शान्ति पर्व · अध्याय 289
दक्ष के यज्ञ में रुद्र के क्रोध से ज्वर की उत्पत्ति
युधिष्ठिर पूछते हैं कि वृत्र को ग्रसने वाला ज्वर कैसे उत्पन्न हुआ। भीष्म बताते हैं कि दक्ष के अश्वमेध में भाग न मिलने पर शिव क्रुद्ध होकर यज्ञ का नाश कर देते हैं और उनके ललाट के पसीने से एक भयंकर पुरुष उत्पन्न होता है। ब्रह्मा के कहने पर शिव को उनका भाग मिलता है और वे इस ज्वर को सब प्राणियों में बाँट देते हैं; फिर भीष्म वृत्र के ज्वर से ग्रस्त होने और इन्द्र के हाथों मारे जाने का वर्णन करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.289.1)
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । अस्मिन्वृत्रवधे तात विवक्षा मम जायते ॥
pitāmaha mahāprājña sarvaśāstraviśārada | asminvṛtravadhe tāta vivakṣā mama jāyate
हे पितामह, हे महाप्राज्ञ, सब शास्त्रों में निपुण, तात, वृत्र के इस वध के विषय में मेरे मन में कुछ पूछने की इच्छा हो रही है।
श्लोक 2 (12.289.2)
ज्वरेण मोहितो वृत्रः कथितस्ते जनाधिप । निहतो वासवेनेह वज्रेणेति ममानघ ॥
jvareṇa mohito vṛtraḥ kathitaste janādhipa | nihato vāsaveneha vajreṇeti mamānagha
हे राजन्, हे अनघ, आपने बताया था कि वृत्र ज्वर से मोहित हो गया था और तब इन्द्र ने वज्र से उसे मार डाला।
श्लोक 3 (12.289.3)
कथमेष महाप्राज्ञ ज्वरः प्रादुर्बभूव ह । ज्वरोत्पत्तिं निपुणतः श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥
kathameṣa mahāprājña jvaraḥ prādurbabhūva ha | jvarotpattiṃ nipuṇataḥ śrotumicchāmyahaṃ prabho
हे महाप्राज्ञ, यह ज्वर कैसे उत्पन्न हुआ? हे प्रभो, मैं ज्वर की उत्पत्ति ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ।
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (12.289.4)
शृणु राजञ्ज्वरस्येमं संभवं लोकविश्रुतम् । विस्तरं चास्य वक्ष्यामि यादृशश्चैव भारत ॥
śṛṇu rājañjvarasyemaṃ saṃbhavaṃ lokaviśrutam | vistaraṃ cāsya vakṣyāmi yādṛśaścaiva bhārata
हे राजन्, ज्वर की लोकविख्यात उत्पत्ति सुनो। हे भारत, मैं उसे जैसी वह थी वैसी ही विस्तार से कहूँगा।
श्लोक 5 (12.289.5)
पुरा मेरोर्महाराज शृङ्गं त्रैलोक्यविश्रुतम् । ज्योतिष्कं नाम सावित्रं सर्वरत्नविभूषितम् ॥
purā merormahārāja śṛṅgaṃ trailokyaviśrutam | jyotiṣkaṃ nāma sāvitraṃ sarvaratnavibhūṣitam
हे महाराज, बहुत पहले मेरु पर्वत पर ज्योतिष्क नाम का एक शिखर था, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध, सूर्य को प्रिय और सब प्रकार के रत्नों से सुशोभित था।
श्लोक 6 (12.289.6)
अप्रमेयमनाधृष्यं सर्वलोकेषु भारत । तत्र देवो गिरितटे हेमधातुविभूषिते ॥
aprameyamanādhṛṣyaṃ sarvalokeṣu bhārata | tatra devo giritaṭe hemadhātuvibhūṣite
हे भारत, वह सब लोकों में अपरिमेय और अजेय था। वहाँ सोने और धातुओं से सजे उस पर्वत-तट पर देव
श्लोक 7 (12.289.7)
पर्यङ्क इव विभ्राजन्नुपविष्टो बभूव ह । शैलराजसुता चास्य नित्यं पार्श्वे स्थिता बभौ । तथा देवा महात्मानो वसवश्चामितौजसः ॥
paryaṅka iva vibhrājannupaviṣṭo babhūva ha | śailarājasutā cāsya nityaṃ pārśve sthitā babhau | tathā devā mahātmāno vasavaścāmitaujasaḥ
पर्यंक पर बैठे हों, ऐसी शोभा से विराजमान थे। पर्वतराज की पुत्री सदा उनके पास बैठी हुई शोभित होती थी, और महात्मा देवता तथा अपार तेज वाले वसु भी वहाँ थे,
श्लोक 8 (12.289.8)
तथैव च महात्मानावश्विनौ भिषजां वरौ । तथा वैश्रवणो राजा गुह्यकैरभिसंवृतः ॥
tathaiva ca mahātmānāvaśvinau bhiṣajāṃ varau | tathā vaiśravaṇo rājā guhyakairabhisaṃvṛtaḥ
वैसे ही वैद्यों में श्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार, और गुह्यकों से घिरे राजा वैश्रवण (कुबेर) भी थे,
श्लोक 9 (12.289.9)
यक्षाणामीश्वरः श्रीमान्कैलासनिलयः प्रभुः । शङ्खपद्मनिधिभ्यां च लक्ष्म्या परमया सह । उपासन्त महात्मानमुशना च महाकविः ॥
yakṣāṇāmīśvaraḥ śrīmānkailāsanilayaḥ prabhuḥ | śaṅkhapadmanidhibhyāṃ ca lakṣmyā paramayā saha | upāsanta mahātmānamuśanā ca mahākaviḥ
यक्षों के स्वामी, श्रीमान् और प्रभु कुबेर, जिनका निवास कैलास है, अपनी शंख और पद्म निधियों तथा परम शोभा के साथ, और महाकवि उशना (शुक्राचार्य) भी उन महात्मा की उपासना कर रहे थे,
श्लोक 10 (12.289.10)
सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव च महर्षयः । अङ्गिरः प्रमुखाश्चैव तथा देवर्षयोऽपरे ॥
sanatkumārapramukhāstathaiva ca maharṣayaḥ | aṅgiraḥ pramukhāścaiva tathā devarṣayo'pare
और सनत्कुमार आदि महर्षि, अङ्गिरा आदि तथा अन्य देवर्षि भी वहाँ उपस्थित थे।
श्लोक 11 (12.289.11)
विश्वावसुश्च गन्धर्वस्तथा नारदपर्वतौ । अप्सरोगणसङ्घाश्च समाजग्मुरनेकशः ॥
viśvāvasuśca gandharvastathā nāradaparvatau | apsarogaṇasaṅghāśca samājagmuranekaśaḥ
गन्धर्व विश्वावसु, नारद और पर्वत, तथा अप्सराओं के झुंड और समूह बहुत बड़ी संख्या में वहाँ आ जुटे।
श्लोक 12 (12.289.12)
ववौ सुखः शिवो वायुर्नानागन्धवहः शुचिः । सर्वर्तुकुसुमोपेताः पुष्पवन्तो द्रुमास्तथा ॥
vavau sukhaḥ śivo vāyurnānāgandhavahaḥ śuciḥ | sarvartukusumopetāḥ puṣpavanto drumāstathā
सुखद, मंगलकारी और पवित्र वायु अनेक गन्ध लिये बह रही थी, और वृक्ष सब ऋतुओं के फूलों से लदे हुए थे।
श्लोक 13 (12.289.13)
तथा विद्याधराश्चैव सिद्धाश्चैव तपोधनाः । महादेवं पशुपतिं पर्युपासन्त भारत ॥
tathā vidyādharāścaiva siddhāścaiva tapodhanāḥ | mahādevaṃ paśupatiṃ paryupāsanta bhārata
हे भारत, विद्याधर और तपोधन सिद्ध पशुपति महादेव की उपासना कर रहे थे।
श्लोक 14 (12.289.14)
भूतानि च महाराज नानारूपधराण्यथ । राक्षसाश्च महारौद्राः पिशाचाश्च महाबलाः ॥
bhūtāni ca mahārāja nānārūpadharāṇyatha | rākṣasāśca mahāraudrāḥ piśācāśca mahābalāḥ
हे महाराज, अनेक रूप धारण करने वाले भूत, अत्यन्त भयंकर राक्षस और बलवान् पिशाच,
श्लोक 15 (12.289.15)
बहुरूपधरा हृष्टा नानाप्रहरणोद्यताः । देवस्यानुचरास्तत्र तस्थिरे चानलोपमाः ॥
bahurūpadharā hṛṣṭā nānāpraharaṇodyatāḥ | devasyānucarāstatra tasthire cānalopamāḥ
नाना रूप धारण किये, प्रसन्न और अनेक प्रकार के शस्त्र उठाये हुए, अग्नि के समान दीप्त देव के अनुचर वहाँ खड़े थे।
श्लोक 16 (12.289.16)
नन्दी च भगवांस्तत्र देवस्यानुमते स्थितः । प्रगृह्य ज्वलितं शूलं दीप्यमानं स्वतेजसा ॥
nandī ca bhagavāṃstatra devasyānumate sthitaḥ | pragṛhya jvalitaṃ śūlaṃ dīpyamānaṃ svatejasā
भगवान् नन्दी देव की अनुमति से वहाँ खड़े थे और अपने ही तेज से दमकता हुआ जलता त्रिशूल उठाये हुए थे।
श्लोक 17 (12.289.17)
गङ्गा च सरितां श्रेष्ठा सर्वतीर्थजलोद्भवा । पर्युपासत तं देवं रूपिणी कुरुनन्दन ॥
gaṅgā ca saritāṃ śreṣṭhā sarvatīrthajalodbhavā | paryupāsata taṃ devaṃ rūpiṇī kurunandana
हे कुरुनन्दन, सब तीर्थों के जल से उत्पन्न नदियों में श्रेष्ठ गङ्गा भी देहधारिणी होकर उन देव की उपासना कर रही थीं।
श्लोक 18 (12.289.18)
स एवं भगवांस्तत्र पूज्यमानः सुरर्षिभिः । देवैश्च सुमहातेजा महादेवो व्यतिष्ठत ॥
sa evaṃ bhagavāṃstatra pūjyamānaḥ surarṣibhiḥ | devaiśca sumahātejā mahādevo vyatiṣṭhata
इस प्रकार महातेजस्वी भगवान् महादेव देवर्षियों और देवताओं से पूजित होकर वहाँ विराजमान रहे।
श्लोक 19 (12.289.19)
कस्यचित्त्वथ कालस्य दक्षो नाम प्रजापतिः । पूर्वोक्तेन विधानेन यक्ष्यमाणोऽन्वपद्यत ॥
kasyacittvatha kālasya dakṣo nāma prajāpatiḥ | pūrvoktena vidhānena yakṣyamāṇo'nvapadyata
कुछ समय बाद दक्ष नाम के प्रजापति ने, पहले बताई विधि के अनुसार, यज्ञ करने का आरम्भ किया।
श्लोक 20 (12.289.20)
ततस्तस्य मखं देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः । गमनाय समागम्य बुद्धिमापेदिरे तदा ॥
tatastasya makhaṃ devāḥ sarve śakrapurogamāḥ | gamanāya samāgamya buddhimāpedire tadā
तब इन्द्र के नेतृत्व में सब देवताओं ने इकट्ठे होकर उसके यज्ञ में जाने का निश्चय किया।
श्लोक 21 (12.289.21)
ते विमानैर्महात्मानो ज्वलनार्कसमप्रभैः । देवस्यानुमतेऽगच्छन्गङ्गाद्वारमिति श्रुतिः ॥
te vimānairmahātmāno jvalanārkasamaprabhaiḥ | devasyānumate'gacchangaṅgādvāramiti śrutiḥ
वे महात्मा देवता अग्नि और सूर्य के समान दमकते विमानों में देव की अनुमति से गङ्गाद्वार को गये, ऐसा सुना जाता है।
श्लोक 22 (12.289.22)
प्रस्थिता देवता दृष्ट्वा शैलराजसुता तदा । उवाच वचनं साध्वी देवं पशुपतिं पतिम् ॥
prasthitā devatā dṛṣṭvā śailarājasutā tadā | uvāca vacanaṃ sādhvī devaṃ paśupatiṃ patim
देवताओं को जाते देखकर पर्वतराज की साध्वी पुत्री ने तब अपने पति पशुपति देव से कहा।
उमोवाच
श्लोक 23 (12.289.23)
भगवन्क्वनु यान्त्येते देवाः शक्रपुरोगमाः । ब्रूहि तत्त्वेन तत्त्वज्ञ संशयो मे महानयम् ॥
bhagavankvanu yāntyete devāḥ śakrapurogamāḥ | brūhi tattvena tattvajña saṃśayo me mahānayam
"भगवन्, इन्द्र आदि ये देवता कहाँ जा रहे हैं? हे तत्त्वज्ञ, मुझे ठीक-ठीक बताइये; यह मेरा बड़ा संशय है।"
महेश्वर उवाच
श्लोक 24 (12.289.24)
दक्षो नाम महाभागे प्रजानां पतिरुत्तमः । हयमेधेन यजते तत्र यान्ति दिवौकसः ॥
dakṣo nāma mahābhāge prajānāṃ patiruttamaḥ | hayamedhena yajate tatra yānti divaukasaḥ
"हे महाभागे, प्रजापतियों में श्रेष्ठ दक्ष अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं। स्वर्गवासी देवता वहीं जा रहे हैं।"
उमोवाच
श्लोक 25 (12.289.25)
यज्ञमेतं महादेव किमर्थं नाभिगच्छसि । केन वा प्रतिषेधेन गमनं ते न विद्यते ॥
yajñametaṃ mahādeva kimarthaṃ nābhigacchasi | kena vā pratiṣedhena gamanaṃ te na vidyate
"हे महादेव, आप इस यज्ञ में क्यों नहीं जाते? या किस रुकावट के कारण आपका वहाँ जाना नहीं हो रहा?"
महेश्वर उवाच
श्लोक 26 (12.289.26)
सुरैरेव महाभागे पूर्वमेतदनुष्ठितम् । यज्ञेषु सर्वेषु मम न भाग उपकल्पितः ॥
suraireva mahābhāge pūrvametadanuṣṭhitam | yajñeṣu sarveṣu mama na bhāga upakalpitaḥ
"हे महाभागे, यह सब देवताओं ने ही पहले से ठहरा रखा है: सब यज्ञों में मेरे लिए कोई भाग नहीं रखा गया।"
श्लोक 27 (12.289.27)
पूर्वोपायोपपन्नेन मार्गेण वरवर्णिनि । न मे सुराः प्रयच्छन्ति भागं यज्ञस्य धर्मतः ॥
pūrvopāyopapannena mārgeṇa varavarṇini | na me surāḥ prayacchanti bhāgaṃ yajñasya dharmataḥ
"हे वरवर्णिनी, पूर्व में निकाली गई रीति के अनुसार देवता मुझे यज्ञ का भाग नहीं देते, यद्यपि वह धर्मतः मेरा है।"
उमोवाच
श्लोक 28 (12.289.28)
भगवन्सर्वभूतेषु प्रभावाभ्यधिको गुणैः । अजय्यश्चाप्यधृष्यश्च तेजसा यशसा श्रिया ॥
bhagavansarvabhūteṣu prabhāvābhyadhiko guṇaiḥ | ajayyaścāpyadhṛṣyaśca tejasā yaśasā śriyā
"भगवन्, आप सब प्राणियों में प्रभाव और गुणों में सबसे बढ़कर हैं, तेज, यश और श्री में अजेय और अदम्य हैं।"
श्लोक 29 (12.289.29)
अनेन ते महाभाग प्रतिषेधेन भागतः । अतीव दुःखमुत्पन्नं वेपथुश्च ममानघ ॥
anena te mahābhāga pratiṣedhena bhāgataḥ | atīva duḥkhamutpannaṃ vepathuśca mamānagha
"हे महाभाग, आपके भाग के इस निषेध से मुझे बहुत दुःख हुआ है और हे अनघ, मैं काँप रही हूँ।"
भीष्म उवाच
श्लोक 30 (12.289.30)
एवमुक्त्वा तु सा देवी देवं पशुपतिं पतिम् । तुष्णींभूताऽभवद्राजन्दह्यमानेन चेतसा ॥
evamuktvā tu sā devī devaṃ paśupatiṃ patim | tuṣṇīṃbhūtā'bhavadrājandahyamānena cetasā
हे राजन्, अपने पति पशुपति देव से ऐसा कहकर देवी जलते हुए हृदय से चुप हो गईं।
श्लोक 31 (12.289.31)
अथ देव्या मतं ज्ञात्वा हृद्गतं यच्चिकीर्षितम् । स समाज्ञापयामास तिष्ठ त्वमिति नन्दिनम् ॥
atha devyā mataṃ jñātvā hṛdgataṃ yaccikīrṣitam | sa samājñāpayāmāsa tiṣṭha tvamiti nandinam
तब देवी का मन और उनके हृदय में छिपी इच्छा जानकर उन्होंने नन्दी को आज्ञा दी, "तुम यहीं रहो।"
श्लोक 32 (12.289.32)
ततो योगबलं कृत्वा सर्वयोगेश्वरेश्वरः । तं यज्ञं स महातेजा भीमैरनुचरैस्तदा ॥
tato yogabalaṃ kṛtvā sarvayogeśvareśvaraḥ | taṃ yajñaṃ sa mahātejā bhīmairanucaraistadā
तब सब योगेश्वरों के भी ईश्वर उन महातेजस्वी ने योगबल का आश्रय लेकर अपने भयंकर अनुचरों से
श्लोक 33 (12.289.33)
सहसा घातयामास देवदेवः पिनाकधृत् । केचिन्नादानमुञ्चन्त केचिद्धासांश्च चक्रिरे ॥
sahasā ghātayāmāsa devadevaḥ pinākadhṛt | kecinnādānamuñcanta keciddhāsāṃśca cakrire
उस यज्ञ को अचानक नष्ट करवा दिया, वे देवों के देव पिनाकधारी। कुछ वहाँ चिल्ला उठे, कुछ ठहाके मारकर हँसने लगे।
श्लोक 34 (12.289.34)
रुधिरेणापरे राजंस्तत्राग्निं समवाकिरन् । केचिद्यूपान्समुत्पाट्य व्याक्षिपन्विकृताननाः ॥
rudhireṇāpare rājaṃstatrāgniṃ samavākiran | kecidyūpānsamutpāṭya vyākṣipanvikṛtānanāḥ
हे राजन्, दूसरे वहाँ अग्नि पर रक्त छिड़कने लगे; कुछ विकृत मुख वाले यज्ञ-स्तम्भों को उखाड़कर इधर-उधर फेंकने लगे।
श्लोक 35 (12.289.35)
आस्यैरन्ये चाग्रसन्त तथैव परिचारकान् । ततः स यज्ञो नृपतेर्वध्यमानः समन्ततः ॥
āsyairanye cāgrasanta tathaiva paricārakān | tataḥ sa yajño nṛpatervadhyamānaḥ samantataḥ
दूसरे अपने मुखों से सेवकों को निगलने लगे। तब राजा का वह यज्ञ चारों ओर से मारा जाता हुआ
श्लोक 36 (12.289.36)
आस्थाय मृगरूपं वै स्वमेवाभ्यगमत्तदा । तं तु यज्ञं तथारूपं गच्छन्तमुपलभ्य सः ॥
āsthāya mṛgarūpaṃ vai svamevābhyagamattadā | taṃ tu yajñaṃ tathārūpaṃ gacchantamupalabhya saḥ
मृग का रूप धारण कर अपने ही स्थान की ओर चल पड़ा। उस यज्ञ को उस रूप में जाते देखकर प्रभु ने
श्लोक 37 (12.289.37)
धनुरादाय बाणेन तदान्वसरत प्रभुः । ततस्तस्य सुरेशस्य क्रोधादमिततेजसः ॥
dhanurādāya bāṇena tadānvasarata prabhuḥ | tatastasya sureśasya krodhādamitatejasaḥ
धनुष और बाण लेकर उसका पीछा किया। तब अमित तेज वाले उन देवेश्वर के क्रोध से
श्लोक 38 (12.289.38)
ललाटात्प्रसृतो घोरः स्वेदबिन्दुर्बभूव ह । तस्मिन्पतितमात्रे च स्वेदबिन्दौ तदा भुवि ॥
lalāṭātprasṛto ghoraḥ svedabindurbabhūva ha | tasminpatitamātre ca svedabindau tadā bhuvi
उनके ललाट से पसीने की एक भयानक बूँद निकली। और उस स्वेदबिन्दु के भूमि पर गिरते ही
श्लोक 39 (12.289.39)
प्रादुर्बभूव सुमहानग्निः कालानलोपमः । तत्र चाजायत तदा पुरुषः पुरुषर्षभ ॥
prādurbabhūva sumahānagniḥ kālānalopamaḥ | tatra cājāyata tadā puruṣaḥ puruṣarṣabha
कालाग्नि के समान एक विशाल अग्नि प्रकट हुई, और हे पुरुषश्रेष्ठ, उसमें एक पुरुष उत्पन्न हुआ,
श्लोक 40 (12.289.40)
ह्रस्वोऽतिमात्रं रक्ताक्षो हरिश्मश्रुर्विभीषणः । ऊर्ध्वकेशोऽतिरोमाङ्गः श्येनोलूकस्तथैव च ॥
hrasvo'timātraṃ raktākṣo hariśmaśrurvibhīṣaṇaḥ | ūrdhvakeśo'tiromāṅgaḥ śyenolūkastathaiva ca
अत्यन्त नाटा, लाल आँखों वाला, हरी दाढ़ी वाला, भयंकर, ऊपर को उठे केशों वाला, अत्यन्त रोमों से भरे अङ्गों वाला, बाज और उल्लू जैसा,
श्लोक 41 (12.289.41)
करालकृष्णवर्णश्च रक्तवासास्तथैव च । तं यज्ञं सुमहासत्वोऽदहत्कक्षमिवानलः ॥
karālakṛṣṇavarṇaśca raktavāsāstathaiva ca | taṃ yajñaṃ sumahāsatvo'dahatkakṣamivānalaḥ
विकराल, काले वर्ण का और लाल वस्त्र पहने हुए; उस महाबली ने उस यज्ञ को वैसे ही जला डाला जैसे आग सूखे घास-फूस को जलाती है।
श्लोक 42 (12.289.42)
व्यचरत्सर्वतो देवान्प्राद्रवत्स ऋषींस्तथा । देवाश्चाप्याद्रवन्सर्वे ततो भीता दिशो दश ॥
vyacaratsarvato devānprādravatsa ṛṣīṃstathā | devāścāpyādravansarve tato bhītā diśo daśa
वह सब ओर घूमता हुआ देवताओं पर और ऋषियों पर भी झपटा; तब भयभीत होकर सब देवता दसों दिशाओं में भाग गये।
श्लोक 43 (12.289.43)
तेन तस्मिन्विचरता पुरुषेण विशांपते । पृथिवी ह्यचलद्राजन्नतीव भरतर्षभ ॥
tena tasminvicaratā puruṣeṇa viśāṃpate | pṛthivī hyacaladrājannatīva bharatarṣabha
हे पृथ्वीपते, हे भरतश्रेष्ठ, उस पुरुष के वहाँ विचरने से पृथ्वी बहुत काँप उठी।
श्लोक 44 (12.289.44)
हाहाभूतं जगत्सर्वमुपलक्ष्य तदा प्रभुः । पितामहो महादेवं दर्शयन्प्रत्यभाषत ॥
hāhābhūtaṃ jagatsarvamupalakṣya tadā prabhuḥ | pitāmaho mahādevaṃ darśayanpratyabhāṣata
सारे संसार को हाहाकार में डूबा देखकर प्रभु पितामह ने महादेव को दर्शन देते हुए उनसे कहा।
ब्रह्मोवाच
श्लोक 45 (12.289.45)
भवतोपि सुराः सर्वे भागं दास्यन्ति वै प्रभो । क्रियतां प्रतिसंहारः सर्वदेवेश्वर त्वया ॥
bhavatopi surāḥ sarve bhāgaṃ dāsyanti vai prabho | kriyatāṃ pratisaṃhāraḥ sarvadeveśvara tvayā
"प्रभो, सब देवता आपको भी भाग देंगे। हे सर्वदेवेश्वर, आप इस संहार को रोक लीजिये।"
श्लोक 46 (12.289.46)
इमा हि देवताः सर्वा ऋषयश्च परंतप । तव क्रोधान्महादेव न शान्तिमुपलेभिरे ॥
imā hi devatāḥ sarvā ṛṣayaśca paraṃtapa | tava krodhānmahādeva na śāntimupalebhire
"हे परंतप महादेव, आपके क्रोध से ये सब देवता और ऋषि शान्ति नहीं पा रहे हैं।"
श्लोक 47 (12.289.47)
यश्चैष पुरुषो जातः स्वेदात्ते विबुधोत्तम । ज्वरो नामैष धर्मज्ञ लोकेषु प्रचरिष्यति ॥
yaścaiṣa puruṣo jātaḥ svedātte vibudhottama | jvaro nāmaiṣa dharmajña lokeṣu pracariṣyati
"हे देवश्रेष्ठ, आपके पसीने से जो यह पुरुष उत्पन्न हुआ है, हे धर्मज्ञ, वह ज्वर नाम से लोकों में विचरेगा।"
श्लोक 48 (12.289.48)
एकीभूतस्य न त्वस्य धारणे तेजसः प्रभो । समर्था सकला पृथ्वी बहुधा सृज्यतामयम् ॥
ekībhūtasya na tvasya dhāraṇe tejasaḥ prabho | samarthā sakalā pṛthvī bahudhā sṛjyatāmayam
"हे प्रभो, एक ही रूप में एकत्र उसके तेज को धारण करने में सारी पृथ्वी समर्थ नहीं है; इसे अनेक रूपों में बाँट दीजिये।"
भीष्म उवाच
श्लोक 49 (12.289.49)
इत्युक्तो ब्रह्मणा देवो भागे चापि प्रकल्पिते । भगवन्तं तथेत्याह ब्रह्माणममितौजसम् ॥
ityukto brahmaṇā devo bhāge cāpi prakalpite | bhagavantaṃ tathetyāha brahmāṇamamitaujasam
ब्रह्मा के ऐसा कहने पर और अपना भाग निश्चित हो जाने पर देव ने अमित तेज वाले भगवान् ब्रह्मा से कहा, "ऐसा ही हो।"
श्लोक 50 (12.289.50)
परां च प्रीतिमगमदुत्स्मयंश्च पिनाकधृत् । अवाप च तदा भागं यथोक्तं ब्रह्मणा भवः ॥
parāṃ ca prītimagamadutsmayaṃśca pinākadhṛt | avāpa ca tadā bhāgaṃ yathoktaṃ brahmaṇā bhavaḥ
पिनाकधारी भव मुस्कराते हुए परम प्रसन्न हुए और ब्रह्मा के कहे अनुसार उन्हें अपना भाग प्राप्त हुआ।
श्लोक 51 (12.289.51)
ज्वरं च सर्वधर्मज्ञो बहुधा व्यसृजत्तदा । शान्त्यर्थं सर्वभूतानां शृणु तच्चापि पुत्रक ॥
jvaraṃ ca sarvadharmajño bahudhā vyasṛjattadā | śāntyarthaṃ sarvabhūtānāṃ śṛṇu taccāpi putraka
और सब धर्मों को जानने वाले शिव ने तब सब प्राणियों की शान्ति के लिए ज्वर को अनेक रूपों में बाँट दिया। हे पुत्र, वह भी सुनो।
श्लोक 52 (12.289.52)
शीर्षाभितापो नागानां पर्वतानां शिलाजतु । अपां तु नीलिकां विद्धि निर्मोकं भुजगेषु च ॥
śīrṣābhitāpo nāgānāṃ parvatānāṃ śilājatu | apāṃ tu nīlikāṃ viddhi nirmokaṃ bhujageṣu ca
नागों में इसे सिर का ताप जानो, पर्वतों में शिलाजीत, जलों में नीली काई और साँपों में केंचुली।
श्लोक 53 (12.289.53)
खोरकः सौरभेयाणामूषरं पृथिवीतले । पशूनामपि धर्मज्ञ दृष्टिप्रत्यवरोधनम् ॥
khorakaḥ saurabheyāṇāmūṣaraṃ pṛthivītale | paśūnāmapi dharmajña dṛṣṭipratyavarodhanam
गौओं में यह खुर का रोग खोरक है, भूमि पर ऊसर, और हे धर्मज्ञ, पशुओं में दृष्टि का अवरोध।
श्लोक 54 (12.289.54)
रन्ध्रागतमथाश्वानां शिखोद्भेदश्च बर्हिणाम् । नेत्ररोगः कोकिलानां ज्वरः प्रोक्तो महात्मना ॥
randhrāgatamathāśvānāṃ śikhodbhedaśca barhiṇām | netrarogaḥ kokilānāṃ jvaraḥ prokto mahātmanā
घोड़ों में यह गले के छिद्र में बैठी मांस की गाँठ है, मोरों में शिखा का फटना, कोयलों में नेत्ररोग; इस प्रकार उन महात्मा ने ज्वर को बताया।
श्लोक 55 (12.289.55)
अवीनां पित्तभेदश्च सर्वेषामिति नः श्रुतम् । शुकानामपि सर्वेषां हिक्किका प्रोच्यते ज्वरः ॥
avīnāṃ pittabhedaśca sarveṣāmiti naḥ śrutam | śukānāmapi sarveṣāṃ hikkikā procyate jvaraḥ
भेड़ों में, जैसा हमने सुना है, यह सभी में पित्त का बिगड़ना है; और सब तोतों में हिचकी को ज्वर कहा जाता है।
श्लोक 56 (12.289.56)
शार्दूलेष्वथ धर्मज्ञ श्रमो ज्वर इहोच्यते । मानुषेषु तु धर्मज्ञ ज्वरो नामैष विश्रुतः ॥
śārdūleṣvatha dharmajña śramo jvara ihocyate | mānuṣeṣu tu dharmajña jvaro nāmaiṣa viśrutaḥ
हे धर्मज्ञ, बाघों में थकावट को ज्वर कहा जाता है; मनुष्यों में यह ज्वर नाम से ही प्रसिद्ध है,
श्लोक 57 (12.289.57)
मरणे जन्मनि तथा मध्ये चाविशते नरम् । एतन्माहेश्वरं तेजो ज्वरो नाम सुदारुणः ॥
maraṇe janmani tathā madhye cāviśate naram | etanmāheśvaraṃ tejo jvaro nāma sudāruṇaḥ
और वह मनुष्य में मृत्यु के समय, जन्म के समय और बीच में भी प्रवेश करता है। यह माहेश्वर तेज ही अत्यन्त भयंकर ज्वर है।
श्लोक 58 (12.289.58)
नमस्यश्चैव मान्यश्च सर्वप्राणिभिरीश्वरः । अनेन हि समाविष्टो वृत्रो धर्मभूतां वरः ॥
namasyaścaiva mānyaśca sarvaprāṇibhirīśvaraḥ | anena hi samāviṣṭo vṛtro dharmabhūtāṃ varaḥ
ईश्वर सब प्राणियों के लिए नमस्कार और सम्मान के योग्य हैं। इसी से आविष्ट होकर धर्मधारियों में श्रेष्ठ वृत्र ने
श्लोक 59 (12.289.59)
व्यजृम्भत ततः शक्रस्तस्मै वज्रमवासृजत् । प्रविश्य वज्रं वृत्रं च दारयामास भारत ॥
vyajṛmbhata tataḥ śakrastasmai vajramavāsṛjat | praviśya vajraṃ vṛtraṃ ca dārayāmāsa bhārata
जम्हाई ली; तब इन्द्र ने उस पर वज्र छोड़ा, और हे भारत, वज्र ने वृत्र में प्रवेश करके उसे चीर डाला।
श्लोक 60 (12.289.60)
दारितश्च स वज्रेण महायोगी महासुरः । जगाम परमं स्थानं विष्णोरमिततेजसः ॥
dāritaśca sa vajreṇa mahāyogī mahāsuraḥ | jagāma paramaṃ sthānaṃ viṣṇoramitatejasaḥ
वज्र से चीरा गया वह महायोगी महान् असुर अमित तेज वाले विष्णु के परम धाम को चला गया।
श्लोक 61 (12.289.61)
विष्णुभक्त्या हि तेनेदं जगद्व्याप्तमभूत्पुरा । तस्माच्च निहतो युद्धे विष्णोः स्थानमवाप्तवान् ॥
viṣṇubhaktyā hi tenedaṃ jagadvyāptamabhūtpurā | tasmācca nihato yuddhe viṣṇoḥ sthānamavāptavān
विष्णु की भक्ति से उसने पूर्वकाल में इस जगत् को व्याप्त किया था; इसीलिए युद्ध में मारा जाकर उसने विष्णु का धाम पाया।
श्लोक 62 (12.289.62)
इत्येष वृत्रमाश्रित्य ज्वरस्य महतो मया । विस्तरः कथितः पुत्र किमन्यत्प्रब्रवीमि ते ॥
ityeṣa vṛtramāśritya jvarasya mahato mayā | vistaraḥ kathitaḥ putra kimanyatprabravīmi te
इस प्रकार हे पुत्र, मैंने वृत्र के प्रसंग में महान् ज्वर का विस्तार से वर्णन कर दिया। अब तुमसे और क्या कहूँ?
श्लोक 63 (12.289.63)
इमां ज्वरोत्पत्तिमदीनमानसः । पठेत्सदा यः सुसमाहितो नरः । विमुक्तरोगः स सुखी मुदा युतो । लभेत कामान्स यथा मनीषितान् ॥
imāṃ jvarotpattimadīnamānasaḥ | paṭhetsadā yaḥ susamāhito naraḥ | vimuktarogaḥ sa sukhī mudā yuto | labheta kāmānsa yathā manīṣitān
जो मनुष्य निश्चिन्त मन और एकाग्र चित्त से ज्वर की इस उत्पत्ति का सदा पाठ करता है, वह रोग से मुक्त, सुखी और प्रसन्न होकर अपनी मनचाही कामनाएँ पाता है।