शान्ति पर्व · अध्याय 294
तार्क्ष्य का राजा सगर को मोक्ष का उपदेश
युधिष्ठिर पूछते हैं कि उनके जैसा राजा संसार में रहते हुए भी आसक्ति के बन्धनों से कैसे मुक्त रह सकता है। भीष्म तार्क्ष्य (अरिष्टनेमि) का राजा सगर को दिया हुआ प्राचीन उपदेश सुनाते हैं। तार्क्ष्य कहते हैं कि पुत्र, पत्नी और स्वजनों के स्नेह के पाश काट देने चाहिए: प्रत्येक प्राणी अपने ही पूर्वकर्मों से जन्म लेता, पलता और मरता है, इसलिए छोड़े जाने वालों की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। फिर वे मुक्त पुरुष के लक्षण गिनाते हैं: वह थोड़े में सन्तुष्ट रहता है, द्वन्द्वों में सम रहता है और शरीर की नश्वरता, बुढ़ापे, मृत्यु तथा बड़े-बड़े राजाओं के चले जाने को स्पष्ट देखता है। सगर उस उपदेश को मानकर मोक्ष से उत्पन्न गुणों के साथ प्रजा का पालन करते हैं।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.294.1)
कथं नु युक्तः पृथिवीं चरेदस्मद्विधो नृपः । नित्यं कैश्च गुणैर्युक्तः सङ्गपाशाद्विमुच्यते ॥
kathaṃ nu yuktaḥ pṛthivīṃ caredasmadvidho nṛpaḥ | nityaṃ kaiśca guṇairyuktaḥ saṅgapāśādvimucyate
हमारे जैसा राजा संयमी रहकर पृथ्वी पर कैसे विचरे, और किन गुणों से युक्त होकर वह सदा के लिए आसक्ति के पाश से छूट जाता है?
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.294.2)
अत्र ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् । अरिष्टनेमिना प्रोक्तं सगरायानुपृच्छते ॥
atra te vartayiṣye'hamitihāsaṃ purātanam | ariṣṭaneminā proktaṃ sagarāyānupṛcchate
इस विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा: जो अरिष्टनेमि ने पूछने वाले सगर से कहा था।
सगर उवाच
श्लोक 3 (12.294.3)
किं श्रेयः परमं ब्रह्मन्कृत्वेह सुखमश्नुते । कथं न शोचेन्न क्षुभ्येदेतदिच्छामि वेदितुम् ॥
kiṃ śreyaḥ paramaṃ brahmankṛtveha sukhamaśnute | kathaṃ na śocenna kṣubhyedetadicchāmi veditum
ब्रह्मन्, परम श्रेय क्या है, जिसे करके मनुष्य यहाँ सुख पाता है? मनुष्य शोक और क्षोभ से कैसे बचे? यह मैं जानना चाहता हूँ।
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (12.294.4)
एवमुक्तस्तदा तार्क्ष्यः सर्वशास्त्रविदां वरः । विबुध्य संपदं चाग्र्यां सद्वाक्यमिदमब्रवीत् ॥
evamuktastadā tārkṣyaḥ sarvaśāstravidāṃ varaḥ | vibudhya saṃpadaṃ cāgryāṃ sadvākyamidamabravīt
इस प्रकार कहे जाने पर समस्त शास्त्रों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ तार्क्ष्य ने राजा की उत्तम सम्पदा को समझकर ये सुन्दर वचन कहे।
तार्क्ष्य उवाच
श्लोक 5 (12.294.5)
सुखं मोक्षसुखं लोके न च मूढोऽवगच्छति । प्रसक्तः पुत्रपशुषु धनधान्यसमाकुलः ॥
sukhaṃ mokṣasukhaṃ loke na ca mūḍho'vagacchati | prasaktaḥ putrapaśuṣu dhanadhānyasamākulaḥ
संसार में मोक्ष का सुख है, पर मूढ़ पुरुष उसे नहीं पहचानता; वह पुत्रों और पशुओं में आसक्त तथा धन-धान्य से घिरा रहता है।
श्लोक 6 (12.294.6)
सक्तबुद्धिरशान्तात्मा स न शक्यश्चिकित्सितुम् । स्नेहपाशसितो मूढो न स मोक्षाय कल्पते ॥
saktabuddhiraśāntātmā sa na śakyaścikitsitum | snehapāśasito mūḍho na sa mokṣāya kalpate
जिसकी बुद्धि आसक्त है और जिसका मन अशान्त है, उसकी चिकित्सा नहीं हो सकती। स्नेह के पाश में बँधा हुआ मूढ़ मोक्ष के योग्य नहीं होता।
श्लोक 7 (12.294.7)
स्नेहजानिह ते पाशान्वक्ष्यामि शृणु तान्मम । सकर्णकेन शिरसा शक्याश्छेत्तुं विजानता ॥
snehajāniha te pāśānvakṣyāmi śṛṇu tānmama | sakarṇakena śirasā śakyāśchettuṃ vijānatā
मैं तुम्हें यहाँ स्नेह से उत्पन्न पाशों के बारे में बताऊँगा; मुझसे उन्हें सुनो। जो इन्हें समझ लेता है, वह सजग मन से इन्हें काट सकता है।
श्लोक 8 (12.294.8)
संभाव्य पुत्रान्कालेन यौवनस्थान्निवेश्य च । समर्थाज्जीवने ज्ञात्वा मुक्तश्चर यथासुखम् ॥
saṃbhāvya putrānkālena yauvanasthānniveśya ca | samarthājjīvane jñātvā muktaścara yathāsukham
अपने पुत्रों को समय पर पालकर, उन्हें युवावस्था में प्रतिष्ठित और विवाहित करके और यह जानकर कि वे जीविका चलाने में समर्थ हैं, मुक्त होकर सुखपूर्वक विचरो।
श्लोक 9 (12.294.9)
भार्यां पुत्रवतीं वृद्धां लालितां पुत्रवत्सलाम् । ज्ञात्वा प्रजहि कालेन परार्थमनुदृश्य च ॥
bhāryāṃ putravatīṃ vṛddhāṃ lālitāṃ putravatsalām | jñātvā prajahi kālena parārthamanudṛśya ca
अपनी पत्नी को, जो पुत्रवती, वृद्ध, लाड़ से पली और सन्तान से स्नेह करने वाली है, यह जानकर और परम प्रयोजन को सामने रखकर समय आने पर छोड़ दो।
श्लोक 10 (12.294.10)
सापत्यो निरपत्यो वा मुक्तश्चर यथासुखम् । इन्द्रियैरिन्द्रियार्थांस्त्वमनुभूय यथाविधि ॥
sāpatyo nirapatyo vā muktaścara yathāsukham | indriyairindriyārthāṃstvamanubhūya yathāvidhi
सन्तान वाले हो या सन्तानहीन, मुक्त होकर सुखपूर्वक विचरो, विधि के अनुसार इन्द्रियों से इन्द्रिय-विषयों का अनुभव करके।
श्लोक 11 (12.294.11)
कृतकौतूहलस्तेषु मुक्तश्चर यथासुखम् । उपपत्त्योपलब्धेषु लोकेषु च समो भव ॥
kṛtakautūhalasteṣu muktaścara yathāsukham | upapattyopalabdheṣu lokeṣu ca samo bhava
उनके विषय में अपना कौतूहल शान्त करके मुक्त होकर सुखपूर्वक विचरो, और उचित उपाय से जो कुछ संसार में मिले, उसमें सम रहो।
श्लोक 12 (12.294.12)
एष तावत्समासेन तव संकीर्तितो मया । मोक्षार्थो विस्तरेणाथ भूयो वक्ष्यामि तच्छृणु ॥
eṣa tāvatsamāsena tava saṃkīrtito mayā | mokṣārtho vistareṇātha bhūyo vakṣyāmi tacchṛṇu
यह मैंने तुम्हें संक्षेप में बताया। अब सुनो, मैं मोक्ष के प्रयोजन के बारे में फिर विस्तार से कहूँगा।
श्लोक 13 (12.294.13)
मुक्ता वीतभया लोके चरन्ति सुखिनो नराः । सक्तभावा विनश्यन्ति नरास्तत्र न संशयः ॥
muktā vītabhayā loke caranti sukhino narāḥ | saktabhāvā vinaśyanti narāstatra na saṃśayaḥ
मुक्त पुरुष संसार में निर्भय और सुखी होकर विचरते हैं; जिनके भाव आसक्त हैं, वे लोग नष्ट हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 14 (12.294.14)
आहारसंचये सक्ता यथा कीटपिपीलिकाः । असक्ताः सुखिनो लोके सक्ताश्चैव विनाशिनः ॥
āhārasaṃcaye saktā yathā kīṭapipīlikāḥ | asaktāḥ sukhino loke saktāścaiva vināśinaḥ
जो भोजन का संचय करने में आसक्त हैं, वे कीड़ों और चींटियों के समान हैं। संसार में अनासक्त सुखी होते हैं और आसक्त विनाश को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 15 (12.294.15)
स्वजने न च ते चिन्ता कर्तव्या मोक्षबुद्धिना । इमे मया विनाभूता भविष्यन्ति कथं त्विति ॥
svajane na ca te cintā kartavyā mokṣabuddhinā | ime mayā vinābhūtā bhaviṣyanti kathaṃ tviti
मोक्ष चाहने वाले को अपने स्वजनों के विषय में यह चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि मेरे बिना इनका क्या होगा।
श्लोक 16 (12.294.16)
स्वयमुत्पद्यते जन्तुः स्वयमेव विवर्धते । सुखदुःखे तथा मृत्युं स्वयमेवाधिगच्छति ॥
svayamutpadyate jantuḥ svayameva vivardhate | sukhaduḥkhe tathā mṛtyuṃ svayamevādhigacchati
प्राणी अपने आप उत्पन्न होता है, अपने आप बढ़ता है और अपने आप ही सुख, दुःख तथा मृत्यु को प्राप्त होता है।
श्लोक 17 (12.294.17)
भोजनाच्छादने चैव मात्रा पित्रा च संग्रहम् । स्वकृतेनाधिगच्छन्ति लोके नास्त्यकृतं पुरा ॥
bhojanācchādane caiva mātrā pitrā ca saṃgraham | svakṛtenādhigacchanti loke nāstyakṛtaṃ purā
भोजन, वस्त्र और माता-पिता का सहारा: लोग इन्हें अपने ही पूर्वकर्म से पाते हैं; संसार में कुछ भी बिना पूर्वकृत कर्म के नहीं है।
श्लोक 18 (12.294.18)
धात्रा विहितभक्ष्याणि सर्वभूतानि मेदिनीम् । लोके विपरिधावन्ति रक्षितानि स्वकर्मभिः ॥
dhātrā vihitabhakṣyāṇi sarvabhūtāni medinīm | loke viparidhāvanti rakṣitāni svakarmabhiḥ
विधाता ने जिनके भोजन की व्यवस्था कर दी है, वे सब प्राणी अपने कर्मों से रक्षित होकर पृथ्वी पर दौड़ते-फिरते हैं।
श्लोक 19 (12.294.19)
स्वयं मृत्पिण्डभूतस्य परतन्त्रस्य सर्वदा । को हेतुः स्वजनं द्वेष्टुं रक्षितं वाऽदृढात्मनः ॥
svayaṃ mṛtpiṇḍabhūtasya paratantrasya sarvadā | ko hetuḥ svajanaṃ dveṣṭuṃ rakṣitaṃ vā'dṛḍhātmanaḥ
वह स्वयं मिट्टी का पिण्ड है और सदा पराधीन है। ऐसे अस्थिर मन वाले के पास स्वजन से द्वेष करने या उसकी रक्षा करने का क्या कारण है?
श्लोक 20 (12.294.20)
स्वजनं हि यदा मृत्युर्हन्त्येव भुवि पश्यतः । कृतेऽपि यत्ने महति तत्र बोद्धव्यमात्मना ॥
svajanaṃ hi yadā mṛtyurhantyeva bhuvi paśyataḥ | kṛte'pi yatne mahati tatra boddhavyamātmanā
जब बड़े प्रयत्न के बाद भी मृत्यु तुम्हारे देखते-देखते पृथ्वी पर स्वजन को मार डालती है, तब तुम्हें स्वयं यह समझ लेना चाहिए।
श्लोक 21 (12.294.21)
जीवन्तमपि चैवैनं भरणे रक्षणे तथा । असमाप्ते परित्यज्य पश्चादपि मरिष्यसि ॥
jīvantamapi caivainaṃ bharaṇe rakṣaṇe tathā | asamāpte parityajya paścādapi mariṣyasi
वह जीवित भी हो, तब भी उसके भरण-पोषण और रक्षण का कार्य अधूरा रहते ही तुम्हें उसे छोड़ना पड़ेगा, और तुम स्वयं भी बाद में मरोगे।
श्लोक 22 (12.294.22)
यदा मृतं च स्वजनं न ज्ञास्यसि कथंचन । सुखितं दुःखितं वाऽपि ननु बोद्धव्यमात्मना ॥
yadā mṛtaṃ ca svajanaṃ na jñāsyasi kathaṃcana | sukhitaṃ duḥkhitaṃ vā'pi nanu boddhavyamātmanā
जब तुम्हारा स्वजन मर जाएगा, तब तुम किसी भी प्रकार नहीं जान पाओगे कि वह सुखी है या दुःखी; क्या यह तुम्हें स्वयं नहीं समझना चाहिए?
श्लोक 23 (12.294.23)
मृते वा त्वयि जीवे वा यदा भोक्ष्यति वै जनः । स्वकृतं ननु बुद्ध्वैवं कर्तव्यं हितमात्मनः ॥
mṛte vā tvayi jīve vā yadā bhokṣyati vai janaḥ | svakṛtaṃ nanu buddhvaivaṃ kartavyaṃ hitamātmanaḥ
तुम मरे हो या जीवित, लोग तो अपने किए हुए का ही फल भोगेंगे; यह समझकर अपने ही हित का कर्म करना चाहिए।
श्लोक 24 (12.294.24)
एवं विजानँल्लोकेऽस्मिन्कः कस्येत्यभिनिश्चितः । मोक्षे निवेशय मनो भूयश्चाप्युपधारय ॥
evaṃ vijānam̐lloke'sminkaḥ kasyetyabhiniścitaḥ | mokṣe niveśaya mano bhūyaścāpyupadhāraya
यह जानकर और इस निश्चय में स्थित होकर कि इस संसार में कौन किसका है, अपने मन को मोक्ष में लगाओ और उसका बार-बार मनन करो।
श्लोक 25 (12.294.25)
क्षुत्पिपासादयो भावा जिता यस्येह देहिनः । क्रोधो लोभस्तथा मोहः सत्ववान्मुक्त एव सः ॥
kṣutpipāsādayo bhāvā jitā yasyeha dehinaḥ | krodho lobhastathā mohaḥ satvavānmukta eva saḥ
जिस देहधारी ने भूख-प्यास आदि भावों को, तथा क्रोध, लोभ और मोह को जीत लिया है और जो सत्त्वगुण से युक्त है, वही मुक्त है।
श्लोक 26 (12.294.26)
द्यूते पाने तथा स्त्रीषु मृगयायां च यो नरः । न प्रमाद्यति संमोहात्सततं मुक्त एव सः ॥
dyūte pāne tathā strīṣu mṛgayāyāṃ ca yo naraḥ | na pramādyati saṃmohātsatataṃ mukta eva saḥ
जो मनुष्य जुए, मदिरा, स्त्रियों और शिकार में मोहवश कभी प्रमाद नहीं करता, वही मुक्त है।
श्लोक 27 (12.294.27)
दिवसेदिवसे नाम रात्रौरात्रौ पुमान्सदा । भोक्तव्यमिति यः स्विन्नो दोषबुद्धिः स उच्यते ॥
divasedivase nāma rātraurātrau pumānsadā | bhoktavyamiti yaḥ svinno doṣabuddhiḥ sa ucyate
जो पुरुष दिन-दिन और रात-रात सदा यह सोचकर थका रहता है कि यह भोगना है, उसे दोष देखने वाली बुद्धि का कहा जाता है।
श्लोक 28 (12.294.28)
आत्मभावं तथा स्त्रीषु सक्तमेव पुनः पुनः । यः पश्यति सदा युक्तो यथावन्मुक्त एव सः ॥
ātmabhāvaṃ tathā strīṣu saktameva punaḥ punaḥ | yaḥ paśyati sadā yukto yathāvanmukta eva saḥ
जो सदा सावधान रहकर यह ठीक-ठीक देखता है कि आत्मभाव बार-बार स्त्रियों में आसक्त हो जाता है, वही मुक्त है।
श्लोक 29 (12.294.29)
संभवं च विनाशं च भूतानां चेष्टितं तथा । यस्तत्त्वतो विजानाति लोकेऽस्मिन्मुक्त एव सः ॥
saṃbhavaṃ ca vināśaṃ ca bhūtānāṃ ceṣṭitaṃ tathā | yastattvato vijānāti loke'sminmukta eva saḥ
जो प्राणियों की उत्पत्ति, विनाश और चेष्टा को इस संसार में तत्त्व से जानता है, वही मुक्त है।
श्लोक 30 (12.294.30)
प्रस्थं वाहसहस्रेषु यात्रार्थं चैव कोटिषु । प्रासादे मञ्चकं स्थानं यः पश्यति स मुच्यते ॥
prasthaṃ vāhasahasreṣu yātrārthaṃ caiva koṭiṣu | prāsāde mañcakaṃ sthānaṃ yaḥ paśyati sa mucyate
जो यह देखता है कि हज़ारों गाड़ी अन्न में से अपने खाने को केवल एक प्रस्थ चाहिए, करोड़ों की सम्पत्ति में निर्वाह भर का थोड़ा-सा चाहिए, और महल में अपने लिए केवल एक खाट भर स्थान चाहिए, वह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 31 (12.294.31)
मृत्युनाऽभ्याहतं लोकं व्याधिभिश्चोपपीडितम् । अवृत्तिकर्शितं चैव यः पश्यति स मुच्यते ॥
mṛtyunā'bhyāhataṃ lokaṃ vyādhibhiścopapīḍitam | avṛttikarśitaṃ caiva yaḥ paśyati sa mucyate
जो संसार को मृत्यु से आहत, रोगों से पीड़ित और आजीविका के अभाव से क्षीण देखता है, वह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 32 (12.294.32)
यः पश्यति स संतुष्टो नपश्यंश्च विहन्यते । यश्चाप्यल्पेन संतुष्टो लोकेऽस्मिन्मुक्त एव सः ॥
yaḥ paśyati sa saṃtuṣṭo napaśyaṃśca vihanyate | yaścāpyalpena saṃtuṣṭo loke'sminmukta eva saḥ
जो इसे देखता है, वह सन्तुष्ट रहता है; जो नहीं देखता, वह आघात पाता है; और जो इस संसार में थोड़े से सन्तुष्ट है, वही मुक्त है।
श्लोक 33 (12.294.33)
अग्नीषोमाविदं सर्वमिति यश्चानुपश्यति । न च संस्पृश्यते भावैरद्भुतैर्मुक्त एव सः ॥
agnīṣomāvidaṃ sarvamiti yaścānupaśyati | na ca saṃspṛśyate bhāvairadbhutairmukta eva saḥ
जो इस सबको अग्नि और सोम के रूप में देखता है और आश्चर्यजनक भावों से छुआ नहीं जाता, वही मुक्त है।
श्लोक 34 (12.294.34)
पर्यङ्कशय्या भूमिश्च समाने यस्य देहिनः । शाल्यन्नं च कदन्नं च यस्य स्यान्मुक्त एव सः ॥
paryaṅkaśayyā bhūmiśca samāne yasya dehinaḥ | śālyannaṃ ca kadannaṃ ca yasya syānmukta eva saḥ
जिस देहधारी के लिए पलंग की शय्या और भूमि समान हैं, और शालि का भात तथा खराब अन्न समान हैं, वही मुक्त है।
श्लोक 35 (12.294.35)
क्षौमं च कुशचीरं च कौशेयं वल्कलानि च । आविकं चर्म च समं यस्य स्यान्मुक्त एव सः ॥
kṣaumaṃ ca kuśacīraṃ ca kauśeyaṃ valkalāni ca | āvikaṃ carma ca samaṃ yasya syānmukta eva saḥ
जिसके लिए सन का वस्त्र, कुशा का चीर, कौशेय, वल्कल और भेड़ का चर्म सब समान हैं, वही मुक्त है।
श्लोक 36 (12.294.36)
पञ्चभूतसमुद्भूतं लोकं यश्चानुपश्यति । तथा च वर्तते दृष्ट्वा लोकेऽस्मिन्मुक्त एव सः ॥
pañcabhūtasamudbhūtaṃ lokaṃ yaścānupaśyati | tathā ca vartate dṛṣṭvā loke'sminmukta eva saḥ
जो संसार को पाँच महाभूतों से उत्पन्न देखता है और यह देखकर उसी के अनुसार आचरण करता है, वही मुक्त है।
श्लोक 37 (12.294.37)
सुखदुःखे समे यस्य लाभालाभौ जयाजयौ । इच्छाद्वेषौ भयोद्वेगौ सर्वथा मुक्त एव सः ॥
sukhaduḥkhe same yasya lābhālābhau jayājayau | icchādveṣau bhayodvegau sarvathā mukta eva saḥ
जिसके लिए सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, इच्छा-द्वेष और भय-उद्वेग समान हैं, वह सब प्रकार से मुक्त है।
श्लोक 38 (12.294.38)
रक्तमूत्रपुरीषाणां दोषाणां संचयांस्तथा । शरीरं दोषबहुलं दृष्ट्वा चैव विमुच्यते ॥
raktamūtrapurīṣāṇāṃ doṣāṇāṃ saṃcayāṃstathā | śarīraṃ doṣabahulaṃ dṛṣṭvā caiva vimucyate
रक्त, मूत्र, मल और दोषों के संचय से भरे हुए, दोषों से परिपूर्ण शरीर को देखकर मनुष्य मुक्त हो जाता है।
श्लोक 39 (12.294.39)
वलीपलितसंयोगं कार्श्यं वैवर्ण्यमेव च । कुब्जभावं च जरया यः पश्यति स मुच्यते ॥
valīpalitasaṃyogaṃ kārśyaṃ vaivarṇyameva ca | kubjabhāvaṃ ca jarayā yaḥ paśyati sa mucyate
जो बुढ़ापे से झुर्रियों और पके बालों का आना, दुबलापन, कान्ति का जाना और कूबड़ का निकल आना देखता है, वह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 40 (12.294.40)
पुंस्त्वोपघातं कालेन दर्शनोपरमं तथा । बाधिर्यं प्राणमन्दत्वं यः पश्यति स मुच्यते ॥
puṃstvopaghātaṃ kālena darśanoparamaṃ tathā | bādhiryaṃ prāṇamandatvaṃ yaḥ paśyati sa mucyate
जो समय के साथ पुरुषत्व की हानि, दृष्टि का क्षय, बहरापन और प्राणशक्ति की मन्दता को देखता है, वह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 41 (12.294.41)
गतानृषींस्तथा देवानसुरांश्च तथा गतान् । लोकादस्मात्परं लोकं यः पश्यति स मुच्यते ॥
gatānṛṣīṃstathā devānasurāṃśca tathā gatān | lokādasmātparaṃ lokaṃ yaḥ paśyati sa mucyate
जो देखता है कि ऋषि और देवता चले गए, असुर भी चले गए, और इस लोक से परे एक और लोक है, वह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 42 (12.294.42)
प्रभावैरन्वितास्तैस्तैः पार्थिवेन्द्राः सहस्रशः । ये गताः पृथिवीं त्यक्त्वा इति ज्ञात्वा विमुच्यते ॥
prabhāvairanvitāstaistaiḥ pārthivendrāḥ sahasraśaḥ | ye gatāḥ pṛthivīṃ tyaktvā iti jñātvā vimucyate
अपने-अपने प्रभावों से युक्त हज़ारों राजा पृथ्वी को छोड़कर चले गए: यह जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है।
श्लोक 43 (12.294.43)
अर्थांश्च दुर्लभाँल्लोके क्लेशांश्च सुलभांस्तथा । दुःखं चैव कुटुम्बार्थे यः पश्यति स मुच्यते ॥
arthāṃśca durlabhām̐lloke kleśāṃśca sulabhāṃstathā | duḥkhaṃ caiva kuṭumbārthe yaḥ paśyati sa mucyate
जो देखता है कि संसार में धन दुर्लभ है, क्लेश सुलभ हैं और कुटुम्ब के लिए दुःख ही उठाना पड़ता है, वह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 44 (12.294.44)
अपत्यानां च वैगुण्यं जनं विगुणमेव च । पश्यन्भूयिष्ठशो लोके को मोक्षं नाभिपूजयेत् ॥
apatyānāṃ ca vaiguṇyaṃ janaṃ viguṇameva ca | paśyanbhūyiṣṭhaśo loke ko mokṣaṃ nābhipūjayet
संसार में सन्तानों के दोष और लोगों की गुणहीनता को बार-बार देखकर कौन मोक्ष का आदर न करेगा?
श्लोक 45 (12.294.45)
शास्त्राल्लोकाच्च यो बुद्धः सर्वं पश्यति मानवः । असारमिव मानुष्यं सर्वथा मुक्त एव सः ॥
śāstrāllokācca yo buddhaḥ sarvaṃ paśyati mānavaḥ | asāramiva mānuṣyaṃ sarvathā mukta eva saḥ
जो मनुष्य शास्त्र और संसार से बोध पाकर सब कुछ को, मनुष्य-जीवन को भी, सारहीन-सा देखता है, वह सब प्रकार से मुक्त है।
श्लोक 46 (12.294.46)
एतच्छ्रुत्वा मम वचो भवांश्चरतु मुक्तवत् । गार्हस्थ्याद्यदि ते मोक्षे कृता बुद्धिरविक्लवा ॥
etacchrutvā mama vaco bhavāṃścaratu muktavat | gārhasthyādyadi te mokṣe kṛtā buddhiraviklavā
मेरे ये वचन सुनकर आप मुक्त पुरुष की भाँति विचरिए, यदि गृहस्थाश्रम में रहते हुए आपने मोक्ष में अपनी बुद्धि दृढ़ और निश्चल कर ली है।
भीष्म उवाच
श्लोक 47 (12.294.47)
तत्तस्य वचनं श्रुत्वा सम्यक्स पृथिवीपतिः । मोक्षजैश्च गुणैर्युक्तः पालयामास च प्रजाः ॥
tattasya vacanaṃ śrutvā samyaksa pṛthivīpatiḥ | mokṣajaiśca guṇairyuktaḥ pālayāmāsa ca prajāḥ
उसके वचन सुनकर और उन्हें भली-भाँति मानकर वह पृथ्वीपति मोक्ष से उत्पन्न गुणों से युक्त होकर प्रजा का पालन करता रहा।