शान्ति पर्व · अध्याय 306
योग और सांख्य की तुलना: योगी का बल
युधिष्ठिर पूछते हैं कि सांख्य और योग में क्या भेद है। भीष्म बताते हैं कि दोनों मत मान्य हैं और दोनों परम गति तक पहुँचाते हैं, यद्यपि उनके दर्शन में अन्तर है; फिर वे जाल तोड़ती मछलियों और मृगों, अग्नि और धारा, तथा धनुर्धर, कर्णधार और सारथि के दृष्टान्तों से योगी का बल समझाते हैं। वे बताते हैं कि किन आहारों और किन विजयों से योगी बल पाता है, मार्ग की कठिनाई की चेतावनी देते हैं, और अन्त में उन सबका वर्णन करते हैं जिनमें मुक्त योगी प्रवेश करता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (12.306.1)
साङ्ख्ये योगे च मे तात विशेषं वक्तुमर्हसि । तव धर्मज्ञ सर्वं हि विदितं कुरुसत्तम ॥
sāṅkhye yoge ca me tāta viśeṣaṃ vaktumarhasi | tava dharmajña sarvaṃ hi viditaṃ kurusattama
हे तात, मुझे सांख्य और योग का भेद बताइये। हे धर्मज्ञ, हे कुरुश्रेष्ठ, आपको तो सब कुछ ज्ञात है।
भीष्म उवाच
श्लोक 2 (12.306.2)
साङ्ख्याः साङ्ख्यं प्रशंसन्ति योगा योगं द्विजातयः । वदन्ति कारणं श्रेष्ठं स्वपक्षोद्भावनाय वै ॥
sāṅkhyāḥ sāṅkhyaṃ praśaṃsanti yogā yogaṃ dvijātayaḥ | vadanti kāraṇaṃ śreṣṭhaṃ svapakṣodbhāvanāya vai
सांख्यमत को मानने वाले सांख्य की प्रशंसा करते हैं और योगमत के अनुयायी द्विज योग की; अपने पक्ष को ऊँचा उठाने के लिए प्रत्येक पक्ष वही कारण बताता है जिसे वह सबसे श्रेष्ठ मानता है।
श्लोक 3 (12.306.3)
अनीश्वरः कथं मुच्येदित्येवं शत्रुसूदन । वदन्ति कारणश्रैष्ठ्यं योगाः सम्यङ्मनीषिणः ॥
anīśvaraḥ kathaṃ mucyedityevaṃ śatrusūdana | vadanti kāraṇaśraiṣṭhyaṃ yogāḥ samyaṅmanīṣiṇaḥ
"जिसका कोई ईश्वर नहीं, वह कैसे मुक्त होगा?" — हे शत्रुसूदन, इस प्रकार अपनी रीति से विद्वान योगमार्गी योग की श्रेष्ठता का कारण बताते हैं।
श्लोक 4 (12.306.4)
वदन्ति कारणं चेदं साङ्ख्याः सम्यग्द्विजातयः । विज्ञायेह गतीः सर्वा विरक्तो विषयेषु यः ॥
vadanti kāraṇaṃ cedaṃ sāṅkhyāḥ samyagdvijātayaḥ | vijñāyeha gatīḥ sarvā virakto viṣayeṣu yaḥ
द्विज सांख्यवादी भी अपना यह कारण ठीक ही बताते हैं कि जो सब गतियों को समझकर विषयों से विरक्त हो गया है,
श्लोक 5 (12.306.5)
ऊर्ध्वं च देहात्सुव्यक्तं विमुच्येदिति नान्यथा । एतदाहुर्महाप्राज्ञाः साङ्ख्यं वै मोक्षदर्शनम् ॥
ūrdhvaṃ ca dehātsuvyaktaṃ vimucyediti nānyathā | etadāhurmahāprājñāḥ sāṅkhyaṃ vai mokṣadarśanam
वह देह छोड़ने के पश्चात् निश्चय ही मुक्त हो जाएगा, अन्यथा नहीं। महाप्राज्ञ जन यही कहते हैं कि सांख्य मोक्ष को दिखाने वाला दर्शन है।
श्लोक 6 (12.306.6)
स्वपक्षे कारणं ग्राह्यं समर्थं वचनं हितम् । शिष्टानां हि मतं ग्राह्यं त्वद्विधैः शिष्टसंमतैः ॥
svapakṣe kāraṇaṃ grāhyaṃ samarthaṃ vacanaṃ hitam | śiṣṭānāṃ hi mataṃ grāhyaṃ tvadvidhaiḥ śiṣṭasaṃmataiḥ
अपने पक्ष में जो कारण ग्रहण किया जाए, वह समर्थ हो और उसका कथन हितकर हो; और शिष्टों के मत को आप जैसे शिष्टसम्मत पुरुषों को स्वीकार करना चाहिए।
श्लोक 7 (12.306.7)
प्रत्यक्षहेतवो योगाः साङ्ख्याः शास्त्रविनिश्चयाः । उभे चैते मते तत्त्वे मम तात युधिष्ठिर ॥
pratyakṣahetavo yogāḥ sāṅkhyāḥ śāstraviniścayāḥ | ubhe caite mate tattve mama tāta yudhiṣṭhira
योग प्रत्यक्ष को आधार मानता है और सांख्य शास्त्र के निश्चयों पर टिके हैं। हे तात युधिष्ठिर, ये दोनों ही मत मुझे तत्त्वतः मान्य हैं।
श्लोक 8 (12.306.8)
उभे चैते मते ज्ञाने नृपते शिष्टसंमते । अनुष्ठिते यथाशास्त्रं नयेतां परमां गतिम् ॥
ubhe caite mate jñāne nṛpate śiṣṭasaṃmate | anuṣṭhite yathāśāstraṃ nayetāṃ paramāṃ gatim
हे राजन्, ये दोनों ज्ञान-मार्ग शिष्टजनों को मान्य हैं; शास्त्र के अनुसार अपनाये जाने पर दोनों परम गति तक पहुँचाते हैं।
श्लोक 9 (12.306.9)
तुल्यं शौचं तयोरेकं दया भूतेषु चानघ । व्रतानां धारणं तुल्यं दर्शनं न समं तयोः । तयोस्तु दर्शनं सम्यक्सूक्ष्माभावे प्रसज्यते ॥
tulyaṃ śaucaṃ tayorekaṃ dayā bhūteṣu cānagha | vratānāṃ dhāraṇaṃ tulyaṃ darśanaṃ na samaṃ tayoḥ | tayostu darśanaṃ samyaksūkṣmābhāve prasajyate
हे अनघ, दोनों में शुचिता एक-सी है, प्राणियों पर दया भी, और व्रतों का पालन भी समान है; पर उन दोनों का दर्शन एक-सा नहीं है। फिर भी उन दोनों का सम्यक् दर्शन सूक्ष्म के अभाव में ही सिद्ध होता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 10 (12.306.10)
यदि तुल्यं व्रतं शौचं दया चात्र फलं तथा । न तुल्यं दर्शनं कस्मात्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
yadi tulyaṃ vrataṃ śaucaṃ dayā cātra phalaṃ tathā | na tulyaṃ darśanaṃ kasmāttanme brūhi pitāmaha
यदि व्रत, शुचिता और दया समान हैं और यहाँ फल भी समान है, तो दोनों का दर्शन समान क्यों नहीं है? हे पितामह, मुझे यह बताइये।
भीष्म उवाच
श्लोक 11 (12.306.11)
रागं मोहं तथा स्नेहं कामं क्रोधं च केवलम् । योगाच्छित्त्वा ततो दोषान्पञ्चैतान्प्राप्नुवन्ति ते ॥
rāgaṃ mohaṃ tathā snehaṃ kāmaṃ krodhaṃ ca kevalam | yogācchittvā tato doṣānpañcaitānprāpnuvanti te
राग, मोह, स्नेह, काम और क्रोध — इन पाँच दोषों को योग से पूरी तरह काटकर वे तब उस परम पद को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 12 (12.306.12)
यथा चानिमिषाः स्थूला जालं छित्त्वा पुनर्जलम् । प्राप्नुवन्ति तथा योगास्तत्पदं वीतकल्मषाः ॥
yathā cānimiṣāḥ sthūlā jālaṃ chittvā punarjalam | prāpnuvanti tathā yogāstatpadaṃ vītakalmaṣāḥ
जैसे बड़ी मछलियाँ जाल को तोड़कर फिर जल में पहुँच जाती हैं, वैसे ही निष्पाप योगी उस पद को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 13 (12.306.13)
तथैव वागुरां छित्त्वा बलवन्तो यथा मृगाः । प्राप्नुयुर्विमलं मार्गं विमुक्ताः सर्वबन्धनैः ॥
tathaiva vāgurāṃ chittvā balavanto yathā mṛgāḥ | prāpnuyurvimalaṃ mārgaṃ vimuktāḥ sarvabandhanaiḥ
उसी प्रकार जैसे बलवान मृग फन्दे को तोड़कर, सब बन्धनों से मुक्त होकर, निर्मल मार्ग पर पहुँच जाते हैं,
श्लोक 14 (12.306.14)
लोभजानि तथा राजन्बन्धनानि बलान्विताः । छित्त्वा योगात्परं मार्गं गच्छन्ति विमलं शिवम् ॥
lobhajāni tathā rājanbandhanāni balānvitāḥ | chittvā yogātparaṃ mārgaṃ gacchanti vimalaṃ śivam
वैसे ही हे राजन्, बलवान लोग लोभ से उत्पन्न बन्धनों को काटकर योग के द्वारा निर्मल और कल्याणकारी परम मार्ग पर जाते हैं।
श्लोक 15 (12.306.15)
अबलाश्च मृगा राजन्वागुरासु यथा परे । विनश्यन्ति न संदेहस्तद्वद्योगबलादृते ॥
abalāśca mṛgā rājanvāgurāsu yathā pare | vinaśyanti na saṃdehastadvadyogabalādṛte
पर हे राजन्, फन्दों में फँसे निर्बल मृग दूसरों की तरह निःसन्देह नष्ट हो जाते हैं; योग के बल के बिना योगियों की भी वैसी ही दशा होती है।
श्लोक 16 (12.306.16)
बलहीनाश्च कौन्तेय यथा जालं गता झषाः । अन्तं गच्छन्ति राजेन्द्र योगास्तद्वत्सुदुर्बलाः ॥
balahīnāśca kaunteya yathā jālaṃ gatā jhaṣāḥ | antaṃ gacchanti rājendra yogāstadvatsudurbalāḥ
और हे राजेन्द्र, हे कुन्तीपुत्र, जैसे बलहीन मछलियाँ जाल में फँसकर अन्त को प्राप्त होती हैं, वैसे ही अत्यन्त दुर्बल योगी भी।
श्लोक 17 (12.306.17)
यथा च शकुनाः सूक्ष्मं प्राप्य जालमरिंदम । तत्र सक्ता विपद्यन्ते मुच्यन्ते च बलान्विताः ॥
yathā ca śakunāḥ sūkṣmaṃ prāpya jālamariṃdama | tatra saktā vipadyante mucyante ca balānvitāḥ
हे अरिन्दम, जैसे छोटे पक्षी महीन जाल में पड़कर उसमें फँस जाते हैं और मर जाते हैं, पर उनमें जो बलवान होते हैं वे छूट जाते हैं,
श्लोक 18 (12.306.18)
कर्मजैर्बन्धनैर्बद्धास्तद्वद्योगाः परंतप । अबला वै विनश्यन्ति मुच्यन्ते च बलान्विताः ॥
karmajairbandhanairbaddhāstadvadyogāḥ paraṃtapa | abalā vai vinaśyanti mucyante ca balānvitāḥ
हे परंतप, वैसे ही कर्म से उत्पन्न बन्धनों में बँधे योगी भी हैं: निर्बल नष्ट हो जाते हैं और बलवान मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 19 (12.306.19)
अल्पकश्च यथा राजन्वह्निः शाम्यति दुर्बलः । आक्रान्त इन्धनैः स्थूलैस्तद्वद्योगोऽबलः प्रभो ॥
alpakaśca yathā rājanvahniḥ śāmyati durbalaḥ | ākrānta indhanaiḥ sthūlaistadvadyogo'balaḥ prabho
हे राजन्, जैसे छोटी, दुर्बल आग मोटे ईंधन से दब जाने पर बुझ जाती है, हे प्रभो, वैसे ही बलहीन योग भी है।
श्लोक 20 (12.306.20)
स एव च यदा राजन्वह्निर्जातबलः पुनः । समीरणयुतः क्षिप्रं दहेत्कृत्स्नां महीमपि ॥
sa eva ca yadā rājanvahnirjātabalaḥ punaḥ | samīraṇayutaḥ kṣipraṃ dahetkṛtsnāṃ mahīmapi
हे राजन्, पर वही आग जब फिर बल पा लेती है और वायु उसका साथ देती है, तब वह शीघ्र ही सारी पृथ्वी को भी जला सकती है।
श्लोक 21 (12.306.21)
तद्वज्जातबलो योगी दीप्ततेजा महाबलः । अन्तकाल इवादित्यः कृत्स्नं संशोषयेज्जगत् ॥
tadvajjātabalo yogī dīptatejā mahābalaḥ | antakāla ivādityaḥ kṛtsnaṃ saṃśoṣayejjagat
उसी प्रकार बल पा चुका, तेज से दीप्त और महाबली योगी प्रलयकाल के सूर्य की भाँति सारे जगत् को सुखा सकता है।
श्लोक 22 (12.306.22)
दुर्बलश्च यथा राजन्स्रोतसा हियते नरः । बलहीनस्तथा योगो विषयैर्ह्रियतेऽवशः ॥
durbalaśca yathā rājansrotasā hiyate naraḥ | balahīnastathā yogo viṣayairhriyate'vaśaḥ
हे राजन्, जैसे दुर्बल मनुष्य धारा में बह जाता है, वैसे ही बलहीन योगी विषयों के प्रवाह में विवश होकर बह जाता है।
श्लोक 23 (12.306.23)
तदेव च महास्रोतो विष्टम्भयति वारणः । तद्वद्योगबलं लब्ध्वा व्यूहते विषयान्बहून् ॥
tadeva ca mahāsroto viṣṭambhayati vāraṇaḥ | tadvadyogabalaṃ labdhvā vyūhate viṣayānbahūn
और जैसे हाथी उसी विशाल धारा को रोक देता है, वैसे ही योग का बल पा लेने पर योगी बहुत-से विषयों को दूर हटा देता है।
श्लोक 24 (12.306.24)
विशन्ति चावशाः पार्थ योगाद्योगबलान्विताः । प्रजापतीनृषीन्देवान्महाभूतानि चेश्वराः ॥
viśanti cāvaśāḥ pārtha yogādyogabalānvitāḥ | prajāpatīnṛṣīndevānmahābhūtāni ceśvarāḥ
हे पार्थ, योग के बल से युक्त योगी स्वतन्त्र होकर योग द्वारा प्रजापतियों, ऋषियों, देवताओं और महाभूतों में प्रवेश करते हैं, क्योंकि वे ईश्वर-सम होते हैं।
श्लोक 25 (12.306.25)
न यमो नान्तकः क्रुद्धो न मृत्युर्भीमविक्रमः । ईशते नृपते सर्वे योगस्यामिततेजसः ॥
na yamo nāntakaḥ kruddho na mṛtyurbhīmavikramaḥ | īśate nṛpate sarve yogasyāmitatejasaḥ
हे राजन्, न यम, न क्रुद्ध अन्तक, न भयंकर पराक्रम वाली मृत्यु — इनमें से कोई भी अपरिमित तेज वाले योग पर अधिकार नहीं कर सकता।
श्लोक 26 (12.306.26)
आत्मनां च सहस्राणि बहूनि भरतर्षभ । योगः कुर्याद्बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत् ॥
ātmanāṃ ca sahasrāṇi bahūni bharatarṣabha | yogaḥ kuryādbalaṃ prāpya taiśca sarvairmahīṃ caret
हे भरतश्रेष्ठ, बल पाकर योगी अनेक सहस्र आत्माएँ रच सकता है और उन सबके साथ पृथ्वी पर विचर सकता है।
श्लोक 27 (12.306.27)
प्राप्नुयाद्विषयान्कश्चित्पुनश्चोग्रं तपश्चरेत् । संक्षिपेच्च पुनस्तात सूर्यस्तेजोगुणानिव ॥
prāpnuyādviṣayānkaścitpunaścograṃ tapaścaret | saṃkṣipecca punastāta sūryastejoguṇāniva
उनमें कोई विषयों को पा सकता है और फिर उग्र तप कर सकता है; और हे तात, जैसे सूर्य अपनी किरणों को समेट लेता है, वैसे ही वह सबको फिर समेट सकता है।
श्लोक 28 (12.306.28)
बलस्थस्य हि योगस्य बन्धनेशस्य पार्थिव । विमोक्षे प्रभविष्णुत्वमुपपन्नमसंशयम् ॥
balasthasya hi yogasya bandhaneśasya pārthiva | vimokṣe prabhaviṣṇutvamupapannamasaṃśayam
हे पार्थिव, जो योगी बल में प्रतिष्ठित है और बन्धन का स्वामी है, उसमें मोक्ष दिलाने की सामर्थ्य निःसन्देह उचित ही है।
श्लोक 29 (12.306.29)
बलानि योगप्राप्तानि मयैतानि विशांपते । निदर्शनार्थं सूक्ष्माणि वक्ष्यामि च पुनस्तव ॥
balāni yogaprāptāni mayaitāni viśāṃpate | nidarśanārthaṃ sūkṣmāṇi vakṣyāmi ca punastava
हे विशाम्पते, योग से प्राप्त होने वाले ये बल मैंने तुम्हें बता दिये। अब दृष्टान्त के लिए मैं तुम्हें कुछ और सूक्ष्म उदाहरण भी बताऊँगा।
श्लोक 30 (12.306.30)
आत्मनश्च समाधाने धारणां प्रति वा विभो । निदर्शनानि सूक्ष्माणि शृणु मे भरतर्षभ ॥
ātmanaśca samādhāne dhāraṇāṃ prati vā vibho | nidarśanāni sūkṣmāṇi śṛṇu me bharatarṣabha
हे विभो, हे भरतश्रेष्ठ, आत्मा की समाधि और धारणा के विषय में सूक्ष्म दृष्टान्त मुझसे सुनो।
श्लोक 31 (12.306.31)
अप्रमत्तो यथा धन्वी लक्ष्यं हन्ति समाहितः । युक्तः सम्यक्तथा योगी मोक्षं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥
apramatto yathā dhanvī lakṣyaṃ hanti samāhitaḥ | yuktaḥ samyaktathā yogī mokṣaṃ prāpnotyasaṃśayam
जैसे सावधान और एकाग्र धनुर्धर अपना लक्ष्य बेध देता है, वैसे ही भली-भाँति समाहित योगी निःसन्देह मोक्ष पा लेता है।
श्लोक 32 (12.306.32)
स्नेहपूर्णे यथा पात्रे मन आधाय निश्चलम् । पुरुषो युक्त आरोहेत्सोपानं युक्तमानसः ॥
snehapūrṇe yathā pātre mana ādhāya niścalam | puruṣo yukta ārohetsopānaṃ yuktamānasaḥ
जैसे कोई पुरुष तेल से भरे पात्र पर अपने मन को निश्चल टिकाकर, एकाग्रचित्त होकर सीढ़ी पर चढ़ता है,
श्लोक 33 (12.306.33)
युक्तस्तथाऽयमात्मानं योगः पार्थिव निश्चलम् । करोत्यमलमात्मानं भास्करोपमदर्शनम् ॥
yuktastathā'yamātmānaṃ yogaḥ pārthiva niścalam | karotyamalamātmānaṃ bhāskaropamadarśanam
वैसे ही हे पार्थिव, समाहित योगी योग से आत्मा को निश्चल और निर्मल कर लेता है, जिसका दर्शन सूर्य के समान होता है।
श्लोक 34 (12.306.34)
यथा च नावं कौन्तेय कर्णधारः समाहितः । महार्णवगतां शीघ्रं नयेत्पार्थिव पत्तनम् ॥
yathā ca nāvaṃ kaunteya karṇadhāraḥ samāhitaḥ | mahārṇavagatāṃ śīghraṃ nayetpārthiva pattanam
और हे कुन्तीपुत्र, जैसे सावधान कर्णधार महासागर में गयी हुई नाव को शीघ्र ही बन्दरगाह तक पहुँचा देता है,
श्लोक 35 (12.306.35)
तद्वदात्मसमाधानं युक्त्वा योगेन तत्ववित् । दुर्गमं स्थानमाप्नोति हित्वा देहमिमं नृप ॥
tadvadātmasamādhānaṃ yuktvā yogena tatvavit | durgamaṃ sthānamāpnoti hitvā dehamimaṃ nṛpa
वैसे ही हे राजन्, तत्त्वज्ञ योगी योग से आत्मा की समाधि लगाकर इस देह को छोड़ता है और दुर्गम स्थान को प्राप्त होता है।
श्लोक 36 (12.306.36)
सारथिश्च यथा युक्त्वा सदश्वान्सुसमाहितः । देशमिष्टं नयत्याशु धन्विनं पुरुषर्षभ ॥
sārathiśca yathā yuktvā sadaśvānsusamāhitaḥ | deśamiṣṭaṃ nayatyāśu dhanvinaṃ puruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ, जैसे सावधान सारथि उत्तम घोड़े जोतकर धनुर्धर को इच्छित स्थान पर शीघ्र पहुँचा देता है,
श्लोक 37 (12.306.37)
तथैव नृपते योगी धारणासु समाहितः । प्राप्नोत्याशु परं स्थानं लक्षं मुक्त इवाशुगः ॥
tathaiva nṛpate yogī dhāraṇāsu samāhitaḥ | prāpnotyāśu paraṃ sthānaṃ lakṣaṃ mukta ivāśugaḥ
वैसे ही हे राजन्, धारणाओं में लीन योगी परम स्थान को शीघ्र प्राप्त कर लेता है, जैसे छूटा हुआ बाण लक्ष्य तक पहुँचता है।
श्लोक 38 (12.306.38)
आवेश्यात्मनि चात्मानं योगी तिष्ठति योऽचलः । पापं हन्ति पुनीतानां पदमाप्नोति सोऽजरम् ॥
āveśyātmani cātmānaṃ yogī tiṣṭhati yo'calaḥ | pāpaṃ hanti punītānāṃ padamāpnoti so'jaram
आत्मा को आत्मा में स्थित करके जो योगी अचल रहता है, वह पाप को नष्ट कर देता है और शुद्धों के अजर पद को पाता है।
श्लोक 39 (12.306.39)
नाभ्यां कण्ठे च शीर्षे च हृदि वक्षसि पार्श्वयोः । दर्शने श्रवणे चापि घ्राणे चामितविक्रम ॥
nābhyāṃ kaṇṭhe ca śīrṣe ca hṛdi vakṣasi pārśvayoḥ | darśane śravaṇe cāpi ghrāṇe cāmitavikrama
हे अमित पराक्रमी, नाभि, कण्ठ, शिर, हृदय, वक्ष, दोनों पार्श्वों में तथा दर्शन, श्रवण और घ्राण में —
श्लोक 40 (12.306.40)
स्थानेष्वेतेषु यो योगी महाव्रतसमाहितः । आत्मना सूक्ष्ममात्मानं युङ्क्ते सम्यग्विशांपते ॥
sthāneṣveteṣu yo yogī mahāvratasamāhitaḥ | ātmanā sūkṣmamātmānaṃ yuṅkte samyagviśāṃpate
हे विशाम्पते, इन स्थानों में जो योगी महाव्रत में दृढ़ रहकर सूक्ष्म आत्मा को आत्मा के द्वारा भली-भाँति जोड़ता है,
श्लोक 41 (12.306.41)
स शीघ्रमचलप्रख्यं कर्म दग्ध्वा शुभाशुभम् । उत्तमं योगमास्थाय यदीच्छति विमुच्यते ॥
sa śīghramacalaprakhyaṃ karma dagdhvā śubhāśubham | uttamaṃ yogamāsthāya yadīcchati vimucyate
वह पर्वत के समान खड़े अपने शुभ और अशुभ कर्मों को शीघ्र जलाकर उत्तम योग का आश्रय लेता है और जब चाहता है, मुक्त हो जाता है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 42 (12.306.42)
आहारान्कीदृशान्कृत्वा कानि जित्वा च भारत । योगी बलमवाप्नोति तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥
āhārānkīdṛśānkṛtvā kāni jitvā ca bhārata | yogī balamavāpnoti tadbhavānvaktumarhati
हे भारत, किन आहारों को अपनाकर और किन्हें जीतकर योगी बल प्राप्त करता है? कृपया यह मुझे बताइये।
भीष्म उवाच
श्लोक 43 (12.306.43)
कणानां भक्षणे युक्तः पिण्याकस्य च भारत । स्नेहानां वर्जने युक्तो योगी बलमवाप्नुयात् ॥
kaṇānāṃ bhakṣaṇe yuktaḥ piṇyākasya ca bhārata | snehānāṃ varjane yukto yogī balamavāpnuyāt
हे भारत, जो योगी कणों और खली के भोजन में लगा रहता है और तेलों का त्याग किये रहता है, वह बल प्राप्त करता है।
श्लोक 44 (12.306.44)
भुञ्जानो यावकं रूक्षं दीर्घकालमरिंदम् । एकाहारो विशुद्धात्मा योगी बलमवाप्नुयात् ॥
bhuñjāno yāvakaṃ rūkṣaṃ dīrghakālamariṃdam | ekāhāro viśuddhātmā yogī balamavāpnuyāt
हे अरिन्दम, जो योगी दीर्घकाल तक रूखा यावक खाता है, एक ही बार भोजन करता है और शुद्ध आत्मा वाला है, वह बल प्राप्त करता है।
श्लोक 45 (12.306.45)
पक्षान्मासानृतूंश्चैतान्संवत्सरानहस्तथा । अपः पीत्वा पयोमिश्रा योगी बलमवाप्नुयात् ॥
pakṣānmāsānṛtūṃścaitānsaṃvatsarānahastathā | apaḥ pītvā payomiśrā yogī balamavāpnuyāt
पक्षों, महीनों, ऋतुओं, वर्षों और दिनों तक दूध मिला जल पीकर योगी बल प्राप्त करता है।
श्लोक 46 (12.306.46)
अखण्डमपि वा मासं सततं मनुजेश्वर । उपोष्य सम्यक्शुद्धात्मा योगी बलमवाप्नुयात् ॥
akhaṇḍamapi vā māsaṃ satataṃ manujeśvara | upoṣya samyakśuddhātmā yogī balamavāpnuyāt
अथवा हे नरेश्वर, शुद्ध आत्मा वाला योगी निरन्तर पूरे एक मास तक विधिपूर्वक उपवास करके बल प्राप्त करता है।
श्लोक 47 (12.306.47)
कामं जित्वा तथा क्रोधं शीतोष्णे वर्षमेव च । भयं शोकं तथा श्वासं पौरुषान्विषयांस्तथा ॥
kāmaṃ jitvā tathā krodhaṃ śītoṣṇe varṣameva ca | bhayaṃ śokaṃ tathā śvāsaṃ pauruṣānviṣayāṃstathā
काम और क्रोध को, शीत, उष्ण और वर्षा को, भय, शोक और श्वास को तथा मनुष्य-सम्बन्धी विषयों को जीतकर,
श्लोक 48 (12.306.48)
अरतिं दुर्जयां चैव घोरां तृष्णां च पार्थिव । स्पर्शं निद्रां तथा तन्द्रीं दुर्जयां नृपसत्तम ॥
aratiṃ durjayāṃ caiva ghorāṃ tṛṣṇāṃ ca pārthiva | sparśaṃ nidrāṃ tathā tandrīṃ durjayāṃ nṛpasattama
और हे राजन्, दुर्जय अरति, भयंकर तृष्णा, स्पर्श, निद्रा और दुर्जय तन्द्रा को भी जीतकर, हे नृपश्रेष्ठ —
श्लोक 49 (12.306.49)
दीपयन्ति महात्मानः सूक्ष्ममात्मानमात्मना । वीतरागा महाप्रज्ञा ध्यानाध्ययनसंपदा ॥
dīpayanti mahātmānaḥ sūkṣmamātmānamātmanā | vītarāgā mahāprajñā dhyānādhyayanasaṃpadā
वीतराग और महाप्रज्ञ महात्मा ध्यान और अध्ययन की सम्पदा से सूक्ष्म आत्मा को आत्मा द्वारा प्रदीप्त करते हैं।
श्लोक 50 (12.306.50)
दुर्गस्त्वेष मतः पन्था ब्राह्मणानां विपश्चिताम् । न कश्चिद्व्रजति ह्यस्मिन्क्षेमेण भरतर्षभ ॥
durgastveṣa mataḥ panthā brāhmaṇānāṃ vipaścitām | na kaścidvrajati hyasminkṣemeṇa bharatarṣabha
विद्वान ब्राह्मणों का यह मार्ग दुर्गम माना गया है; हे भरतश्रेष्ठ, इस पर कोई भी कुशलपूर्वक नहीं चलता।
श्लोक 51 (12.306.51)
यथा कश्चिद्वनं घोरं बहुसर्पसरीसृपम् । श्वभ्रवत्तोयहीनं च दुर्गमं बहुकण्टकम् ॥
yathā kaścidvanaṃ ghoraṃ bahusarpasarīsṛpam | śvabhravattoyahīnaṃ ca durgamaṃ bahukaṇṭakam
कल्पना करो कि कोई युवक एक भयानक वन से कुशलपूर्वक निकल रहा है, जो साँपों और रेंगने वाले जीवों से भरा है, खड्डों-सा गहरा है, जलहीन है, दुर्गम है और काँटों से भरा है,
श्लोक 52 (12.306.52)
अभक्षमटवीप्रायं दावदग्धमहीरुहम् । पन्थानं तस्कराकीर्णं क्षेमेणाभिपतेद्युवा ॥
abhakṣamaṭavīprāyaṃ dāvadagdhamahīruham | panthānaṃ taskarākīrṇaṃ kṣemeṇābhipatedyuvā
जहाँ भोजन नहीं है, जो प्रायः उजाड़ जंगल है, जिसके वृक्ष दावाग्नि से जले हैं, और जिसका मार्ग चोरों से भरा है।
श्लोक 53 (12.306.53)
योगमार्गं तथाऽऽसाद्य यः कश्चिद्व्रजते द्विजः । क्षेमेणोपरमेन्मार्गाद्बहुदोषो हि स स्मृतः ॥
yogamārgaṃ tathā''sādya yaḥ kaścidvrajate dvijaḥ | kṣemeṇoparamenmārgādbahudoṣo hi sa smṛtaḥ
इसी प्रकार जो कोई द्विज योगमार्ग पर पहुँचकर उस पर चलता है, वह उस मार्ग से कुशलपूर्वक निवृत्त भी हो सकता है; क्योंकि वह मार्ग बहुत दोषों वाला माना गया है।
श्लोक 54 (12.306.54)
सुस्थेयं क्षुरधारासु निशितासु महीपते । धारणासु तु योगस्य दुःस्थेयमकृतात्मभिः ॥
sustheyaṃ kṣuradhārāsu niśitāsu mahīpate | dhāraṇāsu tu yogasya duḥstheyamakṛtātmabhiḥ
हे महीपते, तीखी उस्तरे की धारों पर खड़ा रहना सरल है; पर जिनका आत्मा संस्कारित नहीं हुआ, उनके लिए योग की धारणाओं में स्थिर रहना कठिन है।
श्लोक 55 (12.306.55)
विपन्ना धारणास्तात नयन्ति न शुभां गतिम् । नेतृहीना यथा नावः पुरुषानर्णवे नृप ॥
vipannā dhāraṇāstāta nayanti na śubhāṃ gatim | netṛhīnā yathā nāvaḥ puruṣānarṇave nṛpa
हे तात, विफल हुई धारणाएँ शुभ गति की ओर नहीं ले जातीं, जैसे हे राजन्, कर्णधार-रहित नावें समुद्र में पुरुषों को नहीं ले जा पातीं।
श्लोक 56 (12.306.56)
यस्तु तिष्ठति कौन्तेय धारणासु यथाविधि । मरणं जन्म दुःखं च सुखं च स विमुञ्चति ॥
yastu tiṣṭhati kaunteya dhāraṇāsu yathāvidhi | maraṇaṃ janma duḥkhaṃ ca sukhaṃ ca sa vimuñcati
पर हे कौन्तेय, जो विधिपूर्वक धारणाओं में स्थित रहता है, वह मरण, जन्म, दुःख और सुख से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 57 (12.306.57)
नानाशास्त्रेषु निष्पन्नं योगेष्विदमुदाहृतम् । परं योगस्य यत्कृत्यं निश्चितं तद्द्विजातिषु ॥
nānāśāstreṣu niṣpannaṃ yogeṣvidamudāhṛtam | paraṃ yogasya yatkṛtyaṃ niścitaṃ taddvijātiṣu
अनेक शास्त्रों में सिद्ध हुआ यह योग-सम्बन्धी उपदेश कहा गया है; योग का जो परम कर्तव्य है, वह द्विजों में निश्चित है।
श्लोक 58 (12.306.58)
परं हि तद्ब्रह्ममयं महात्म । न्ब्रह्माणमीशं वरदं च विष्णुम् । भवं च धर्मं च षडाननं च । षट्ब्रह्मपुत्रांश्च महानुभावान् ॥
paraṃ hi tadbrahmamayaṃ mahātma | nbrahmāṇamīśaṃ varadaṃ ca viṣṇum | bhavaṃ ca dharmaṃ ca ṣaḍānanaṃ ca | ṣaṭbrahmaputrāṃśca mahānubhāvān
हे महात्मन्, वह परम पद सचमुच ब्रह्ममय है: ब्रह्मा, ईश; वरदायी विष्णु; भव; धर्म; षडानन; और ब्रह्मा के छह महानुभाव पुत्र;
श्लोक 59 (12.306.59)
तमश्च कष्टं सुमहद्रजश्च । सत्वं विशुद्धं प्रकृतिं परां च । सिद्धिं च देवीं वरुणस्य पत्नीं । तेजश्च कृत्स्नं सुमहच्च धैर्यम् ॥
tamaśca kaṣṭaṃ sumahadrajaśca | satvaṃ viśuddhaṃ prakṛtiṃ parāṃ ca | siddhiṃ ca devīṃ varuṇasya patnīṃ | tejaśca kṛtsnaṃ sumahacca dhairyam
कष्टदायी तमस् और विशाल रजस्; विशुद्ध सत्त्व और परा प्रकृति; वरुण की पत्नी देवी सिद्धि; समस्त तेज और महान् धैर्य;
श्लोक 60 (12.306.60)
ताराधिपं खे विमलं सतारं । विश्वांश्च देवानुरगान्पितृंश्च । शैलांश्च कृत्स्नानुदधींश्च घोरा । न्नदीश्च सर्वाः सवनान्घनांश्च ॥
tārādhipaṃ khe vimalaṃ satāraṃ | viśvāṃśca devānuragānpitṛṃśca | śailāṃśca kṛtsnānudadhīṃśca ghorā | nnadīśca sarvāḥ savanānghanāṃśca
आकाश में तारों सहित निर्मल ताराधिप चन्द्रमा; सब विश्वेदेव, नाग और पितर; सब पर्वत और भयंकर समुद्र; सब नदियाँ, सवन-यज्ञ और मेघ;
श्लोक 61 (12.306.61)
नागान्नगान्यक्षगणान्दिशश्च । गन्धर्वसंघान्पुरुषान्स्त्रियश्च । परात्परं प्राप्य महान्महात्मा । विशेत योगी नचिराद्विमुक्तः ॥
nāgānnagānyakṣagaṇāndiśaśca | gandharvasaṃghānpuruṣānstriyaśca | parātparaṃ prāpya mahānmahātmā | viśeta yogī nacirādvimuktaḥ
नाग, पर्वत, यक्षगण और दिशाएँ; गन्धर्वों के समूह, पुरुष और स्त्रियाँ — परात्पर को पाकर वह महान् महात्मा योगी शीघ्र ही मुक्त होकर इन सबमें प्रवेश कर सकता है।
श्लोक 62 (12.306.62)
कथा च येयं नृपते प्रसक्ता । देवे महावीर्यतमौ शुभेयम् । योगी स सर्वानभिभूय मर्त्या । न्नारायणात्मा कुरुते महात्मा ॥
kathā ca yeyaṃ nṛpate prasaktā | deve mahāvīryatamau śubheyam | yogī sa sarvānabhibhūya martyā | nnārāyaṇātmā kurute mahātmā
और हे राजन्, यह कथा ईश्वर से जुड़ी है और मंगलकारी है; यह उन दो परम पराक्रमियों से सम्बन्धित है। महात्मा योगी सब मर्त्यों को पार करके अपने को नारायणमय आत्मा वाला बना लेता है।