शान्ति पर्व · अध्याय 301
पराशर: आसक्ति और तप की शक्ति
पराशर गृहस्थ-धर्म से आगे बढ़कर तप का विधान बताते हैं। वे दिखाते हैं कि गृहस्थ में सम्पत्ति, आसक्ति और लोभ से 'मेरा' का भाव कैसे बढ़ता है, और हानि तथा पीड़ा से संसार के प्रति वैराग्य, उससे आत्मज्ञान और फिर तप की ओर झुकाव कैसे होता है। वे बताते हैं कि देवता, ऋषि, राजा और सब प्रकार के सुख तप के फल हैं, लोभ और असन्तोष से सावधान करते हैं, और कहते हैं कि विषय-सुख बाण के गिरने भर के क्षण ठहरता है। अन्त में वे कहते हैं कि गृहस्थ को अपने धर्म में कुशलता से कर्म करना चाहिए, क्योंकि जैसे नदियाँ सागर में, वैसे ही सब आश्रम गृहस्थ में विश्राम पाते हैं।
पराशर उवाच
श्लोक 1 (12.301.1)
एष धर्मविधिस्तात गृहस्थस्य प्रकीर्तितः । तपोविधिं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥
eṣa dharmavidhistāta gṛhasthasya prakīrtitaḥ | tapovidhiṃ tu vakṣyāmi tanme nigadataḥ śṛṇu
पराशर ने कहा: "हे तात, गृहस्थ का यह धर्म-विधान कहा गया। अब मैं तप का विधान बताऊँगा; उसे मुझसे कहते हुए सुनो।
श्लोक 2 (12.301.2)
प्रायेण च गृहस्थस्य ममत्वं नाम जायते । सङ्गागतं नरश्रेष्ठ भावै राजसतामसैः ॥
prāyeṇa ca gṛhasthasya mamatvaṃ nāma jāyate | saṅgāgataṃ naraśreṣṭha bhāvai rājasatāmasaiḥ
हे नरश्रेष्ठ, प्रायः गृहस्थ में आसक्ति से उत्पन्न 'मेरा' का भाव जाग उठता है, जो रजोगुणी और तमोगुणी भावों से पोषित होता है।
श्लोक 3 (12.301.3)
गृहाण्याश्रित्य गावश्च क्षेत्राणि च धनानि च । दाराः पुत्राश्च भृत्याश्च भवन्तीह नरस्य वै ॥
gṛhāṇyāśritya gāvaśca kṣetrāṇi ca dhanāni ca | dārāḥ putrāśca bhṛtyāśca bhavantīha narasya vai
घर का आश्रय लेकर गौएँ, खेत और धन, पत्नी, पुत्र और सेवक मनुष्य के अपने बन जाते हैं।
श्लोक 4 (12.301.4)
एवं तस्य प्रवृत्तस्य नित्यमेवानुपश्यतः । रागद्वेषौ विवर्धेते ह्यनित्यत्वमपश्यतः ॥
evaṃ tasya pravṛttasya nityamevānupaśyataḥ | rāgadveṣau vivardhete hyanityatvamapaśyataḥ
इस प्रकार प्रवृत्त हुए और सदा इन्हीं को देखनेवाले उस पुरुष में, जो अनित्यता को नहीं देखता, राग और द्वेष बढ़ते जाते हैं।
श्लोक 5 (12.301.5)
रागद्वेषाभिभूतं च नरं द्रव्यवशानुगम् । मोहजस्तारतिर्नाम समुपैति नराधिप ॥
rāgadveṣābhibhūtaṃ ca naraṃ dravyavaśānugam | mohajastāratirnāma samupaiti narādhipa
हे नराधिप, राग-द्वेष से अभिभूत और धन के वश में चलनेवाले मनुष्य के पास मोह से उत्पन्न 'रति' नाम की आसक्ति आ पहुँचती है।
श्लोक 6 (12.301.6)
कृतार्थं भोगिनं मत्वा सर्वो रतिपरायणः । लाभं ग्राम्यसुखादन्यं रतितो नानुपश्यति ॥
kṛtārthaṃ bhoginaṃ matvā sarvo ratiparāyaṇaḥ | lābhaṃ grāmyasukhādanyaṃ ratito nānupaśyati
भोग करनेवाले को कृतार्थ मानकर सब लोग भोग में ही लग जाते हैं; वह भोग से इन्द्रियसुख के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं देखता।
श्लोक 7 (12.301.7)
ततो लोभाभिभूतात्मा सङ्गाद्वर्धयते जनम् । पुष्ट्यर्थं चैव तस्येह जनस्यार्थं चिकीर्षति ॥
tato lobhābhibhūtātmā saṅgādvardhayate janam | puṣṭyarthaṃ caiva tasyeha janasyārthaṃ cikīrṣati
फिर लोभ से घिरे मन से वह आसक्ति के कारण अपने जनों को बढ़ाता है, और उनके पोषण के लिए उन लोगों का प्रयोजन सिद्ध करना चाहता है।
श्लोक 8 (12.301.8)
स जानन्नपि चाकार्यमर्थार्थं सेवते नरः । बालस्नेहपरीतात्मा तत्क्षयाच्चानुतप्यते ॥
sa jānannapi cākāryamarthārthaṃ sevate naraḥ | bālasnehaparītātmā tatkṣayāccānutapyate
वह जानता हुआ भी कि यह करने योग्य नहीं है, धन के लिए वही करता है; बच्चों के स्नेह से घिरा हुआ वह उस धन के नष्ट होने पर पछताता है।
श्लोक 9 (12.301.9)
ततो दानेन संपन्नो रक्षन्नात्मपराजयम् । करोति येन भोगी स्यामिति तस्माद्विनश्यति ॥
tato dānena saṃpanno rakṣannātmaparājayam | karoti yena bhogī syāmiti tasmādvinaśyati
फिर दान से सम्पन्न होकर, अपनी पराजय से बचता हुआ, वह ऐसा कर्म करता है कि 'मैं भोगी बनूँ'; और उसी से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 10 (12.301.10)
तद्यदि बुद्धियुक्तानां शाश्वतं ब्रह्मवादिनाम् । अभीच्छतां शुभं कर्म नराणां त्यजतां सुखम् ॥
tadyadi buddhiyuktānāṃ śāśvataṃ brahmavādinām | abhīcchatāṃ śubhaṃ karma narāṇāṃ tyajatāṃ sukham
जो मनुष्य बुद्धि से युक्त हैं, सनातन ब्रह्म के वक्ता हैं, शुभ कर्म चाहते हैं और सुख को त्याग देते हैं—
श्लोक 11 (12.301.11)
लोकायतननाशाच्च धननाशाच्च पार्थिव । आधिव्याधिप्रतापाच्च निर्वेदमुपगच्छति ॥
lokāyatananāśācca dhananāśācca pārthiva | ādhivyādhipratāpācca nirvedamupagacchati
—हे राजन्, ऐसा पुरुष संसार में अपने आश्रयस्थान के नाश, धन के नाश तथा मानसिक और शारीरिक पीड़ाओं के ताप से वैराग्य को प्राप्त होता है।
श्लोक 12 (12.301.12)
निर्वेदादात्मसंबोधः संबोधादात्मदर्शनम् । शास्त्रार्थदर्शनाद्राजंस्तप एवानुपश्यति ॥
nirvedādātmasaṃbodhaḥ saṃbodhādātmadarśanam | śāstrārthadarśanādrājaṃstapa evānupaśyati
वैराग्य से आत्मज्ञान होता है, आत्मज्ञान से आत्मदर्शन; और शास्त्र के अर्थ को देखने से, हे राजन्, वह केवल तप को ही देखता है।
श्लोक 13 (12.301.13)
दुर्लभो हि मनुष्येन्द्र नरः प्रत्यवमर्शवान् । यो वै प्रियसुखे क्षीणे तपः कर्तुं व्यवस्यति ॥
durlabho hi manuṣyendra naraḥ pratyavamarśavān | yo vai priyasukhe kṣīṇe tapaḥ kartuṃ vyavasyati
हे राजेन्द्र, ऐसा विचारवान् मनुष्य दुर्लभ है जो प्रिय सुख के क्षीण हो जाने पर तप करने का निश्चय करे।
श्लोक 14 (12.301.14)
तपः सर्वगतं तात हीनस्यापि विधीयते । जितेन्द्रियस्य दान्तस्य स्वर्गमार्गप्रवर्तकम् ॥
tapaḥ sarvagataṃ tāta hīnasyāpi vidhīyate | jitendriyasya dāntasya svargamārgapravartakam
हे तात, तप सर्वत्र सुलभ है; हीन व्यक्ति के लिए भी उसका विधान है। जितेन्द्रिय और संयमी के लिए वह स्वर्ग के मार्ग पर ले चलनेवाला है।
श्लोक 15 (12.301.15)
प्रजापतिः प्रजाः पूर्वमसृजत्तपसा विभुः । क्वचित्क्वचिद्व्रतपरो व्रतान्यास्थाय पार्थिव ॥
prajāpatiḥ prajāḥ pūrvamasṛjattapasā vibhuḥ | kvacitkvacidvrataparo vratānyāsthāya pārthiva
पूर्वकाल में सर्वव्यापी प्रजापति ने तप से प्रजा की सृष्टि की; हे राजन्, कहीं-कहीं वे व्रतों को अपनाकर व्रत में तत्पर रहे।
श्लोक 16 (12.301.16)
आदित्या वसवो रुद्रास्तथैवाग्न्यश्विमारुताः । विश्वेदेवास्तथा साध्याः पितरोऽथ मरुद्गणाः ॥
ādityā vasavo rudrāstathaivāgnyaśvimārutāḥ | viśvedevāstathā sādhyāḥ pitaro'tha marudgaṇāḥ
आदित्य, वसु, रुद्र, अग्नि, अश्विनीकुमार और मरुत; विश्वेदेव, साध्य, पितर और मरुद्गण;
श्लोक 17 (12.301.17)
यक्षराक्षसगन्धर्वाः सिद्धाश्चान्ये दिवौकसः । संसिद्धास्तपसा तात ये चान्ये स्वर्गवासिनः ॥
yakṣarākṣasagandharvāḥ siddhāścānye divaukasaḥ | saṃsiddhāstapasā tāta ye cānye svargavāsinaḥ
यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, सिद्ध और स्वर्ग में रहनेवाले अन्य देवता—हे तात, ये सब तप से सिद्ध हुए, और दूसरे जो स्वर्गवासी हैं, वे भी।
श्लोक 18 (12.301.18)
ये चादौ ब्राह्मणाः सृष्टा ब्रह्मणा तपसा पुरा । ते भावयन्तः पृथिवीं विचरन्ति दिवं तथा ॥
ye cādau brāhmaṇāḥ sṛṣṭā brahmaṇā tapasā purā | te bhāvayantaḥ pṛthivīṃ vicaranti divaṃ tathā
और जो ब्राह्मण आरम्भ में ब्रह्मा द्वारा तप से रचे गए, वे पृथ्वी का पोषण करते हुए पृथ्वी पर और स्वर्ग में भी विचरते हैं।
श्लोक 19 (12.301.19)
मर्त्यलोके च राजानो ये चान्ये गृहमेधिनः । महाकुलेषु दृश्यन्ते तत्सर्वं तपसः फलम् ॥
martyaloke ca rājāno ye cānye gṛhamedhinaḥ | mahākuleṣu dṛśyante tatsarvaṃ tapasaḥ phalam
मर्त्यलोक में जो राजा और जो अन्य गृहस्थ बड़े कुलों में दिखाई देते हैं, वह सब तप का फल है।
श्लोक 20 (12.301.20)
कौशेयानि च वस्त्राणि शुभान्याभरणानि च । वाहनासनपानानि तत्सर्वं तपसः फलम् ॥
kauśeyāni ca vastrāṇi śubhānyābharaṇāni ca | vāhanāsanapānāni tatsarvaṃ tapasaḥ phalam
रेशमी वस्त्र, सुन्दर आभूषण, सवारियाँ, आसन और पेय—यह सब तप का फल है।
श्लोक 21 (12.301.21)
मनोनुकूलाः प्रमदा रूपवत्यः सहस्रशः । वासः प्रासादपृष्ठे च तत्सर्वं तपसः फलम् ॥
manonukūlāḥ pramadā rūpavatyaḥ sahasraśaḥ | vāsaḥ prāsādapṛṣṭhe ca tatsarvaṃ tapasaḥ phalam
मन के अनुकूल, रूपवती हज़ारों स्त्रियाँ और महल की छत पर निवास—यह सब तप का फल है।
श्लोक 22 (12.301.22)
शयनानि च मुख्यानि भोज्यानि विविधानि च । अभिप्रेतानि सर्वाणि भवन्ति शुभकर्मिणाम् ॥
śayanāni ca mukhyāni bhojyāni vividhāni ca | abhipretāni sarvāṇi bhavanti śubhakarmiṇām
उत्तम शय्याएँ और तरह-तरह के भोज्य पदार्थ—सभी अभीष्ट वस्तुएँ शुभ कर्म करनेवालों को प्राप्त होती हैं।
श्लोक 23 (12.301.23)
नाप्राप्यं तपसः किंचिन्त्रैलोक्येऽपि परंतप । उपभोगपरित्यागः फलान्यकृतकर्मणाम् ॥
nāprāpyaṃ tapasaḥ kiṃcintrailokye'pi paraṃtapa | upabhogaparityāgaḥ phalānyakṛtakarmaṇām
हे परंतप, तीनों लोकों में भी तप के लिए कुछ अप्राप्य नहीं है। जिन्होंने कर्म नहीं किया, उनके फल भोगों का त्याग ही हैं।
श्लोक 24 (12.301.24)
सुखितो दुःखितो वाऽपि नरो लोभं परित्यजेत् । अवेक्ष्य मनसा शास्त्रं बुद्ध्या च नृपसत्तम ॥
sukhito duḥkhito vā'pi naro lobhaṃ parityajet | avekṣya manasā śāstraṃ buddhyā ca nṛpasattama
हे नृपश्रेष्ठ, सुखी हो या दुखी, मनुष्य को मन और बुद्धि से शास्त्र का विचार करके लोभ को छोड़ देना चाहिए।
श्लोक 25 (12.301.25)
असंतोषोऽसुखायेति लोभादिन्द्रियविभ्रमः । ततोऽस्य नश्यति प्रज्ञा विद्येवाभ्यासवर्जिता ॥
asaṃtoṣo'sukhāyeti lobhādindriyavibhramaḥ | tato'sya naśyati prajñā vidyevābhyāsavarjitā
असन्तोष दुःख के ही लिए है, और लोभ से इन्द्रियों में भ्रम पैदा होता है। तब अभ्यास छोड़ी हुई विद्या की तरह उसकी प्रज्ञा नष्ट हो जाती है।
श्लोक 26 (12.301.26)
नष्टप्रज्ञो यदा तु स्यात्तदा न्यायं न पश्यति । तस्मात्सुखक्षये प्राप्ते पुमानुग्रतपश्चरेत् ॥
naṣṭaprajño yadā tu syāttadā nyāyaṃ na paśyati | tasmātsukhakṣaye prāpte pumānugratapaścaret
प्रज्ञा के नष्ट हो जाने पर वह न्याय को नहीं देखता। इसलिए सुख के क्षीण हो जाने पर मनुष्य को उग्र तप करना चाहिए।
श्लोक 27 (12.301.27)
यदिष्टं तत्सुखं प्राहुर्द्वेष्यं दुःखमिहेष्यते । कृताकृतस्य तपसः फलं पश्यस्व यादृशम् ॥
yadiṣṭaṃ tatsukhaṃ prāhurdveṣyaṃ duḥkhamiheṣyate | kṛtākṛtasya tapasaḥ phalaṃ paśyasva yādṛśam
जो इष्ट है उसे सुख कहते हैं और जो अप्रिय है वह यहाँ दुःख माना जाता है। किए हुए और न किए हुए तप का कैसा फल होता है, यह देखो।
श्लोक 28 (12.301.28)
नित्यं भद्राणि पश्यन्ति विषयांश्चोपभुञ्जते । प्राकाश्यं चैवं गच्छन्ति कृत्वा निष्कल्मषं तपः ॥
nityaṃ bhadrāṇi paśyanti viṣayāṃścopabhuñjate | prākāśyaṃ caivaṃ gacchanti kṛtvā niṣkalmaṣaṃ tapaḥ
वे सदा कल्याणकारी वस्तुएँ देखते हैं और विषयों का भोग करते हैं; निष्पाप तप करके वे इस प्रकार प्रसिद्धि को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 29 (12.301.29)
अप्रियाण्यवमानाश्च दुःखं बहुविधात्मकम् । फलार्थी सत्पथं त्यक्त्वा प्राप्नोति विषयात्मकम् ॥
apriyāṇyavamānāśca duḥkhaṃ bahuvidhātmakam | phalārthī satpathaṃ tyaktvā prāpnoti viṣayātmakam
अप्रिय बातें और अपमान अनेक प्रकार का दुःख हैं; फल चाहनेवाला सत्पथ को छोड़कर विषयरूप फल ही पाता है।
श्लोक 30 (12.301.30)
धर्मे तपसि दाने च विचिकित्साऽस्य जायते । स कृत्वा पापकान्येव निरयं प्रतिपद्यते ॥
dharme tapasi dāne ca vicikitsā'sya jāyate | sa kṛtvā pāpakānyeva nirayaṃ pratipadyate
उसके मन में धर्म, तप और दान के विषय में संशय उत्पन्न हो जाता है; वह पाप कर्म ही करके नरक को प्राप्त होता है।
श्लोक 31 (12.301.31)
सुखे तु वर्तमानो वै दुःखे वाऽपि नरोत्तम । सुवृत्ताद्यो न चलते शास्त्रचक्षुः स मानवः ॥
sukhe tu vartamāno vai duḥkhe vā'pi narottama | suvṛttādyo na calate śāstracakṣuḥ sa mānavaḥ
हे नरश्रेष्ठ, जो मनुष्य सुख में रहते हुए या दुःख में भी सदाचार से विचलित नहीं होता और जिसकी आँख शास्त्र है, वही सच्चा मनुष्य है।
श्लोक 32 (12.301.32)
इषुप्रपातमात्रं हि स्पर्शयोगे रतिः स्मृता । रसने दर्शने घ्राणे श्रवणे च विशांपते ॥
iṣuprapātamātraṃ hi sparśayoge ratiḥ smṛtā | rasane darśane ghrāṇe śravaṇe ca viśāṃpate
हे विशाम्पति, स्पर्श के संयोग में सुख केवल बाण के गिरने भर के क्षण का माना गया है; रसना, दर्शन, घ्राण और श्रवण में भी यही बात है।
श्लोक 33 (12.301.33)
ततोऽस्य जायते तीव्रा वेदना तत्क्षयात्पुनः । बुधा ये न प्रशंसन्ति मोक्षं सुखमनुत्तमम् ॥
tato'sya jāyate tīvrā vedanā tatkṣayātpunaḥ | budhā ye na praśaṃsanti mokṣaṃ sukhamanuttamam
फिर उसके समाप्त होने पर उसमें तीव्र पीड़ा उत्पन्न होती है। जो ज्ञानी हैं, वे उसकी प्रशंसा नहीं करते; उनके लिए मोक्ष ही सर्वोत्तम सुख है।
श्लोक 34 (12.301.34)
ततः फलार्थं सर्वस्य भवन्ति ज्यायसे गुणाः । धर्मवृद्ध्या च सततं कामार्थाभ्यां न हीयते ॥
tataḥ phalārthaṃ sarvasya bhavanti jyāyase guṇāḥ | dharmavṛddhyā ca satataṃ kāmārthābhyāṃ na hīyate
फिर फल के लिए सबके गुण किसी बड़े फल की ओर ले जानेवाले होते हैं; और धर्म की वृद्धि से मनुष्य काम और अर्थ से कभी वंचित नहीं होता।
श्लोक 35 (12.301.35)
अप्रयत्नागताः सेव्या गृहस्थैर्विषयाः सदा । प्रयत्नेनोपगम्यश्च स्वधर्म इति मे मतिः ॥
aprayatnāgatāḥ sevyā gṛhasthairviṣayāḥ sadā | prayatnenopagamyaśca svadharma iti me matiḥ
गृहस्थों को चाहिए कि जो विषय बिना प्रयास के आ जाएँ, उन्हीं का सदा सेवन करें; और प्रयत्नपूर्वक अपनाने योग्य अपना धर्म है—यह मेरा मत है।
श्लोक 36 (12.301.36)
मानिनां कुलजातानां नित्यं शास्त्रार्थचक्षुषाम् । क्रियाधर्मविमुक्तानामशक्त्या संवृतात्मनाम् ॥
mānināṃ kulajātānāṃ nityaṃ śāstrārthacakṣuṣām | kriyādharmavimuktānāmaśaktyā saṃvṛtātmanām
जो अभिमानी हैं, अच्छे कुल में जन्मे हैं, सदा शास्त्र के अर्थ को ही आँख बनाए रहते हैं, कर्म के धर्म से मुक्त हैं और असामर्थ्य से जिन्होंने अपने को समेट लिया है—
श्लोक 37 (12.301.37)
क्रियमाणं यदा कर्म नाशं गच्छति मानुषम् । तेषां नान्यदृते लोके तपसः कर्म विद्यते ॥
kriyamāṇaṃ yadā karma nāśaṃ gacchati mānuṣam | teṣāṃ nānyadṛte loke tapasaḥ karma vidyate
—जब मनुष्य द्वारा किया जाता हुआ कर्म नष्ट हो जाता है, तब उनके लिए इस लोक में तप के सिवा दूसरा कोई कर्म नहीं रह जाता।
श्लोक 38 (12.301.38)
सर्वात्मनाऽनुकुर्वीत गृहस्थः कर्मनिश्चयम् । दाक्ष्येण हव्यकव्यार्थं स्वधर्मे विचरन्नृप ॥
sarvātmanā'nukurvīta gṛhasthaḥ karmaniścayam | dākṣyeṇa havyakavyārthaṃ svadharme vicarannṛpa
हे राजन्, गृहस्थ को चाहिए कि अपने धर्म में चलते हुए, कुशलता से देवों और पितरों के निमित्त, पूरे मन से कर्म का निश्चय लेकर उसका अनुकरण करे।
श्लोक 39 (12.301.39)
यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् । एवमाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥
yathā nadīnadāḥ sarve sāgare yānti saṃsthitim | evamāśramiṇaḥ sarve gṛhasthe yānti saṃsthitim
जैसे सब नदियाँ और महानद सागर में जाकर विश्राम पाते हैं, वैसे ही सब आश्रमों के लोग गृहस्थ में जाकर स्थिति पाते हैं।"