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शान्ति पर्व · अध्याय 300

पराशर: आजीविका और प्रजाओं का धर्म से पतन

पराशर राजा को अपना उपदेश आगे बढ़ाते हैं। वे प्रत्येक वर्ण के न्यायोचित धन का और उन निम्न आजीविकाओं का वर्णन करते हैं जिन्हें आजीविका के अभाव में द्विज अपना सकता है, तथा निन्दित व्यवसायों से सावधान करते हैं। फिर वे बताते हैं कि 'धिक्' के दण्ड से शासित प्रजाओं में दर्प, क्रोध और मोह के कारण असुरों का प्रवेश कैसे हुआ, शिव ने एक बाण से तीनों आकाशीय नगर कैसे गिराए, और इन्द्र तथा राजाओं को दण्ड धारण करने का भार कैसे सौंपा गया। अन्त में वे राजा से न्यायपूर्वक शासन करने, गुणों से प्रेम रखने और किसी प्राणी की हिंसा न करने का आग्रह करते हैं।

अध्याय 299अध्याय-सूचीअध्याय 301

पराशर उवाच

श्लोक 1 (12.300.1)

प्रतिग्रहार्जिता विप्रे क्षत्रिये युधि निर्जिताः । वैश्ये न्यायार्जिताश्चैव शूद्रे शुश्रूषयार्जिताः ॥

pratigrahārjitā vipre kṣatriye yudhi nirjitāḥ | vaiśye nyāyārjitāścaiva śūdre śuśrūṣayārjitāḥ

पराशर ने कहा: "ब्राह्मण के लिए धन वह है जो प्रतिग्रह (दान लेने) से मिले, क्षत्रिय के लिए वह जो युद्ध में जीता जाए, वैश्य के लिए वह जो न्याय से कमाया जाए, और शूद्र के लिए वह जो सेवा से अर्जित हो।

श्लोक 2 (12.300.2)

स्वल्पाऽप्यर्थाः प्रशस्यन्ते धर्मस्यार्थे महाफलाः । नित्यं त्रयाणां वर्णानां शुश्रूषुः शूद्र उच्यते ॥

svalpā'pyarthāḥ praśasyante dharmasyārthe mahāphalāḥ | nityaṃ trayāṇāṃ varṇānāṃ śuśrūṣuḥ śūdra ucyate

थोड़ा-सा धन भी, यदि वह धर्म के काम आए, सराहा जाता है और उसका फल बड़ा होता है। जो सदा तीनों वर्णों की सेवा करता है, वह शूद्र कहलाता है।

श्लोक 3 (12.300.3)

क्षत्रधर्मा वैश्यधर्मा नावृत्तिः पतते द्विजः । शूद्रधर्मा यदा तु स्यात्तदा पतति वै द्विजः ॥

kṣatradharmā vaiśyadharmā nāvṛttiḥ patate dvijaḥ | śūdradharmā yadā tu syāttadā patati vai dvijaḥ

जिस द्विज के पास आजीविका न हो, वह क्षत्रिय या वैश्य के धर्म पर चले तो पतित नहीं होता; किन्तु जब वह शूद्र के धर्म पर चलने लगता है, तब वह द्विज अवश्य पतित हो जाता है।

श्लोक 4 (12.300.4)

वाणिज्यं पाशुपाल्यं च तथा शिल्पोपजीवनम् । शूद्रस्यापि विधीयन्ते यदा वृत्तिर्न जायते ॥

vāṇijyaṃ pāśupālyaṃ ca tathā śilpopajīvanam | śūdrasyāpi vidhīyante yadā vṛttirna jāyate

जब शूद्र को (सेवा से) आजीविका न मिले, तब उसके लिए वाणिज्य, पशुपालन और शिल्प से जीविका चलाना भी विहित है।

श्लोक 5 (12.300.5)

रङ्गावतरणं चैव तथा रूपोपजीवनम् । मद्यमांसोपजीव्यं च विक्रयं लोहचर्मणोः ॥

raṅgāvataraṇaṃ caiva tathā rūpopajīvanam | madyamāṃsopajīvyaṃ ca vikrayaṃ lohacarmaṇoḥ

रंगमंच पर उतरना, रूप के सहारे जीना, मद्य और मांस से जीविका चलाना, और लोहे तथा चमड़े की बिक्री—

श्लोक 6 (12.300.6)

अपूर्विणा न कर्तव्यं कर्म लोके विगर्हितम् । कृतपूर्विणस्तु त्यजतो महान्धर्म इति श्रुतिः ॥

apūrviṇā na kartavyaṃ karma loke vigarhitam | kṛtapūrviṇastu tyajato mahāndharma iti śrutiḥ

लोक में निन्दित ऐसा कर्म वह न करे जिसने पहले कभी न किया हो; और जिसने पहले किया हो, उसके लिए इसे छोड़ देना महान् धर्म है—ऐसी श्रुति है।

श्लोक 7 (12.300.7)

संसिद्धः पुरुषो लोके यदाचरति पापकम् । मदेनाभिप्लुतमनास्तच्च न ग्राह्यमुच्यते ॥

saṃsiddhaḥ puruṣo loke yadācarati pāpakam | madenābhiplutamanāstacca na grāhyamucyate

संसार में कोई सिद्ध (प्रतिष्ठित) पुरुष मद में डूबे मन से जो पाप करता है, वह भी दूसरों के अपनाने योग्य नहीं कहा गया है।

श्लोक 8 (12.300.8)

श्रूयन्ते हि पुराणेषु प्रजा धिग्दण्डशासनाः । दान्ता धर्मप्रधानाश्च न्यायधर्मानुवृत्तिकाः ॥

śrūyante hi purāṇeṣu prajā dhigdaṇḍaśāsanāḥ | dāntā dharmapradhānāśca nyāyadharmānuvṛttikāḥ

पुराणों में सुना जाता है कि प्रजाएँ 'धिक्' के दण्ड से, अर्थात् निन्दा से, शासित होती थीं; वे संयमी थीं, धर्म को सर्वोपरि मानती थीं और न्याय तथा धर्म का अनुसरण करती थीं।

श्लोक 9 (12.300.9)

धर्म एव सदा नॄणामिह राजन्प्रशस्यते । धर्मवृद्धा गुणानेव सेवन्ते हि नरा भुवि ॥

dharma eva sadā nṝṇāmiha rājanpraśasyate | dharmavṛddhā guṇāneva sevante hi narā bhuvi

हे राजन्, इस लोक में मनुष्यों के लिए सदा धर्म की ही प्रशंसा होती है; धर्म में बढ़े हुए लोग पृथ्वी पर केवल गुणों का ही सेवन करते हैं।

श्लोक 10 (12.300.10)

तं धर्ममसुरास्तात नामृष्यन्त नराधिप । विवर्धमानाः क्रमशस्तत्र तेऽन्वाविशन्प्रजाः ॥

taṃ dharmamasurāstāta nāmṛṣyanta narādhipa | vivardhamānāḥ kramaśastatra te'nvāviśanprajāḥ

हे तात, हे नराधिप, उस धर्म को असुर सह न सके; वे धीरे-धीरे बढ़ते हुए उन प्रजाओं में प्रवेश कर गए।

श्लोक 11 (12.300.11)

तासां दर्पः समभवत्प्रजानां धर्मनाशनः । दर्पात्मनां ततः पश्चात्क्रोधस्तासामजायत ॥

tāsāṃ darpaḥ samabhavatprajānāṃ dharmanāśanaḥ | darpātmanāṃ tataḥ paścātkrodhastāsāmajāyata

उन प्रजाओं में धर्म का नाश करनेवाला दर्प उत्पन्न हुआ; फिर दर्प से भरे हुए उन लोगों में क्रोध पैदा हुआ।

श्लोक 12 (12.300.12)

ततः क्रोधाभिभूतानां वृत्तं लज्जासमन्वितम् । ह्रीश्चैवाप्यनशद्राजंस्ततो मोहो व्यजायत ॥

tataḥ krodhābhibhūtānāṃ vṛttaṃ lajjāsamanvitam | hrīścaivāpyanaśadrājaṃstato moho vyajāyata

फिर क्रोध से अभिभूत हुए उन लोगों का लज्जायुक्त आचरण नष्ट हो गया; हे राजन्, लज्जा भी जाती रही, और तब मोह उत्पन्न हुआ।

श्लोक 13 (12.300.13)

ततो मोहपरीतास्ता नापश्यन्त यथा पुरा । परस्परावमर्देन वर्धयन्त्यो यथासुखम् ॥

tato mohaparītāstā nāpaśyanta yathā purā | parasparāvamardena vardhayantyo yathāsukham

फिर मोह से घिरे हुए वे पहले की तरह देख नहीं पाते थे; एक-दूसरे को कुचलते हुए वे मनमाने सुख के पीछे बढ़ने लगे।

श्लोक 14 (12.300.14)

ताः प्राप्य तु स धिग्दण्डो न कारणमतो भवत् । ततोऽभ्यगच्छन्देवांश्च ब्राह्मणांश्चावमन्य ह ॥

tāḥ prāpya tu sa dhigdaṇḍo na kāraṇamato bhavat | tato'bhyagacchandevāṃśca brāhmaṇāṃścāvamanya ha

उन तक पहुँचकर वह 'धिक्' का दण्ड अब उनके लिए संयम का कारण नहीं रहा। तब वे देवताओं और ब्राह्मणों, दोनों का अपमान करते हुए देवताओं पर चढ़ आए।

श्लोक 15 (12.300.15)

एतस्मिन्नेव काले तु देवा देववरं शिवम् । अगच्छञ्शरणं धीरं बहुरूपं गुणाधिकम् ॥

etasminneva kāle tu devā devavaraṃ śivam | agacchañśaraṇaṃ dhīraṃ bahurūpaṃ guṇādhikam

उसी समय देवता देवों में श्रेष्ठ, धीर, अनेक रूपोंवाले और गुणों में बढ़े-चढ़े शिव की शरण में गए।

श्लोक 16 (12.300.16)

तेन स्म ते गगनगाः सपुराः पातिताः क्षितौ । त्रिधाऽप्येकेन बाणेन देवाप्यायिततेजसा ॥

tena sma te gaganagāḥ sapurāḥ pātitāḥ kṣitau | tridhā'pyekena bāṇena devāpyāyitatejasā

उन्होंने देवताओं द्वारा बढ़ाए गए तेजवाले एक ही बाण से आकाश में विचरनेवाले उन तीनों को उनके नगरों सहित पृथ्वी पर गिरा दिया।

श्लोक 17 (12.300.17)

तेषामधिपतिस्त्वासीद्भीमो भीमपराक्रमः । देवतानां भयकरः स हतः शूलपाणिना ॥

teṣāmadhipatistvāsīdbhīmo bhīmaparākramaḥ | devatānāṃ bhayakaraḥ sa hataḥ śūlapāṇinā

उनका अधिपति भयंकर पराक्रमवाला एक भयानक असुर था, जो देवताओं को भय देता था; उसे त्रिशूलधारी ने मार डाला।

श्लोक 18 (12.300.18)

तस्मिन्हतेऽथ स्वं भावं प्रत्यपद्यन्त मानवाः । प्रावर्तन्त च वै वेदाः शास्त्राणि च यथा पुरा ॥

tasminhate'tha svaṃ bhāvaṃ pratyapadyanta mānavāḥ | prāvartanta ca vai vedāḥ śāstrāṇi ca yathā purā

उसके मारे जाने पर मनुष्य अपने स्वभाव में लौट आए; और वेद तथा शास्त्र पहले की तरह चलने लगे।

श्लोक 19 (12.300.19)

ततोऽभिषिच्य राज्येन देवानां दिवि वासवम् । सप्तर्षयश्चान्वयुञ्जन्नराणां दण्डधारणे ॥

tato'bhiṣicya rājyena devānāṃ divi vāsavam | saptarṣayaścānvayuñjannarāṇāṃ daṇḍadhāraṇe

तब स्वर्ग में देवताओं के राजा के रूप में इन्द्र का अभिषेक करके सप्तर्षियों ने मनुष्यों पर दण्ड धारण करने का भार सौंपा।

श्लोक 20 (12.300.20)

सप्तर्षीणामथोर्ध्वं च विपृथुर्नाम पार्थिवः । राजानः क्षत्रियाश्चैव मण्डलेषु पृथक्पृथक् ॥

saptarṣīṇāmathordhvaṃ ca vipṛthurnāma pārthivaḥ | rājānaḥ kṣatriyāścaiva maṇḍaleṣu pṛthakpṛthak

सप्तर्षियों के ऊपर विपृथु नाम का राजा था; और राजा तथा क्षत्रिय अलग-अलग मण्डलों (प्रदेशों) में स्थापित हुए।

श्लोक 21 (12.300.21)

महाकुलेषु ये जाता वृद्धाः पूर्वतराश्च ये । तेषामप्यासुरो भावो हृदयान्नापसर्पति ॥

mahākuleṣu ye jātā vṛddhāḥ pūrvatarāśca ye | teṣāmapyāsuro bhāvo hṛdayānnāpasarpati

बड़े कुलों में जन्मे जो वृद्ध और पूर्वकाल के लोग हैं, उनके भी हृदय से आसुरी भाव दूर नहीं हटता।

श्लोक 22 (12.300.22)

तस्मात्तेनैव भावेन सानुषङ्गेण पार्थिवाः । आसुराण्येव कर्माणि न्यसेवन्भीमविक्रमाः ॥

tasmāttenaiva bhāvena sānuṣaṅgeṇa pārthivāḥ | āsurāṇyeva karmāṇi nyasevanbhīmavikramāḥ

इसलिए उसी भाव के साथ लगे रहने से भयंकर पराक्रमवाले राजा आसुरी कर्मों का ही सेवन करते रहे।

श्लोक 23 (12.300.23)

प्रत्यतिष्ठंश्च तेष्वेव तान्येव स्थापयन्त्यपि । भजन्ते तानि चाद्यापि ये बालिशतरा नराः ॥

pratyatiṣṭhaṃśca teṣveva tānyeva sthāpayantyapi | bhajante tāni cādyāpi ye bāliśatarā narāḥ

वे उन्हीं कर्मों में टिके रहे और उन्हीं को स्थापित भी करते रहे; और आज भी जो अत्यन्त मूढ़ लोग हैं, वे उनका सेवन करते हैं।

श्लोक 24 (12.300.24)

तस्मादहं ब्रवीमि त्वां राजन्संचिन्त्य शास्त्रतः । संसिद्धावागमं कुर्यात्कर्म हिंसात्मकं त्यजेत् ॥

tasmādahaṃ bravīmi tvāṃ rājansaṃcintya śāstrataḥ | saṃsiddhāvāgamaṃ kuryātkarma hiṃsātmakaṃ tyajet

इसलिए, हे राजन्, मैं शास्त्र का विचार करके तुमसे कहता हूँ: सिद्धि की ओर बढ़ने का प्रयत्न करो और हिंसा से भरे कर्म को छोड़ दो।

श्लोक 25 (12.300.25)

न संकरेण द्रविणं प्रचिन्वीयाद्विचक्षणः । धर्मार्थं न्यायमुत्सृज्य न तत्कल्याणमुच्यते ॥

na saṃkareṇa draviṇaṃ pracinvīyādvicakṣaṇaḥ | dharmārthaṃ nyāyamutsṛjya na tatkalyāṇamucyate

विवेकी पुरुष गड़बड़ी और अनीति से धन का संचय न करे; धर्म के लिए भी न्याय को छोड़ देना कल्याणकारी नहीं कहा गया।

श्लोक 26 (12.300.26)

स त्वमेवंविधो दान्तः क्षत्रियः प्रियबान्धवः । प्रजा भृत्यांश्च पुत्रांश्च स्वधर्मेणानुपालय ॥

sa tvamevaṃvidho dāntaḥ kṣatriyaḥ priyabāndhavaḥ | prajā bhṛtyāṃśca putrāṃśca svadharmeṇānupālaya

तुम ऐसे ही संयमी क्षत्रिय हो और बन्धुओं के प्रिय हो; प्रजा, सेवकों और पुत्रों का अपने धर्म के अनुसार पालन करो।

श्लोक 27 (12.300.27)

इष्टानिष्टसमायोगे वैरं सौहार्दमेव च । अथ जातिसहस्राणि बहूनि परिवर्तते ॥

iṣṭāniṣṭasamāyoge vairaṃ sauhārdameva ca | atha jātisahasrāṇi bahūni parivartate

इष्ट और अनिष्ट के संयोग से वैर भी होता है और मित्रता भी; और इस प्रकार जीव हज़ारों जन्मों में घूमता रहता है।

श्लोक 28 (12.300.28)

तस्माद्गुणेषु रज्येथा मा दोषेषु कथंचन । निर्गुणोऽपि हि दुर्बुद्धिरात्मनः सोऽरिरुच्यते ॥

tasmādguṇeṣu rajyethā mā doṣeṣu kathaṃcana | nirguṇo'pi hi durbuddhirātmanaḥ so'rirucyate

इसलिए गुणों में अनुराग रखो, दोषों में कभी नहीं; क्योंकि गुणहीन और दुर्बुद्धि मनुष्य अपना ही शत्रु कहलाता है।

श्लोक 29 (12.300.29)

मानुषेषु महाराज धर्माधर्मौ प्रवर्ततः । न तथाऽन्येषु भूतेषु मनुष्यरहितेष्विह ॥

mānuṣeṣu mahārāja dharmādharmau pravartataḥ | na tathā'nyeṣu bhūteṣu manuṣyarahiteṣviha

हे महाराज, धर्म और अधर्म मनुष्यों में ही प्रवर्तित होते हैं; इस लोक में मनुष्य-भाव से रहित दूसरे प्राणियों में वैसा नहीं होता।

श्लोक 30 (12.300.30)

धर्मशीलो नरो विद्वानीहकोऽनीहकोऽपि वा । आत्मभूतः सदा लोके चरेद्भूतान्यहिंसया ॥

dharmaśīlo naro vidvānīhako'nīhako'pi vā | ātmabhūtaḥ sadā loke caredbhūtānyahiṃsayā

धर्मशील विद्वान् पुरुष, चाहे वह कर्म में प्रवृत्त हो या न हो, लोक में सदा सब प्राणियों को अपना ही आत्मा समझकर किसी की हिंसा न करता हुआ विचरे।

श्लोक 31 (12.300.31)

यदा व्यपेतहृल्लेखं मनो भवति तस्य वै । नानृतं चैव भवति तदा कल्याणमृच्छति ॥

yadā vyapetahṛllekhaṃ mano bhavati tasya vai | nānṛtaṃ caiva bhavati tadā kalyāṇamṛcchati

जब उसका मन हृदय की पीड़ा से रहित हो जाता है और उसमें असत्य नहीं रहता, तभी वह कल्याण को प्राप्त होता है।"

अध्याय 299अध्याय-सूचीअध्याय 301