शान्ति पर्व · अध्याय 303
पराशर का उपदेश: मृत्यु, पुनर्जन्म और मनुष्य-जन्म का महत्त्व
पराशर विदेहराज जनक को अपना उपदेश जारी रखते हैं। वे युद्ध में योद्धा के नियम, शरीर और उसकी मृत्यु, पुनर्जन्म, प्राणियों के श्रेष्ठता-क्रम, तथा मृत्यु के उत्तम और साधारण प्रकारों की बात करते हैं। अन्त में वे कहते हैं कि दुर्लभ मनुष्य-जन्म का उपयोग धर्म, दान, तप और परम कल्याण के लिए करना चाहिए। फिर भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि मुनि ने यह सब विदेहराज को सुनाया था।
पराशर उवाच
श्लोक 1 (12.303.1)
पिता सखायो गुरवः स्त्रियश्च । न निर्गुणानां प्रभवन्ति लोके । अनन्यभक्ताः प्रियवादिनश्च । हिताश्च वश्याश्च तथैव राजन् ॥
pitā sakhāyo guravaḥ striyaśca | na nirguṇānāṃ prabhavanti loke | ananyabhaktāḥ priyavādinaśca | hitāśca vaśyāśca tathaiva rājan
पिता, मित्र, गुरु और स्त्रियाँ इस लोक में गुणहीन मनुष्यों पर अधिकार नहीं रखते; किन्तु हे राजन्, जो अनन्य भक्ति रखते हैं, प्रिय बोलते हैं, हितैषी हैं और आज्ञाकारी हैं, उन पर वे अधिकार रखते हैं।
श्लोक 2 (12.303.2)
पिता परं दैवतं मानवानां । मातुर्विशिष्टं पितरं वदन्ति । ज्ञानस्य लाभं परमं वदन्ति । जितेन्द्रियार्थाः परमाप्नुवन्ति ॥
pitā paraṃ daivataṃ mānavānāṃ | māturviśiṣṭaṃ pitaraṃ vadanti | jñānasya lābhaṃ paramaṃ vadanti | jitendriyārthāḥ paramāpnuvanti
पिता मनुष्यों का सबसे बड़ा देवता है; कहते हैं कि पिता माता से भी श्रेष्ठ है। ज्ञान की प्राप्ति को वे परम लाभ कहते हैं, और जिन्होंने इन्द्रियों तथा उनके विषयों को जीत लिया है, वे परम पद को पाते हैं।
श्लोक 3 (12.303.3)
रणाजिरे यत्र शराग्निसंस्तरे । नृपात्मजो घातमवाप्य दह्यते । प्रयाति लोकानमरैः सुदुर्लभा । न्निषेवते स्वर्गफलं यथासुखम् ॥
raṇājire yatra śarāgnisaṃstare | nṛpātmajo ghātamavāpya dahyate | prayāti lokānamaraiḥ sudurlabhā | nniṣevate svargaphalaṃ yathāsukham
जो राजकुमार रणभूमि में, बाणरूपी अग्नि की शय्या पर, घात पाकर भस्म होता है, वह देवताओं के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ लोकों को जाता है और स्वर्ग के फल को सुख से भोगता है।
श्लोक 4 (12.303.4)
श्रान्तं भीतं भ्रष्टशस्त्रं रुदन्तं । पराङ्भुखं पारिवर्हैश्च हीनम् । अनुद्यन्तं रोगिणं याचमानं । न वै हिंस्याद्बालवृद्धौ च राजन् ॥
śrāntaṃ bhītaṃ bhraṣṭaśastraṃ rudantaṃ | parāṅbhukhaṃ pārivarhaiśca hīnam | anudyantaṃ rogiṇaṃ yācamānaṃ | na vai hiṃsyādbālavṛddhau ca rājan
जो थका हो, डरा हो, जिसके शस्त्र गिर गए हों, जो रो रहा हो, पीठ फेर चुका हो, जिसके पास साज-सामान न रहा हो, जो प्रयत्न न कर रहा हो, रोगी हो या याचना कर रहा हो, तथा बालक और वृद्ध को, हे राजन्, कभी नहीं मारना चाहिए।
श्लोक 5 (12.303.5)
पारिबर्हैः सुसंयुक्तमुद्यतं तुल्यतां गतम् । अतिक्रमेत्तं नृपतिः संग्रामे क्षत्रियात्मजम् ॥
pāribarhaiḥ susaṃyuktamudyataṃ tulyatāṃ gatam | atikramettaṃ nṛpatiḥ saṃgrāme kṣatriyātmajam
जो क्षत्रिय साज-सामान से भली-भाँति सम्पन्न हो, शस्त्र उठाए तैयार हो और अपने समान बल का हो, राजा को युद्ध में उसी को जीतना चाहिए।
श्लोक 6 (12.303.6)
तुल्यादिह वधः श्रेयान्विशिष्टाच्चेति निश्चयः । निहीनात्कातराच्चैव कृपणाद्गर्हितो वधः ॥
tulyādiha vadhaḥ śreyānviśiṣṭācceti niścayaḥ | nihīnātkātarāccaiva kṛpaṇādgarhito vadhaḥ
इस लोक में समान या श्रेष्ठ योद्धा का वध करना ही उत्तम है, यह निश्चय है; पर नीच, कायर और दीन का वध निन्दित है।
श्लोक 7 (12.303.7)
पापात्पापसमाचारान्निहीनाच्च नराधिप । पाप एष वधः प्रोक्तो नरकायेति निश्चयः ॥
pāpātpāpasamācārānnihīnācca narādhipa | pāpa eṣa vadhaḥ prokto narakāyeti niścayaḥ
हे नरेश्वर, जो पापी हो, पापाचारी हो या नीच हो, उसका वध पापरूप वध कहा गया है और वह नरक की ओर ले जाता है, यह निश्चय है।
श्लोक 8 (12.303.8)
न कश्चित्त्राति वै राजन्दिष्टान्तवशमागतम् । सावशेषायुषं चापि कश्चिन्नैवापकर्षति ॥
na kaścittrāti vai rājandiṣṭāntavaśamāgatam | sāvaśeṣāyuṣaṃ cāpi kaścinnaivāpakarṣati
हे राजन्, जो मनुष्य अपने नियत अन्त के वश में आ गया है, उसे कोई नहीं बचा सकता; और जिसकी आयु अभी शेष है, उसे भी कोई खींच नहीं ले जा सकता।
श्लोक 9 (12.303.9)
स्निग्धैश्च क्रियमाणानि कर्माणीह निवर्तयेत् । हिंसात्मकानि सर्वाणि नायुरिच्छेत्परायुषा ॥
snigdhaiśca kriyamāṇāni karmāṇīha nivartayet | hiṃsātmakāni sarvāṇi nāyuricchetparāyuṣā
प्रियजन भी जो कर्म कर रहे हों, यदि वे सब हिंसा से भरे हों तो उन्हें रोक देना चाहिए; दूसरे की आयु की कीमत पर अपनी आयु नहीं चाहनी चाहिए।
श्लोक 10 (12.303.10)
गृहस्थानां तु सर्वेषां विनाशमभिकाङ्क्षताम् । निधनं शोभनं तात पुलिनेषु क्रियावताम् ॥
gṛhasthānāṃ tu sarveṣāṃ vināśamabhikāṅkṣatām | nidhanaṃ śobhanaṃ tāta pulineṣu kriyāvatām
हे तात, जो सब गृहस्थ देह-त्याग की कामना करते हैं, उनमें से कर्मनिष्ठ लोगों के लिए पवित्र जल के तटों पर मृत्यु शुभ है।
श्लोक 11 (12.303.11)
आयुषि क्षयमापन्ने पञ्चत्वमुपगच्छति । तथा ह्यकारणाद्भवति कारणैरुपपादितम् ॥
āyuṣi kṣayamāpanne pañcatvamupagacchati | tathā hyakāraṇādbhavati kāraṇairupapāditam
आयु के क्षीण हो जाने पर मनुष्य पंचतत्त्व में विलीन होता है। इस प्रकार यह बिना कारण नहीं होता; यह कारणों से ही घटित होता है।
श्लोक 12 (12.303.12)
तथा शरीरं भवति देहाद्येनोपपादितम् । अध्वानं गतकश्चायं प्राप्तश्चायं गृहाद्गृहम् ॥
tathā śarīraṃ bhavati dehādyenopapāditam | adhvānaṃ gatakaścāyaṃ prāptaścāyaṃ gṛhādgṛham
इसी प्रकार शरीर भी शरीर से ही उत्पन्न होता है; जैसे कोई पथिक मार्ग तय करके एक घर से दूसरे घर पहुँचता है।
श्लोक 13 (12.303.13)
द्वितीयं कारणं तत्र नान्यत्किंचन विद्यते । तद्देहं देहिनां युक्तं मोक्षभूतेषु वर्तते ॥
dvitīyaṃ kāraṇaṃ tatra nānyatkiṃcana vidyate | taddehaṃ dehināṃ yuktaṃ mokṣabhūteṣu vartate
इसमें कोई दूसरा कारण नहीं है, और कुछ भी नहीं। देहधारियों के योग्य वह शरीर मोक्ष की ओर बढ़ते हुए प्राणियों के बीच चलता रहता है।
श्लोक 14 (12.303.14)
शिरास्नाय्वस्थिसंघातं बीभत्सामेध्यसंकुलम् । भूतानामिन्द्रियाणां च गुणानां च समागमम् ॥
śirāsnāyvasthisaṃghātaṃ bībhatsāmedhyasaṃkulam | bhūtānāmindriyāṇāṃ ca guṇānāṃ ca samāgamam
वह नसों, स्नायुओं और हड्डियों का समूह है, घिनौना और अपवित्र वस्तुओं से भरा हुआ, भूतों, इन्द्रियों और गुणों का संगम।
श्लोक 15 (12.303.15)
त्वगन्तं देहमित्याहुर्विद्वांसोऽध्यात्मचिन्तकाः । गुणैरपि परिक्षीणं शरीरं मर्त्यतां गतम् ॥
tvagantaṃ dehamityāhurvidvāṃso'dhyātmacintakāḥ | guṇairapi parikṣīṇaṃ śarīraṃ martyatāṃ gatam
आत्मचिन्तन करने वाले विद्वान् इसे देह कहते हैं, जो त्वचा तक ही सीमित है। गुणों से भी जब यह क्षीण हो जाता है, तब शरीर मरणशील अवस्था को प्राप्त होता है।
श्लोक 16 (12.303.16)
शरीरिणा परित्यक्तं निश्चेष्टं गतचेतनम् । भूतैः प्रकृतिमापन्नैस्ततो भूमौ निमज्जति ॥
śarīriṇā parityaktaṃ niśceṣṭaṃ gatacetanam | bhūtaiḥ prakṛtimāpannaistato bhūmau nimajjati
देहधारी जीव द्वारा त्यागा हुआ, निश्चेष्ट और चेतनारहित वह शरीर, अपने तत्त्वों के प्रकृति में लौट जाने पर, फिर पृथ्वी में समा जाता है।
श्लोक 17 (12.303.17)
भावितं कर्मयोगेन जायते तत्रतत्र ह । इदं शरीरं वैदेह म्रियते यत्रयत्र ह । तत्प्रपाते परो दृष्टो विसर्गः कर्मणस्तथा ॥
bhāvitaṃ karmayogena jāyate tatratatra ha | idaṃ śarīraṃ vaideha mriyate yatrayatra ha | tatprapāte paro dṛṣṭo visargaḥ karmaṇastathā
कर्मयोग से गढ़ा हुआ यह शरीर जहाँ-तहाँ जन्म लेता है। हे वैदेह, यह शरीर जहाँ-जहाँ मरता है, उसके पतन पर कर्म का एक और अन्तिम विसर्जन भी देखा गया है।
श्लोक 18 (12.303.18)
न जायते तु नृपते कंचित्कालमयं पुनः । परिभ्रमति भूतात्मा द्यामिवाम्बुधरो महान् ॥
na jāyate tu nṛpate kaṃcitkālamayaṃ punaḥ | paribhramati bhūtātmā dyāmivāmbudharo mahān
हे राजन्, कुछ समय तक यह फिर जन्म नहीं लेता; जीवात्मा आकाश में विशाल बादल की तरह भटकता फिरता है।
श्लोक 19 (12.303.19)
स पुनर्जायते राजन्प्राप्येहायतनं नृपः । मनसः परमो ह्यात्मा इन्द्रियेभ्यः परं मनः ॥
sa punarjāyate rājanprāpyehāyatanaṃ nṛpaḥ | manasaḥ paramo hyātmā indriyebhyaḥ paraṃ manaḥ
फिर, हे राजन्, यहाँ किसी आश्रय को पाकर वह पुनः जन्म लेता है। आत्मा मन से परे है और मन इन्द्रियों से परे है।
श्लोक 20 (12.303.20)
विविधानां च भूतानां जङ्गमाः परमा नृप । जङ्गमानामपि तथा द्विपदाः परमा मताः । द्विपदानामपि तथा द्विजा वै परमाः स्मृताः ॥
vividhānāṃ ca bhūtānāṃ jaṅgamāḥ paramā nṛpa | jaṅgamānāmapi tathā dvipadāḥ paramā matāḥ | dvipadānāmapi tathā dvijā vai paramāḥ smṛtāḥ
हे राजन्, नाना प्रकार के प्राणियों में चलने वाले श्रेष्ठ हैं; चलने वालों में दोपाये श्रेष्ठ माने गए हैं; और दोपायों में द्विज श्रेष्ठ कहे गए हैं।
श्लोक 21 (12.303.21)
द्विजानामपि राजेन्द्र प्रज्ञावन्तः परा मताः । प्राज्ञानामात्मसंबुद्धाः संबुद्धानाममानिनः ॥
dvijānāmapi rājendra prajñāvantaḥ parā matāḥ | prājñānāmātmasaṃbuddhāḥ saṃbuddhānāmamāninaḥ
हे राजेन्द्र, द्विजों में प्रज्ञावान् श्रेष्ठ माने गए हैं; प्रज्ञावानों में आत्मा को जान लेने वाले; और उनमें भी अभिमान से रहित लोग।
श्लोक 22 (12.303.22)
जातमन्वेति मरणं नृणामिति विनिश्चयः । अन्तवन्ति हि कर्माणि सेवन्ते गुणतः प्रजाः ॥
jātamanveti maraṇaṃ nṛṇāmiti viniścayaḥ | antavanti hi karmāṇi sevante guṇataḥ prajāḥ
जो उत्पन्न हुआ है, मृत्यु उसके पीछे आती है; मनुष्यों के विषय में यही निश्चय है। कर्मों का अन्त होता है, और प्राणी अपने गुणों के अनुसार उनका सेवन करते हैं।
श्लोक 23 (12.303.23)
आपन्ने तूत्तरां काष्ठां सूर्ये यो निधनं व्रजेत् । नक्षत्रे च मुहूर्ते च पुण्ये राजन्स पुण्यकृत् ॥
āpanne tūttarāṃ kāṣṭhāṃ sūrye yo nidhanaṃ vrajet | nakṣatre ca muhūrte ca puṇye rājansa puṇyakṛt
हे राजन्, जो सूर्य के उत्तर की ओर पहुँच जाने पर, शुभ नक्षत्र और पुण्य मुहूर्त में मृत्यु को प्राप्त होता है, वह पुण्यकर्मा है।
श्लोक 24 (12.303.24)
अयोजयित्वा क्लेशेन जनं प्लाव्य च दुष्कृतम् । मृत्युनाऽऽत्मकृतेनेह कर्म कृत्वाऽऽत्मशक्तितः ॥
ayojayitvā kleśena janaṃ plāvya ca duṣkṛtam | mṛtyunā''tmakṛteneha karma kṛtvā''tmaśaktitaḥ
किसी को कष्ट में डाले बिना, अपने दुष्कर्मों को धोकर और अपनी शक्ति भर कर्म करके, वह अपने ही द्वारा रचे हुए मृत्यु-मार्ग से जाता है।
श्लोक 25 (12.303.25)
विषमुद्बन्धनं दाहो दस्युहस्तात्तथा वधः । दंष्ट्रिभ्यश्च पशुभ्यश्च प्राकृतो वध उच्यते ॥
viṣamudbandhanaṃ dāho dasyuhastāttathā vadhaḥ | daṃṣṭribhyaśca paśubhyaśca prākṛto vadha ucyate
विष, फाँसी, अग्नि, डाकुओं के हाथ से वध, और दाढ़ वाले जन्तुओं तथा पशुओं से मृत्यु, ये साधारण मृत्यु कहे जाते हैं।
श्लोक 26 (12.303.26)
न चैभिः पुण्यकर्माणो युज्यन्ते चाभिसंधिजैः । एवंविधैश्च बहुभिरपरैः प्राकृतैरपि ॥
na caibhiḥ puṇyakarmāṇo yujyante cābhisaṃdhijaiḥ | evaṃvidhaiśca bahubhiraparaiḥ prākṛtairapi
पुण्यकर्मा लोग न इनसे जुड़ते हैं, न संकल्प से उत्पन्न मृत्युओं से, और न ऐसे ही अन्य बहुत से साधारण प्रकारों से।
श्लोक 27 (12.303.27)
ऊर्ध्वं भित्त्वा प्रतिष्ठन्ते प्राणाः पुण्यवतां नृप । मध्यतो मध्यपुण्यानामधो दुष्कृतकर्मणाम् ॥
ūrdhvaṃ bhittvā pratiṣṭhante prāṇāḥ puṇyavatāṃ nṛpa | madhyato madhyapuṇyānāmadho duṣkṛtakarmaṇām
हे राजन्, पुण्यात्माओं के प्राण ऊपर की ओर भेदकर निकलते हैं; मध्यम पुण्य वालों के बीच से; और दुष्कर्मियों के नीचे से।
श्लोक 28 (12.303.28)
एकः शत्रुर्न द्वितीयोस्ति शत्रु । रज्ञानतुल्यः पुरुषस्य राजन् । येनावृतः कुरुते संप्रयुक्तो । घोराणि कर्माणि सुदारुणानि ॥
ekaḥ śatrurna dvitīyosti śatru | rajñānatulyaḥ puruṣasya rājan | yenāvṛtaḥ kurute saṃprayukto | ghorāṇi karmāṇi sudāruṇāni
शत्रु एक ही है, दूसरा नहीं: हे राजन्, अज्ञान के समान मनुष्य का कोई शत्रु नहीं। उसी से घिरा हुआ मनुष्य प्रेरित होकर घोर और अत्यन्त दारुण कर्म करता है।
श्लोक 29 (12.303.29)
प्रबोधनार्थं श्रुतिधर्मयुक्तं । वृद्धानुपास्य प्रभवेत यस्य । प्रयत्नसाध्यो हि स राजपुत्र । प्रज्ञाशरेणोन्मथितः परैति ॥
prabodhanārthaṃ śrutidharmayuktaṃ | vṛddhānupāsya prabhaveta yasya | prayatnasādhyo hi sa rājaputra | prajñāśareṇonmathitaḥ paraiti
जो वृद्धजनों की सेवा करके वेद और धर्म से युक्त उस ज्ञान को पा लेता है जो जगाने वाला है, वह राजकुमार प्रयत्न से साध्य है; प्रज्ञा के बाण से बिंधकर वह परम गति को जाता है।
श्लोक 30 (12.303.30)
अधीत्य वेदं तपसा ब्रह्मचारी । यज्ञाञ्शक्त्या सन्निसृज्येह पञ्च । वनं गच्छेत्पुरुषो धर्मकामः । श्रेयः कृत्वा स्थापयित्वा स्ववंशम् ॥
adhītya vedaṃ tapasā brahmacārī | yajñāñśaktyā sannisṛjyeha pañca | vanaṃ gacchetpuruṣo dharmakāmaḥ | śreyaḥ kṛtvā sthāpayitvā svavaṃśam
तप के साथ ब्रह्मचारी रहकर वेद का अध्ययन करके, शक्ति भर पाँचों यज्ञों को सम्पन्न करके, धर्म की कामना वाला पुरुष कल्याणकारी कर्म करने और अपने वंश को स्थापित करने के बाद वन को जाए।
श्लोक 31 (12.303.31)
उपभोगैरपि त्यक्तं नात्मानं सादयेन्नरः । चण्डालत्वेऽपि मानुष्यं सर्वथा तात शोभनम् ॥
upabhogairapi tyaktaṃ nātmānaṃ sādayennaraḥ | caṇḍālatve'pi mānuṣyaṃ sarvathā tāta śobhanam
भोगों से छूट जाने पर भी मनुष्य को अपने आपको गिरने नहीं देना चाहिए। हे तात, चाण्डाल होने पर भी मनुष्य-जन्म सब प्रकार से शुभ है।
श्लोक 32 (12.303.32)
इयं हि योनिः प्रथमा यां प्राप्य जगतीपते । आत्मा वै शक्यते त्रातुं कर्मभिः शुभलक्षणैः ॥
iyaṃ hi yoniḥ prathamā yāṃ prāpya jagatīpate | ātmā vai śakyate trātuṃ karmabhiḥ śubhalakṣaṇaiḥ
यह प्रथम योनि है, जिसे पाकर, हे पृथ्वीपते, जीव संसार में विचरण करता है; शुभ लक्षणों वाले कर्मों से आत्मा की रक्षा की जा सकती है।
श्लोक 33 (12.303.33)
कथं न विप्रणश्येम योनितोस्या इति प्रभो । कुर्वन्ति धर्मं मनुजाः श्रुतिप्रामाण्यदर्शनात् ॥
kathaṃ na vipraṇaśyema yonitosyā iti prabho | kurvanti dharmaṃ manujāḥ śrutiprāmāṇyadarśanāt
“हे प्रभो, इस योनि से हम नष्ट कैसे न हों?” यह सोचकर मनुष्य श्रुति के प्रमाण को देखते हुए धर्म का आचरण करते हैं।
श्लोक 34 (12.303.34)
यो दुर्लभतरं प्राप्य मानुष्यं द्विषते नरः । धर्मावमन्ता कामात्मा भवेत्स खलु वञ्च्यते ॥
yo durlabhataraṃ prāpya mānuṣyaṃ dviṣate naraḥ | dharmāvamantā kāmātmā bhavetsa khalu vañcyate
जो मनुष्य अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर उससे द्वेष करता है, धर्म का अनादर करता है और कामना में डूबा रहता है, वह निश्चय ही ठगा जाता है।
श्लोक 35 (12.303.35)
यस्तु प्रीतिपुराणेन चक्षुषा तात पश्यति । दीपोपमानि भूतानि यावदर्थान्न पश्यति ॥
yastu prītipurāṇena cakṣuṣā tāta paśyati | dīpopamāni bhūtāni yāvadarthānna paśyati
हे तात, जो पुरानी प्रीति की आँख से प्राणियों को दीपक के समान देखता है, और उन्हें अपने प्रयोजन की वस्तु की तरह नहीं देखता,
श्लोक 36 (12.303.36)
सान्त्वेनानुप्रदानेन प्रियवादेन चाप्युत । समदुःखसुखो भूत्वा स परत्र महीयते ॥
sāntvenānupradānena priyavādena cāpyuta | samaduḥkhasukho bhūtvā sa paratra mahīyate
सान्त्वना, दान और प्रिय वचन से, और सुख-दुःख में समान रहकर, वह परलोक में सम्मानित होता है।
श्लोक 37 (12.303.37)
दानं त्यागः शोभना मूर्तिमद्भ्यो । भूयः प्लाव्यं तपसा वै शरीरम् । सरस्वतीनैमिषपुष्करेषु । ये चाप्यन्ये पुण्यदेशाः पृथिव्याम् ॥
dānaṃ tyāgaḥ śobhanā mūrtimadbhyo | bhūyaḥ plāvyaṃ tapasā vai śarīram | sarasvatīnaimiṣapuṣkareṣu | ye cāpyanye puṇyadeśāḥ pṛthivyām
दान और त्याग देहधारियों के लिए शुभ हैं; और तप से शरीर को और भी शुद्ध करना चाहिए, सरस्वती, नैमिष और पुष्कर में, तथा पृथ्वी के जो अन्य पुण्य स्थान हैं उनमें।
श्लोक 38 (12.303.38)
गृहेषु येषामसवः पतन्ति । तेषामथो निर्हरणं प्रशस्तम् । यानेन वै प्रापणं च श्मशाने । शुचौ देशे विधिना चैव दाहः ॥
gṛheṣu yeṣāmasavaḥ patanti | teṣāmatho nirharaṇaṃ praśastam | yānena vai prāpaṇaṃ ca śmaśāne | śucau deśe vidhinā caiva dāhaḥ
जिनके घरों में प्राण छूटते हैं, उनके लिए शव को बाहर ले जाना प्रशस्त है: यान से श्मशान तक ले जाना और पवित्र स्थान में विधि से दाह करना।
श्लोक 39 (12.303.39)
इष्टिः पुष्टिर्यजनं याजनं च । दानं पुण्यानां कर्मणां च प्रयोगः । शक्त्या पित्र्यं यच्च किंचित्प्रशस्तं । सर्वाण्यात्मार्थे मानवोऽयं करोति ॥
iṣṭiḥ puṣṭiryajanaṃ yājanaṃ ca | dānaṃ puṇyānāṃ karmaṇāṃ ca prayogaḥ | śaktyā pitryaṃ yacca kiṃcitpraśastaṃ | sarvāṇyātmārthe mānavo'yaṃ karoti
यज्ञ, पुष्टि-कर्म, यजन और याजन, दान, पुण्य कर्मों का अनुष्ठान, और पितरों के निमित्त शक्ति भर जो कुछ प्रशस्त है, यह सब मनुष्य अपने ही कल्याण के लिए करता है।
श्लोक 40 (12.303.40)
गृहस्थानां च सर्वेषां विनाशमभिकाङ्क्षताम् । निधनं शोभनं तात पुलिनेषु क्रियावताम् ॥
gṛhasthānāṃ ca sarveṣāṃ vināśamabhikāṅkṣatām | nidhanaṃ śobhanaṃ tāta pulineṣu kriyāvatām
हे तात, जो सब गृहस्थ देह-त्याग की कामना करते हैं, उनमें से कर्मनिष्ठ लोगों के लिए पवित्र जल के तटों पर मृत्यु शुभ है।
श्लोक 41 (12.303.41)
धर्मशास्त्राणि वेदाश्च षडङ्गानि नराधिप । श्रेयसोर्थे विधीयन्ते नरस्याक्लिष्टकर्मणः ॥
dharmaśāstrāṇi vedāśca ṣaḍaṅgāni narādhipa | śreyasorthe vidhīyante narasyākliṣṭakarmaṇaḥ
हे नराधिप, धर्मशास्त्र और छह अंगों सहित वेद, क्लेश-रहित कर्म वाले मनुष्य के परम कल्याण के लिए विहित हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 42 (12.303.42)
एतद्वै सर्वमाख्यातं मुनिना सुमहात्मना । विदेहराजाय पुरा श्रेयसोर्थे नराधिप ॥
etadvai sarvamākhyātaṃ muninā sumahātmanā | videharājāya purā śreyasorthe narādhipa
हे नराधिप, यह सब पूर्वकाल में उन महात्मा मुनि ने विदेहराज को परम कल्याण के लिए सुनाया था।