शान्ति पर्व · अध्याय 302
जनक के प्रश्न: वर्ण, गोत्र और धर्म पर पराशर
जनक पराशर से पूछते हैं कि वर्णों के भेद कैसे उत्पन्न होते हैं। पराशर बताते हैं कि चारों वर्ण सृष्टिकर्ता के मुख, भुजाओं, जंघाओं और चरणों से उत्पन्न हुए, संकर जातियाँ कैसे बनीं, और निम्न जन्म के मुनि तप से कैसे ब्राह्मण हुए; चार मूल गोत्र हैं और अन्य गोत्र कर्म से बने। वे प्रत्येक वर्ण के विशेष धर्म और सबके सामान्य धर्म बताते हैं, यह भी कि मनुष्य को जाति दूषित करती है या कर्म, और वे अहिंसक कर्म जो अजर स्थान तक ले जाते हैं।
जनक उवाच
श्लोक 1 (12.302.1)
वर्णो विशेषवर्णानां महर्षे केन जायते । एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तद्ब्रूहि वदतां वर ॥
varṇo viśeṣavarṇānāṃ maharṣe kena jāyate | etadicchāmyahaṃ jñātuṃ tadbrūhi vadatāṃ vara
जनक ने कहा: "हे महर्षि, विशिष्ट वर्णों का वर्ण-भेद किससे उत्पन्न होता है? हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, मैं यह जानना चाहता हूँ; मुझे बताइए।
श्लोक 2 (12.302.2)
यदेतज्जायतेऽपत्यं स एवायमिति श्रुतिः । कथं ब्राह्मणतो जातो विशेषग्रहणं गतः ॥
yadetajjāyate'patyaṃ sa evāyamiti śrutiḥ | kathaṃ brāhmaṇato jāto viśeṣagrahaṇaṃ gataḥ
श्रुति कहती है कि जो सन्तान उत्पन्न होती है वह वही होती है जिससे उत्पन्न हुई; तब ब्राह्मण से उत्पन्न होकर भी वह विशेष (भिन्न) संज्ञा को कैसे प्राप्त हो गया?"
पराशर उवाच
श्लोक 3 (12.302.3)
एवमेतन्महाराज येन जातः स एव सः । तपसस्त्वपकर्षेण जातिग्रहणतां गतः ॥
evametanmahārāja yena jātaḥ sa eva saḥ | tapasastvapakarṣeṇa jātigrahaṇatāṃ gataḥ
पराशर ने कहा: "हे महाराज, यह ऐसा ही है—जिससे जो उत्पन्न होता है, वह वही है; किन्तु तप के ह्रास से वह दूसरी जाति के नाम को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 4 (12.302.4)
सुक्षेत्राच्च सुबीजाच्च पुण्यो भवति संभवः । अतोऽन्यतरतो हीनादवरो नाम जायते ॥
sukṣetrācca subījācca puṇyo bhavati saṃbhavaḥ | ato'nyatarato hīnādavaro nāma jāyate
अच्छे खेत और अच्छे बीज से पवित्र जन्म होता है; दोनों में से एक के भी हीन होने पर निम्न सन्तान उत्पन्न होती है।
श्लोक 5 (12.302.5)
वक्त्राद्भुजाभ्यामूरुभ्यां पद्भ्यां चैवाथ जज्ञिरे । सृजतः प्रजापतेर्लोकानिति धर्मविदो विदुः ॥
vaktrādbhujābhyāmūrubhyāṃ padbhyāṃ caivātha jajñire | sṛjataḥ prajāpaterlokāniti dharmavido viduḥ
सृष्टि करते हुए प्रजापति के मुख, भुजाओं, जंघाओं और चरणों से लोग उत्पन्न हुए—ऐसा धर्म को जाननेवाले कहते हैं।
श्लोक 6 (12.302.6)
मुखजा ब्राह्मणास्तात बाहुजाः क्षत्रियाः स्मृताः । ऊरुजा धनिनो राजन्पादजाः परिचारकाः ॥
mukhajā brāhmaṇāstāta bāhujāḥ kṣatriyāḥ smṛtāḥ | ūrujā dhanino rājanpādajāḥ paricārakāḥ
हे तात, ब्राह्मण मुख से उत्पन्न माने गए हैं, क्षत्रिय भुजाओं से; हे राजन्, धनी (वैश्य) जंघाओं से और सेवक चरणों से।
श्लोक 7 (12.302.7)
चतुर्णामेव वर्णानामागमः पुरुषर्षभ । अतोऽन्ये त्वतिरिक्ता ये ते वै संकरजाः स्मृताः ॥
caturṇāmeva varṇānāmāgamaḥ puruṣarṣabha | ato'nye tvatiriktā ye te vai saṃkarajāḥ smṛtāḥ
हे पुरुषश्रेष्ठ, उत्पत्ति चारों वर्णों की ही है; इनके अतिरिक्त जो दूसरे हैं, वे संकर से उत्पन्न माने गए हैं।
श्लोक 8 (12.302.8)
क्षत्रियातिरथाम्बष्ठा उग्रा वैदेहकास्तथा । श्वपाकाः पुल्कसाः स्तेना निषादाः सूतमागधाः ॥
kṣatriyātirathāmbaṣṭhā ugrā vaidehakāstathā | śvapākāḥ pulkasāḥ stenā niṣādāḥ sūtamāgadhāḥ
क्षत्रिय से उत्पन्न अतिरथ, अम्बष्ठ, उग्र, वैदेहक, श्वपाक, पुल्कस, स्तेन, निषाद, सूत और मागध;
श्लोक 9 (12.302.9)
अयोगाः कारणा व्रात्याश्चाण्डालाश्च नराधिप । एते चतुर्भ्यो वर्णेभ्यो जायन्ते वै परस्परात् ॥
ayogāḥ kāraṇā vrātyāścāṇḍālāśca narādhipa | ete caturbhyo varṇebhyo jāyante vai parasparāt
हे नराधिप, आयोग, कारण, व्रात्य और चाण्डाल—ये चारों वर्णों से परस्पर मेल से उत्पन्न होते हैं।"
जनक उवाच
श्लोक 10 (12.302.10)
ब्रह्मणैकेन जातानां नानात्वं गोत्रतः कथम् । बहूनीह हि लोके वै गोत्राणि मुनिसत्तम ॥
brahmaṇaikena jātānāṃ nānātvaṃ gotrataḥ katham | bahūnīha hi loke vai gotrāṇi munisattama
जनक ने कहा: "जो एक ही ब्रह्मा से उत्पन्न हुए हैं, उनमें गोत्र के भेद से नानात्व कैसे है? हे मुनिश्रेष्ठ, संसार में तो बहुत-से गोत्र हैं।
श्लोक 11 (12.302.11)
यत्र तत्र कथं जाताः स्वयोनिं मुनयो गताः । शूद्रयोनौ समुत्पन्ना वियोनौ च तथा परे ॥
yatra tatra kathaṃ jātāḥ svayoniṃ munayo gatāḥ | śūdrayonau samutpannā viyonau ca tathā pare
जहाँ-तहाँ उत्पन्न होकर भी मुनि अपनी योनि (ब्राह्मण-स्थिति) को कैसे प्राप्त हुए? कोई शूद्र-योनि में उत्पन्न हुए और दूसरे अनुचित योनि में।"
पराशर उवाच
श्लोक 12 (12.302.12)
राजन्नैतद्भवेद्ब्राह्ममपकृष्टेन जन्मना । महात्मनां समुत्पत्तिस्तपसा भावितात्मनाम् ॥
rājannaitadbhavedbrāhmamapakṛṣṭena janmanā | mahātmanāṃ samutpattistapasā bhāvitātmanām
पराशर ने कहा: "हे राजन्, नीच जन्म के कारण यह बात ब्राह्मण-भाव के विषय में लागू नहीं होती; तप से शुद्ध आत्मावाले महात्माओं की उत्पत्ति तप से होती है।
श्लोक 13 (12.302.13)
उत्पाद्य पुत्रान्मुनयो नृपते यत्र तत्र ह । स्वेनैव तपसा तेषामृषित्वं विदधुः पुनः ॥
utpādya putrānmunayo nṛpate yatra tatra ha | svenaiva tapasā teṣāmṛṣitvaṃ vidadhuḥ punaḥ
हे राजन्, मुनियों ने जहाँ-तहाँ पुत्र उत्पन्न करके अपने ही तप से बाद में उन्हें ऋषित्व प्रदान किया।
श्लोक 14 (12.302.14)
पितामहश्च मे पूर्वमृश्यशृङ्गश्च काश्यपः । वेदस्ताण्ड्यः कृपश्चैव काक्षीवत्कमठादयः ॥
pitāmahaśca me pūrvamṛśyaśṛṅgaśca kāśyapaḥ | vedastāṇḍyaḥ kṛpaścaiva kākṣīvatkamaṭhādayaḥ
मेरे पितामह, पूर्वकाल में ऋष्यशृंग, काश्यप, वेद, ताण्ड्य, कृप, काक्षीवत्, कमठ आदि—
श्लोक 15 (12.302.15)
यवक्रीतश्च नृपते द्रोणश्च वदतांवरः । आयुर्मतङ्गो दत्तश्च द्रुमदो मात्स्य एव च ॥
yavakrītaśca nṛpate droṇaśca vadatāṃvaraḥ | āyurmataṅgo dattaśca drumado mātsya eva ca
हे राजन्, यवक्रीत, वक्ताओं में श्रेष्ठ द्रोण, आयु, मतंग, दत्त, द्रुमद और मात्स्य भी—
श्लोक 16 (12.302.16)
एते स्वां प्रकृतिं प्राप्ता वैदेह तपसो बलात् । प्रतिष्ठिता वेदविदो दमेन तपसैव हि ॥
ete svāṃ prakṛtiṃ prāptā vaideha tapaso balāt | pratiṣṭhitā vedavido damena tapasaiva hi
हे विदेहराज, ये सब तप के बल से अपने स्वभाव (स्वरूप) को प्राप्त हुए; वेद के ज्ञाता बनकर ये दम और तप से ही प्रतिष्ठित हुए।
श्लोक 17 (12.302.17)
मूलगोत्राणि चत्वारि समुत्पन्नानि पार्थिव । अङ्गिराः कश्यपश्चैव वसिष्ठो भृगुरेव च ॥
mūlagotrāṇi catvāri samutpannāni pārthiva | aṅgirāḥ kaśyapaścaiva vasiṣṭho bhṛgureva ca
हे पार्थिव, चार मूल गोत्र उत्पन्न हुए: अंगिरा, कश्यप, वसिष्ठ और भृगु।
श्लोक 18 (12.302.18)
कर्मतोऽन्यानि गोत्राणि समुत्पन्नानि पार्थिव । नामधेयानि तपसा तानि च ग्रहणं सताम् ॥
karmato'nyāni gotrāṇi samutpannāni pārthiva | nāmadheyāni tapasā tāni ca grahaṇaṃ satām
हे पार्थिव, अन्य गोत्र कर्म से उत्पन्न हुए; उनके नाम तप से मिले और वे सज्जनों द्वारा स्वीकृत हैं।"
जनक उवाच
श्लोक 19 (12.302.19)
विशेषधर्मान्वर्णानां प्रब्रूहि भगवन्मम । ततः सामान्यधर्मांश्च सर्वत्र कुशलो ह्यसि ॥
viśeṣadharmānvarṇānāṃ prabrūhi bhagavanmama | tataḥ sāmānyadharmāṃśca sarvatra kuśalo hyasi
जनक ने कहा: "हे भगवन्, मुझे वर्णों के विशेष धर्म बताइए, और फिर सामान्य धर्म भी; क्योंकि आप सब विषयों में कुशल हैं।"
पराशर उवाच
श्लोक 20 (12.302.20)
प्रतिग्रहो याजनं च तथैवाध्यापनं नृप । विशेषधर्मा विप्राणां रक्षा क्षत्रस्य शोभना ॥
pratigraho yājanaṃ ca tathaivādhyāpanaṃ nṛpa | viśeṣadharmā viprāṇāṃ rakṣā kṣatrasya śobhanā
पराशर ने कहा: "हे राजन्, दान लेना, यज्ञ कराना और पढ़ाना—ये ब्राह्मणों के विशेष धर्म हैं; रक्षा करना क्षत्रिय का उत्तम धर्म है।
श्लोक 21 (12.302.21)
कृषिश्च पाशुपाल्यं च वाणिज्यं च विशामपि । द्विजानां परिचर्या च शूद्रकर्म नराधिप ॥
kṛṣiśca pāśupālyaṃ ca vāṇijyaṃ ca viśāmapi | dvijānāṃ paricaryā ca śūdrakarma narādhipa
हे नराधिप, खेती, पशुपालन और वाणिज्य वैश्यों के कर्म हैं; और द्विजों की सेवा शूद्र का कर्म है।
श्लोक 22 (12.302.22)
विशेषधर्मा नृपते वर्णानां परिकीर्तिताः । धर्मान्साधारणांस्तात विस्तरेण शृणुष्व मे ॥
viśeṣadharmā nṛpate varṇānāṃ parikīrtitāḥ | dharmānsādhāraṇāṃstāta vistareṇa śṛṇuṣva me
हे राजन्, वर्णों के विशेष धर्म कहे गए। हे तात, अब सामान्य धर्म मुझसे विस्तार से सुनो।
श्लोक 23 (12.302.23)
आनृशंस्यमहिंसा चाप्रमादः संविभागिता । श्राद्धकर्मातिथेयं च सत्यमक्रोध एव च ॥
ānṛśaṃsyamahiṃsā cāpramādaḥ saṃvibhāgitā | śrāddhakarmātitheyaṃ ca satyamakrodha eva ca
क्रूरता का अभाव, अहिंसा, सावधानी, बाँटकर भोगना, श्राद्धकर्म, अतिथि-सत्कार, सत्य और क्रोध का अभाव;
श्लोक 24 (12.302.24)
स्वेषु दारेषु संतोषः शौचं नित्याऽनसूयता । आत्मज्ञानं तितिक्षा च धर्माः साधारणा नृप ॥
sveṣu dāreṣu saṃtoṣaḥ śaucaṃ nityā'nasūyatā | ātmajñānaṃ titikṣā ca dharmāḥ sādhāraṇā nṛpa
अपनी पत्नियों में सन्तोष, पवित्रता, सदा दूसरों के गुणों में दोष न देखना, आत्मज्ञान और सहनशीलता—हे राजन्, ये सामान्य धर्म हैं।
श्लोक 25 (12.302.25)
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्त्रयो वर्णा द्विजातयः । अत्र तेषामधीकारो धर्मेषु द्विपदां वर ॥
brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāstrayo varṇā dvijātayaḥ | atra teṣāmadhīkāro dharmeṣu dvipadāṃ vara
हे द्विपदों में श्रेष्ठ, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीन वर्ण द्विज हैं; धर्मों में इन्हीं का अधिकार है।
श्लोक 26 (12.302.26)
विकर्मावस्थिता वर्णाः पतन्ति नृपते त्रयः । उन्नमन्ति यथा सन्त आश्रित्येह स्वकर्मसु ॥
vikarmāvasthitā varṇāḥ patanti nṛpate trayaḥ | unnamanti yathā santa āśrityeha svakarmasu
हे राजन्, विकर्म में स्थित होने पर तीनों वर्ण पतित हो जाते हैं; और अपने कर्मों का आश्रय लेकर वे सज्जनों की तरह ऊपर उठते हैं।
श्लोक 27 (12.302.27)
न चापि शूद्रः पततीति निश्चयो । न चापि संस्कारमिहार्हतीति वा । श्रुतिप्रयुक्तं न च धर्ममाप्नुते । न चास्य धर्मे प्रतिषेधनं कृतम् ॥
na cāpi śūdraḥ patatīti niścayo | na cāpi saṃskāramihārhatīti vā | śrutiprayuktaṃ na ca dharmamāpnute | na cāsya dharme pratiṣedhanaṃ kṛtam
यह निश्चय है कि शूद्र पतित नहीं होता, और न वह यहाँ संस्कारों के योग्य है; वह श्रुति द्वारा विहित धर्म को भी नहीं पाता, फिर भी उसके लिए धर्म का निषेध नहीं किया गया।
श्लोक 28 (12.302.28)
वैदेहकं शूद्रमुदाहरन्ति । द्विजा महाराज श्रुतोपपन्नाः । अहं हि पश्यामि नरेन्द्र देवं । विश्वस्य विष्णुं जगतः प्रधानम् ॥
vaidehakaṃ śūdramudāharanti | dvijā mahārāja śrutopapannāḥ | ahaṃ hi paśyāmi narendra devaṃ | viśvasya viṣṇuṃ jagataḥ pradhānam
हे महाराज, शास्त्रज्ञ द्विज वैदेहक को शूद्र का उदाहरण बताते हैं। परन्तु हे नरेन्द्र, मैं तो विश्व और जगत् के प्रधान देव विष्णु को देखता हूँ।
श्लोक 29 (12.302.29)
सतां वृत्तमधिष्ठाय निहीना उद्दिधीर्षवः । मन्त्रवर्जं न दुष्यन्ति कुर्वाणाः पौष्टिकीः क्रियाः ॥
satāṃ vṛttamadhiṣṭhāya nihīnā uddidhīrṣavaḥ | mantravarjaṃ na duṣyanti kurvāṇāḥ pauṣṭikīḥ kriyāḥ
जो हीन अवस्था के लोग ऊपर उठना चाहते हैं, वे सज्जनों के आचरण को अपनाकर मन्त्रों के बिना पौष्टिक कर्म करें तो दोष के भागी नहीं होते।
श्लोक 30 (12.302.30)
यथायथा हि सद्वृत्तमालम्बन्तीतरे जनाः । तथातथा सुखं प्राप्य प्रेत्य चेह च मोदते ॥
yathāyathā hi sadvṛttamālambantītare janāḥ | tathātathā sukhaṃ prāpya pretya ceha ca modate
दूसरे लोग जैसे-जैसे सदाचार का सहारा लेते हैं, वैसे-वैसे वे सुख पाकर यहाँ और मरने के बाद भी आनन्द पाते हैं।"
जनक उवाच
श्लोक 31 (12.302.31)
किं कर्म दूषयत्येनमथो जातिर्महामुने । संदेहो मे समुत्पन्नस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
kiṃ karma dūṣayatyenamatho jātirmahāmune | saṃdeho me samutpannastanme vyākhyātumarhasi
जनक ने कहा: "हे महामुने, इस मनुष्य को कर्म दूषित करता है या जाति? मुझे संदेह हो गया है; आप उसे समझाइए।"
पराशर उवाच
श्लोक 32 (12.302.32)
असंशयं महाराज उभयं दोषकारकम् । कर्म चैव हि जातिश्च विशेषं तु निशामय ॥
asaṃśayaṃ mahārāja ubhayaṃ doṣakārakam | karma caiva hi jātiśca viśeṣaṃ tu niśāmaya
पराशर ने कहा: "हे महाराज, निःसन्देह दोनों ही दोष के कारण हैं—कर्म भी और जाति भी; पर इनका भेद सुनो।
श्लोक 33 (12.302.33)
जात्या च कर्मणा चैव दुष्टं कर्म निषेवते । जात्या दुष्टश्च यः पापं न करोति स पूरुषः ॥
jātyā ca karmaṇā caiva duṣṭaṃ karma niṣevate | jātyā duṣṭaśca yaḥ pāpaṃ na karoti sa pūruṣaḥ
जो जाति से भी दूषित है और कर्म से भी, वह दूषित कर्म करता है; पर जो जाति से दूषित होकर भी पाप नहीं करता, वही सच्चा पुरुष है।
श्लोक 34 (12.302.34)
जात्या प्रधानं पुरुषं कुर्वाणं कर्म धिक्कृतम् । कर्म तद्दूषयत्येनं तस्मात्कर्म न शोभनम् ॥
jātyā pradhānaṃ puruṣaṃ kurvāṇaṃ karma dhikkṛtam | karma taddūṣayatyenaṃ tasmātkarma na śobhanam
जो जाति से श्रेष्ठ पुरुष निन्दित कर्म करता है, उसे वह कर्म दूषित करता है; इसलिए वह कर्म शोभनीय नहीं है।"
जनक उवाच
श्लोक 35 (12.302.35)
कानि कर्माणि धर्म्याणि लोकेऽस्मिन्द्विजसत्तम । न हिंसन्तीह भूतानि क्रियमाणानि सर्वदा ॥
kāni karmāṇi dharmyāṇi loke'smindvijasattama | na hiṃsantīha bhūtāni kriyamāṇāni sarvadā
जनक ने कहा: "हे द्विजश्रेष्ठ, इस लोक में कौन-से कर्म धर्मसम्मत हैं, जो सदा किए जाने पर भी प्राणियों की हिंसा नहीं करते?"
पराशर उवाच
श्लोक 36 (12.302.36)
शृणु मेऽत्र महाराज यन्मां त्वं परिपृच्छसि । यानि कर्माण्यहिंस्राणि नरं त्रायन्ति सर्वदा ॥
śṛṇu me'tra mahārāja yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi | yāni karmāṇyahiṃsrāṇi naraṃ trāyanti sarvadā
पराशर ने कहा: "हे महाराज, तुम जो मुझसे पूछ रहे हो, उसे सुनो—वे कौन-से अहिंसक कर्म हैं जो मनुष्य की सदा रक्षा करते हैं।
श्लोक 37 (12.302.37)
संन्यस्याग्नीनुदासीनाः पश्यन्ति विगतज्वराः । नैःश्रेयसं कर्मपथं समारुह्य यथाक्रमम् ॥
saṃnyasyāgnīnudāsīnāḥ paśyanti vigatajvarāḥ | naiḥśreyasaṃ karmapathaṃ samāruhya yathākramam
वे अग्नियों का त्याग करके उदासीन होकर, चिन्ता-ज्वर से मुक्त होकर, क्रमशः कल्याण के कर्ममार्ग पर चढ़कर स्पष्ट देखते हैं;
श्लोक 38 (12.302.38)
प्रश्रिता विनयोपेता दमनित्याः सुसंशिताः । प्रयान्ति स्थानमजरं सर्वकर्मविवर्जिताः ॥
praśritā vinayopetā damanityāḥ susaṃśitāḥ | prayānti sthānamajaraṃ sarvakarmavivarjitāḥ
विनम्र, विनय से युक्त, सदा दमशील और तीक्ष्ण व्रतवाले वे सब कर्मों से रहित होकर उस अजर स्थान को जाते हैं।
श्लोक 39 (12.302.39)
सर्वे वर्णा धर्मकार्याणि सम्यक् । कृत्वा राजन्सत्यवाक्यानि चोक्त्वा । त्यक्त्वाधर्मं दारुणं जीवलोके । यान्ति स्वर्गं नात्र कार्यो विचारः ॥
sarve varṇā dharmakāryāṇi samyak | kṛtvā rājansatyavākyāni coktvā | tyaktvādharmaṃ dāruṇaṃ jīvaloke | yānti svargaṃ nātra kāryo vicāraḥ
हे राजन्, सभी वर्ण धर्म-कार्य भली-भाँति करके और सत्य वचन बोलकर, इस जीवलोक में कठोर अधर्म को त्यागकर स्वर्ग को जाते हैं; इसमें विचार की कोई बात नहीं।"