शान्ति पर्व · अध्याय 298
दान, ऋण और अग्नि-सेवा पर पराशर का उपदेश
पराशर सिखाते हैं कि धन न्याय से कमाना और धर्म के लिए उसकी रक्षा करनी चाहिए, और भूखे अतिथि को थोड़ा जल या फल देना भी महाफल देता है, जैसा रन्तिदेव और शैब्य के उदाहरणों से दिखता है। वे ऋषियों, देवताओं, पितरों, अतिथियों और आश्रितों के प्रति मनुष्य के ऋण गिनाते हैं, उन ऋषियों के नाम बताते हैं जिन्होंने देवताओं की स्तुति और अग्नि में आहुति से सिद्धि पाई, और चेताते हैं कि अधर्म से पाया धन व्यर्थ है। अन्त में वे आहिताग्नि, माता-पिता और गुरु की सेवा का महत्त्व बताते हैं।
पराशर उवाच
श्लोक 1 (12.298.1)
कः कस्य चोपकुरुते कश्च कस्मै प्रयच्छति । प्राणी करोत्ययं कर्म सर्वमात्मार्थमात्मना ॥
kaḥ kasya copakurute kaśca kasmai prayacchati | prāṇī karotyayaṃ karma sarvamātmārthamātmanā
कौन किसका उपकार करता है और कौन किसे देता है? यह प्राणी सब कर्म अपने ही लिए, अपने द्वारा करता है।
श्लोक 2 (12.298.2)
गौरवेण परित्यक्तं निःस्नेहं परिवर्जयेत् । सोदर्यं भ्रातरमपि किमुतान्यं पृथग्जनम् ॥
gauraveṇa parityaktaṃ niḥsnehaṃ parivarjayet | sodaryaṃ bhrātaramapi kimutānyaṃ pṛthagjanam
जिसने अहंकारवश साथ छोड़ दिया हो और जिसमें स्नेह न रहा हो, उसे छोड़ देना चाहिए, चाहे वह सगा भाई ही हो; फिर किसी साधारण पराये की तो बात ही क्या?
श्लोक 3 (12.298.3)
विशिष्टस्य विशिष्टाच्च तुल्यौ दानप्रतिग्रहौ । तयोः पुण्यतरं दानं तद्द्विजस्य प्रयच्छतः ॥
viśiṣṭasya viśiṣṭācca tulyau dānapratigrahau | tayoḥ puṇyataraṃ dānaṃ taddvijasya prayacchataḥ
विशिष्ट पुरुष का विशिष्ट पुरुष से देना और लेना समान है; किन्तु उन दोनों में दान अधिक पुण्यदायी है, विशेषतः जब देनेवाला द्विज हो।
श्लोक 4 (12.298.4)
न्यायागतं धनं वर्णैर्न्यायेनैव विवर्धितम् । संरक्ष्यं यत्नमास्थाय धर्मार्थमिति निश्चयः ॥
nyāyāgataṃ dhanaṃ varṇairnyāyenaiva vivardhitam | saṃrakṣyaṃ yatnamāsthāya dharmārthamiti niścayaḥ
वर्णों के द्वारा न्याय से पाया और न्याय से ही बढ़ाया हुआ धन धर्म के लिए यत्नपूर्वक रक्षा करने योग्य है, यह निश्चय है।
श्लोक 5 (12.298.5)
न धर्मार्थी नृशंसेन कर्मणा धनमार्जयेत् । शक्तितः सर्वकार्याणि कुर्यान्नर्द्धिमनुस्मरन् ॥
na dharmārthī nṛśaṃsena karmaṇā dhanamārjayet | śaktitaḥ sarvakāryāṇi kuryānnarddhimanusmaran
धर्म चाहनेवाला क्रूर कर्म से धन न कमाए। वह समृद्धि का चिन्तन किए बिना अपनी शक्ति के अनुसार सब कार्य करे।
श्लोक 6 (12.298.6)
अपो हि प्रयताः शीतास्तापिता ज्वलनेन वा । शक्तितोऽतिथये दत्त्वा क्षुधार्तायाऽश्नुते फलम् ॥
apo hi prayatāḥ śītāstāpitā jvalanena vā | śaktito'tithaye dattvā kṣudhārtāyā'śnute phalam
शुद्ध जल, ठंडा हो या अग्नि से गरम किया हुआ, भूख से पीड़ित अतिथि को अपनी शक्ति के अनुसार देकर मनुष्य फल पाता है।
श्लोक 7 (12.298.7)
रन्तिदेवेन लोकेष्टा सिद्धिः प्राप्ता महात्मना । फलपत्रैरथो मूलैर्मुनीनर्चितवांश्च सः ॥
rantidevena lokeṣṭā siddhiḥ prāptā mahātmanā | phalapatrairatho mūlairmunīnarcitavāṃśca saḥ
महात्मा रन्तिदेव ने लोक-वांछित सिद्धि पाई; उन्होंने फल, पत्तों और मूलों से मुनियों का सत्कार किया।
श्लोक 8 (12.298.8)
तैरेव फलपत्रैश्च स माठरमतोषयत् । तस्माल्लेभे परं स्थानं शैब्योऽपि पृथिवीपतिः ॥
taireva phalapatraiśca sa māṭharamatoṣayat | tasmāllebhe paraṃ sthānaṃ śaibyo'pi pṛthivīpatiḥ
उन्हीं फल-पत्तों से उन्होंने माठर को सन्तुष्ट किया; और उसी से राजा शैब्य ने भी परम स्थान पाया।
श्लोक 9 (12.298.9)
देवतातिथिभृत्येभ्यः पितृभ्यश्चात्मनस्तथा । ऋणवाञ्जायते मर्त्यस्तस्मादनृणतां व्रजेत् ॥
devatātithibhṛtyebhyaḥ pitṛbhyaścātmanastathā | ṛṇavāñjāyate martyastasmādanṛṇatāṃ vrajet
मनुष्य देवताओं, अतिथियों, भृत्यों, पितरों और अपने प्रति ऋणी होकर जन्म लेता है; इसलिए उसे ऋणमुक्त होना चाहिए।
श्लोक 10 (12.298.10)
स्वाध्यायेन महर्षिभ्यो देवेभ्यो यज्ञकर्मणा । पितृभ्यः श्राद्धदानेन नृणामभ्यर्चनेन च ॥
svādhyāyena maharṣibhyo devebhyo yajñakarmaṇā | pitṛbhyaḥ śrāddhadānena nṛṇāmabhyarcanena ca
वह ये ऋण चुकाए: स्वाध्याय से महर्षियों के प्रति, यज्ञकर्म से देवताओं के प्रति, श्राद्ध-दान से पितरों के प्रति और सत्कार से मनुष्यों के प्रति।
श्लोक 11 (12.298.11)
पाकशेषावहार्येण पालनेनात्मनोऽपि च । यथावद्भृत्यवर्गस्य चिकीर्षेत्कर्म आदितः ॥
pākaśeṣāvahāryeṇa pālanenātmano'pi ca | yathāvadbhṛtyavargasya cikīrṣetkarma āditaḥ
पकाने के बाद बचे हुए अंश को देकर, अपनी रक्षा करके, और भृत्यवर्ग का यथोचित पालन करके वह आरम्भ से ही अपना कर्तव्य निभाने की इच्छा करे।
श्लोक 12 (12.298.12)
प्रयत्नेन च संसिद्धा धनैरपि विवर्जिताः । सम्यग्घृत्वा हुतवहं मुनयः सिद्धिमागताः ॥
prayatnena ca saṃsiddhā dhanairapi vivarjitāḥ | samyagghṛtvā hutavahaṃ munayaḥ siddhimāgatāḥ
धन से रहित होकर भी मुनि प्रयत्न से सिद्ध हुए; अग्नि में भली-भाँति आहुति देकर वे सिद्धि को प्राप्त हुए।
श्लोक 13 (12.298.13)
विश्वामित्रस्य पुत्रत्वमृचीकतनयोऽगमत् । ऋग्भिः स्तुत्वा महाबाहो देवान्वै यज्ञभागिनः ॥
viśvāmitrasya putratvamṛcīkatanayo'gamat | ṛgbhiḥ stutvā mahābāho devānvai yajñabhāginaḥ
महाबाहो, ऋचीक के पुत्र ने यज्ञ में भाग पानेवाले देवताओं की ऋचाओं से स्तुति करके विश्वामित्र का पुत्रत्व पाया।
श्लोक 14 (12.298.14)
गतः शुक्रत्वमुशना देवदेवप्रसादनात् । देवीं स्तुत्वा तु गगने मोदते तेजसा वृतः ॥
gataḥ śukratvamuśanā devadevaprasādanāt | devīṃ stutvā tu gagane modate tejasā vṛtaḥ
देवाधिदेव की कृपा से उशना ने शुक्र-भाव पाया; देवी की स्तुति करके वे तेज से घिरे आकाश में आनन्द करते हैं।
श्लोक 15 (12.298.15)
असितो देवलश्चैव तथा नारदपर्वतौ । कक्षीवाञ्जामदग्न्यश्च रामस्ताण्ड्यस्तथाऽऽत्मवान् ॥
asito devalaścaiva tathā nāradaparvatau | kakṣīvāñjāmadagnyaśca rāmastāṇḍyastathā''tmavān
असित, देवल, नारद और पर्वत; कक्षीवान्, जमदग्नि के पुत्र राम और आत्मसंयमी ताण्ड्य;
श्लोक 16 (12.298.16)
वसिष्ठो जमदग्निश्च विश्वामित्रोऽत्रिरेव च । भरद्वाजो हरिश्मश्रुः कुण्डधारः श्रुतश्रवाः ॥
vasiṣṭho jamadagniśca viśvāmitro'trireva ca | bharadvājo hariśmaśruḥ kuṇḍadhāraḥ śrutaśravāḥ
वसिष्ठ, जमदग्नि, विश्वामित्र और अत्रि, भरद्वाज, हरिश्मश्रु, कुण्डधार और श्रुतश्रवा;
श्लोक 17 (12.298.17)
एते महर्षयः स्तुत्वा विष्णुमृग्भिः समाहिताः । लेभिरे तपसा सिद्धिं प्रसादात्तस्य धीमतः ॥
ete maharṣayaḥ stutvā viṣṇumṛgbhiḥ samāhitāḥ | lebhire tapasā siddhiṃ prasādāttasya dhīmataḥ
इन महर्षियों ने एकाग्र होकर ऋचाओं से विष्णु की स्तुति की और उन बुद्धिमान् की कृपा से तप के द्वारा सिद्धि पाई।
श्लोक 18 (12.298.18)
अनर्हाश्चार्हतां प्राप्ताः सन्तः स्तुत्वा तमेव ह । न तु वृद्धिमिहान्विच्छेत्कर्म कृत्वा जुगुप्सितम् ॥
anarhāścārhatāṃ prāptāḥ santaḥ stutvā tameva ha | na tu vṛddhimihānvicchetkarma kṛtvā jugupsitam
अयोग्य भी उसी की स्तुति करके योग्यता को प्राप्त हुए। परन्तु निन्दित कर्म करके यहाँ उन्नति की इच्छा नहीं करनी चाहिए।
श्लोक 19 (12.298.19)
येऽर्था धर्मेण ते सत्या येऽधर्मेण धिगस्तु तान् । धर्मं वै शाश्वतं लोके न जह्याद्धनकाङ्क्षया ॥
ye'rthā dharmeṇa te satyā ye'dharmeṇa dhigastu tān | dharmaṃ vai śāśvataṃ loke na jahyāddhanakāṅkṣayā
जो धन धर्म से मिला है वही सच्चा है; जो अधर्म से मिला है उसे धिक्कार है। धन की इच्छा से लोक में सनातन धर्म को कभी न छोड़े।
श्लोक 20 (12.298.20)
आहिताग्निर्हि धर्मात्मा यः स पुण्यकृदुत्तमः । वेदा हि सर्वे राजेन्द्र स्थितास्त्रिष्वग्निषु प्रभो ॥
āhitāgnirhi dharmātmā yaḥ sa puṇyakṛduttamaḥ | vedā hi sarve rājendra sthitāstriṣvagniṣu prabho
जो धर्मात्मा आहिताग्नि है, वह पुण्य करनेवालों में उत्तम है; क्योंकि हे राजेन्द्र, हे प्रभो, सब वेद तीनों अग्नियों में स्थित हैं।
श्लोक 21 (12.298.21)
स चाप्यग्न्याहितो विप्रः क्रिया यस्य न हीयते । श्रेयो ह्यनाहिताग्नित्वमग्निहोत्रं न निष्क्रियम् ॥
sa cāpyagnyāhito vipraḥ kriyā yasya na hīyate | śreyo hyanāhitāgnitvamagnihotraṃ na niṣkriyam
और वही विप्र सच्चा आहिताग्नि है जिसकी क्रिया कभी लुप्त नहीं होती; अग्नि की स्थापना न करना अच्छा है, पर क्रियाहीन अग्निहोत्र नहीं।
श्लोक 22 (12.298.22)
अग्निरात्मा च माता च पिता जनयिता तथा । गुरुश्च नरशार्दूल परिचर्या यथातथम् ॥
agnirātmā ca mātā ca pitā janayitā tathā | guruśca naraśārdūla paricaryā yathātatham
अग्नि, आत्मा, माता, पिता, जन्म देनेवाला और गुरु, हे नरशार्दूल, इन सबकी यथोचित सेवा करनी चाहिए।
श्लोक 23 (12.298.23)
मानं त्यक्त्वा यो नरो वृद्धसेवी । विद्वान्क्लीबः पश्यति प्रीतियोगात् । दाक्ष्येण हीनो धर्मयुक्तो न दान्तो । लोकेऽस्मिन्वै पूज्यते सद्भिरार्यः ॥
mānaṃ tyaktvā yo naro vṛddhasevī | vidvānklībaḥ paśyati prītiyogāt | dākṣyeṇa hīno dharmayukto na dānto | loke'sminvai pūjyate sadbhirāryaḥ
जो मनुष्य मान को त्यागकर वृद्धों की सेवा करता है; जो विद्वान् प्रेम के कारण निर्बल की तरह देखता रहता है; जो कुशलता से रहित, धर्म में लगा हुआ और किसी से दबा न हुआ है, ऐसा श्रेष्ठ पुरुष इस लोक में सज्जनों द्वारा पूजित होता है।