शान्ति पर्व · अध्याय 297
पाप, प्रायश्चित्त और शुभ कर्म पर पराशर का उपदेश
पराशर जनक को अपना उपदेश जारी रखते हैं। वे बुद्धिमान् को ऐसा सारथि बताते हैं जो ज्ञान की लगामों से अपने मनोरथों को चलाता है, कहते हैं कि मनुष्य पुण्य से ऊँचे वर्ण को पाता और पाप से गिरता है, और सिखाते हैं कि अज्ञान से किया पाप तप और अहिंसा से धुल जाता है, पर जान-बूझकर किया पाप इतनी सरलता से नहीं हटता। अन्त में वे राजा के कर्तव्य बताते हैं: शत्रुओं को जीतना, प्रजा की रक्षा करना, अनेक यज्ञ करना और जीवन के अन्तिम भाग में वन का आश्रय लेना।
पराशर उवाच
श्लोक 1 (12.297.1)
मनोरथरथं प्राप्य इन्द्रियार्थहयं नरः । रश्मिभिर्ज्ञानसंभूतैर्यो गच्छति स बुद्धिमान् ॥
manoratharathaṃ prāpya indriyārthahayaṃ naraḥ | raśmibhirjñānasaṃbhūtairyo gacchati sa buddhimān
जो मनुष्य मनोरथ के रथ पर चढ़कर, इन्द्रियों के विषयरूपी घोड़ों को ज्ञान से उत्पन्न लगामों से सँभालकर चलता है, वही बुद्धिमान् है।
श्लोक 2 (12.297.2)
सेवाश्रितेन मनसा वृत्तिहीनस्य शस्यते । द्विजातिहस्तान्निर्वृत्ता न तु तुल्यात्परस्परात् ॥
sevāśritena manasā vṛttihīnasya śasyate | dvijātihastānnirvṛttā na tu tulyātparasparāt
जिसके पास आजीविका नहीं है, उसके लिए सेवा में लगे मन से अपनाई गई वृत्ति प्रशंसनीय है, यदि वह द्विजातियों के हाथ से मिली हो, आपस में बराबरी के लोगों से नहीं।
श्लोक 3 (12.297.3)
आयुर्नसुलभं लब्ध्वा नावकर्षेद्विशांपते । उत्कर्षार्थं प्रयतते नरः पुण्येन कर्मणा ॥
āyurnasulabhaṃ labdhvā nāvakarṣedviśāṃpate | utkarṣārthaṃ prayatate naraḥ puṇyena karmaṇā
विशांपते, दुर्लभ आयु को पाकर मनुष्य को अपना अपकर्ष नहीं करना चाहिए; मनुष्य पुण्य कर्म से उत्कर्ष के लिए प्रयत्न करता है।
श्लोक 4 (12.297.4)
वर्णेभ्यो हि परिभ्रष्टो न वै संमानमर्हति । न तु यः सत्क्रियां प्राप्य राजसं कर्म सेवते ॥
varṇebhyo hi paribhraṣṭo na vai saṃmānamarhati | na tu yaḥ satkriyāṃ prāpya rājasaṃ karma sevate
जो अपने वर्ण से गिर गया है वह सम्मान के योग्य नहीं; और वह भी नहीं जो सत्कार पाकर राजसी कर्म में लग जाता है।
श्लोक 5 (12.297.5)
वर्णोत्कर्षमवाप्नोति नरः पुण्येन कर्मणा । दुर्लभं तमलब्धा हि हन्यात्पापेन कर्मणा ॥
varṇotkarṣamavāpnoti naraḥ puṇyena karmaṇā | durlabhaṃ tamalabdhā hi hanyātpāpena karmaṇā
मनुष्य पुण्य कर्म से ऊँचे वर्ण को पाता है; किन्तु उस दुर्लभ को न पाकर वह पाप कर्म से उसे नष्ट कर देगा।
श्लोक 6 (12.297.6)
अज्ञानाद्धि कृतं पापं तपसैवाभिनिर्णुदेत् । पापं हि कर्म फलति पापमेव स्वयंकृतम् । तस्मात्पापं न सेवेत कर्म दुःखफलोदयम् ॥
ajñānāddhi kṛtaṃ pāpaṃ tapasaivābhinirṇudet | pāpaṃ hi karma phalati pāpameva svayaṃkṛtam | tasmātpāpaṃ na seveta karma duḥkhaphalodayam
अज्ञान से किए पाप को तप से ही दूर करना चाहिए। पाप कर्म फल देता है, और स्वयं किया हुआ पाप पाप ही रहता है। इसलिए दुःख फलवाले पाप कर्म का सेवन न करे।
श्लोक 7 (12.297.7)
पापानुबन्धं यत्कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् । तन्न सेवेत मेधावी शुचिः कुशलिनं यथा ॥
pāpānubandhaṃ yatkarma yadyapi syānmahāphalam | tanna seveta medhāvī śuciḥ kuśalinaṃ yathā
जो कर्म पाप से जुड़ा हो, वह चाहे महाफलवाला हो, तो भी बुद्धिमान् उसका सेवन न करे, जैसे शुद्ध मनुष्य कुशलिन नामक चाण्डाल-विशेष से दूर रहता है।
श्लोक 8 (12.297.8)
किंकष्टमनुपश्यामि फलं पापस्य कर्मणः । प्रत्यापन्नस्य हि ततो नात्मा तावद्विरोचते ॥
kiṃkaṣṭamanupaśyāmi phalaṃ pāpasya karmaṇaḥ | pratyāpannasya hi tato nātmā tāvadvirocate
मैं पाप कर्म के फल को घोर कष्ट के रूप में देखता हूँ; क्योंकि जो पश्चात्ताप कर चुका है, उसे उस समय अपना आत्मा ही रुचिकर नहीं लगता।
श्लोक 9 (12.297.9)
प्रत्यापत्तिश्च यस्येह बालिशस्य न जायते । तस्यापि सुमहांस्तापः प्रस्थितस्योपजायते ॥
pratyāpattiśca yasyeha bāliśasya na jāyate | tasyāpi sumahāṃstāpaḥ prasthitasyopajāyate
और जिस मूर्ख में ऐसी विरक्ति नहीं जागती, उसे भी प्रस्थान करते समय बड़ा सन्ताप होता है।
श्लोक 10 (12.297.10)
विरक्तं शोध्यते वस्त्रं न तु कृष्णोपसंहितम् । प्रयत्नेन मनुष्येन्द्र पापमेवं निबोध मे ॥
viraktaṃ śodhyate vastraṃ na tu kṛṣṇopasaṃhitam | prayatnena manuṣyendra pāpamevaṃ nibodha me
जिसका रंग उड़ गया हो, ऐसा वस्त्र शुद्ध किया जा सकता है, पर काले रंग में रँगा हुआ नहीं। हे नरेन्द्र, पाप को भी इसी प्रकार यत्नपूर्वक मुझसे समझो।
श्लोक 11 (12.297.11)
स्वयं कृत्वा तु यः पापं शुभमेवानुतिष्ठति । प्रायश्चित्तं नरः कर्तुमुभयं सोऽश्नुते पृथक् ॥
svayaṃ kṛtvā tu yaḥ pāpaṃ śubhamevānutiṣṭhati | prāyaścittaṃ naraḥ kartumubhayaṃ so'śnute pṛthak
जो मनुष्य स्वयं पाप करके प्रायश्चित्त के रूप में केवल शुभ कर्म करता है, वह दोनों का फल अलग-अलग भोगता है।
श्लोक 12 (12.297.12)
अज्ञानात्तु कृतां हिंसामहिंसा व्यपकर्षति । ब्राह्मणाः शास्त्रनिर्देशादित्याहुर्ब्रह्मवादिनः ॥
ajñānāttu kṛtāṃ hiṃsāmahiṃsā vyapakarṣati | brāhmaṇāḥ śāstranirdeśādityāhurbrahmavādinaḥ
अज्ञान से की गई हिंसा को अहिंसा दूर कर देती है, ऐसा शास्त्र के निर्देश से ब्रह्मवादी ब्राह्मण कहते हैं।
श्लोक 13 (12.297.13)
तथा कामकृतं नास्य विहिंसैवानुकर्षति । इत्याहुर्ब्रह्मशास्त्रज्ञा ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः ॥
tathā kāmakṛtaṃ nāsya vihiṃsaivānukarṣati | ityāhurbrahmaśāstrajñā brāhmaṇā brahmavādinaḥ
परन्तु जान-बूझकर किया हुआ पाप इस प्रकार नहीं हटता; हिंसा ही उसे साथ खींचती है। ऐसा ब्रह्मशास्त्र के ज्ञाता ब्रह्मवादी ब्राह्मण कहते हैं।
श्लोक 14 (12.297.14)
अहं तु तावत्पश्यामि कर्म यद्वर्तते कृतम् । गुणयुक्तं प्रकाशं वा पापेनानुपसंहितम् ॥
ahaṃ tu tāvatpaśyāmi karma yadvartate kṛtam | guṇayuktaṃ prakāśaṃ vā pāpenānupasaṃhitam
मैं तो उस कर्म को देखता हूँ जो किया हुआ टिका रहता है, चाहे वह गुणों से युक्त हो या प्रकट रूप से किया गया हो, और पाप से संयुक्त न हो।
श्लोक 15 (12.297.15)
यथा सूक्ष्माणि कर्माणि फलन्तीह यथातथम् । बुद्धियुक्तानि तानीह कृतानि मनसा सह ॥
yathā sūkṣmāṇi karmāṇi phalantīha yathātatham | buddhiyuktāni tānīha kṛtāni manasā saha
सूक्ष्म कर्म भी यहाँ जैसे किए गए हों वैसा ही फल देते हैं, वे जो समझ-बूझकर, मन के साथ किए गए हों।
श्लोक 16 (12.297.16)
भवत्यल्पफलं कर्म सेवितं नित्यमुल्वणम् । अबुद्धिपूर्वं धर्मज्ञ कृतमुग्रेण कर्मणा ॥
bhavatyalpaphalaṃ karma sevitaṃ nityamulvaṇam | abuddhipūrvaṃ dharmajña kṛtamugreṇa karmaṇā
धर्मज्ञ, तीव्र और निरन्तर सेवित कर्म भी, यदि बिना विचारे उग्र कर्म से किया जाए, तो अल्प फल देता है।
श्लोक 17 (12.297.17)
कृतानि यानि कर्माणि दैवतैर्मुनिभिस्तथा । न चरेत्तानि धर्मात्मा श्रुत्वा चापि न कुत्सयेत् ॥
kṛtāni yāni karmāṇi daivatairmunibhistathā | na carettāni dharmātmā śrutvā cāpi na kutsayet
देवताओं और मुनियों ने जो कर्म किए हैं, धर्मात्मा उन्हें न करे, और उनके विषय में सुनकर निन्दा भी न करे।
श्लोक 18 (12.297.18)
संचिन्त्य मनसा राजन्विदित्वा शक्तिमात्मनः । करोति यः शुभं कर्म स वै भद्राणि पश्यति ॥
saṃcintya manasā rājanviditvā śaktimātmanaḥ | karoti yaḥ śubhaṃ karma sa vai bhadrāṇi paśyati
राजन्, जो मन से सोच-विचारकर और अपनी शक्ति को जानकर शुभ कर्म करता है, वह कल्याण देखता है।
श्लोक 19 (12.297.19)
नवे कपाले सलिलं संन्यस्तं हीयते यथा । नवेतरे तथा भावं प्राप्नोति सुखभावितम् ॥
nave kapāle salilaṃ saṃnyastaṃ hīyate yathā | navetare tathā bhāvaṃ prāpnoti sukhabhāvitam
जैसे नए कपाल में रखा जल नष्ट हो जाता है, वैसे ही जो नया नहीं है उसमें वह भीगकर सुखद स्थिति को प्राप्त होता है।
श्लोक 20 (12.297.20)
सतोयेऽन्यत्तु यत्तोयं तस्मिन्नेव प्रसिच्यते । तद्धि वृद्धिमवाप्नोति सलिले सलिलं यथा ॥
satoye'nyattu yattoyaṃ tasminneva prasicyate | taddhi vṛddhimavāpnoti salile salilaṃ yathā
और जिस पात्र में पहले से जल है, उसमें डाला गया दूसरा जल उसी जल में मिल जाता है; वह जल में जल की तरह बढ़ता है।
श्लोक 21 (12.297.21)
एवं कर्माणि यानीह बुद्धियुक्तानि पार्थिव । समानि चैव यानीह तानि पुण्यतमान्यपि ॥
evaṃ karmāṇi yānīha buddhiyuktāni pārthiva | samāni caiva yānīha tāni puṇyatamānyapi
इसी प्रकार, राजन्, यहाँ जो कर्म बुद्धि से युक्त हैं और जो सम (समान) हैं, वे भी अत्यन्त पुण्यदायी हैं।
श्लोक 22 (12.297.22)
राज्ञा जेतव्याः शत्रवश्चोन्नताश्च । सम्यक्कर्तव्यं पालनं च प्रजानाम् । अग्निश्चेयो बहुभिश्चापि यज्ञै । रन्त्ये मध्ये वा वनमाश्रित्य स्थेयम् ॥
rājñā jetavyāḥ śatravaśconnatāśca | samyakkartavyaṃ pālanaṃ ca prajānām | agniśceyo bahubhiścāpi yajñai | rantye madhye vā vanamāśritya stheyam
राजा को शत्रुओं पर, उन्नत शत्रुओं पर भी, विजय पानी चाहिए; प्रजा का भली-भाँति पालन करना चाहिए; अनेक यज्ञों से अग्नि का चयन करना चाहिए; और अन्त में या बीच में वन का आश्रय लेकर रहना चाहिए।
श्लोक 23 (12.297.23)
दमान्वितः पुरुषो धर्मशीलो । भूतानि चात्मानमिवानुपश्येत् । गरीयसः पूजयेदात्मशक्त्या । सत्येन शीलेन सुखं नरेन्द्र ॥
damānvitaḥ puruṣo dharmaśīlo | bhūtāni cātmānamivānupaśyet | garīyasaḥ pūjayedātmaśaktyā | satyena śīlena sukhaṃ narendra
दम से युक्त, धर्मशील पुरुष सब प्राणियों को अपने समान देखे; और अपनी शक्ति के अनुसार अपने से बड़ों का पूजन करे। हे नरेन्द्र, सत्य और शील से सुख मिलता है।