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शान्ति पर्व · अध्याय 305

हंस और साध्य देवताओं का संवाद

युधिष्ठिर सत्य, दम, क्षमा और प्रज्ञा की प्रशंसा के विषय में पूछते हैं। भीष्म एक प्राचीन कथा सुनाते हैं: सुनहरे हंस के रूप में प्रजापति से साध्य देवता उस एक कर्तव्य के बारे में पूछते हैं जो मनुष्य को सब बन्धनों से छुड़ाता है। हंस गाली सहने की क्षमा, वाणी, मन और अन्य द्वारों की रक्षा, सत्य की पवित्रता और संगति के प्रभाव का उपदेश देता है, और साध्यों के प्रश्नों का उत्तर देता है कि लोक किससे ढका है और ब्राह्मण का देवत्व क्या है।

अध्याय 304अध्याय-सूचीअध्याय 306

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.305.1)

सत्यं दमं क्षमां प्रज्ञां प्रशंसन्ति पितामह । विद्वांसो मनुजा लोके कथमेतन्मतं तव ॥

satyaṃ damaṃ kṣamāṃ prajñāṃ praśaṃsanti pitāmaha | vidvāṃso manujā loke kathametanmataṃ tava

हे पितामह, संसार के विद्वान् सत्य, दम, क्षमा और प्रज्ञा की प्रशंसा करते हैं। इस विषय में आपका क्या मत है?

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (12.305.2)

अत्र ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् । साध्यानामिह संवादं हंसस्य च युधिष्ठिर ॥

atra te vartayiṣye'hamitihāsaṃ purātanam | sādhyānāmiha saṃvādaṃ haṃsasya ca yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, इस विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ: साध्य देवताओं और हंस का संवाद।

श्लोक 3 (12.305.3)

हंसो भूत्वाऽथ सौवर्णस्त्वजो नित्यः प्रजापतिः । स वै पर्येति लोकांस्त्रीनथ साध्यानुपागमत् ॥

haṃso bhūtvā'tha sauvarṇastvajo nityaḥ prajāpatiḥ | sa vai paryeti lokāṃstrīnatha sādhyānupāgamat

नित्य, अजन्मा प्रजापति सुनहरे हंस का रूप धरकर तीनों लोकों में विचरते हुए साध्य देवताओं के पास आया।

साध्या ऊचुः

श्लोक 4 (12.305.4)

शकुने वयं स्म देवा वै साध्यास्त्वामनुयुङ्क्ष्महे । पृच्छामस्त्वां मोक्षधर्मं भवांश्च किल मोक्षवित् ॥

śakune vayaṃ sma devā vai sādhyāstvāmanuyuṅkṣmahe | pṛcchāmastvāṃ mokṣadharmaṃ bhavāṃśca kila mokṣavit

“हे पक्षी, हम देवता हैं, साध्य हैं, और आपसे प्रश्न करते हैं। हम आपसे मोक्षधर्म पूछते हैं, क्योंकि कहा जाता है कि आप मोक्ष को जानने वाले हैं।”

श्लोक 5 (12.305.5)

श्रुतोसि नः पण्डितो धीरवादी । साधुः शब्दश्चरते ते पतत्रिन् । किं मन्यसे श्रेष्ठतमं द्विज त्वं । कस्मिन्मनस्ते रमते महात्मन् ॥

śrutosi naḥ paṇḍito dhīravādī | sādhuḥ śabdaścarate te patatrin | kiṃ manyase śreṣṭhatamaṃ dvija tvaṃ | kasminmanaste ramate mahātman

“हमने आपको पण्डित और धीर वक्ता के रूप में सुना है। हे पतत्रिन्, आपकी साधु कीर्ति सर्वत्र फैली है। हे द्विज, आप सबसे श्रेष्ठ किसे मानते हैं? हे महात्मन्, आपका मन किसमें रमता है?”

श्लोक 6 (12.305.6)

तन्नः कार्यं पक्षिवर प्रशाधि । यत्कार्याणां मन्यसे श्रेष्ठमेकम् । यत्कृत्वा वै पुरुषः सर्वबन्धै । र्विमुच्यते विहगेन्द्रेह शीघ्रम् ॥

tannaḥ kāryaṃ pakṣivara praśādhi | yatkāryāṇāṃ manyase śreṣṭhamekam | yatkṛtvā vai puruṣaḥ sarvabandhai | rvimucyate vihagendreha śīghram

“इसलिए, हे पक्षिश्रेष्ठ, हमें उस एक कर्तव्य का उपदेश दीजिए जिसे आप सब कर्तव्यों में श्रेष्ठ मानते हैं, जिसे करके मनुष्य, हे विहगेन्द्र, सब बन्धनों से शीघ्र छूट जाता है।”

हंस उवाच

श्लोक 7 (12.305.7)

इदं कार्यममृताशाः शृणुध्वं । तपो दमः सत्यमात्माभिगुप्तिः । ग्रन्थीन्विमुच्य हृदयस्य सर्वा । न्प्रियाप्रिये स्वं वशमानयीत ॥

idaṃ kāryamamṛtāśāḥ śṛṇudhvaṃ | tapo damaḥ satyamātmābhiguptiḥ | granthīnvimucya hṛdayasya sarvā | npriyāpriye svaṃ vaśamānayīta

हे अमृत की आशा रखने वालो, यह कर्तव्य सुनो: तप, दम, सत्य और आत्मा की रक्षा। हृदय की सब गाँठें खोलकर प्रिय और अप्रिय दोनों को अपने वश में कर लेना चाहिए।

श्लोक 8 (12.305.8)

नारुतुदः स्यान्न नृशंसवादी । न हीनतः परमभ्याददीत । ययाऽस्य वाचा पर उद्विजेत । न तां वदेद्रुशतीं पापलोक्याम् ॥

nārutudaḥ syānna nṛśaṃsavādī | na hīnataḥ paramabhyādadīta | yayā'sya vācā para udvijeta | na tāṃ vadedruśatīṃ pāpalokyām

वह दूसरों के मर्म को बेधने वाला न हो, न क्रूर बोलने वाला; वह नीच उपाय से दूसरे से कुछ न ले। जिस वाणी से दूसरा उद्विग्न हो और जो पापलोकों की ओर ले जाती है, वह कठोर वाणी न बोले।

श्लोक 9 (12.305.9)

वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति । यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य नामर्मसु ते पतन्ति । तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु ॥

vāksāyakā vadanānniṣpatanti | yairāhataḥ śocati rātryahāni | parasya nāmarmasu te patanti | tānpaṇḍito nāvasṛjetpareṣu

वाणी के बाण मुख से निकलते हैं; उनसे घायल मनुष्य रात-दिन शोक करता है। वे दूसरे के मर्मस्थलों पर गिरते हैं; ज्ञानी उन्हें दूसरों पर नहीं छोड़ता।

श्लोक 10 (12.305.10)

परश्चेदेनमतिवादबाणै । र्भृशं विध्येच्छम एवेह कार्यः । संरोष्यमाणः प्रतिहृष्यते यः । स आदत्ते सुकृतं वै परस्य ॥

paraścedenamativādabāṇai | rbhṛśaṃ vidhyecchama eveha kāryaḥ | saṃroṣyamāṇaḥ pratihṛṣyate yaḥ | sa ādatte sukṛtaṃ vai parasya

यदि दूसरा उसे निन्दा के बाणों से बहुत बेधे, तो यहाँ शान्ति ही उसका कर्तव्य है। जो क्रोध दिलाए जाने पर भी प्रसन्न रहता है, वह दूसरे के पुण्य को ले लेता है।

श्लोक 11 (12.305.11)

क्षेपायमाणमभिषङ्गव्यलीकं । निगृह्णाति ज्वलितं यश्च मन्युम् । अदुष्टचेता मुदितोऽनसूयुः । स आदत्ते सुकृतं वै परेषाम् ॥

kṣepāyamāṇamabhiṣaṅgavyalīkaṃ | nigṛhṇāti jvalitaṃ yaśca manyum | aduṣṭacetā mudito'nasūyuḥ | sa ādatte sukṛtaṃ vai pareṣām

जो निन्दा और अपमान की चोट से उठे अपने प्रज्वलित क्रोध को रोक लेता है, निर्मल चित्त, प्रसन्न और ईर्ष्यारहित रहता है, वह दूसरों के पुण्य को ले लेता है।

श्लोक 12 (12.305.12)

आक्रुश्यमानो न वदामि किंचि । त्क्षमाम्यहं ताड्यमानश्च नित्यम् । श्रेष्ठं ह्येतद्यत्क्षमामाहुरार्याः । सत्यं तथैवार्जवमानृशंस्यम् ॥

ākruśyamāno na vadāmi kiṃci | tkṣamāmyahaṃ tāḍyamānaśca nityam | śreṣṭhaṃ hyetadyatkṣamāmāhurāryāḥ | satyaṃ tathaivārjavamānṛśaṃsyam

“गाली दिए जाने पर मैं कुछ नहीं कहता; पीटे जाने पर भी मैं सदा क्षमा करता हूँ। यही श्रेष्ठ है, जिसे आर्य क्षमा कहते हैं, और वैसे ही सत्य, सरलता और क्रूरता का अभाव।”

श्लोक 13 (12.305.13)

वेदस्योपनिषत्सत्यं सत्यस्योपनिषद्दमः । दमस्योपनिषन्मोक्ष एतत्सर्वानुशासनम् ॥

vedasyopaniṣatsatyaṃ satyasyopaniṣaddamaḥ | damasyopaniṣanmokṣa etatsarvānuśāsanam

वेद का रहस्य सत्य है; सत्य का रहस्य दम है; दम का रहस्य मोक्ष है। यही सम्पूर्ण उपदेश है।

श्लोक 14 (12.305.14)

वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं । विधित्सावेगमुदरोपस्थवेगम् । एतान्वेगान्यो विषहेदुदीर्णां । स्तं मन्येऽहं ब्राह्मणं वै मुनिं च ॥

vāco vegaṃ manasaḥ krodhavegaṃ | vidhitsāvegamudaropasthavegam | etānvegānyo viṣahedudīrṇāṃ | staṃ manye'haṃ brāhmaṇaṃ vai muniṃ ca

वाणी का वेग, क्रोध का वेग, तृष्णा का वेग, उदर और उपस्थ का वेग: जो इन उठे हुए वेगों को सह लेता है, उसे मैं सच्चा ब्राह्मण और मुनि मानता हूँ।

श्लोक 15 (12.305.15)

अक्रोधनः क्रुध्यतां वै विशिष्ट । स्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्टः । अमानुषान्मानुषो वै विशिष्ट । स्तथाऽज्ञानाज्ज्ञानवान्वै विशिष्टः ॥

akrodhanaḥ krudhyatāṃ vai viśiṣṭa | stathā titikṣuratitikṣorviśiṣṭaḥ | amānuṣānmānuṣo vai viśiṣṭa | stathā'jñānājjñānavānvai viśiṣṭaḥ

क्रोध करने वालों से क्रोध न करने वाला श्रेष्ठ है; इसी प्रकार असहनशील से सहनशील श्रेष्ठ है; अमानुष से मनुष्य श्रेष्ठ है, और अज्ञानी से ज्ञानवान् श्रेष्ठ है।

श्लोक 16 (12.305.16)

आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेवं तितिक्षतः । आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ॥

ākruśyamāno nākrośenmanyurevaṃ titikṣataḥ | ākroṣṭāraṃ nirdahati sukṛtaṃ cāsya vindati

गाली दिए जाने पर गाली नहीं देनी चाहिए; सहने वाले का क्रोध गाली देने वाले को जला देता है और उसका पुण्य उसे मिल जाता है।

श्लोक 17 (12.305.17)

यो नात्युक्तः प्राह रूक्षं प्रियं वा । यो वा हतो न प्रतिहन्ति धैर्यात् । पापं च यो नेच्छति तस्य हन्तु । स्तस्येह देवाः स्पृहयन्ति नित्यम् ॥

yo nātyuktaḥ prāha rūkṣaṃ priyaṃ vā | yo vā hato na pratihanti dhairyāt | pāpaṃ ca yo necchati tasya hantu | stasyeha devāḥ spṛhayanti nityam

जो अत्यन्त निन्दित होने पर भी न कठोर बोलता है न मीठी चापलूसी, जो मारे जाने पर धैर्य से पलटकर नहीं मारता, और मारने वाले का भी बुरा नहीं चाहता, उसकी देवता सदा स्पृहा करते हैं।

श्लोक 18 (12.305.18)

पापीयसः क्षमेतैव श्रेयसः सदृशस्य च । विमानितो हतोक्रुष्ट एवं सिद्धिं गमिष्यति ॥

pāpīyasaḥ kṣametaiva śreyasaḥ sadṛśasya ca | vimānito hatokruṣṭa evaṃ siddhiṃ gamiṣyati

अपने से नीच को क्षमा करना चाहिए, श्रेष्ठ को भी और समान को भी। अपमानित, पीटा गया और गाली दिया गया मनुष्य इसी प्रकार सिद्धि पाएगा।

श्लोक 19 (12.305.19)

सदाऽहमार्यान्निभृतोप्युपासे । न मे विधित्सोत्सहते न रोषः । न चाप्यहं लिप्समानः परैमि । न चैव किंचिद्विषमेण यामि ॥

sadā'hamāryānnibhṛtopyupāse | na me vidhitsotsahate na roṣaḥ | na cāpyahaṃ lipsamānaḥ paraimi | na caiva kiṃcidviṣameṇa yāmi

शान्त रहते हुए भी मैं सदा आर्यजनों की उपासना करता हूँ। मेरे भीतर न कर्म-तृष्णा उठती है, न क्रोध; मैं लोभ से धर्म को नहीं छोड़ता, और न किसी बात में टेढ़े मार्ग से जाता हूँ।

श्लोक 20 (12.305.20)

नाहं शप्तः प्रतिशपामि कंचि । द्दमं द्वारं ह्यमृतस्येह वेद्मि । गुह्यं ब्रह्म तदिदं ब्रवीमि । न मानुषाच्छ्रेष्ठतरं हि किंचित् ॥

nāhaṃ śaptaḥ pratiśapāmi kaṃci | ddamaṃ dvāraṃ hyamṛtasyeha vedmi | guhyaṃ brahma tadidaṃ bravīmi | na mānuṣācchreṣṭhataraṃ hi kiṃcit

“शाप पाकर भी मैं किसी को प्रतिशाप नहीं देता। मैं जानता हूँ कि दम ही यहाँ अमृत का द्वार है। मैं तुमसे यह गुप्त ब्रह्म कहता हूँ: मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है।”

श्लोक 21 (12.305.21)

निर्मुच्यमानः पापेभ्यो घनेभ्य इव चन्द्रमाः । विरजाः कालमाकाङ्क्षन्धीरो धैर्येण सिध्यति ॥

nirmucyamānaḥ pāpebhyo ghanebhya iva candramāḥ | virajāḥ kālamākāṅkṣandhīro dhairyeṇa sidhyati

जैसे चन्द्रमा घने बादलों से मुक्त होता है, वैसे ही पापों से मुक्त, निर्मल धीर पुरुष अपने समय की प्रतीक्षा करता हुआ धैर्य से सिद्धि पाता है।

श्लोक 22 (12.305.22)

यः सर्वेषां भवति ह्यर्चनीय । उत्सेचने स्तम्भ इवाभिजातः । यस्मै वाचं सुप्रसन्नां वदन्ति । स वै देवान्गच्छति संयतात्मा ॥

yaḥ sarveṣāṃ bhavati hyarcanīya | utsecane stambha ivābhijātaḥ | yasmai vācaṃ suprasannāṃ vadanti | sa vai devāngacchati saṃyatātmā

जो सब के लिए पूजनीय हो जाता है, जल खींचने के स्थान पर गड़े दृढ़ खम्भे की तरह, और जिससे लोग अत्यन्त प्रसन्न वाणी में बोलते हैं, वह संयतात्मा देवताओं के पास जाता है।

श्लोक 23 (12.305.23)

न तथा वक्तुमिच्छन्ति कल्याणान्पुरुषे गुणान् । यथैषां वक्तुमिच्छन्ति नैर्गुण्यमनुयुञ्जकाः ॥

na tathā vaktumicchanti kalyāṇānpuruṣe guṇān | yathaiṣāṃ vaktumicchanti nairguṇyamanuyuñjakāḥ

दोष निकालने वाले लोग किसी पुरुष के कल्याणकारी गुणों को उतना कहना नहीं चाहते, जितना उसके गुणहीन होने को कहना चाहते हैं।

श्लोक 24 (12.305.24)

यस्य वाङ्मनसी गुप्ते सम्यक्प्रणिहिते सदा । वेदास्तपश्च त्यागश्च स इदं सर्वमाप्नुयात् ॥

yasya vāṅmanasī gupte samyakpraṇihite sadā | vedāstapaśca tyāgaśca sa idaṃ sarvamāpnuyāt

जिसकी वाणी और मन सदा सुरक्षित और भली-भाँति स्थिर रहते हैं, वह वेद, तप और त्याग, यह सब पा लेता है।

श्लोक 25 (12.305.25)

आक्रोशनविमानाभ्यां नाबुधान्बोधयेद्बुधः । तस्मान्न वर्धयेदन्यं न चात्मानं विहिंसयेत् ॥

ākrośanavimānābhyāṃ nābudhānbodhayedbudhaḥ | tasmānna vardhayedanyaṃ na cātmānaṃ vihiṃsayet

ज्ञानी को गाली और अपमान से अज्ञानियों को जगाने का यत्न नहीं करना चाहिए। इसलिए वह न दूसरे को बढ़ावा दे और न अपने को हानि पहुँचाए।

श्लोक 26 (12.305.26)

अमृतस्येव संतृप्येदवमानस्य पण्डितः । सुखं ह्यवमतः शेते योऽवमन्ता स नश्यति ॥

amṛtasyeva saṃtṛpyedavamānasya paṇḍitaḥ | sukhaṃ hyavamataḥ śete yo'vamantā sa naśyati

ज्ञानी को अपमान से अमृत की तरह तृप्त होना चाहिए। जिसका अपमान हुआ है वह सुख से सोता है; जो अपमान करता है, वह नष्ट होता है।

श्लोक 27 (12.305.27)

यत्क्रोधनो यजति यद्ददाति । यद्वा तपस्तप्यति यज्जुहोति । वैवस्वतस्तद्धरतेऽस्य सर्वं । मोघः श्रमो भवति हि क्रोधनस्य ॥

yatkrodhano yajati yaddadāti | yadvā tapastapyati yajjuhoti | vaivasvatastaddharate'sya sarvaṃ | moghaḥ śramo bhavati hi krodhanasya

क्रोधी जो यज्ञ करता है, जो दान देता है, जो तप तपता है और जो हवन करता है, वैवस्वत यम वह सब हर लेता है; क्रोधी का श्रम व्यर्थ होता है।

श्लोक 28 (12.305.28)

चत्वारि यस्य द्वाराणि सुगुप्तान्यमरोत्तमाः । उपस्थमुदरं हस्तौ वाक्चतुर्थी स धर्मवित् ॥

catvāri yasya dvārāṇi suguptānyamarottamāḥ | upasthamudaraṃ hastau vākcaturthī sa dharmavit

हे देवश्रेष्ठो, जिसके चार द्वार, उपस्थ, उदर, हाथ और चौथी वाणी, भली-भाँति सुरक्षित हैं, वही धर्म को जानने वाला है।

श्लोक 29 (12.305.29)

सत्यं दमं ह्यार्जवमानृशंस्यं । धृतिं तितिक्षामभिसेवमानः । स्वाध्यायनित्योऽस्पृहयन्परेषा । मेकान्तशील्यूर्ध्वगतिर्भवेत्सः ॥

satyaṃ damaṃ hyārjavamānṛśaṃsyaṃ | dhṛtiṃ titikṣāmabhisevamānaḥ | svādhyāyanityo'spṛhayanpareṣā | mekāntaśīlyūrdhvagatirbhavetsaḥ

सत्य, दम, सरलता, क्रूरता का अभाव, धृति और क्षमा का सेवन करने वाला, नित्य स्वाध्याय में लगा, दूसरों की किसी वस्तु की स्पृहा न रखने वाला और एकान्त-प्रिय पुरुष ऊर्ध्वगति पाता है।

श्लोक 30 (12.305.30)

सर्वान्वेदाननुचरन्वत्सवच्चतुरः स्तनान् । न पावनतमं किंचित्सत्यादध्यगमं क्वचित् ॥

sarvānvedānanucaranvatsavaccaturaḥ stanān | na pāvanatamaṃ kiṃcitsatyādadhyagamaṃ kvacit

बछड़े की तरह चारों थनों के समान सब वेदों का अनुसरण करते हुए मैंने सत्य से बढ़कर पवित्र करने वाली कोई वस्तु कहीं नहीं पाई।

श्लोक 31 (12.305.31)

आचक्षेऽहं मनुष्येभ्यो देवेभ्यः प्रतिसंचरन् । सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव ॥

ācakṣe'haṃ manuṣyebhyo devebhyaḥ pratisaṃcaran | satyaṃ svargasya sopānaṃ pārāvārasya nauriva

मनुष्यों और फिर देवताओं के बीच विचरते हुए मैं घोषणा करता हूँ: सत्य स्वर्ग की सीढ़ी है, जैसे समुद्र पार करने के लिए नाव।

श्लोक 32 (12.305.32)

यादृशैः संविवदते यादृशांश्चोपसेवते । यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग्भवति पूरुषः ॥

yādṛśaiḥ saṃvivadate yādṛśāṃścopasevate | yādṛgicchecca bhavituṃ tādṛgbhavati pūruṣaḥ

मनुष्य जैसों के साथ बातचीत करता है, जैसों की सेवा करता है, और जैसा बनना चाहता है, वैसा ही हो जाता है।

श्लोक 33 (12.305.33)

यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं । तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव । वासो यथा रागवशं प्रयाति । तथा स तेषां वशमभ्युपैति ॥

yadi santaṃ sevati yadyasantaṃ | tapasvinaṃ yadi vā stenameva | vāso yathā rāgavaśaṃ prayāti | tathā sa teṣāṃ vaśamabhyupaiti

चाहे वह सज्जन की सेवा करे या दुर्जन की, तपस्वी की या चोर की, जैसे वस्त्र रंग के वश में आ जाता है, वैसे ही वह उनके वश में आ जाता है।

श्लोक 34 (12.305.34)

सदा देवाः साधुभिः संवदन्ते । न मानुषं विषयं यान्ति द्रष्टुम् । नेन्दुः समः स्यादसमो हि वायु । रुच्चावचं विषयं यः स वेद ॥

sadā devāḥ sādhubhiḥ saṃvadante | na mānuṣaṃ viṣayaṃ yānti draṣṭum | nenduḥ samaḥ syādasamo hi vāyu | ruccāvacaṃ viṣayaṃ yaḥ sa veda

देवता सदा सज्जनों से बातचीत करते हैं; वे मानवों के लोक को देखने नहीं आते। चन्द्रमा सम नहीं है और वायु भी सम नहीं है; जो ऊँच-नीच सब विषयों को जानता है, वही जानता है।

श्लोक 35 (12.305.35)

अदुष्टं वर्तमाने तु हृदयान्तरपूरुषे । तेनैव देवाः प्रीयन्ते सतां मार्गस्थितेन वै ॥

aduṣṭaṃ vartamāne tu hṛdayāntarapūruṣe | tenaiva devāḥ prīyante satāṃ mārgasthitena vai

जब हृदय के भीतर रहने वाला पुरुष निर्दोष बना रहता है, तब सन्मार्ग पर स्थित उस मनुष्य से देवता प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 36 (12.305.36)

शिश्नोदरे ये निरताः सदैव । स्तेना नरा वाक्परुषाश्च नित्यम् । अपेतधर्मानिति तान्विदित्वा । दूराद्देवाः संपरिवर्जयन्ति ॥

śiśnodare ye niratāḥ sadaiva | stenā narā vākparuṣāśca nityam | apetadharmāniti tānviditvā | dūrāddevāḥ saṃparivarjayanti

जो सदा उदर और उपस्थ में रमे रहते हैं, चोर हैं और सदा कठोर बोलने वाले हैं, उन्हें धर्महीन जानकर देवता दूर से ही त्याग देते हैं।

श्लोक 37 (12.305.37)

न वै देवा हीनसत्वेन तोष्याः । सर्वाशिना दुष्कृतकर्मणा वा । सत्यव्रता ये तु नराः कृतज्ञा । धर्मे रतास्तैः सह संभजन्ते ॥

na vai devā hīnasatvena toṣyāḥ | sarvāśinā duṣkṛtakarmaṇā vā | satyavratā ye tu narāḥ kṛtajñā | dharme ratāstaiḥ saha saṃbhajante

देवता हीन मन वाले, सब कुछ खाने वाले या दुष्कर्म करने वाले से सन्तुष्ट नहीं होते; जो मनुष्य सत्यव्रती, कृतज्ञ और धर्म में रत हैं, उन्हीं के साथ वे रहते हैं।

श्लोक 38 (12.305.38)

अव्याहृतं व्याहृताच्छ्रेय आहुः । सत्यं वदेद्व्याहृतं तद्द्वितीयम् । धर्म्यं वदेद्व्याहृतं तत्तृतीयं । प्रियं वदेद्व्याहृतं तच्चतुर्थम् ॥

avyāhṛtaṃ vyāhṛtācchreya āhuḥ | satyaṃ vadedvyāhṛtaṃ taddvitīyam | dharmyaṃ vadedvyāhṛtaṃ tattṛtīyaṃ | priyaṃ vadedvyāhṛtaṃ taccaturtham

कहते हैं कि न बोलना बोलने से श्रेष्ठ है; दूसरा स्थान सत्य बोलने का है; तीसरा धर्म की बात बोलने का; और चौथा प्रिय बोलने का।

साध्या ऊचुः

श्लोक 39 (12.305.39)

केनायमावृतो लोकः केन वा न प्रकाशते । केन त्यजति मित्राणि केन स्वर्गं न गच्छति ॥

kenāyamāvṛto lokaḥ kena vā na prakāśate | kena tyajati mitrāṇi kena svargaṃ na gacchati

“यह लोक किससे ढका हुआ है? किससे यह प्रकाशित नहीं होता? मनुष्य किससे मित्रों को छोड़ देता है? और किससे स्वर्ग को नहीं पहुँचता?”

हंस उवाच

श्लोक 40 (12.305.40)

अज्ञानेनावृतो लोको मात्सर्यान्न प्रकाशते । लोभात्त्यजति मित्राणि सङ्गात्स्वर्गं न गच्छति ॥

ajñānenāvṛto loko mātsaryānna prakāśate | lobhāttyajati mitrāṇi saṅgātsvargaṃ na gacchati

लोक अज्ञान से ढका है; मात्सर्य से वह प्रकाशित नहीं होता; लोभ से मनुष्य मित्रों को त्याग देता है; और आसक्ति से स्वर्ग को नहीं पहुँचता।

साध्या ऊचुः

श्लोक 41 (12.305.41)

कः स्विदेको रमते ब्राह्मणानां । कः स्विदेको बहुभिर्जोषमास्ते । कः स्विदेको बलवान्दुर्बलोपि । कः स्विदेषां कलहं नान्ववैति ॥

kaḥ svideko ramate brāhmaṇānāṃ | kaḥ svideko bahubhirjoṣamāste | kaḥ svideko balavāndurbalopi | kaḥ svideṣāṃ kalahaṃ nānvavaiti

“ब्राह्मणों में अकेला कौन रमता है? अकेला कौन बहुतों के साथ सुख से बैठता है? अकेला कौन दुर्बल होकर भी बलवान् है? और इनमें कौन कलह के पीछे नहीं जाता?”

हंस उवाच

श्लोक 42 (12.305.42)

प्राज्ञ एको रमते ब्राह्मणानां । प्राज्ञश्चैको बहुभिर्जोषमास्ते । प्राज्ञ एको बलवान्दुर्बलोऽपि । प्राज्ञ एषां कलहं नान्ववैति ॥

prājña eko ramate brāhmaṇānāṃ | prājñaścaiko bahubhirjoṣamāste | prājña eko balavāndurbalo'pi | prājña eṣāṃ kalahaṃ nānvavaiti

ब्राह्मणों में प्राज्ञ ही अकेला रमता है; प्राज्ञ ही बहुतों के साथ सुख से बैठता है; प्राज्ञ ही दुर्बल होकर भी बलवान् है; और प्राज्ञ ही इनमें कलह के पीछे नहीं जाता।

साध्या ऊचुः

श्लोक 43 (12.305.43)

किं ब्राह्मणानां देवत्वं किंच साधुत्वमुच्यते । असाधुत्वे च किं तेषां किमेषां मानुषं मतम् ॥

kiṃ brāhmaṇānāṃ devatvaṃ kiṃca sādhutvamucyate | asādhutve ca kiṃ teṣāṃ kimeṣāṃ mānuṣaṃ matam

“ब्राह्मणों का देवत्व क्या है? उनकी साधुता क्या कही जाती है? उनकी असाधुता क्या है? और उनका मानुषत्व क्या माना गया है?”

हंस उवाच

श्लोक 44 (12.305.44)

स्वाध्याय एषां देवत्वं व्रतं साधुत्वमुच्यते । असाधुत्वं परीवादो मृत्युर्मानुष्यमुच्यते ॥

svādhyāya eṣāṃ devatvaṃ vrataṃ sādhutvamucyate | asādhutvaṃ parīvādo mṛtyurmānuṣyamucyate

उनका देवत्व स्वाध्याय है; उनकी साधुता व्रत कही जाती है; असाधुता परनिन्दा है; और मृत्यु को उनका मानुषत्व कहा जाता है।

भीष्म उवाच

श्लोक 45 (12.305.45)

इत्युक्त्वा परमो देवो भगवान्नित्य अव्ययः । साध्यैर्देवगणैः सार्धं दिवमेवारुरोह सः ॥

ityuktvā paramo devo bhagavānnitya avyayaḥ | sādhyairdevagaṇaiḥ sārdhaṃ divamevāruroha saḥ

ऐसा कहकर नित्य और अविनाशी भगवान् परम देव साध्य देवगणों के साथ स्वर्ग को चढ़ गए।

श्लोक 46 (12.305.46)

एतद्यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वर्गाय च ध्रुवम् । दर्शितं देवदेवेन परमेणाव्ययेन च ॥

etadyaśasyamāyuṣyaṃ puṇyaṃ svargāya ca dhruvam | darśitaṃ devadevena parameṇāvyayena ca

यह यशस्वी, आयुष्य देने वाला, पुण्यमय और निश्चय ही स्वर्ग की ओर ले जाने वाला है; इसे देवों के देव, परम अविनाशी ने दिखाया था।

श्लोक 47 (12.305.47)

संवाद इत्ययं श्रेष्ठः साध्यानां परिकीर्तितः । क्षेत्रं वै कर्मणां योनिः सद्भावः सत्यमुच्यते ॥

saṃvāda ityayaṃ śreṣṭhaḥ sādhyānāṃ parikīrtitaḥ | kṣetraṃ vai karmaṇāṃ yoniḥ sadbhāvaḥ satyamucyate

साध्यों का यह श्रेष्ठ संवाद कहा गया है। कर्मों का क्षेत्र और योनि सद्भाव कहा जाता है, वही सत्य है।

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