शान्ति पर्व · अध्याय 296
पराशर का जनक को उपदेश: धर्म और कर्मफल
युधिष्ठिर पूछते हैं कि मनुष्य कौन-सा कर्म करके इस लोक और परलोक में परम कल्याण पाता है; भीष्म उत्तर में बताते हैं कि राजा जनक ने यही प्रश्न मुनि पराशर से किया था। पराशर कहते हैं कि धर्म ही परम कल्याण है, मनुष्य के अपने कर्मों के सिवा कोई दैव नहीं है, आँख, मन, वाणी और शरीर का हर कर्म अपने समान फल देता है, और पुण्य तथा पाप बारी-बारी से क्षीण होते हैं। अन्त में वे उनकी सूची देते हैं जो दया के पात्र हैं: डरपोक क्षत्रिय, सब कुछ खानेवाला ब्राह्मण, शीलहीन विद्वान् और प्रजा के प्रति स्नेहहीन राजा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.296.1)
अतः परं महाबाहो यच्छ्रेयस्तद्ब्रवीहि मे । न तृप्याम्यमृतस्येव वचसस्ते पितामह ॥
ataḥ paraṃ mahābāho yacchreyastadbravīhi me | na tṛpyāmyamṛtasyeva vacasaste pitāmaha
महाबाहो, इसके आगे जो परम कल्याणकारी है वह मुझे बताइए। पितामह, अमृत के समान आपके वचनों से मैं तृप्त नहीं होता।
श्लोक 2 (12.296.2)
किं कर्म पुरुषः कृत्वा शुभं पुरुषसत्तम । श्रेयः परमवाप्नोति प्रेत्य चेह च तद्वद ॥
kiṃ karma puruṣaḥ kṛtvā śubhaṃ puruṣasattama | śreyaḥ paramavāpnoti pretya ceha ca tadvada
पुरुषश्रेष्ठ, मनुष्य कौन-सा शुभ कर्म करके इस लोक में और मरने के बाद परम कल्याण पाता है? वह बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 3 (12.296.3)
अत्र ते वर्तयिष्यामि यथा पूर्वं महायशाः । पराशरं महात्मानं पप्रच्छ जनको नृपः ॥
atra te vartayiṣyāmi yathā pūrvaṃ mahāyaśāḥ | parāśaraṃ mahātmānaṃ papraccha janako nṛpaḥ
जैसे पूर्वकाल में यशस्वी राजा जनक ने महात्मा पराशर से पूछा था, वह मैं इस विषय में तुम्हें सुनाता हूँ।
जनक उवाच
श्लोक 4 (12.296.4)
किं श्रेयः सर्वभूतानामस्मिँल्लोके परत्र च । यद्भवेत्प्रतिपत्त्व्यं तद्भवान्प्रब्रवीतु मे ॥
kiṃ śreyaḥ sarvabhūtānāmasmim̐lloke paratra ca | yadbhavetpratipattvyaṃ tadbhavānprabravītu me
इस लोक और परलोक में सब प्राणियों के लिए परम कल्याण क्या है? जो अपनाने योग्य हो, वह आप मुझे बताइए।
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (12.296.5)
ततः स तपसा युक्तः सर्वधर्मविधानवित् । नृपायानुग्रहमना मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् ॥
tataḥ sa tapasā yuktaḥ sarvadharmavidhānavit | nṛpāyānugrahamanā munirvākyamathābravīt
तब तप से युक्त, सब धर्मों के विधान को जाननेवाले उन मुनि ने, राजा पर अनुग्रह करने की इच्छा से, ये वचन कहे।
पराशर उवाच
श्लोक 6 (12.296.6)
धर्म एव कृतः श्रेयानिह लोके परत्र च । तस्माद्धि परमं नास्ति यथा प्राहुर्मनीषिणः ॥
dharma eva kṛtaḥ śreyāniha loke paratra ca | tasmāddhi paramaṃ nāsti yathā prāhurmanīṣiṇaḥ
आचरण में लाया हुआ धर्म ही इस लोक और परलोक में श्रेष्ठ कल्याण है। विद्वान् कहते हैं कि उससे बढ़कर कुछ नहीं है।
श्लोक 7 (12.296.7)
प्रतिपद्य नरो धर्मं स्वर्गलोके महीयते । धर्मात्मकः कर्मविधिर्देहिनां नृपसत्तम ॥
pratipadya naro dharmaṃ svargaloke mahīyate | dharmātmakaḥ karmavidhirdehināṃ nṛpasattama
धर्म को अपनानेवाला मनुष्य स्वर्गलोक में सम्मान पाता है। नृपश्रेष्ठ, देहधारियों के कर्म का विधान धर्ममूलक है।
श्लोक 8 (12.296.8)
तस्मिन्नाश्रमिणः सन्तः स्वकर्माणीह कुर्वते ॥
tasminnāśramiṇaḥ santaḥ svakarmāṇīha kurvate
उसी में आश्रमों में स्थित सज्जन यहाँ अपने-अपने कर्म करते हैं।
श्लोक 9 (12.296.9)
चतुर्विधा हि लोकेऽस्मिन्यात्रा तात विधीयते । मर्त्या यत्रावतिष्ठन्ते सा च कामात्प्रवर्तते ॥
caturvidhā hi loke'sminyātrā tāta vidhīyate | martyā yatrāvatiṣṭhante sā ca kāmātpravartate
तात, इस लोक में चार प्रकार की जीवन-यात्रा बताई गई है, जिसमें मनुष्य टिके रहते हैं, और वह कामना से प्रवृत्त होती है।
श्लोक 10 (12.296.10)
सुकृतासुकृतं कर्म निषेव्य विविधैः क्रमैः । दशार्धप्रविभक्तानां भूतानां विविधा गतिः ॥
sukṛtāsukṛtaṃ karma niṣevya vividhaiḥ kramaiḥ | daśārdhapravibhaktānāṃ bhūtānāṃ vividhā gatiḥ
भाँति-भाँति के क्रमों से शुभ और अशुभ कर्म करके, पाँच भागों में बँटे हुए प्राणियों की अनेक प्रकार की गति होती है।
श्लोक 11 (12.296.11)
सौवर्णं राजतं चापि यथा भाण्डं निषिच्यते । तथा निपिच्यते जन्तुः पूर्वकर्मवशानुगः ॥
sauvarṇaṃ rājataṃ cāpi yathā bhāṇḍaṃ niṣicyate | tathā nipicyate jantuḥ pūrvakarmavaśānugaḥ
जैसे सोने या चाँदी का पात्र ढाला जाता है, वैसे ही जीव अपने पूर्वकर्मों के वश में होकर ढाला जाता है।
श्लोक 12 (12.296.12)
नाबीजाज्जायते किंचिन्नाकृत्वा सुखमेधते । सुकृतैर्विन्दते सौख्यं प्राप्य देहक्षयं नरः ॥
nābījājjāyate kiṃcinnākṛtvā sukhamedhate | sukṛtairvindate saukhyaṃ prāpya dehakṣayaṃ naraḥ
बीज के बिना कुछ उत्पन्न नहीं होता, और कर्म किए बिना कोई सुख नहीं पाता। मनुष्य शरीर के नाश के बाद अपने शुभ कर्मों से सुख पाता है।
श्लोक 13 (12.296.13)
दैवं तात न पश्यामि नास्ति दैवस्य साधनम् । स्वभावतो हि संसिद्धा देवगन्धर्वदानवाः ॥
daivaṃ tāta na paśyāmi nāsti daivasya sādhanam | svabhāvato hi saṃsiddhā devagandharvadānavāḥ
तात, मैं दैव को नहीं देखता; दैव का कोई साधन नहीं है। देवता, गन्धर्व और दानव अपने स्वभाव से ही सिद्ध हुए हैं।
श्लोक 14 (12.296.14)
प्रेत्य यान्त्यकृतं कर्म न स्मरन्ति सदा जनाः । ते वै तस्य फलप्राप्तौ कर्म चापि चतुर्विधम् ॥
pretya yāntyakṛtaṃ karma na smaranti sadā janāḥ | te vai tasya phalaprāptau karma cāpi caturvidham
मरकर लोग आगे चले जाते हैं और किए हुए कर्म को कभी स्मरण नहीं करते; उसका फल मिलते समय कर्म भी चार प्रकार का होता है।
श्लोक 15 (12.296.15)
लोकयात्राश्रयश्चैव शब्दो वेदाश्रयः कृतः । शान्त्यर्थं मनसस्तात नैतद्वृद्धानुशासनम् ॥
lokayātrāśrayaścaiva śabdo vedāśrayaḥ kṛtaḥ | śāntyarthaṃ manasastāta naitadvṛddhānuśāsanam
लोकव्यवहार का आधार बना हुआ शब्द वेद पर आश्रित किया गया है, तात, मन की शान्ति के लिए; यह वृद्धों का अनुशासन नहीं है।
श्लोक 16 (12.296.16)
चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम् । कुरुते यादृशं कर्म तादृशं प्रतिपद्यते ॥
cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham | kurute yādṛśaṃ karma tādṛśaṃ pratipadyate
आँख, मन, वाणी और कर्म, इन चार प्रकारों से मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है।
श्लोक 17 (12.296.17)
निरन्तरं च मिश्रं च लभते कर्म पार्थिव । कल्याणं यदि वा पापं न तु नाशोऽस्य विद्यते ॥
nirantaraṃ ca miśraṃ ca labhate karma pārthiva | kalyāṇaṃ yadi vā pāpaṃ na tu nāśo'sya vidyate
राजन्, मनुष्य को अपने कर्म का फल निरन्तर या मिला-जुला मिलता है, चाहे वह कल्याणकारी हो या पाप; उसका नाश नहीं होता।
श्लोक 18 (12.296.18)
कदाचित्सुकृतं तात कूटस्थमिव तिष्ठति । मज्जमानस्य संसारे यावद्दुःखाद्विमुच्यते ॥
kadācitsukṛtaṃ tāta kūṭasthamiva tiṣṭhati | majjamānasya saṃsāre yāvadduḥkhādvimucyate
तात, संसार में डूबते हुए मनुष्य के लिए कभी-कभी पुण्य कर्म कूटस्थ-सा अचल रहता है, जब तक वह दुःख से छूट नहीं जाता।
श्लोक 19 (12.296.19)
ततो दुःखक्षयं कृत्वा सुकृतं कर्म सेवते । सुकृतक्षयाच्च दुष्कृतं तद्विद्धि मनुजाधिप ॥
tato duḥkhakṣayaṃ kṛtvā sukṛtaṃ karma sevate | sukṛtakṣayācca duṣkṛtaṃ tadviddhi manujādhipa
तब दुःख का क्षय करके वह पुण्य कर्म का फल भोगता है; और पुण्य के क्षय से पाप का फल आता है। हे नरेश्वर, यह जान लो।
श्लोक 20 (12.296.20)
दमः क्षमा धृतिस्तेजः संतोषः सत्यवादिता । ह्रीरहिंसाऽव्यसनिता दाक्ष्यं चेति सुखावहाः ॥
damaḥ kṣamā dhṛtistejaḥ saṃtoṣaḥ satyavāditā | hrīrahiṃsā'vyasanitā dākṣyaṃ ceti sukhāvahāḥ
दम, क्षमा, धैर्य, तेज, सन्तोष, सत्यवादिता, लज्जा, अहिंसा, व्यसनहीनता और दक्षता, ये सुख देनेवाले हैं।
श्लोक 21 (12.296.21)
दुष्कृते सुकृते चापि न जन्तुर्नियतो भवेत् । नित्यं मनः समाधाने प्रयतेत विचक्षणः ॥
duṣkṛte sukṛte cāpi na janturniyato bhavet | nityaṃ manaḥ samādhāne prayateta vicakṣaṇaḥ
प्राणी को दुष्कर्म या सुकर्म में बँधा नहीं रहना चाहिए; विवेकी पुरुष सदा मन की समाधि के लिए प्रयत्न करे।
श्लोक 22 (12.296.22)
नायं परस्य सुकृतं दुष्कृतं चापि सेवते । करोति यादृशं कर्म तादृशं प्रतिपद्यते ॥
nāyaṃ parasya sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ cāpi sevate | karoti yādṛśaṃ karma tādṛśaṃ pratipadyate
मनुष्य दूसरे के पुण्य या पाप का फल नहीं भोगता; वह जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है।
श्लोक 23 (12.296.23)
सुखदुःखे समाधाय पुमानन्येन गच्छति । अन्येनैव जनः सर्वः संगतो यश्च पार्थिवः ॥
sukhaduḥkhe samādhāya pumānanyena gacchati | anyenaiva janaḥ sarvaḥ saṃgato yaśca pārthivaḥ
सुख और दुःख को स्थिर करके मनुष्य दूसरे के द्वारा चलता है; सब लोग, और जो राजा है वह भी, दूसरे से ही जुड़े हैं।
श्लोक 24 (12.296.24)
परेषां यदसूयेत न तत्कुर्यात्स्वयं नरः । यो ह्यसूयुस्तथा युक्तः सोऽवहासं नियच्छति ॥
pareṣāṃ yadasūyeta na tatkuryātsvayaṃ naraḥ | yo hyasūyustathā yuktaḥ so'vahāsaṃ niyacchati
जिस बात के लिए मनुष्य दूसरों पर दोष लगाए, उसे स्वयं न करे; जो दोष निकालनेवाला स्वयं वैसा ही आचरण करता है, वह उपहास का पात्र बनता है।
श्लोक 25 (12.296.25)
भीरू राजन्यो ब्राह्मणः सर्वभक्ष्यो । वैश्योऽनीहावान्हीनवर्णोऽलसश्च । विद्वांश्चाशीलो वृत्तहीनः कुलीनः । सत्याद्विभ्रष्टो ब्राह्मणस्त्री च दुष्टा ॥
bhīrū rājanyo brāhmaṇaḥ sarvabhakṣyo | vaiśyo'nīhāvānhīnavarṇo'lasaśca | vidvāṃścāśīlo vṛttahīnaḥ kulīnaḥ | satyādvibhraṣṭo brāhmaṇastrī ca duṣṭā
डरपोक क्षत्रिय, सब कुछ खा लेनेवाला ब्राह्मण, उद्योगहीन वैश्य, आलसी हीन वर्ण का मनुष्य, शीलहीन विद्वान्, आचारहीन कुलीन, सत्य से भ्रष्ट ब्राह्मण और दुष्ट ब्राह्मण-स्त्री,
श्लोक 26 (12.296.26)
रागी युक्तः पचमानोऽऽत्महेतो । र्मूर्खो वक्ता नृपहीनं च राष्ट्रम् । एते सर्वे शोच्यतां यान्ति राज । न्यश्चायुक्तः स्नेहहीनः प्रजासु ॥
rāgī yuktaḥ pacamāno''tmaheto | rmūrkho vaktā nṛpahīnaṃ ca rāṣṭram | ete sarve śocyatāṃ yānti rāja | nyaścāyuktaḥ snehahīnaḥ prajāsu
योग में लगा हुआ भी रागी पुरुष, केवल अपने लिए पकानेवाला, मूर्ख वक्ता, और राजा से रहित राष्ट्र, ये सब, राजन्, शोक के पात्र होते हैं; और वह भी जो अयोग्य होकर प्रजा के प्रति स्नेहहीन है।