcchata
'यह महाभयंकर ब्रह्महत्या पुत्र से इन्द्र पर आ पड़ी है; तुम सब इसका चौथा भाग ले लो।'
भीष्म उवाच
श्लोक 38 (12.288.38)
ततो वृक्षौषधितृणं तथैवोक्तं यथातथम् । व्यथितं वह्निवद्राजन्ब्रह्माणमिदमब्रवीत् ॥
tato vṛkṣauṣadhitṛṇaṃ tathaivoktaṃ yathātatham | vyathitaṃ vahnivadrājanbrahmāṇamidamabravīt
तब वृक्षों, ओषधियों और तृणों ने, जिनसे ठीक वैसा ही कहा गया था, अग्नि के समान व्यथित होकर, हे राजन्, ब्रह्मा से यह कहा:
वृक्षौषधितृणमुवाच
श्लोक 39 (12.288.39)
अस्माकं ब्रह्मवध्यायाः कोऽन्तो लोकपितामह । स्वभावनिहतानस्मान्न पुनर्हन्तुमर्हसि ॥
asmākaṃ brahmavadhyāyāḥ ko'nto lokapitāmaha | svabhāvanihatānasmānna punarhantumarhasi
'हे लोकपितामह, हमारी इस ब्रह्महत्या का अन्त क्या है? हम तो अपने स्वभाव से ही मारे हुए हैं; आप हमें फिर न मारें।'
श्लोक 40 (12.288.40)
वयमग्निं तथा शीतं वर्षं च पवनेरितम् । सहामः सततं देव तथा च्छेदनभेदने ॥
vayamagniṃ tathā śītaṃ varṣaṃ ca pavaneritam | sahāmaḥ satataṃ deva tathā cchedanabhedane
'हम निरन्तर अग्नि, शीत और वायु से चलाई हुई वर्षा सहते हैं, हे देव, और कटना-फटना भी।'
श्लोक 41 (12.288.41)
ब्रह्मवध्यामिमामद्य भवतः शासनाद्वयम् । ग्रहीष्यामस्त्रिलोकेश मोक्षं चिन्तयतां भवान् ॥
brahmavadhyāmimāmadya bhavataḥ śāsanādvayam | grahīṣyāmastrilokeśa mokṣaṃ cintayatāṃ bhavān
'हे त्रिलोकेश, आपकी आज्ञा से हम आज इस ब्रह्महत्या को ग्रहण करेंगे; आप हमारे छुटकारे का विचार कीजिए।'
ब्रह्मोवाच
श्लोक 42 (12.288.42)
पर्वकाले तु संप्राप्ते यो वै छेदनभेदनम् । करिष्यति नरो मोहात्तमेषाऽनुगमिष्यति ॥
parvakāle tu saṃprāpte yo vai chedanabhedanam | kariṣyati naro mohāttameṣā'nugamiṣyati
'पर्व का समय आने पर जो मनुष्य मोहवश काटेगा या चीरेगा, उसके पीछे यह चली जाएगी।'
भीष्म उवाच
श्लोक 43 (12.288.43)
ततो वृक्षौषधितृणमेवमुक्तं महात्मना । ब्रह्माणमभिसंपूज्य जगामाशु यथागतम् ॥
tato vṛkṣauṣadhitṛṇamevamuktaṃ mahātmanā | brahmāṇamabhisaṃpūjya jagāmāśu yathāgatam
महात्मा के इस प्रकार कहने पर वृक्ष, ओषधियाँ और तृण ब्रह्मा को प्रणाम करके जैसे आए थे वैसे ही शीघ्र चले गए।
श्लोक 44 (12.288.44)
आहूयाप्सरसो देवस्ततो लोकपितामहः । वाचा मधुरया प्राह सान्त्वयन्निव भारत ॥
āhūyāpsaraso devastato lokapitāmahaḥ | vācā madhurayā prāha sāntvayanniva bhārata
तब लोकपितामह देव ने अप्सराओं को बुलाकर, हे भारत, मधुर वाणी में मानो उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा:
ब्रह्मोवाच
श्लोक 45 (12.288.45)
इयमिन्द्रादनुप्राप्ता ब्रह्मवध्या वराङ्गनाः । चतुर्थमस्या भागांशं मयोक्ताः संप्रतीच्छत ॥
iyamindrādanuprāptā brahmavadhyā varāṅganāḥ | caturthamasyā bhāgāṃśaṃ mayoktāḥ saṃpratīcchata
'हे वरांगनाओ, यह ब्रह्महत्या इन्द्र से आ पड़ी है; जैसा मैंने कहा, तुम इसका चौथा भाग ले लो।'
अप्सरस ऊचुः
श्लोक 46 (12.288.46)
ग्रहणे कृतबुद्धीनां देवेश तव शासनात् । मोक्षं समयतोऽस्माकं चिन्तयस्व पितामह ॥
grahaṇe kṛtabuddhīnāṃ deveśa tava śāsanāt | mokṣaṃ samayato'smākaṃ cintayasva pitāmaha
'हे देवेश, आपकी आज्ञा से हमने उसे ग्रहण करने का निश्चय कर लिया है; हे पितामह, शर्त के साथ हमारे छुटकारे का विचार कीजिए।'
ब्रह्मोवाच
श्लोक 47 (12.288.47)
रजस्वलासु नारीषु यो वै मैथुनमाचरेत् । तमेषा यास्यति क्षिप्रं व्येतु वो मानसो ज्वरः ॥
rajasvalāsu nārīṣu yo vai maithunamācaret | tameṣā yāsyati kṣipraṃ vyetu vo mānaso jvaraḥ
'जो मनुष्य रजस्वला स्त्रियों से मैथुन करेगा, उसके पास यह शीघ्र चली जाएगी; तुम्हारे मन का ज्वर दूर हो जाए।'
भीष्म उवाच
श्लोक 48 (12.288.48)
तथेति हृष्टमनस इत्युक्त्वाऽऽप्सरसां गणाः । स्वानि स्थानानि संप्राप्य रेमिरे भरतर्षभ ॥
tatheti hṛṣṭamanasa ityuktvā''psarasāṃ gaṇāḥ | svāni sthānāni saṃprāpya remire bharatarṣabha
'ऐसा ही हो,' अप्सराओं के समूह ने हर्षित मन से यह कहा और अपने-अपने स्थानों को पहुँचकर, हे भरतश्रेष्ठ, आनन्द करने लगीं।
श्लोक 49 (12.288.49)
ततस्त्रिलोककृद्देवः पुनरेव महातपाः । अपः संचिन्तयामास ध्यातास्ताश्चाप्यथागमन् ॥
tatastrilokakṛddevaḥ punareva mahātapāḥ | apaḥ saṃcintayāmāsa dhyātāstāścāpyathāgaman
तब त्रिलोकों के रचयिता महातपस्वी देव ने फिर जल का चिन्तन किया; ध्यान किए जाने पर वे आ पहुँचे।
श्लोक 50 (12.288.50)
तास्तु सर्वाः समागम्य ब्रह्माणममितौजसम् । इदमूचुर्वचो राजन्प्रणिपत्य पितामहम् ॥
tāstu sarvāḥ samāgamya brahmāṇamamitaujasam | idamūcurvaco rājanpraṇipatya pitāmaham
वे सब, हे राजन्, अपरिमित तेजवाले ब्रह्मा के पास एकत्र होकर पितामह को प्रणाम करके यह वचन बोले:
आप ऊचुः
श्लोक 51 (12.288.51)
इमाः स्म देव संप्राप्तास्त्वत्सकाशमरिंदम । शासनात्तव लोकेश समाज्ञापय नः प्रभो ॥
imāḥ sma deva saṃprāptāstvatsakāśamariṃdama | śāsanāttava lokeśa samājñāpaya naḥ prabho
'हे देव, हे शत्रुदमन, हम आपके पास आ गए हैं; हे लोकेश, आपकी आज्ञा से, हे प्रभो, हमें आदेश दीजिए।'
ब्रह्मोवाच
श्लोक 52 (12.288.52)
इयं वृत्रादनुप्राप्ता पुरुहूतं महाभया । ब्रह्मवध्या चतुर्थांशमस्या यूयं प्रतीच्छत ॥
iyaṃ vṛtrādanuprāptā puruhūtaṃ mahābhayā | brahmavadhyā caturthāṃśamasyā yūyaṃ pratīcchata
'यह महाभयंकर ब्रह्महत्या वृत्र से इन्द्र पर आ पड़ी है; तुम सब इसका चौथा भाग ले लो।'
आप ऊचुः
श्लोक 53 (12.288.53)
एवं भवतु लोकेश यथा वदसि नः प्रभो । मोक्षं समयतोऽस्माकं संचिन्तयितुमर्हसि ॥
evaṃ bhavatu lokeśa yathā vadasi naḥ prabho | mokṣaṃ samayato'smākaṃ saṃcintayitumarhasi
'हे लोकेश, ऐसा ही हो, जैसा आप हमसे कहते हैं, हे प्रभो; आप शर्त के साथ हमारे छुटकारे का विचार करें।'
श्लोक 54 (12.288.54)
त्वं हि देवेश सर्वस्य जगतः परमा गतिः । कोऽन्यः प्रसाद्यो हि भवेद्यः कृच्छ्रान्नः समुद्धरेत् ॥
tvaṃ hi deveśa sarvasya jagataḥ paramā gatiḥ | ko'nyaḥ prasādyo hi bhavedyaḥ kṛcchrānnaḥ samuddharet
'हे देवेश, आप ही सारे जगत् की परम गति हैं; और कौन प्रसन्न करने योग्य होगा, जो हमें इस संकट से उबार सके?'
ब्रह्मोवाच
श्लोक 55 (12.288.55)
अल्पा इति मतिं कृत्वा यो नरो बुद्धिमोहितः । श्लेष्ममूत्रपुरीषाणि युष्मासु प्रतिमोक्ष्यति ॥
alpā iti matiṃ kṛtvā yo naro buddhimohitaḥ | śleṣmamūtrapurīṣāṇi yuṣmāsu pratimokṣyati
'जो मनुष्य बुद्धि से मोहित होकर तुम्हें तुच्छ समझकर तुममें कफ, मूत्र और मल छोड़ेगा,'
श्लोक 56 (12.288.56)
तमियं यास्यति क्षिप्रं तत्रैव च निवत्स्यति । तथा वो भविता मोक्ष इति सत्यं ब्रवीमि वः ॥
tamiyaṃ yāsyati kṣipraṃ tatraiva ca nivatsyati | tathā vo bhavitā mokṣa iti satyaṃ bravīmi vaḥ
'उसके पास यह शीघ्र जाएगी और वहीं रहेगी। इस प्रकार तुम्हारा छुटकारा होगा; मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।'
भीष्म उवाच
श्लोक 57 (12.288.57)
ततो विमुच्य देवेन्द्रं ब्रह्मवध्या युधिष्ठिर । यथा निसृष्टं तं वासमगमद्देवशासनात् ॥
tato vimucya devendraṃ brahmavadhyā yudhiṣṭhira | yathā nisṛṣṭaṃ taṃ vāsamagamaddevaśāsanāt
तब देवेन्द्र को छोड़कर, हे युधिष्ठिर, ब्रह्महत्या देवता की आज्ञा से उस निवास को चली गई, जो उसे सौंपा गया था।
श्लोक 58 (12.288.58)
एवं शक्रेण संप्राप्ता ब्रह्मवध्या जनाधिप । पितामहमनुज्ञाप्य सोऽश्वमेधमकल्पयत् ॥
evaṃ śakreṇa saṃprāptā brahmavadhyā janādhipa | pitāmahamanujñāpya so'śvamedhamakalpayat
इस प्रकार, हे नरेश्वर, शक्र को ब्रह्महत्या लगी थी; और पितामह की आज्ञा लेकर उन्होंने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया।
श्लोक 59 (12.288.59)
श्रूयते च महाराज संप्राप्ता वासवेन वै । ब्रह्मवध्या ततः शुद्धिं हयमेधेन लब्धवान् ॥
śrūyate ca mahārāja saṃprāptā vāsavena vai | brahmavadhyā tataḥ śuddhiṃ hayamedhena labdhavān
और हे महाराज, सुना जाता है कि ब्रह्महत्या को प्राप्त हुए इन्द्र ने तब अश्वमेध यज्ञ से शुद्धि पाई।
श्लोक 60 (12.288.60)
समवाप्य श्रियं देवो हत्वाऽरींश्च सहस्रशः । प्रहर्षमतुलं लेभे वासवः पृथिवीपते ॥
samavāpya śriyaṃ devo hatvā'rīṃśca sahasraśaḥ | praharṣamatulaṃ lebhe vāsavaḥ pṛthivīpate
श्री को फिर पाकर और हजारों शत्रुओं को मारकर, हे पृथ्वीपति, इन्द्र ने अतुल हर्ष पाया।
श्लोक 61 (12.288.61)
वृत्रस्य रुधिराच्चैव बुद्बुदाः पार्थ जज्ञिरे । द्विजातिभिरभक्ष्यास्ते दीक्षितैश्च तपोधनैः ॥
vṛtrasya rudhirāccaiva budbudāḥ pārtha jajñire | dvijātibhirabhakṣyāste dīkṣitaiśca tapodhanaiḥ
और वृत्र के रक्त से, हे पार्थ, बुलबुले उत्पन्न हुए; द्विजातियों को, तथा दीक्षित तपस्वियों को भी, उन्हें नहीं खाना चाहिए।
श्लोक 62 (12.288.62)
सर्वावस्थं त्वमप्येषां द्विजातीनां प्रियं कुरु । इमे हि भूतले देवाः प्रथिताः कुरुनन्दन ॥
sarvāvasthaṃ tvamapyeṣāṃ dvijātīnāṃ priyaṃ kuru | ime hi bhūtale devāḥ prathitāḥ kurunandana
हे कुरुनन्दन, तुम भी हर दशा में इन द्विजातियों का प्रिय करो; क्योंकि ये पृथ्वी पर प्रसिद्ध देवता हैं।
श्लोक 63 (12.288.63)
एवं शक्रेण कौरव्य बुद्धिसौक्ष्म्यान्महासुरः । उपायपूर्वं निहतो वृत्रो ह्यमिततेजसा ॥
evaṃ śakreṇa kauravya buddhisaukṣmyānmahāsuraḥ | upāyapūrvaṃ nihato vṛtro hyamitatejasā
इस प्रकार, हे कौरव्य, अपरिमित तेजवाले शक्र ने बुद्धि की सूक्ष्मता से, पहले उपाय करके, महान् असुर वृत्र को मारा।
श्लोक 64 (12.288.64)
एवं त्वमपि कौन्तेय पृथिव्यामपराजितः । भविष्यसि यथा देवः शतक्रतुरमित्रहा ॥
evaṃ tvamapi kaunteya pṛthivyāmaparājitaḥ | bhaviṣyasi yathā devaḥ śatakraturamitrahā
इसी प्रकार, हे कुन्तीपुत्र, तुम भी पृथ्वी पर अपराजित रहोगे, जैसे शत्रुनाशक देव शतक्रतु रहे।
श्लोक 65 (12.288.65)
ये तु शक्रकथां दिव्यामिमां पर्वसुपर्वसु । विप्रमध्ये वदिष्यन्ति न ते प्राप्स्यन्ति किल्विषं ॥
ye tu śakrakathāṃ divyāmimāṃ parvasuparvasu | vipramadhye vadiṣyanti na te prāpsyanti kilviṣaṃ
जो लोग इस दिव्य शक्र-कथा को प्रत्येक पर्व पर ब्राह्मणों के बीच सुनाएँगे, वे पाप को प्राप्त नहीं होंगे।
श्लोक 66 (12.288.66)
इत्येतद्वृत्रमाश्रित्य शक्रस्यात्यद्भुतं महत् । कथितं कर्म ते तात किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
ityetadvṛtramāśritya śakrasyātyadbhutaṃ mahat | kathitaṃ karma te tāta kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi
इस प्रकार, हे तात, वृत्र को लेकर शक्र का यह अत्यन्त अद्भुत और महान् कर्म मैंने तुम्हें सुना दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?