शान्ति पर्व · अध्याय 304
पराशर द्वारा जनक को परम कल्याण के मार्ग का उपदेश
जनक पराशर से पूछते हैं कि परम कल्याण क्या है और कहाँ जाकर मनुष्य नहीं लौटता। पराशर उत्तर देते हैं कि अनासक्ति और ज्ञान उसकी जड़ हैं, सब प्राणियों को दिया गया अभय सबसे बड़ा दान है, और पाप ज्ञानी से नहीं चिपकता। वे बताते हैं कि प्राणी अपने ही कर्मों का फल पाते हैं, कुटुम्ब और मित्रों के सम्बन्ध स्वार्थ पर टिके हैं, और दृढ़ उद्योग तथा श्रद्धा से सिद्धि मिलती है। यह सुनकर जनक आनन्दित होते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.304.1)
पुनरेव तु पप्रच्छ जनको मिथिलाधिपः । पराशरं महात्मानं धर्मे परमनिश्चयम् ॥
punareva tu papraccha janako mithilādhipaḥ | parāśaraṃ mahātmānaṃ dharme paramaniścayam
मिथिला के स्वामी जनक ने धर्म में दृढ़ निश्चय वाले महात्मा पराशर से फिर पूछा।
जनक उवाच
श्लोक 2 (12.304.2)
किं श्रेयः का गतिर्ब्रह्मन्किं कृतं न विनश्यति । क्व गतो न निवर्तेत तन्मे ब्रूहि महामते ॥
kiṃ śreyaḥ kā gatirbrahmankiṃ kṛtaṃ na vinaśyati | kva gato na nivarteta tanme brūhi mahāmate
हे ब्रह्मन्, परम कल्याण क्या है और अन्तिम गति क्या है? कौन-सा किया हुआ कर्म नष्ट नहीं होता? कहाँ जाकर मनुष्य नहीं लौटता? हे महामते, यह मुझे बताइए।
पराशर उवाच
श्लोक 3 (12.304.3)
असङ्गः श्रेयसो मूलं ज्ञानं ज्ञानगतिः परा । चीर्णं तपो न प्रणश्येद्वापः क्षेत्रे न नश्यति ॥
asaṅgaḥ śreyaso mūlaṃ jñānaṃ jñānagatiḥ parā | cīrṇaṃ tapo na praṇaśyedvāpaḥ kṣetre na naśyati
अनासक्ति परम कल्याण की जड़ है; ज्ञान और ज्ञान का मार्ग सर्वोपरि है। एक बार किया हुआ तप नष्ट नहीं होता, जैसे खेत में बोया हुआ बीज नष्ट नहीं होता।
श्लोक 4 (12.304.4)
छित्त्वाऽधर्ममयं पाशं यदा धर्मेऽभिरज्यते । दत्त्वाऽभयकृतं दानं तदा सिद्धिमवाप्नुते ॥
chittvā'dharmamayaṃ pāśaṃ yadā dharme'bhirajyate | dattvā'bhayakṛtaṃ dānaṃ tadā siddhimavāpnute
जब मनुष्य अधर्म से बना पाश काटकर धर्म में रम जाता है और अभयदान दे चुका होता है, तब वह सिद्धि को प्राप्त करता है।
श्लोक 5 (12.304.5)
यो ददाति सहस्राणि गवामश्वशतानि च । अभयं सर्वभूतेभ्यः सदा तमभिवर्तते ॥
yo dadāti sahasrāṇi gavāmaśvaśatāni ca | abhayaṃ sarvabhūtebhyaḥ sadā tamabhivartate
जो हजारों गायें और सैकड़ों घोड़े दान करता है, उसे वह सदा पीछे छोड़ देता है जो सब प्राणियों को अभय देता है।
श्लोक 6 (12.304.6)
वसन्विषयमध्येऽपि न वसत्येव बुद्धिमान् । संवसत्येव दुर्बुद्धिरसत्सु विषयेष्वपि ॥
vasanviṣayamadhye'pi na vasatyeva buddhimān | saṃvasatyeva durbuddhirasatsu viṣayeṣvapi
बुद्धिमान् विषयों के बीच रहता हुआ भी उनमें नहीं रहता; दुर्बुद्धि मनुष्य तो असार विषयों में भी पूरी तरह रमा रहता है।
श्लोक 7 (12.304.7)
नाधर्मः श्लिष्यते प्राज्ञं पयः पुष्करपर्णवत् । अप्राज्ञमधिकं पापं श्लिष्यते जतुकाष्ठवत् ॥
nādharmaḥ śliṣyate prājñaṃ payaḥ puṣkaraparṇavat | aprājñamadhikaṃ pāpaṃ śliṣyate jatukāṣṭhavat
अधर्म ज्ञानी से नहीं चिपकता, जैसे कमल के पत्ते से जल; पर अज्ञानी से महान् पाप चिपक जाता है, जैसे लकड़ी से लाख।
श्लोक 8 (12.304.8)
नाधर्मः कारणापेक्षी कर्तारमभिमुञ्चति । कर्ता खलु यथाकालं ततः समभिपद्यते ॥
nādharmaḥ kāraṇāpekṣī kartāramabhimuñcati | kartā khalu yathākālaṃ tataḥ samabhipadyate
अधर्म किसी कारण की अपेक्षा करके कर्ता को नहीं छोड़ता; कर्ता समय आने पर उसका फल पाता ही है।
श्लोक 9 (12.304.9)
न भिद्यन्ते कृतात्मान आत्मप्रत्ययदर्शिनः । बुद्धिकर्मेन्द्रियाणां हि प्रमत्तो यो न बुध्यते । शुभाशुभे प्रसक्तात्मा प्राप्नोति सुमहद्भयम् ॥
na bhidyante kṛtātmāna ātmapratyayadarśinaḥ | buddhikarmendriyāṇāṃ hi pramatto yo na budhyate | śubhāśubhe prasaktātmā prāpnoti sumahadbhayam
जिनका आत्मा संस्कारित हो चुका है और जो आत्म-निश्चय से देखते हैं, वे विभक्त नहीं होते। पर जो असावधान मनुष्य अपनी बुद्धि, कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को नहीं समझता और जिसका मन शुभ-अशुभ में आसक्त है, वह भारी भय पाता है।
श्लोक 10 (12.304.10)
वीतरागो जितक्रोधः सम्यग्भवति यः सदा । विषये वर्तमानोऽपि न स पापेन युज्यते ॥
vītarāgo jitakrodhaḥ samyagbhavati yaḥ sadā | viṣaye vartamāno'pi na sa pāpena yujyate
जो वीतराग है, जिसने क्रोध को जीत लिया है और जो सदा सम्यक् स्थिति में रहता है, वह विषयों के बीच रहते हुए भी पाप से नहीं बँधता।
श्लोक 11 (12.304.11)
मर्यादायां वर्तमानोऽपि नावसीदति । पुष्टस्रोत इवासक्तः स्फीतो भवति संचयः ॥
maryādāyāṃ vartamāno'pi nāvasīdati | puṣṭasrota ivāsaktaḥ sphīto bhavati saṃcayaḥ
मर्यादा में रहते हुए भी वह नहीं गिरता; पुष्ट धारा वाली नदी की तरह, अनासक्त रहकर, उसका संचय बढ़ता जाता है।
श्लोक 12 (12.304.12)
यथा भानुगतं तेजो मणिः शुद्धः समाधिना । आदत्ते राजशार्दूल तथा योगः प्रवर्तते ॥
yathā bhānugataṃ tejo maṇiḥ śuddhaḥ samādhinā | ādatte rājaśārdūla tathā yogaḥ pravartate
हे राजशार्दूल, जैसे शुद्ध मणि सूर्य के तेज को एकाग्रता से ग्रहण कर लेती है, वैसे ही योग प्रवृत्त होता है।
श्लोक 13 (12.304.13)
यथा तिलानामिह पुष्पसंश्रया । त्पृथक्पृथग्याति गुणोऽतिसौम्यताम् । तथा नराणां भुवि भावितात्मनां । यथाश्रयं सत्वगुणः प्रवर्तते ॥
yathā tilānāmiha puṣpasaṃśrayā | tpṛthakpṛthagyāti guṇo'tisaumyatām | tathā narāṇāṃ bhuvi bhāvitātmanāṃ | yathāśrayaṃ satvaguṇaḥ pravartate
जैसे तिल फूलों के संसर्ग से अलग-अलग फूल की गन्ध अत्यन्त कोमलता से ग्रहण करता है, वैसे ही पृथ्वी पर शुद्ध आत्मा वाले मनुष्यों में सत्त्वगुण अपने आश्रय के अनुसार प्रकट होता है।
श्लोक 14 (12.304.14)
जहाति दारान्विविधाश्च संपदः । पदं च यानं विविधाश्च सत्क्रियाः । त्रिविष्टपे जातमतिर्यदा नर । स्तदाऽस्य बुद्धिर्विषयेषु भिद्यते ॥
jahāti dārānvividhāśca saṃpadaḥ | padaṃ ca yānaṃ vividhāśca satkriyāḥ | triviṣṭape jātamatiryadā nara | stadā'sya buddhirviṣayeṣu bhidyate
जब मनुष्य की बुद्धि स्वर्ग में लग जाती है, तब वह पत्नियों, नाना प्रकार की सम्पत्तियों, पद, सवारी और नाना सत्कर्मों को छोड़ देता है; तब उसकी बुद्धि विषयों से अलग हो जाती है।
श्लोक 15 (12.304.15)
प्रसक्तबुद्धिर्विषयेषु यो नरो । न बुध्यते ह्यात्महितं कथंचन । स सर्वभावानुगतेन चेतसा । नृपाऽऽमिषेणेव झषो विकृष्यते ॥
prasaktabuddhirviṣayeṣu yo naro | na budhyate hyātmahitaṃ kathaṃcana | sa sarvabhāvānugatena cetasā | nṛpā''miṣeṇeva jhaṣo vikṛṣyate
जिस मनुष्य की बुद्धि विषयों में आसक्त है और जो अपने आत्मा के हित को कभी नहीं समझता, उसे सब भावों के पीछे चलने वाला चित्त, हे राजन्, चारे से मछली की तरह खींचता है।
श्लोक 16 (12.304.16)
संघातवन्मर्त्यलोकः परस्परमपाश्रितः । कदलीगर्भनिःसारो नौरिवाप्सु निमज्जति ॥
saṃghātavanmartyalokaḥ parasparamapāśritaḥ | kadalīgarbhaniḥsāro naurivāpsu nimajjati
यह मर्त्य लोक एक संघात-मात्र है, जिसके अंग परस्पर एक-दूसरे पर टिके हैं; केले के तने के भीतर की तरह सारहीन है, और पानी में नाव की तरह डूब जाता है।
श्लोक 17 (12.304.17)
न धर्मकालः पुरुषस्य निश्चितो । न चापि मृत्युः पुरुषं प्रतीक्षते । सदा हि धर्मस्य क्रियैव शोभना । तदा नरो मृत्युमुखान्निवर्तते ॥
na dharmakālaḥ puruṣasya niścito | na cāpi mṛtyuḥ puruṣaṃ pratīkṣate | sadā hi dharmasya kriyaiva śobhanā | tadā naro mṛtyumukhānnivartate
मनुष्य के लिए धर्म का कोई समय निश्चित नहीं है, और मृत्यु भी उसकी प्रतीक्षा नहीं करती। धर्म का आचरण सदा ही शुभ है; उसी से मनुष्य मृत्यु के मुख से लौट आता है।
श्लोक 18 (12.304.18)
यथाऽन्धः स्वगृहे युक्तो ह्यभ्यासादेव गच्छति । तथा युक्तेन मनसा प्राज्ञो गच्छति तां गतिम् ॥
yathā'ndhaḥ svagṛhe yukto hyabhyāsādeva gacchati | tathā yuktena manasā prājño gacchati tāṃ gatim
जैसे अन्धा मनुष्य अपने घर में अभ्यास से ही चलता-फिरता है, वैसे ही ज्ञानी साधे हुए मन से उस गति को पहुँचता है।
श्लोक 19 (12.304.19)
मरणं जन्मनि प्रोक्तं जन्म वै मरणाश्रितम् । अविद्वान्मोक्षधर्मेषु बद्धो भ्रमति चक्रवत् ॥
maraṇaṃ janmani proktaṃ janma vai maraṇāśritam | avidvānmokṣadharmeṣu baddho bhramati cakravat
कहा गया है कि मरण जन्म में है और जन्म मरण पर टिका है। जो मोक्ष-धर्मों को नहीं जानता, वह बँधा हुआ चक्र की तरह घूमता रहता है।
श्लोक 20 (12.304.20)
बुद्धिमार्गप्रयातस्य सुखं त्विह परत्र च । विस्तराः क्लेशसंयुक्ताः संक्षेपास्तु सुखावहाः । परार्थं विस्तराः सर्वे त्यागमात्महितं विदुः ॥
buddhimārgaprayātasya sukhaṃ tviha paratra ca | vistarāḥ kleśasaṃyuktāḥ saṃkṣepāstu sukhāvahāḥ | parārthaṃ vistarāḥ sarve tyāgamātmahitaṃ viduḥ
जो बुद्धि के मार्ग पर चल पड़ा है, उसके लिए यहाँ भी सुख है और परलोक में भी। विस्तार वाले कर्म क्लेश से भरे हैं; संक्षिप्त कर्म सुख देने वाले हैं। सब विस्तार वाले कर्म दूसरों के लिए हैं; त्याग को ही वे अपना हित कहते हैं।
श्लोक 21 (12.304.21)
यथा मृणालानुगतमाशु मुञ्चति कर्दमम् । तथाऽऽत्मा पुरुषस्येह मनसा परिमुच्यते ॥
yathā mṛṇālānugatamāśu muñcati kardamam | tathā''tmā puruṣasyeha manasā parimucyate
जैसे कमलनाल से लगी कीचड़ को मनुष्य झट छुड़ा देता है, वैसे ही पुरुष का आत्मा यहाँ मन के द्वारा मुक्त हो जाता है।
श्लोक 22 (12.304.22)
मनः प्रणयतेऽऽत्मानं स एनमभियुञ्जति । युक्तो यदा स भवति तदा तं पश्यते परम् ॥
manaḥ praṇayate''tmānaṃ sa enamabhiyuñjati | yukto yadā sa bhavati tadā taṃ paśyate param
मन आत्मा को आगे ले चलता है और आत्मा उसे नियुक्त करता है; जब वह साधा हुआ होता है, तब मनुष्य उस परम को देखता है।
श्लोक 23 (12.304.23)
परार्थे वर्तमानस्तु स्वं कार्यं योऽभिमन्यते । इन्द्रियार्थेषु सक्तः स स्वकार्यात्परिहीयते ॥
parārthe vartamānastu svaṃ kāryaṃ yo'bhimanyate | indriyārtheṣu saktaḥ sa svakāryātparihīyate
जो दूसरे के प्रयोजन में लगा रहकर भी उसे अपना कार्य मानता है और इन्द्रियों के विषयों में आसक्त है, वह अपने सच्चे कार्य से गिर जाता है।
श्लोक 24 (12.304.24)
अधस्तिर्यग्गतिं चैव स्वर्गे चैव परां गतिम् । प्राप्नोति सुकृतैरात्मा प्राज्ञस्येहेतरस्य च ॥
adhastiryaggatiṃ caiva svarge caiva parāṃ gatim | prāpnoti sukṛtairātmā prājñasyehetarasya ca
आत्मा अपने कर्मों से नीच या तिर्यक् गति पाता है और स्वर्ग में परम गति पाता है; ज्ञानी के लिए भी यही है और दूसरे के लिए भी।
श्लोक 25 (12.304.25)
मृन्मये भाजने पक्वे यथा वै नश्यति द्रवः । तथा शरीरं तपसा तप्तं विषयमश्नुते ॥
mṛnmaye bhājane pakve yathā vai naśyati dravaḥ | tathā śarīraṃ tapasā taptaṃ viṣayamaśnute
जैसे पके मिट्टी के पात्र में से द्रव नष्ट हो जाता है, वैसे ही तप से तपा हुआ शरीर विषयों को भोगता है।
श्लोक 26 (12.304.26)
विषयानश्नुते यस्तु न स भोक्ष्यत्यसंशयम् । यस्तु भोगांस्त्यजेदात्मा स वै भोक्तुं व्यवस्यति ॥
viṣayānaśnute yastu na sa bhokṣyatyasaṃśayam | yastu bhogāṃstyajedātmā sa vai bhoktuṃ vyavasyati
जो विषयों को खाता है, वह निःसन्देह कभी भोग नहीं पाएगा; पर जो आत्मा भोगों को त्याग देता है, वही वास्तव में भोगने का निश्चय करता है।
श्लोक 27 (12.304.27)
नीहारेण हि संवीतः शिश्नोदरपरायणः । जात्यन्ध इव पन्थानमावृतात्मा न बुध्यते ॥
nīhāreṇa hi saṃvītaḥ śiśnodaraparāyaṇaḥ | jātyandha iva panthānamāvṛtātmā na budhyate
कुहरे से ढका हुआ, पेट और जननेन्द्रिय में लगा हुआ, आवृत आत्मा वाला मनुष्य जन्म से अन्धे की तरह मार्ग को नहीं देखता।
श्लोक 28 (12.304.28)
वणिग्यथा समुद्राद्वै यथार्थं लभते धनम् । तथा मर्त्यार्णवाज्जन्तोः कर्मविज्ञानतो गतिः ॥
vaṇigyathā samudrādvai yathārthaṃ labhate dhanam | tathā martyārṇavājjantoḥ karmavijñānato gatiḥ
जैसे वणिक् समुद्र से अपने उद्यम के अनुसार धन पाता है, वैसे ही मर्त्यलोक के सागर में प्राणी की गति कर्म के ज्ञान के अनुसार होती है।
श्लोक 29 (12.304.29)
अहोरात्रमये लोके जरारूपेण संचरन् । मृत्युर्ग्रसति भूतानि पवनं पन्नगो यथा ॥
ahorātramaye loke jarārūpeṇa saṃcaran | mṛtyurgrasati bhūtāni pavanaṃ pannago yathā
दिन-रात से बने इस लोक में मृत्यु जरा का रूप लेकर विचरती हुई प्राणियों को निगलती है, जैसे सर्प वायु को।
श्लोक 30 (12.304.30)
स्वयं कृतानि कर्माणि जातो जन्तुः प्रपद्यते । नाकृतं लभते कश्चित्किंचिदत्र प्रियाप्रियम् ॥
svayaṃ kṛtāni karmāṇi jāto jantuḥ prapadyate | nākṛtaṃ labhate kaścitkiṃcidatra priyāpriyam
जन्म लेकर प्राणी अपने ही किए हुए कर्मों को पाता है; यहाँ कोई भी बिना किए हुए प्रिय या अप्रिय को कुछ भी नहीं पाता।
श्लोक 31 (12.304.31)
शयानं यान्तमासीनं प्रवृत्तं विषयेषु च । शुभाशुभानि कर्माणि प्रपद्यन्ते नरं सदा ॥
śayānaṃ yāntamāsīnaṃ pravṛttaṃ viṣayeṣu ca | śubhāśubhāni karmāṇi prapadyante naraṃ sadā
चाहे वह लेटा हो, चलता हो या बैठा हो, या विषयों में लगा हो, शुभ और अशुभ कर्म मनुष्य के पीछे सदा लगे रहते हैं।
श्लोक 32 (12.304.32)
न ह्यन्यत्तीरमासाद्य पुनस्तर्तुं व्यवस्यति । दुर्लभो दृश्यते ह्यस्य विनिपातो महार्णवे ॥
na hyanyattīramāsādya punastartuṃ vyavasyati | durlabho dṛśyate hyasya vinipāto mahārṇave
दूसरे तट पर पहुँचकर कोई फिर पार करने का प्रयत्न नहीं करता; क्योंकि महासागर में उसका गिरना दुर्लभ देखा जाता है।
श्लोक 33 (12.304.33)
यथा भारावसन्ना हि नौर्महाम्भसि तन्तुना । यथा मनोभियोगाद्वै शरीरं प्रचिकीर्षति ॥
yathā bhārāvasannā hi naurmahāmbhasi tantunā | yathā manobhiyogādvai śarīraṃ pracikīrṣati
जैसे बोझ से दबी नाव बड़ी जलराशि में रस्सी से खिंचती है, वैसे ही मन की प्रेरणा से शरीर कर्म में प्रवृत्त होता है।
श्लोक 34 (12.304.34)
यथा समुद्रमभितः संश्रिताः सरितोऽपराः । तथाऽन्याप्रकृतिर्योगादभिसंश्रियते सदा ॥
yathā samudramabhitaḥ saṃśritāḥ sarito'parāḥ | tathā'nyāprakṛtiryogādabhisaṃśriyate sadā
जैसे चारों ओर से अन्य नदियाँ समुद्र का आश्रय लेती हैं, वैसे ही दूसरी प्रकृति योग से सदा उससे जुड़ती है।
श्लोक 35 (12.304.35)
स्नेहपाशैर्बहुविधैरासक्तमनसो नराः । प्रकृतिस्था विषीदन्ति जले सैकतवेश्मवत् ॥
snehapāśairbahuvidhairāsaktamanaso narāḥ | prakṛtisthā viṣīdanti jale saikataveśmavat
अनेक प्रकार के स्नेह-पाशों में बँधे मन वाले, अपनी प्रकृति में स्थित मनुष्य पानी में बालू के घर की तरह डूब जाते हैं।
श्लोक 36 (12.304.36)
शरीरगृहसंस्थस्य शौचतीर्थस्य देहिनः । बुद्धिमार्गप्रयातस्य सुखं त्विह परत्र च ॥
śarīragṛhasaṃsthasya śaucatīrthasya dehinaḥ | buddhimārgaprayātasya sukhaṃ tviha paratra ca
शरीररूपी घर में रहने वाले, शौच ही जिसका तीर्थ है, और बुद्धि के मार्ग पर चल पड़े देहधारी के लिए यहाँ भी सुख है और परलोक में भी।
श्लोक 37 (12.304.37)
विस्तराः क्लेशसंयुक्ताः संक्षेपास्तु सुखावहाः । परार्थं विस्तराः सर्वे त्यागमात्महितं विदुः ॥
vistarāḥ kleśasaṃyuktāḥ saṃkṣepāstu sukhāvahāḥ | parārthaṃ vistarāḥ sarve tyāgamātmahitaṃ viduḥ
विस्तार वाले कर्म क्लेश से भरे हैं; संक्षिप्त कर्म सुख देने वाले हैं। सब विस्तार वाले कर्म दूसरों के लिए हैं; त्याग को ही वे अपना हित कहते हैं।
श्लोक 38 (12.304.38)
संकल्पजो मित्रवर्गो ज्ञातयः कारणात्मकाः । भार्या पुत्रश्च दासश्च स्वमर्थमनुयुञ्जते ॥
saṃkalpajo mitravargo jñātayaḥ kāraṇātmakāḥ | bhāryā putraśca dāsaśca svamarthamanuyuñjate
मित्रों का समूह संकल्प से उत्पन्न होता है; सम्बन्धी किसी कारण से बने होते हैं; पत्नी, पुत्र और दास अपना-अपना स्वार्थ साधते हैं।
श्लोक 39 (12.304.39)
न माता न पिता किंचित्कस्यचित्प्रतिपद्यते । दानपथ्यौदनो जन्तुः स्वकर्मफलमश्नुते ॥
na mātā na pitā kiṃcitkasyacitpratipadyate | dānapathyaudano jantuḥ svakarmaphalamaśnute
न माता, न पिता किसी को कुछ देता है; जिसका मार्ग का पाथेय दान है, वह प्राणी अपने ही कर्मों का फल भोगता है।
श्लोक 40 (12.304.40)
माता पुत्रः पिता भ्राता भार्या मित्रजनस्तथा । अष्टापदपदस्थाने लाक्षामुद्रेव लक्ष्यते ॥
mātā putraḥ pitā bhrātā bhāryā mitrajanastathā | aṣṭāpadapadasthāne lākṣāmudreva lakṣyate
माता, पुत्र, पिता, भाई, पत्नी और मित्रजन अष्टापद की चौसर पर रखी लाख की गोटियों की तरह दिखाई देते हैं।
श्लोक 41 (12.304.41)
सर्वाणि कर्माणि पुराकृतानि । शुभाशुभान्यात्मनो यान्ति जन्तोः । उपस्थितं कर्मफलं विदित्वा । बुद्धिं तथा चोदयतेऽन्तरात्मा ॥
sarvāṇi karmāṇi purākṛtāni | śubhāśubhānyātmano yānti jantoḥ | upasthitaṃ karmaphalaṃ viditvā | buddhiṃ tathā codayate'ntarātmā
पहले किए हुए सब शुभ और अशुभ कर्म प्राणी के साथ जाते हैं; कर्म के फल को उपस्थित जानकर अन्तरात्मा बुद्धि को उसी के अनुसार प्रेरित करता है।
श्लोक 42 (12.304.42)
व्यवसायं समाश्रित्य सहायान्योऽधिगच्छति । न तस्य कश्चिदारम्भः कदाचिदवसीदति ॥
vyavasāyaṃ samāśritya sahāyānyo'dhigacchati | na tasya kaścidārambhaḥ kadācidavasīdati
जो दृढ़ उद्योग का आश्रय लेकर सहायकों को पा लेता है, उसका कोई भी आरम्भ कभी विफल नहीं होता।
श्लोक 43 (12.304.43)
अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम् । न श्रीः संत्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः ॥
advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam | na śrīḥ saṃtyajate nityamādityamiva raśmayaḥ
जो एकाग्र मन वाला, संयमी, शूर, धीर और विद्वान् है, उसे लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ती, जैसे किरणें सूर्य को नहीं छोड़तीं।
श्लोक 44 (12.304.44)
आस्तिक्यव्यवसायाभ्यामुपायान्वितया धिया । य आरभत्यनिन्द्यात्मा न सोऽर्थात्परिसीदति ॥
āstikyavyavasāyābhyāmupāyānvitayā dhiyā | ya ārabhatyanindyātmā na so'rthātparisīdati
जो निर्दोष आत्मा वाला श्रद्धा और दृढ़ निश्चय के साथ, उपाय से युक्त बुद्धि लेकर कार्य आरम्भ करता है, वह अपने लक्ष्य से कभी नहीं गिरता।
श्लोक 45 (12.304.45)
सर्वःस्वानि शुभाशुभानि नियतं कर्माणि जन्तुःस्वयं । गर्भात्संप्रतिपद्यते तदुभयं यत्तेन पूर्वं कृतम् । मृत्युश्चापरिहारवान्समगतिः कालेन विच्छेदिना । दारोश्चूर्णमिवाश्मसारविहितं कर्मान्तिकं प्रापयेत् ॥
sarvaḥsvāni śubhāśubhāni niyataṃ karmāṇi jantuḥsvayaṃ | garbhātsaṃpratipadyate tadubhayaṃ yattena pūrvaṃ kṛtam | mṛtyuścāparihāravānsamagatiḥ kālena vicchedinā | dāroścūrṇamivāśmasāravihitaṃ karmāntikaṃ prāpayet
हर प्राणी गर्भ से ही अपने शुभ और अशुभ कर्मों को स्वयं प्राप्त करता है, दोनों को, जो उसने पहले किए हैं; और अपरिहार्य मृत्यु, समान गति वाली, छेदने वाले काल के साथ, उसे कर्म के अन्त तक पहुँचा देती है, जैसे लोहे की आरी से काटी हुई लकड़ी चूर्ण हो जाती है।
श्लोक 46 (12.304.46)
स्वरूपतामात्मकृतं च विस्तरं । कुलान्वयं द्रव्यसमृद्धिसंचयम् । नरो हि सर्वो लभते यथाकृतं । शुभाशुभेनात्मकृतेन कर्मणा ॥
svarūpatāmātmakṛtaṃ ca vistaraṃ | kulānvayaṃ dravyasamṛddhisaṃcayam | naro hi sarvo labhate yathākṛtaṃ | śubhāśubhenātmakṛtena karmaṇā
अपने ही बनाए रूप और स्थिति को, विस्तार को, कुल-परम्परा को और धन की समृद्धि के संचय को, हर मनुष्य अपने किए हुए शुभ या अशुभ कर्म के अनुसार पाता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 47 (12.304.47)
इत्युक्तो जनको राजन्याथातथ्यं मनीषिणा । श्रुत्वा धर्मविदां श्रेष्ठः परां मुदमवाप ह ॥
ityukto janako rājanyāthātathyaṃ manīṣiṇā | śrutvā dharmavidāṃ śreṣṭhaḥ parāṃ mudamavāpa ha
हे राजन्, ज्ञानी पराशर के द्वारा यथार्थ बात कही जाने पर धर्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ जनक ने सुनकर परम आनन्द पाया।