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शान्ति पर्व · अध्याय 293

नारद का गालव को श्रेय का उपदेश

युधिष्ठिर पूछते हैं कि जो शास्त्रों में संशय करता है और निश्चय नहीं कर पाता, उसके लिए कल्याण का मार्ग क्या है। भीष्म गालव और नारद का पुराना संवाद सुनाते हैं: अनेक शास्त्रों और आश्रमों के अपने-अपने श्रेय बताने से भ्रमित गालव नारद से श्रेय का स्वरूप पूछते हैं। नारद श्रेय के अंग गिनाते हैं (सत्य, कोमलता, दान, सन्तोष, विद्या, अहंकार और अति से बचना), आत्मप्रशंसा से सावधान करते हैं, और बताते हैं कि कल्याण चाहने वाले को किस प्रकार के देश में रहना चाहिए और किसे छोड़ देना चाहिए; अन्त में धर्मनिष्ठ राजा के लक्षण बताते हैं।

अध्याय 292अध्याय-सूचीअध्याय 294

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.293.1)

अतत्त्वज्ञस्य शास्त्राणां संततं संशयात्मनः । अकृतव्यवसायस्य श्रेयो ब्रूहि पितामह ॥

atattvajñasya śāstrāṇāṃ saṃtataṃ saṃśayātmanaḥ | akṛtavyavasāyasya śreyo brūhi pitāmaha

पितामह, जो शास्त्रों के तत्त्व को नहीं जानता, जिसका मन सदा संशय में रहता है और जिसने कोई निश्चय नहीं किया है, उसके लिए कल्याण का मार्ग क्या है, यह मुझे बताइए।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.293.2)

गुरुपूजा च सततं वृद्धानां पर्युपासनम् । श्रवणं चैव विद्यानां कूटस्थं श्रेय उच्यते ॥

gurupūjā ca satataṃ vṛddhānāṃ paryupāsanam | śravaṇaṃ caiva vidyānāṃ kūṭasthaṃ śreya ucyate

गुरुजनों की निरन्तर सेवा, वृद्धजनों की उपासना और विद्याओं का श्रवण: इसी को स्थिर श्रेय कहा जाता है।

श्लोक 3 (12.293.3)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । गालवस्य च संवादं देवर्षेर्नारदस्य च ॥

atrāpyudāharantīmamitihāsaṃ purātanam | gālavasya ca saṃvādaṃ devarṣernāradasya ca

इस विषय में लोग यह प्राचीन इतिहास सुनाते हैं: गालव और देवर्षि नारद का संवाद।

श्लोक 4 (12.293.4)

वीतमोहक्लमं विप्रं ज्ञानतृप्तं जितेन्द्रियः । श्रेयस्कामो यतात्मानं नारदं गालवोऽब्रवीत् ॥

vītamohaklamaṃ vipraṃ jñānatṛptaṃ jitendriyaḥ | śreyaskāmo yatātmānaṃ nāradaṃ gālavo'bravīt

आत्मसंयमी और अपना कल्याण चाहने वाले गालव ने नारद से कहा, जो मोह और थकान से रहित, ज्ञान से तृप्त और संयमी विप्र थे।

गालव उवाच

श्लोक 5 (12.293.5)

यैः कैश्चित्संमतो लोके गुणैश्च पुरुषो नृषु । भवत्यनपगान्सर्वांस्तान्गुणाँल्लक्षयामहे ॥

yaiḥ kaiścitsaṃmato loke guṇaiśca puruṣo nṛṣu | bhavatyanapagānsarvāṃstānguṇām̐llakṣayāmahe

जिन गुणों के कारण मनुष्य संसार में लोगों का माननीय होता है और जो उसे कभी छोड़ते नहीं, उन सब गुणों को हम पहचानते हैं।

श्लोक 6 (12.293.6)

भवानेवंविधोऽस्माकं संशयं छेत्तुमर्हति । अमूढश्चिरमूढानां लोकतत्त्वमजानताम् ॥

bhavānevaṃvidho'smākaṃ saṃśayaṃ chettumarhati | amūḍhaściramūḍhānāṃ lokatattvamajānatām

आप जैसे पुरुष, जो कभी मोह में नहीं पड़ते, हमारे संशय को काट सकते हैं; हम बहुत समय से मोहित हैं और संसार के तत्त्व को नहीं जानते।

श्लोक 7 (12.293.7)

ज्ञाने ह्येवं प्रवृत्तिः स्यात्कार्याणामविशेषतः । यत्कार्यं न व्यवस्यामस्तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥

jñāne hyevaṃ pravṛttiḥ syātkāryāṇāmaviśeṣataḥ | yatkāryaṃ na vyavasyāmastadbhavānvaktumarhati

ज्ञान से ही कर्मों में, उन्हें एक-दूसरे से मिलाए बिना, प्रवृत्ति होती है। जिस कर्तव्य का हम निश्चय नहीं कर पाते, उसे आप हमें बताइए।

श्लोक 8 (12.293.8)

भगवन्नाश्रमाः सर्वे पृथगाचारदर्शिनः । इदं श्रेय इदं श्रेय इति सर्वे प्रबोधिताः ॥

bhagavannāśramāḥ sarve pṛthagācāradarśinaḥ | idaṃ śreya idaṃ śreya iti sarve prabodhitāḥ

भगवन्, सब आश्रम अपने-अपने अलग आचार को देखते हैं, और सभी को यही सिखाया गया है कि यह श्रेय है, यह श्रेय है।

श्लोक 9 (12.293.9)

तांस्तु विप्रस्थितान्दृष्ट्वा शास्त्रैः शास्त्राभिनन्दिनः । स्वशास्त्रैः परितुष्टाश्च श्रेयो नोपलभामहे ॥

tāṃstu viprasthitāndṛṣṭvā śāstraiḥ śāstrābhinandinaḥ | svaśāstraiḥ parituṣṭāśca śreyo nopalabhāmahe

उन्हें अलग-अलग स्थित देखकर, जो प्रत्येक अपने शास्त्रों में रमे हैं और अपने ही शास्त्रों से पूरी तरह सन्तुष्ट हैं, हम श्रेय को नहीं पा पाते।

श्लोक 10 (12.293.10)

शास्त्रं यदि भवेदेकं श्रेयो व्यक्तं भवेत्तदा । शास्त्रैश्च बहुभिर्भूयः श्रेयो गुह्यं प्रवेशितम् ॥

śāstraṃ yadi bhavedekaṃ śreyo vyaktaṃ bhavettadā | śāstraiśca bahubhirbhūyaḥ śreyo guhyaṃ praveśitam

यदि एक ही शास्त्र होता तो श्रेय स्पष्ट होता। परन्तु बहुत-से शास्त्रों के कारण श्रेय गुह्य बना दिया गया है।

श्लोक 11 (12.293.11)

एतस्मात्कारणाच्छ्रेयो गहनं प्रतिभाति मे । ब्रवीतु भगवांस्तन्मे उपसन्नोस्म्यधीहि भो ॥

etasmātkāraṇācchreyo gahanaṃ pratibhāti me | bravītu bhagavāṃstanme upasannosmyadhīhi bho

इसी कारण श्रेय मुझे गहन प्रतीत होता है। भगवन्, आप मुझे उसे बताइए; मैं आपकी शरण में आया हूँ, मुझे उपदेश दीजिए।

नारद उवाच

श्लोक 12 (12.293.12)

आश्रमास्तात चत्वारो यथा संकल्पिताः पृथक् । तान्सर्वाननुपश्य त्वं समाश्रित्यैव गालव ॥

āśramāstāta catvāro yathā saṃkalpitāḥ pṛthak | tānsarvānanupaśya tvaṃ samāśrityaiva gālava

वत्स, आश्रम चार हैं और प्रत्येक अलग-अलग विधान के अनुसार निर्धारित है। गालव, तुम सबका आश्रय लेकर उन सबको भली-भाँति देखो।

श्लोक 13 (12.293.13)

तेषांतेषां तथाहि त्वमाश्रमाणां ततस्ततः । नानारूपं गुणोद्देशं पश्य विप्रस्थितं पृथक् ॥

teṣāṃteṣāṃ tathāhi tvamāśramāṇāṃ tatastataḥ | nānārūpaṃ guṇoddeśaṃ paśya viprasthitaṃ pṛthak

उन-उन आश्रमों में बताए गए गुणों के नाना रूपों को, जो प्रत्येक अलग-अलग स्थित हैं, एक-एक करके देखो।

श्लोक 14 (12.293.14)

न यान्ति चैव ते सम्यगभिप्रेतमसंशयम् । अन्येऽपश्यंस्तथा सम्यगाश्रमाणां परां गतिम् ॥

na yānti caiva te samyagabhipretamasaṃśayam | anye'paśyaṃstathā samyagāśramāṇāṃ parāṃ gatim

वे उस इष्ट लक्ष्य को निःसंदेह नहीं पाते; दूसरों ने तो आश्रमों की परम गति को ठीक-ठीक देखा है।

श्लोक 15 (12.293.15)

यत्तु निःश्रेयसं सम्यक्तच्चैवासंशयात्मकम् । अनुग्रहं च मित्राणाममित्राणां च निग्रहम् ॥

yattu niḥśreyasaṃ samyaktaccaivāsaṃśayātmakam | anugrahaṃ ca mitrāṇāmamitrāṇāṃ ca nigraham

जो सचमुच परम कल्याण है, वही असंदिग्ध है: मित्रों पर अनुग्रह, शत्रुओं का निग्रह,

श्लोक 16 (12.293.16)

संग्रहं च त्रिवर्गस्य श्रेय आहुर्मनीषिणः । निवृत्तिः कर्मणः पापात्सततं पुण्यशीलता ॥

saṃgrahaṃ ca trivargasya śreya āhurmanīṣiṇaḥ | nivṛttiḥ karmaṇaḥ pāpātsatataṃ puṇyaśīlatā

और त्रिवर्ग का संग्रह: इसे विद्वान् श्रेय कहते हैं। पापकर्म से निवृत्ति, निरन्तर पुण्यशीलता,

श्लोक 17 (12.293.17)

सद्भिश्च समुदाचारः श्रेय एतदसंशयम् । मार्दवं सर्वभूतेषु व्यवहारेषु चार्जवम् ॥

sadbhiśca samudācāraḥ śreya etadasaṃśayam | mārdavaṃ sarvabhūteṣu vyavahāreṣu cārjavam

और सज्जनों के साथ सदाचार: यह निःसंदेह श्रेय है। सब प्राणियों के प्रति कोमलता, व्यवहार में सरलता,

श्लोक 18 (12.293.18)

वाक्चैव मधुरा प्रोक्ता श्रेय एतदसंशयम् । देवताभ्यः पितृभ्यश्च संविभागोऽतिथिष्वपि ॥

vākcaiva madhurā proktā śreya etadasaṃśayam | devatābhyaḥ pitṛbhyaśca saṃvibhāgo'tithiṣvapi

और मधुर वाणी: इन्हें भी निःसंदेह श्रेय कहा गया है। देवताओं, पितरों और अतिथियों को भी उनका भाग देना,

श्लोक 19 (12.293.19)

असंत्यागश्च भृत्यानां श्रेय एतदसंशयम् । सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् ॥

asaṃtyāgaśca bhṛtyānāṃ śreya etadasaṃśayam | satyasya vacanaṃ śreyaḥ satyajñānaṃ tu duṣkaram

और अपने आश्रितों को न छोड़ना: यह निःसंदेह श्रेय है। सत्य बोलना श्रेय है, परन्तु सत्य को जानना कठिन है।

श्लोक 20 (12.293.20)

यद्भूतहितमत्यन्तमेतत्सत्यं ब्रवीम्यहम् । अहंकारस्य च त्यागः प्रमादस्य च निग्रहः ॥

yadbhūtahitamatyantametatsatyaṃ bravīmyaham | ahaṃkārasya ca tyāgaḥ pramādasya ca nigrahaḥ

जो प्राणियों के लिए अत्यन्त हितकर है, उसी को मैं सत्य कहता हूँ। अहंकार का त्याग और प्रमाद का दमन,

श्लोक 21 (12.293.21)

संतोषश्चैकचर्या च कूटस्थं श्रेय उच्यते । धर्मेण वेदाध्ययनं वेदाङ्गानां तथैव च ॥

saṃtoṣaścaikacaryā ca kūṭasthaṃ śreya ucyate | dharmeṇa vedādhyayanaṃ vedāṅgānāṃ tathaiva ca

सन्तोष और एकान्त-चर्या को स्थिर श्रेय कहा जाता है। धर्मपूर्वक वेद का अध्ययन और उसी प्रकार वेदाङ्गों का भी,

श्लोक 22 (12.293.22)

ज्ञानार्थानां च जिज्ञासा श्रेय एतदसंशयम् । शब्दरूपरसस्पर्शान्सह गन्धेन केवलान् ॥

jñānārthānāṃ ca jijñāsā śreya etadasaṃśayam | śabdarūparasasparśānsaha gandhena kevalān

और जानने योग्य को जानने की जिज्ञासा: यह निःसंदेह श्रेय है। शब्द, रूप, रस और स्पर्श, गन्ध के साथ, केवल भोग के विषय के रूप में,

श्लोक 23 (12.293.23)

नात्यर्थमुपसेवेत श्रेयसोर्थी कथंचन ॥

nātyarthamupaseveta śreyasorthī kathaṃcana

श्रेय चाहने वाले को कभी अधिक मात्रा में नहीं भोगना चाहिए।

श्लोक 24 (12.293.24)

नक्तंचर्यां दिवास्वप्नमालस्यं पैशुनं मदम् । अतियोगमयोगं च श्रेयसोर्थी परित्यजेत् ॥

naktaṃcaryāṃ divāsvapnamālasyaṃ paiśunaṃ madam | atiyogamayogaṃ ca śreyasorthī parityajet

श्रेय चाहने वाले को रात में भटकना, दिन में सोना, आलस्य, चुगली, मद, अति और अयोग छोड़ देना चाहिए।

श्लोक 25 (12.293.25)

आत्मोत्कर्षं न मार्गेत परेषां परिनिन्दया । स्वगुणैरेव मार्गेत विप्रकर्षं पृथग्जनात् ॥

ātmotkarṣaṃ na mārgeta pareṣāṃ parinindayā | svaguṇaireva mārgeta viprakarṣaṃ pṛthagjanāt

वह दूसरों की निन्दा करके अपने को ऊँचा उठाने की चेष्टा न करे; अपने ही गुणों से साधारण जन से विशिष्ट होने का प्रयत्न करे।

श्लोक 26 (12.293.26)

निर्गुणास्त्वेव भूयिष्ठमात्मसंभाविता नराः । दोषैरन्यान्गुणवतः क्षिपन्त्यात्मगुणक्षयात् ॥

nirguṇāstveva bhūyiṣṭhamātmasaṃbhāvitā narāḥ | doṣairanyānguṇavataḥ kṣipantyātmaguṇakṣayāt

गुणहीन मनुष्य प्रायः अपने ही बारे में बड़ा भ्रम रखते हैं और अपने गुणों के क्षय के कारण गुणवान् लोगों पर दोष मढ़ते हैं।

श्लोक 27 (12.293.27)

अनूच्यमानास्तु पुनस्ते मन्यन्ते महाजनात् । गुणवत्तरमात्मानं स्वेन मानेन दर्पिताः ॥

anūcyamānāstu punaste manyante mahājanāt | guṇavattaramātmānaṃ svena mānena darpitāḥ

और जब लोग उनकी बात दोहराते हैं, तो अपने अभिमान से फूले हुए वे अपने को महापुरुषों से भी अधिक गुणवान् समझने लगते हैं।

श्लोक 28 (12.293.28)

अब्रुवन्कस्यचिन्निन्दामात्मपूजामवर्णयन् । विपश्चिद्गुणसंपन्नः प्राप्नोत्येव महद्यशः ॥

abruvankasyacinnindāmātmapūjāmavarṇayan | vipaścidguṇasaṃpannaḥ prāpnotyeva mahadyaśaḥ

गुणवान् विद्वान् किसी की निन्दा किए बिना और अपनी प्रशंसा किए बिना भी बड़ा यश पाता ही है।

श्लोक 29 (12.293.29)

अब्रुवन्वाऽतिसुरभिर्गन्धः सुमनसां शुचिः । तथैवाव्याहरन्भाति विमलो भानुरम्बरे ॥

abruvanvā'tisurabhirgandhaḥ sumanasāṃ śuciḥ | tathaivāvyāharanbhāti vimalo bhānurambare

फूलों की निर्मल सुगन्ध बिना बोले दूर तक फैलती है; वैसे ही निर्मल सूर्य बिना कुछ कहे आकाश में चमकता है।

श्लोक 30 (12.293.30)

एवमादीनि चान्यानि परित्यक्तानि मेधया । ज्वलन्ति यशसा लोके यानि न व्याहरन्ति च ॥

evamādīni cānyāni parityaktāni medhayā | jvalanti yaśasā loke yāni na vyāharanti ca

ऐसी ही और भी वस्तुएँ, जिन्हें बुद्धि ने अपने आप खड़े रहने को छोड़ दिया है, बिना कुछ कहे संसार में यश से जगमगाती हैं।

श्लोक 31 (12.293.31)

न लोके दीप्यते मूर्खः केवलात्मप्रशंसया । अपि चापिहितः श्वभ्रे कृतविद्यः प्रकाशते ॥

na loke dīpyate mūrkhaḥ kevalātmapraśaṃsayā | api cāpihitaḥ śvabhre kṛtavidyaḥ prakāśate

मूर्ख केवल अपनी प्रशंसा करने से संसार में नहीं चमकता; पर विद्वान् गड्ढे में छिपा हो तब भी प्रकाशित होता है।

श्लोक 32 (12.293.32)

असदुच्चैरपि प्रोक्तः शब्दः समुपशाम्यति । दीप्यते त्वेव लोकेषु शनैरपि सुभाषितम् ॥

asaduccairapi proktaḥ śabdaḥ samupaśāmyati | dīpyate tveva lokeṣu śanairapi subhāṣitam

बुरी बात चाहे ऊँचे स्वर से कही जाए, शान्त हो जाती है; किन्तु सुभाषित धीरे से कहा गया हो तब भी संसार में चमकता है।

श्लोक 33 (12.293.33)

मूढानामवलिप्तानामसारं भाषितं बहु । दर्शयत्यन्तरात्मानमग्निरूपमिवांशुमान् ॥

mūḍhānāmavaliptānāmasāraṃ bhāṣitaṃ bahu | darśayatyantarātmānamagnirūpamivāṃśumān

मूढ़ और अभिमानी लोगों की बहुत-सी निःसार बातें उनके अन्तःकरण को प्रकट कर देती हैं, जैसे अंशुमाली सूर्य अग्नि का रूप दिखाता है।

श्लोक 34 (12.293.34)

एतस्मात्कारणात्प्रज्ञां मृगयन्ते पृथग्विधाम् । प्रज्ञालाभो हि भूतानामुत्तमः प्रतिभाति मे ॥

etasmātkāraṇātprajñāṃ mṛgayante pṛthagvidhām | prajñālābho hi bhūtānāmuttamaḥ pratibhāti me

इसी कारण लोग नाना प्रकार की प्रज्ञा की खोज करते हैं; प्राणियों के लिए प्रज्ञा का लाभ मुझे सबसे उत्तम प्रतीत होता है।

श्लोक 35 (12.293.35)

नापृष्टः कस्यचिद्ब्रूयान्नाप्यन्यायेन पृच्छतः । जानन्नपि च मेधावी जडवत्समुपाविशेत् ॥

nāpṛṣṭaḥ kasyacidbrūyānnāpyanyāyena pṛcchataḥ | jānannapi ca medhāvī jaḍavatsamupāviśet

बिना पूछे वह किसी से न बोले, और अनुचित ढंग से पूछने वाले को भी उत्तर न दे; जानते हुए भी बुद्धिमान् मनुष्य जड़ के समान बैठा रहे।

श्लोक 36 (12.293.36)

ततो वासं परीक्षेत धर्मनित्येषु साधुषु । मनुष्येषु वदान्येषु स्वधर्मनिरतेषु च ॥

tato vāsaṃ parīkṣeta dharmanityeṣu sādhuṣu | manuṣyeṣu vadānyeṣu svadharmanirateṣu ca

तब वह निवास का विचार करे: धर्म में नित्य लगे हुए सज्जनों के बीच, उदार और अपने धर्म में निरत मनुष्यों के बीच।

श्लोक 37 (12.293.37)

चतुर्णां यत्र वर्णानां धर्मव्यतिकरो भवेत् । न तत्र वासं कुर्वीत श्रेयोर्थी वै कथंचन ॥

caturṇāṃ yatra varṇānāṃ dharmavyatikaro bhavet | na tatra vāsaṃ kurvīta śreyorthī vai kathaṃcana

जहाँ चारों वर्णों के धर्म आपस में मिल गए हों, वहाँ श्रेय चाहने वाला कभी निवास न करे।

श्लोक 38 (12.293.38)

निरारम्भोऽप्ययमिह यथालब्धोपजीवनः । पुण्यं पुण्येषु विमलं पापं पापेषु चाप्नुयात् ॥

nirārambho'pyayamiha yathālabdhopajīvanaḥ | puṇyaṃ puṇyeṣu vimalaṃ pāpaṃ pāpeṣu cāpnuyāt

जो कोई कर्म आरम्भ नहीं करता और जो कुछ मिल जाए उसी से जीता है, वह भी यहाँ पुण्यात्माओं के बीच निर्मल पुण्य पाता है और पापियों के बीच पाप।

श्लोक 39 (12.293.39)

अपामग्नेस्तथेन्दोश्च स्पर्शं वेदयते यथा । तथा पश्यामहे स्पर्शमुभयोः पुण्यपापयोः ॥

apāmagnestathendośca sparśaṃ vedayate yathā | tathā paśyāmahe sparśamubhayoḥ puṇyapāpayoḥ

जैसे जल, अग्नि और चन्द्रमा के स्पर्श का अनुभव होता है, वैसे ही हम पुण्य और पाप, दोनों का स्पर्श देखते हैं।

श्लोक 40 (12.293.40)

अपश्यन्तोऽन्यविषयं भुञ्जते विघसाशिनः । भुञ्जानाश्चान्यविषयान्विषयान्विद्धि कर्मणाम् ॥

apaśyanto'nyaviṣayaṃ bhuñjate vighasāśinaḥ | bhuñjānāścānyaviṣayānviṣayānviddhi karmaṇām

यज्ञ का शेष खाने वाले किसी दूसरे विषय की ओर देखे बिना भोजन करते हैं; और जो दूसरे विषयों को भोगते हैं, उनके लिए जान लो कि वे अपने कर्मों के ही विषय भोगते हैं।

श्लोक 41 (12.293.41)

यत्रागमयमानानामसत्कारेण पृच्छताम् । प्रब्रूयाद्ब्रह्मणो धर्मं त्यजेत्तं देशमात्मवान् ॥

yatrāgamayamānānāmasatkāreṇa pṛcchatām | prabrūyādbrahmaṇo dharmaṃ tyajettaṃ deśamātmavān

जहाँ लोग अनादर से प्रश्न करते हैं और सुनी हुई बात को ग्रहण नहीं करते, फिर भी ब्राह्मण उन्हें धर्म का उपदेश देता है, उस देश को आत्मवान् पुरुष छोड़ दे।

श्लोक 42 (12.293.42)

शिष्योपाध्यायिका वृत्तिर्यत्र स्यात्सुसमाहिता । यथावच्छास्त्रसंपन्ना कस्तं देशं परित्यजेत् ॥

śiṣyopādhyāyikā vṛttiryatra syātsusamāhitā | yathāvacchāstrasaṃpannā kastaṃ deśaṃ parityajet

जहाँ शिष्यों और उपाध्यायों की जीविका भली-भाँति व्यवस्थित और शास्त्र के अनुरूप हो, उस देश को कौन छोड़ेगा?

श्लोक 43 (12.293.43)

आकाशस्था ध्रुवं यत्र दोषं ब्रूयुर्विपश्चिताम् । आत्मपूजाभिकामो वै को वसेत्तत्र पण्डितः ॥

ākāśasthā dhruvaṃ yatra doṣaṃ brūyurvipaścitām | ātmapūjābhikāmo vai ko vasettatra paṇḍitaḥ

जहाँ आकाश में स्थित-से बने हुए लोग विद्वानों के दोष अवश्य कहते हैं, वहाँ अपना सम्मान चाहने वाला कौन पण्डित रहेगा?

श्लोक 44 (12.293.44)

यत्र संलोडिता लुब्धैः प्रायशो धर्मसेतवः । प्रदीप्तमिव चेलान्तं कस्तं देशं न संत्यजेत् ॥

yatra saṃloḍitā lubdhaiḥ prāyaśo dharmasetavaḥ | pradīptamiva celāntaṃ kastaṃ deśaṃ na saṃtyajet

जहाँ धर्म के सेतु प्रायः लोभियों द्वारा तोड़ दिए गए हों, जलते हुए वस्त्र के छोर के समान, उस देश को कौन न छोड़ेगा?

श्लोक 45 (12.293.45)

यत्र धर्ममनाशङ्काश्चरेयुर्वीतमत्सराः । भवेत्तत्र वसेच्चैव पुण्यशीलेषु साधुषु ॥

yatra dharmamanāśaṅkāścareyurvītamatsarāḥ | bhavettatra vaseccaiva puṇyaśīleṣu sādhuṣu

जहाँ लोग निर्भय और मत्सरहीन होकर धर्म का आचरण करते हैं, वहाँ पुण्यशील सज्जनों के बीच वह रहे और निवास करे।

श्लोक 46 (12.293.46)

धर्ममर्थनिमित्तं च चरेयुर्यत्र मानवाः । न ताननुवसेज्जातु ते हि पापकृतो जनाः ॥

dharmamarthanimittaṃ ca careyuryatra mānavāḥ | na tānanuvasejjātu te hi pāpakṛto janāḥ

जहाँ लोग धन के लिए धर्म का आचरण करते हैं, वहाँ उनके बीच वह कभी न रहे, क्योंकि वे पापकर्म करने वाले लोग हैं।

श्लोक 47 (12.293.47)

कर्मणां यत्र पापेन वर्तन्ते जीवितेप्सवः । व्यवधावेत्ततस्तूर्णं ससर्पाच्छरणादिव ॥

karmaṇāṃ yatra pāpena vartante jīvitepsavaḥ | vyavadhāvettatastūrṇaṃ sasarpāccharaṇādiva

जहाँ जीने की इच्छा रखने वाले लोग पापपूर्ण कर्म से जीविका चलाते हैं, वहाँ से वह तुरन्त भाग निकले, जैसे साँप वाले घर से।

श्लोक 48 (12.293.48)

येन खट्वां समारूढः कर्मणाऽनुशयी भवेत् । आदितस्तन्न कर्तव्यमिच्छता भवमात्मनः ॥

yena khaṭvāṃ samārūḍhaḥ karmaṇā'nuśayī bhavet | āditastanna kartavyamicchatā bhavamātmanaḥ

जो अपनी उन्नति चाहता है, उसे आरम्भ से ही वह कर्म नहीं करना चाहिए जिससे अर्थी पर चढ़ते समय उसे पछताना पड़े।

श्लोक 49 (12.293.49)

यत्र राजा च राज्ञश्च पुरुषाः प्रत्यनन्तराः । कुटुम्बिनामग्रभुजस्त्यजेत्तद्राष्ट्रमात्मवान् ॥

yatra rājā ca rājñaśca puruṣāḥ pratyanantarāḥ | kuṭumbināmagrabhujastyajettadrāṣṭramātmavān

जहाँ राजा और राजा के निकटवर्ती पुरुष गृहस्थों से पहले भोजन कर लेते हैं, उस राष्ट्र को आत्मवान् पुरुष छोड़ दे।

श्लोक 50 (12.293.50)

श्रोत्रियास्त्वग्रभोक्तारो धर्मनित्याः सनातनाः । याजनाध्यापने युक्ता यत्र तद्राष्ट्रमावसेत् ॥

śrotriyāstvagrabhoktāro dharmanityāḥ sanātanāḥ | yājanādhyāpane yuktā yatra tadrāṣṭramāvaset

वह उस राष्ट्र में बसे जहाँ वेदज्ञ, धर्म में नित्य लगे हुए, सनातन ब्राह्मण पहले भोजन करते हैं और यज्ञ कराने तथा पढ़ाने में लगे रहते हैं।

श्लोक 51 (12.293.51)

स्वाहास्वधावषट्कारा यत्र सम्यगनुष्ठिताः । अजस्रं चैव वर्तन्ते वसेत्तत्राविचारयन् ॥

svāhāsvadhāvaṣaṭkārā yatra samyaganuṣṭhitāḥ | ajasraṃ caiva vartante vasettatrāvicārayan

जहाँ स्वाहा, स्वधा और वषट्कार विधिपूर्वक किए जाते हैं और निरन्तर चलते रहते हैं, वहाँ वह निःसंकोच रहे।

श्लोक 52 (12.293.52)

अशुचीन्यत्र पश्येत ब्राह्मणान्वृत्तिकर्शितान् । त्यजेत्तद्राष्ट्रमासन्नमुपसृष्टमिवामिषम् ॥

aśucīnyatra paśyeta brāhmaṇānvṛttikarśitān | tyajettadrāṣṭramāsannamupasṛṣṭamivāmiṣam

जहाँ वह ब्राह्मणों को आजीविका के अभाव से क्षीण और अपवित्र देखे, उस राष्ट्र को वह छोड़ दे, जैसे छुए और दूषित हुए मांस को छोड़ा जाता है।

श्लोक 53 (12.293.53)

प्रीयमाणा नरा यत्र प्रयच्छेयुरयाचिताः । स्वस्थचित्तो वसेत्तत्र कृतकृत्य इवात्मवान् ॥

prīyamāṇā narā yatra prayaccheyurayācitāḥ | svasthacitto vasettatra kṛtakṛtya ivātmavān

जहाँ लोग प्रसन्न होकर बिना माँगे दान देते हैं, वहाँ वह कृतकृत्य के समान शान्त चित्त से रहे।

श्लोक 54 (12.293.54)

दण्डो यत्राविनीतेषु सत्कारश्च कृतात्मसु । चरेत्तत्र वसेच्चैव पुण्यशीलेषु साधुषु ॥

daṇḍo yatrāvinīteṣu satkāraśca kṛtātmasu | carettatra vaseccaiva puṇyaśīleṣu sādhuṣu

जहाँ अनुशासनहीनों को दण्ड मिलता है और संयमी लोगों का सत्कार होता है, वहाँ पुण्यशील सज्जनों के बीच वह विचरे और रहे।

श्लोक 55 (12.293.55)

उपसृष्टेषु दान्तेषु दुराचारेषु साधुषु । अविनीतेषु लुब्धेषु सुमहद्दण्डधारणम् ॥

upasṛṣṭeṣu dānteṣu durācāreṣu sādhuṣu | avinīteṣu lubdheṣu sumahaddaṇḍadhāraṇam

संयमियों पर आक्रमण करने वालों, सज्जनों के साथ दुराचार करने वालों तथा उद्दण्ड और लोभी लोगों पर बहुत भारी दण्ड रखा जाता है।

श्लोक 56 (12.293.56)

यत्र राजा धर्मनित्यो राज्यं धर्मेण पालयेत् । अपास्य कामान्कामेशो वसेत्तत्राविचारयन् ॥

yatra rājā dharmanityo rājyaṃ dharmeṇa pālayet | apāsya kāmānkāmeśo vasettatrāvicārayan

जहाँ धर्म में नित्य स्थित राजा कामनाओं को छोड़कर, अपनी कामनाओं का स्वामी होकर, धर्म से राज्य का पालन करता है, वहाँ वह निःसंकोच रहे।

श्लोक 57 (12.293.57)

यथाशीला हि राजानः सर्वान्विषयवासिनः । श्रेयसा योजयत्याशु श्रेयसि प्रत्युपस्थिते ॥

yathāśīlā hi rājānaḥ sarvānviṣayavāsinaḥ | śreyasā yojayatyāśu śreyasi pratyupasthite

राजा जैसे शील के होते हैं, वैसे ही वे देश के सब निवासियों को, श्रेय के उपस्थित होने पर, शीघ्र श्रेय की ओर ले जाते हैं।

श्लोक 58 (12.293.58)

पृच्छतस्ते मया तात श्रेय एतदुदाहृतम् । न हि शक्यं प्रधानेन श्रेयः सङ्ख्यातुमात्मनः ॥

pṛcchataste mayā tāta śreya etadudāhṛtam | na hi śakyaṃ pradhānena śreyaḥ saṅkhyātumātmanaḥ

वत्स, तुम्हारे पूछने पर मैंने यह श्रेय बताया है; आत्मा का श्रेय पूरी तरह गिना नहीं जा सकता, प्रधान पुरुष के द्वारा भी नहीं।

श्लोक 59 (12.293.59)

एवं प्रवर्तमानस्य वृत्तिं प्रणिहितात्मनः । तपसैवेह बहुलं श्रेयो व्यक्तं भविष्यति ॥

evaṃ pravartamānasya vṛttiṃ praṇihitātmanaḥ | tapasaiveha bahulaṃ śreyo vyaktaṃ bhaviṣyati

जो इस प्रकार आचरण करता है और जिसका चित्त भली-भाँति एकाग्र है, उसके लिए श्रेय केवल तप से ही प्रचुर और स्पष्ट प्रकट हो जाएगा।

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