शान्ति पर्व · अध्याय 299
आजीविका, सत्संग और दान के भेद पर पराशर का उपदेश
पराशर सबसे नीचे के वर्ण की आजीविका, सज्जनों की संगति के महत्त्व (जैसे सफेद वस्त्र जिस रंग में डुबोया जाए वही रंग ले लेता है) और इस नियम की चर्चा करते हैं कि किसी फल के लिए धर्मविरुद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। वे बताते हैं कि चारों वर्ण अपने-अपने कर्म से धर्म की रक्षा कैसे करते हैं, और छीनकर दान देनेवाला राजा चोर क्यों है। अन्त में वे दान को देने की रीति के अनुसार उत्तम, मध्यम और अधम गिनाते हैं और बताते हैं कि प्रत्येक वर्ण किस गुण से शोभित होता है।
पराशर उवाच
श्लोक 1 (12.299.1)
वृत्तिः सकाशाद्वर्णेभ्यस्त्रिभ्यो हीनस्य शोभना । प्रीत्योपनीता निर्दिष्टा धर्मिष्ठान्कुरुते सदा ॥
vṛttiḥ sakāśādvarṇebhyastribhyo hīnasya śobhanā | prītyopanītā nirdiṣṭā dharmiṣṭhānkurute sadā
सबसे नीचे के वर्ण के लिए उत्तम आजीविका तीनों ऊपर के वर्णों से मिलती है; प्रेम से दी गई और नियत की हुई वह सदा लोगों को धर्मनिष्ठ बनाती है।
श्लोक 2 (12.299.2)
वृत्तिश्चेन्नास्ति शूद्रस्य पितृपैतामही ध्रुवा । न वृत्तिं परतो मार्गेच्छुश्रूषां तु प्रयोजयेत् ॥
vṛttiścennāsti śūdrasya pitṛpaitāmahī dhruvā | na vṛttiṃ parato mārgecchuśrūṣāṃ tu prayojayet
यदि शूद्र के पास पिता-पितामह से प्राप्त पक्की आजीविका न हो, तो वह दूसरी ओर आजीविका न खोजे; वह सेवा में लगे।
श्लोक 3 (12.299.3)
सद्भिस्तु सह संसर्गः शोभते धर्मदर्शिभिः । नित्यं सर्वास्ववस्थासु नासद्भिरिति मे मतिः ॥
sadbhistu saha saṃsargaḥ śobhate dharmadarśibhiḥ | nityaṃ sarvāsvavasthāsu nāsadbhiriti me matiḥ
धर्म को देखनेवाले सज्जनों का साथ सदा और सब अवस्थाओं में शोभा देता है, दुष्टों का नहीं, ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 4 (12.299.4)
यथोदयगिरौ द्रव्यं सन्निकर्षेण दीप्यते । तथा सत्सन्निकर्षेण हीनवर्णोऽपि दीप्यते ॥
yathodayagirau dravyaṃ sannikarṣeṇa dīpyate | tathā satsannikarṣeṇa hīnavarṇo'pi dīpyate
जैसे उदयगिरि पर स्थित वस्तु समीपता से चमकती है, वैसे ही सज्जनों की निकटता से हीन वर्ण का मनुष्य भी चमक उठता है।
श्लोक 5 (12.299.5)
यादृशेन हि वर्णेन भाव्यते शुक्लमम्बरम् । तादृशं कुरुते रूपमेतदेवमवेहि मे ॥
yādṛśena hi varṇena bhāvyate śuklamambaram | tādṛśaṃ kurute rūpametadevamavehi me
सफेद वस्त्र को जिस रंग में रँगा जाता है, वह वैसा ही रूप धारण कर लेता है; यह मुझसे ऐसे ही समझो।
श्लोक 6 (12.299.6)
तस्माद्गुणेषु रज्येथा मा दोषेषु कदाचन । अनित्यमिह मर्त्यानां जीवितं हि चलाचलम् ॥
tasmādguṇeṣu rajyethā mā doṣeṣu kadācana | anityamiha martyānāṃ jīvitaṃ hi calācalam
इसलिए गुणों में अनुराग रखो, दोषों में कभी नहीं। यहाँ मनुष्यों का जीवन अनित्य और चंचल है।
श्लोक 7 (12.299.7)
सुखे वा यदि वा दुःखे वर्तमानो विचक्षणः । यश्चिनोति शुभान्येव स भद्राणीह पश्यति ॥
sukhe vā yadi vā duḥkhe vartamāno vicakṣaṇaḥ | yaścinoti śubhānyeva sa bhadrāṇīha paśyati
सुख में हो या दुःख में, जो विवेकी पुरुष केवल शुभ का ही संचय करता है, वह यहाँ कल्याण देखता है।
श्लोक 8 (12.299.8)
धर्मादपेतं यत्कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् । न तत्सेवेत मेधावी न तद्धितमिहोच्यते ॥
dharmādapetaṃ yatkarma yadyapi syānmahāphalam | na tatseveta medhāvī na taddhitamihocyate
जो कर्म धर्म से हटा हुआ हो, वह महाफलवाला भी हो तो बुद्धिमान् उसका सेवन न करे; उसे यहाँ हितकर नहीं कहा जाता।
श्लोक 9 (12.299.9)
धर्मेण सहितं यत्तु भवेदल्पफलोदयम् । तत्कार्यमविशङ्केन कर्मात्यन्तं सुखावहम् ॥
dharmeṇa sahitaṃ yattu bhavedalpaphalodayam | tatkāryamaviśaṅkena karmātyantaṃ sukhāvaham
किन्तु जो कर्म धर्म से युक्त हो, चाहे उसका फल थोड़ा ही हो, उसे निःशंक होकर करना चाहिए; वह कर्म अत्यन्त सुख देनेवाला है।
श्लोक 10 (12.299.10)
यो हृत्वा गोसहस्राणि नृपो दद्यादरक्षिता । स शब्दमात्रफलभाग्राजा भवति तस्करः ॥
yo hṛtvā gosahasrāṇi nṛpo dadyādarakṣitā | sa śabdamātraphalabhāgrājā bhavati taskaraḥ
जो राजा हजारों गायें छीनकर उन्हें दान कर देता है, पर रक्षक नहीं है, वह केवल नाममात्र के फल का भागी होता है; वह राजा चोर है।
श्लोक 11 (12.299.11)
स्वयंभूरसृजच्चाग्रे धातारं लोकसत्कृतम् । धाताऽसृजत्पुत्रमेकं लोकानां धारणे रतम् ॥
svayaṃbhūrasṛjaccāgre dhātāraṃ lokasatkṛtam | dhātā'sṛjatputramekaṃ lokānāṃ dhāraṇe ratam
स्वयम्भू ने आरम्भ में लोकसम्मानित धाता को रचा, और धाता ने लोकों को धारण करने में रत एक पुत्र को रचा।
श्लोक 12 (12.299.12)
तमर्चयित्वा वैश्यस्तु कुर्यादत्यर्थमृद्धिमत् । रक्षितव्यं तु राजन्यैरुपयोज्यं द्विजातिभिः ॥
tamarcayitvā vaiśyastu kuryādatyarthamṛddhimat | rakṣitavyaṃ tu rājanyairupayojyaṃ dvijātibhiḥ
उसका पूजन करके वैश्य अपने धन को खूब समृद्ध करे; वह क्षत्रियों द्वारा रक्षा करने योग्य और द्विजातियों द्वारा उपयोग में लाने योग्य है।
श्लोक 13 (12.299.13)
अजिह्नैरशठक्रोधैर्हव्यकव्यप्रयोक्तृभिः । शूद्रैर्निर्मार्जनं कार्यमेवं धर्मो न नश्यति ॥
ajihnairaśaṭhakrodhairhavyakavyaprayoktṛbhiḥ | śūdrairnirmārjanaṃ kāryamevaṃ dharmo na naśyati
सरल, कपट और क्रोध से रहित तथा देवताओं और पितरों के हव्य-कव्य की व्यवस्था करनेवाले शूद्रों को शुद्धि का कार्य करना चाहिए; इस प्रकार धर्म नष्ट नहीं होता।
श्लोक 14 (12.299.14)
अप्रनष्टे ततो धर्मे भवन्ति सुखिताः प्रजाः । सुखेन तासां राजेन्द्र मोदन्ते दिवि देवताः ॥
apranaṣṭe tato dharme bhavanti sukhitāḥ prajāḥ | sukhena tāsāṃ rājendra modante divi devatāḥ
धर्म के नष्ट न होने पर प्रजा सुखी रहती है; और राजेन्द्र, उनके सुख से स्वर्ग में देवता आनन्दित होते हैं।
श्लोक 15 (12.299.15)
तस्माद्यो रक्षति नृपः स धर्मेणेति पूज्यते । अधीते चापि यो विप्रो वैश्यो यश्चार्जने रतः ॥
tasmādyo rakṣati nṛpaḥ sa dharmeṇeti pūjyate | adhīte cāpi yo vipro vaiśyo yaścārjane rataḥ
इसलिए जो राजा रक्षा करता है वह धर्म के कारण पूजित होता है; वैसे ही अध्ययन करनेवाला ब्राह्मण और कमाने में लगा वैश्य,
श्लोक 16 (12.299.16)
यश्च शुश्रूषते शूद्रः सततं नियतेन्द्रियः । अतोऽन्यथा मनुष्येन्द्र स्वधर्मात्परिहीयते ॥
yaśca śuśrūṣate śūdraḥ satataṃ niyatendriyaḥ | ato'nyathā manuṣyendra svadharmātparihīyate
और इन्द्रियों को संयम में रखकर निरन्तर सेवा करनेवाला शूद्र। हे नरेन्द्र, जो इनसे भिन्न आचरण करता है, वह अपने धर्म से गिर जाता है।
श्लोक 17 (12.299.17)
प्राणसंतापनिर्दिष्टाः काकिण्योऽपि महाफलाः । न्यायेनोपार्जिता दत्ताः किमुतान्याः सहस्रशः ॥
prāṇasaṃtāpanirdiṣṭāḥ kākiṇyo'pi mahāphalāḥ | nyāyenopārjitā dattāḥ kimutānyāḥ sahasraśaḥ
प्राणों को कष्ट देकर अलग रखे गए छोटे सिक्के भी, यदि न्याय से कमाकर दिए जाएँ, तो महाफलदायी हैं; फिर हजारों की तो बात ही क्या?
श्लोक 18 (12.299.18)
सत्कृत्य हि द्विजातिभ्यो यो ददाति नराधिपः । यादृशं तादृशं नित्यमश्नाति फलमूर्जितम् ॥
satkṛtya hi dvijātibhyo yo dadāti narādhipaḥ | yādṛśaṃ tādṛśaṃ nityamaśnāti phalamūrjitam
जो राजा द्विजातियों का सत्कार करके उन्हें देता है, वह जैसा देता है वैसा ही प्रबल फल सदा भोगता है।
श्लोक 19 (12.299.19)
अभिगम्य तु यद्दत्तं धर्म्यमाहुरभिष्टुतम् । याचितेन तु यद्दत्तं तदाहुर्मध्यमं फलम् ॥
abhigamya tu yaddattaṃ dharmyamāhurabhiṣṭutam | yācitena tu yaddattaṃ tadāhurmadhyamaṃ phalam
जो दान (पात्र के) पास जाकर दिया जाता है उसे धर्मयुक्त और प्रशंसित कहते हैं; जो माँगने पर दिया जाता है उसका फल मध्यम कहा गया है।
श्लोक 20 (12.299.20)
अवज्ञया दीयते यत्तथैवाश्रद्धयाऽपि वा । तदाहुरधमं दानं मुनयः सत्यवादिनः ॥
avajñayā dīyate yattathaivāśraddhayā'pi vā | tadāhuradhamaṃ dānaṃ munayaḥ satyavādinaḥ
जो तिरस्कार से या श्रद्धा के बिना दिया जाता है, उसे सत्यवादी मुनि अधम दान कहते हैं।
श्लोक 21 (12.299.21)
अतिक्रामेन्मज्जमानो विविधेन नरः सदा । तथा प्रयत्नं कुर्वीत यथा मुच्येत संशयात् ॥
atikrāmenmajjamāno vividhena naraḥ sadā | tathā prayatnaṃ kurvīta yathā mucyeta saṃśayāt
अनेक प्रकार से डूबता हुआ मनुष्य सदा पार जाने का यत्न करे, और ऐसा प्रयत्न करे कि संकट से छूट जाए।
श्लोक 22 (12.299.22)
दमेन शोभते विप्रः क्षत्रियो विजयेन तु । धनेन वैश्यः शूद्रस्तु नित्यं दाक्ष्येण शोभते ॥
damena śobhate vipraḥ kṣatriyo vijayena tu | dhanena vaiśyaḥ śūdrastu nityaṃ dākṣyeṇa śobhate
ब्राह्मण दम से शोभित होता है, क्षत्रिय विजय से, वैश्य धन से, और शूद्र सदा तत्परता से सेवा करके शोभित होता है।