शान्ति पर्व · अध्याय 295
शिव के उदर में उशना
युधिष्ठिर पूछते हैं कि ऋषि उशना असुरों का पक्ष क्यों लेते थे, वे शुक्र कैसे बने और आकाश के मध्य से होकर क्यों नहीं चलते। भीष्म बताते हैं कि उशना ने योग से कुबेर का धन हर लिया, क्रुद्ध शिव ने उन्हें हाथ में लेकर निगल लिया, और शिव के उदर में भटकने के बाद वे शिश्न के मार्ग से ही बाहर निकल सके। तब देवी ने उन्हें अपना पुत्र कहा, शिव ने उन्हें जाने दिया और उशना शुक्र होकर चले गए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.295.1)
तिष्ठते मे सदा तात कौतूहलमिदं हृदि । तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तः कुरुपितामह ॥
tiṣṭhate me sadā tāta kautūhalamidaṃ hṛdi | tadahaṃ śrotumicchāmi tvattaḥ kurupitāmaha
तात, मेरे हृदय में सदा एक जिज्ञासा बनी रहती है; हे कुरुओं के पितामह, मैं उसे आपसे सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 2 (12.295.2)
कथं देवर्षिरुशना सदा काव्यो महामतिः । असुराणां प्रियकारः सुराणामप्रिये रतः ॥
kathaṃ devarṣiruśanā sadā kāvyo mahāmatiḥ | asurāṇāṃ priyakāraḥ surāṇāmapriye rataḥ
देवर्षि उशना, परम बुद्धिमान् काव्य, सदा असुरों का प्रिय करने और देवताओं का अप्रिय करने में क्यों लगे रहते थे?
श्लोक 3 (12.295.3)
वर्धयामास तेजश्च किमर्थममितौजसाम् । नित्यं वैरनिबद्धाश्च दानवाः सुरसत्तमैः ॥
vardhayāmāsa tejaśca kimarthamamitaujasām | nityaṃ vairanibaddhāśca dānavāḥ surasattamaiḥ
और देवश्रेष्ठों के साथ सदा वैर में बँधे हुए, अपार बलशाली दानवों का तेज उन्होंने किसलिए बढ़ाया?
श्लोक 4 (12.295.4)
कथं चाप्युशना प्राप शुक्रत्वममरद्युतिः । ऋद्धिं च स कथं प्राप्तः सर्वमेतद्ब्रवीहि मे ॥
kathaṃ cāpyuśanā prāpa śukratvamamaradyutiḥ | ṛddhiṃ ca sa kathaṃ prāptaḥ sarvametadbravīhi me
और अमरों के समान तेजस्वी उशना शुक्र-भाव को कैसे प्राप्त हुए? उन्हें यह ऋद्धि कैसे मिली? यह सब मुझे बताइए।
श्लोक 5 (12.295.5)
न याति च स तेजस्वी मध्येन नभसः कथम् । एतदिच्छामि विज्ञातुं निखिलेन पितामह ॥
na yāti ca sa tejasvī madhyena nabhasaḥ katham | etadicchāmi vijñātuṃ nikhilena pitāmaha
और वे तेजस्वी आकाश के मध्य से होकर क्यों नहीं चलते? पितामह, मैं यह सब पूरा-पूरा जानना चाहता हूँ।
भीष्म उवाच
श्लोक 6 (12.295.6)
शृणु राजन्नवहितः सर्वमेतद्यथातथम् । यथामति यथा चैतच्छ्रुतपूर्वं मयाऽनघ ॥
śṛṇu rājannavahitaḥ sarvametadyathātatham | yathāmati yathā caitacchrutapūrvaṃ mayā'nagha
राजन्, ध्यान देकर यह सब ठीक-ठीक सुनो; हे निष्पाप, जैसा मैंने पहले सुना है और जैसा मैं समझता हूँ, वैसा ही कहता हूँ।
श्लोक 7 (12.295.7)
एष भार्गवदायादो मुनिर्मान्यो दृढव्रतः । सुराणां विप्रियकरो निमित्ते कारणात्मके ॥
eṣa bhārgavadāyādo munirmānyo dṛḍhavrataḥ | surāṇāṃ vipriyakaro nimitte kāraṇātmake
भृगु के ये वंशज, दृढ़ व्रतवाले पूज्य मुनि, किसी कारण के उपस्थित होने पर देवताओं के अप्रिय में प्रवृत्त हुए थे।
श्लोक 8 (12.295.8)
इन्द्रोऽथ धनदो राजा यक्षरक्षोधिपः सदा । प्रभविष्णुश्च कोशस्य जगतश्च तथा प्रभुः ॥
indro'tha dhanado rājā yakṣarakṣodhipaḥ sadā | prabhaviṣṇuśca kośasya jagataśca tathā prabhuḥ
इन्द्र जगत् के स्वामी हैं, और धनद (कुबेर) राजा हैं, जो सदा यक्षों और राक्षसों के अधिपति तथा कोश के स्वामी हैं।
श्लोक 9 (12.295.9)
तस्यात्मानमथाविश्य योगसिद्धो महामुनिः । रुद्ध्वा धनपतिं देवं योगेन हृतवान्वसु ॥
tasyātmānamathāviśya yogasiddho mahāmuniḥ | ruddhvā dhanapatiṃ devaṃ yogena hṛtavānvasu
योग में सिद्ध उन महामुनि ने उस (धनद) के शरीर में प्रवेश करके धन के स्वामी देव को योगबल से रोक दिया और उसका धन हर लिया।
श्लोक 10 (12.295.10)
हृते धने ततः शर्म न लेभे धनदस्तथा । आपन्नमन्युः संविग्नः सोभ्यगात्सुरसत्तमम् ॥
hṛte dhane tataḥ śarma na lebhe dhanadastathā | āpannamanyuḥ saṃvignaḥ sobhyagātsurasattamam
धन हर लिए जाने पर धनद को शान्ति न मिली; क्रोध और व्यथा से भरकर वे देवश्रेष्ठ के पास गए।
श्लोक 11 (12.295.11)
निवेदयामास तदा शिवायामिततेजसे । देवश्रेष्ठाय रुद्राय सौम्याय बहुरूपिणे ॥
nivedayāmāsa tadā śivāyāmitatejase | devaśreṣṭhāya rudrāya saumyāya bahurūpiṇe
तब उन्होंने अपार तेजस्वी, देवों में श्रेष्ठ, सौम्य और अनेक रूपोंवाले शिव रुद्र को निवेदन किया।
धनद उवाच
श्लोक 12 (12.295.12)
योगात्मकेनोशनसा रुद्ध्वा मम हृतं वसु । योगेनात्मगतं कृत्वा निःसृतश्च महातपाः ॥
yogātmakenośanasā ruddhvā mama hṛtaṃ vasu | yogenātmagataṃ kṛtvā niḥsṛtaśca mahātapāḥ
योगस्वरूप उशना ने मुझे रोककर मेरा धन हर लिया है, और उसे योग से अपने भीतर कर लेने के बाद वह महातपस्वी बाहर निकल गया है।
भीष्म उवाच
श्लोक 13 (12.295.13)
एतच्छ्रुत्वा ततः क्रुद्धो महायोगी महेश्वरः । संरक्तनयनो राजञ्शूलमादाय तस्थिवान् ॥
etacchrutvā tataḥ kruddho mahāyogī maheśvaraḥ | saṃraktanayano rājañśūlamādāya tasthivān
यह सुनकर महायोगी महेश्वर क्रुद्ध हो उठे; हे राजन्, उनकी आँखें लाल हो गईं और वे त्रिशूल लेकर खड़े हो गए।
श्लोक 14 (12.295.14)
क्वासौ क्वासाविति प्राह गृहीत्वा परमायुधम् । उशना दूरतस्तस्य ह्यभूज्ज्ञात्वा चिकीर्षितम् ॥
kvāsau kvāsāviti prāha gṛhītvā paramāyudham | uśanā dūratastasya hyabhūjjñātvā cikīrṣitam
"वह कहाँ है? वह कहाँ है?" यह कहते हुए उन्होंने अपना परम आयुध उठा लिया। उधर उशना को दूर से ही उनका अभिप्राय ज्ञात हो गया।
श्लोक 15 (12.295.15)
स महायोगिनो बुद्ध्वा तं रोषं वै महात्मनः । गतिमागमनं वेत्ति स्थानं चैव ततः प्रभुः ॥
sa mahāyogino buddhvā taṃ roṣaṃ vai mahātmanaḥ | gatimāgamanaṃ vetti sthānaṃ caiva tataḥ prabhuḥ
उन महात्मा महायोगी के उस क्रोध को जानकर प्रभु उशना ने तब उनका जाना, आना और स्थान जान लिया।
श्लोक 16 (12.295.16)
संचिन्त्येग्रेण तपसा महात्मानं महेश्वरम् । उशना योगसिद्धात्मा शूलाग्रे प्रत्यदृश्यत ॥
saṃcintyegreṇa tapasā mahātmānaṃ maheśvaram | uśanā yogasiddhātmā śūlāgre pratyadṛśyata
उग्र तप से महात्मा महेश्वर का ध्यान करके योग से सिद्ध आत्मावाले उशना त्रिशूल की नोक पर दिखाई दिए।
श्लोक 17 (12.295.17)
विज्ञातरूपः स तदा तपः सिद्धोऽथ धन्विना । ज्ञात्वा शूलं च देवेशः पाणिना समनामयत् ॥
vijñātarūpaḥ sa tadā tapaḥ siddho'tha dhanvinā | jñātvā śūlaṃ ca deveśaḥ pāṇinā samanāmayat
धनुर्धारी देवेश्वर ने तप से सिद्ध उन उशना को उनके रूप से पहचान लिया, और यह जानकर कि त्रिशूल पर वे हैं, उसे हाथ से झुका दिया।
श्लोक 18 (12.295.18)
आनतेनाथ शूलेन पाणिनामिततेजसा । पिनाकमिति चोवाच शूलमुग्रायुधः प्रभुः ॥
ānatenātha śūlena pāṇināmitatejasā | pinākamiti covāca śūlamugrāyudhaḥ prabhuḥ
अपार तेजस्वी हाथ से त्रिशूल के झुका दिए जाने पर उग्र आयुधवाले प्रभु ने उस त्रिशूल को "पिनाक" कहा।
श्लोक 19 (12.295.19)
पाणिमध्यगतं दृष्ट्वा भार्गवं तमुमापतिः । आस्यं विवृत्य भ्रकुटिं पाणिं संप्राक्षिपच्छनैः ॥
pāṇimadhyagataṃ dṛṣṭvā bhārgavaṃ tamumāpatiḥ | āsyaṃ vivṛtya bhrakuṭiṃ pāṇiṃ saṃprākṣipacchanaiḥ
अपनी हथेली के बीच भार्गव को देखकर उमापति ने मुख खोला, भौंहें चढ़ाईं और धीरे-धीरे हाथ आगे फेंका।
श्लोक 20 (12.295.20)
स तु प्रविष्ट उशना कोष्ठं माहेश्वरं प्रभुः । व्यचरच्चापि तत्रासौ महात्मा भृगुनन्दनः ॥
sa tu praviṣṭa uśanā koṣṭhaṃ māheśvaraṃ prabhuḥ | vyacaraccāpi tatrāsau mahātmā bhṛgunandanaḥ
इस प्रकार प्रभु उशना माहेश्वर के उदर में प्रविष्ट हुए और वे महात्मा भृगुनन्दन वहीं विचरने लगे।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 21 (12.295.21)
किमर्थं व्यचरद्राजन्नुशना तस्य धीमतः । जठरे देवदेवस्य किंचाकार्षीन्महाद्युतिः ॥
kimarthaṃ vyacaradrājannuśanā tasya dhīmataḥ | jaṭhare devadevasya kiṃcākārṣīnmahādyutiḥ
राजन्, उन बुद्धिमान् देवाधिदेव के उदर में उशना क्यों विचरते रहे? और उन महातेजस्वी ने वहाँ क्या किया?
भीष्म उवाच
श्लोक 22 (12.295.22)
पुरा सोऽन्तर्जलगतः स्थाणुभूतो महाव्रतः । वर्षाणामभवद्राजन्प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥
purā so'ntarjalagataḥ sthāṇubhūto mahāvrataḥ | varṣāṇāmabhavadrājanprayutānyarbudāni ca
राजन्, पूर्वकाल में वे महाव्रती जल के भीतर चले गए और लाखों-करोड़ों वर्षों तक स्थाणु (ठूँठ) के समान खड़े रहे।
श्लोक 23 (12.295.23)
उदतिष्ठत्तपस्तप्त्वा दुश्चरं च महाह्रदात् । ततो देवातिदेवस्तं ब्रह्मा वै समसर्पत ॥
udatiṣṭhattapastaptvā duścaraṃ ca mahāhradāt | tato devātidevastaṃ brahmā vai samasarpata
दुष्कर तप करके वे उस महाह्रद से उठे। तब देवों के भी देव ब्रह्मा उनके पास आए।
श्लोक 24 (12.295.24)
तपोवृद्धिमपृच्छच्च कुशलं चैवमव्ययः । तपः सुचीर्णमिति च प्रोवाच वृषभध्वजः ॥
tapovṛddhimapṛcchacca kuśalaṃ caivamavyayaḥ | tapaḥ sucīrṇamiti ca provāca vṛṣabhadhvajaḥ
अविनाशी ब्रह्मा ने उनसे उनके तप की वृद्धि और कुशल पूछी, और वृषभध्वज ने कहा कि तप भली-भाँति सम्पन्न हुआ है।
श्लोक 25 (12.295.25)
तत्संयोगेन वृद्धिं चाप्यपश्यत्स तु शंकरः । महामतिरचिन्त्यात्मा सत्यधर्मरतः सदा ॥
tatsaṃyogena vṛddhiṃ cāpyapaśyatsa tu śaṃkaraḥ | mahāmatiracintyātmā satyadharmarataḥ sadā
और उस संयोग से महाबुद्धि, अचिन्त्य स्वरूपवाले, सदा सत्य और धर्म में रत शंकर ने अपनी वृद्धि भी देखी।
श्लोक 26 (12.295.26)
स तेनाढ्यो महायोगी तपसा च धनेन च । व्यराजत महाराज त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ॥
sa tenāḍhyo mahāyogī tapasā ca dhanena ca | vyarājata mahārāja triṣu lokeṣu vīryavān
उससे, तप और धन से समृद्ध होकर वे वीर्यवान् महायोगी, हे महाराज, तीनों लोकों में शोभित हुए।
श्लोक 27 (12.295.27)
ततः पिनाकी योगात्मा ध्यानयोगं समाविशत् । उशना तु समुद्विग्नो निलिल्ये जठरे ततः ॥
tataḥ pinākī yogātmā dhyānayogaṃ samāviśat | uśanā tu samudvigno nililye jaṭhare tataḥ
तब योगात्मा पिनाकी ध्यानयोग में लीन हो गए, और उशना अत्यन्त व्याकुल होकर उनके उदर में इधर-उधर भटकने लगे।
श्लोक 28 (12.295.28)
तुष्टाव च महायोगी देवं तत्रस्थ एव च । निःसारं काङ्क्षमाणः स तेन स्म प्रतिहन्यते ॥
tuṣṭāva ca mahāyogī devaṃ tatrastha eva ca | niḥsāraṃ kāṅkṣamāṇaḥ sa tena sma pratihanyate
वे महायोगी वहीं रहकर देव की स्तुति करने लगे; पर निकलने का मार्ग खोजते हुए वे उनके द्वारा रोक दिए गए।
श्लोक 29 (12.295.29)
उशना तु तथोवाच जठरस्थो महामुनिः । प्रसादं मे कुरुष्वेति पुनः पुनररिंदम् ॥
uśanā tu tathovāca jaṭharastho mahāmuniḥ | prasādaṃ me kuruṣveti punaḥ punarariṃdam
हे शत्रुओं को सन्ताप देनेवाले, उदर में स्थित महामुनि उशना बार-बार कहते रहे, "मुझ पर कृपा कीजिए।"
श्लोक 30 (12.295.30)
तमुवाच महादेवो गच्छ शिश्नेन मोक्षणम् । इति सर्वाणि स्रोतांसि रुद्ध्वा त्रिदशपुङ्गवः ॥
tamuvāca mahādevo gaccha śiśnena mokṣaṇam | iti sarvāṇi srotāṃsi ruddhvā tridaśapuṅgavaḥ
सब स्रोतों को रोककर देवश्रेष्ठ महादेव ने उनसे कहा, "जाओ, तुम्हारी मुक्ति शिश्न के मार्ग से है।"
श्लोक 31 (12.295.31)
अपश्यमानस्तद्द्वारं सर्वतः पिहितो मुनिः । पर्यक्रामद्दह्यमान इतश्चेतश्च तेजसा ॥
apaśyamānastaddvāraṃ sarvataḥ pihito muniḥ | paryakrāmaddahyamāna itaścetaśca tejasā
उस द्वार को न पाकर, चारों ओर से बन्द हुए मुनि ताप से जलते हुए इधर-उधर भटकते रहे।
श्लोक 32 (12.295.32)
स वै निष्क्रम्य शिश्नेन शुक्रत्वमभिपेदिवान् । कार्येण तेन नभसो नाध्यगच्छत मध्यतः ॥
sa vai niṣkramya śiśnena śukratvamabhipedivān | kāryeṇa tena nabhaso nādhyagacchata madhyataḥ
शिश्न के मार्ग से निकलकर वे शुक्र-भाव को प्राप्त हुए; इसी कारण वे आकाश के मध्य से होकर नहीं जाते।
श्लोक 33 (12.295.33)
तत एव च देवेषु अप्रविष्टो महामुनिः । पौरोहित्यं च दैत्यानां शक्रतेजोविवृद्धये ॥
tata eva ca deveṣu apraviṣṭo mahāmuniḥ | paurohityaṃ ca daityānāṃ śakratejovivṛddhaye
इसी कारण वे महामुनि देवताओं के बीच प्रविष्ट न हुए, और प्रबल तेज की वृद्धि के लिए उन्होंने दैत्यों का पौरोहित्य स्वीकार किया।
श्लोक 34 (12.295.34)
विनिष्क्रान्तं तु तं दृष्ट्वा ज्वलन्तमिव तेजसा । भवो रोषसमाविष्टः शूलोद्यतकरः स्थितः ॥
viniṣkrāntaṃ tu taṃ dṛṣṭvā jvalantamiva tejasā | bhavo roṣasamāviṣṭaḥ śūlodyatakaraḥ sthitaḥ
उन्हें तेज से जलते हुए-से निकलता देखकर क्रोध से भरे भव त्रिशूल उठाए खड़े हो गए।
श्लोक 35 (12.295.35)
अवारयत तं देवी क्रुद्धं पशुपतिं पतिम् । पुत्रत्वमगमद्देव्या वारिते शंकरे च सः ॥
avārayata taṃ devī kruddhaṃ paśupatiṃ patim | putratvamagamaddevyā vārite śaṃkare ca saḥ
देवी ने अपने क्रुद्ध पति पशुपति को रोका; और देवी के द्वारा शंकर के रोके जाने पर उशना उनके पुत्र हो गए।
देव्युवाच
श्लोक 36 (12.295.36)
हिंसनीयस्त्वया नैव मम पुत्रत्वमागतः । न हि देवोदरात्कश्चिन्निःसृतो नाशमर्हति ॥
hiṃsanīyastvayā naiva mama putratvamāgataḥ | na hi devodarātkaścinniḥsṛto nāśamarhati
तुम्हें इसे मारना उचित नहीं; यह मेरा पुत्र बन चुका है। देव के उदर से निकला हुआ कोई भी विनाश के योग्य नहीं होता।
भीष्म उवाच
श्लोक 37 (12.295.37)
ततः प्रीतो भवो देव्याः प्रहसंश्चेदमब्रवीत् । गच्छत्वेष यथाकाममिति राजन्पुनः पुनः ॥
tataḥ prīto bhavo devyāḥ prahasaṃścedamabravīt | gacchatveṣa yathākāmamiti rājanpunaḥ punaḥ
तब देवी से प्रसन्न होकर भव ने हँसते हुए कहा, "यह जहाँ चाहे चला जाए" — हे राजन्, उन्होंने यह बार-बार कहा।
श्लोक 38 (12.295.38)
ततः प्रणम्य वरदं देवं देवीमुमां तथा । उशना प्राप तद्धीमान्गतिमिष्टां महामुनिः ॥
tataḥ praṇamya varadaṃ devaṃ devīmumāṃ tathā | uśanā prāpa taddhīmāngatimiṣṭāṃ mahāmuniḥ
तब वरदाता देव और देवी उमा को प्रणाम करके बुद्धिमान् महामुनि उशना ने अपनी इष्ट गति पाई।
श्लोक 39 (12.295.39)
एतत्ते कथितं तात भार्गवस्य महात्मनः । चरितं भरतश्रेष्ठ यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥
etatte kathitaṃ tāta bhārgavasya mahātmanaḥ | caritaṃ bharataśreṣṭha yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi
तात, भरतश्रेष्ठ, तुमने जो मुझसे पूछा था, महात्मा भार्गव का वह चरित मैंने तुम्हें सुना दिया।