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शान्ति पर्व · अध्याय 307

सांख्य का उपदेश: संसार के दोष और नारायण तक का मार्ग

युधिष्ठिर के अनुरोध पर भीष्म सांख्य का उपदेश करते हैं। साधक सभी भोग-लोकों, तत्त्वों के गुणों और देह के दोषों को परखकर ज्ञान से दुःख के सागर को पार करता है; फिर सूर्य, वायु, आकाश, रजस् और सत्त्व उसे आगे नारायण तक पहुँचाते हैं। युधिष्ठिर पूछते हैं कि मुक्त जन को स्मरण रहता है या नहीं; भीष्म बताते हैं कि आत्मा प्रकृति के पार कैसे जाता है, सांख्य को समस्त ज्ञान का आश्रय बताते हैं और अन्त में उन नारायण का वर्णन करते हैं जो उसे धारण करते हैं और प्रलय में जगत् को अपने में समेट लेते हैं।

अध्याय 306अध्याय-सूचीअध्याय 308

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.307.1)

सम्यक्त्वयाऽयं नृपते वर्णितः शिष्टसंमतः । योगमार्गो यथान्यायं शिष्यायेह हितैषिणा ॥

samyaktvayā'yaṃ nṛpate varṇitaḥ śiṣṭasaṃmataḥ | yogamārgo yathānyāyaṃ śiṣyāyeha hitaiṣiṇā

हे राजन्, आपने शिष्टजनों से मान्य योगमार्ग का यथोचित वर्णन भली-भाँति किया है, जैसे हितैषी गुरु शिष्य को समझाता है।

श्लोक 2 (12.307.2)

साङ्ख्ये त्विदानीं कार्त्स्न्येन विधिं प्रब्रूहि पृच्छते । त्रिषु लोकेषु यज्ज्ञानं सर्वं तद्विदितं हि ते ॥

sāṅkhye tvidānīṃ kārtsnyena vidhiṃ prabrūhi pṛcchate | triṣu lokeṣu yajjñānaṃ sarvaṃ tadviditaṃ hi te

अब मुझ जिज्ञासु को सांख्य की विधि पूरी-पूरी बताइये; क्योंकि तीनों लोकों में जो भी ज्ञान है, वह सब आपको ज्ञात है।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (12.307.3)

शृणु मे त्वमिदं कृत्स्नं साङ्ख्यानां विदितात्मनाम् । विदितं यतिभिः सर्वैः कपिलादिभिरीश्वरैः ॥

śṛṇu me tvamidaṃ kṛtsnaṃ sāṅkhyānāṃ viditātmanām | viditaṃ yatibhiḥ sarvaiḥ kapilādibhirīśvaraiḥ

आत्मज्ञानी सांख्यों का यह सम्पूर्ण उपदेश मुझसे सुनो, जिसे सब यति और कपिल आदि ईश्वरकोटि के मुनि जानते हैं,

श्लोक 4 (12.307.4)

यस्मिन्नविभ्रमाः केचिद्दृश्यन्ते मनुजर्षभ । गुणाश्च यस्मिन्बहवो दोषहानिश्च केवला ॥

yasminnavibhramāḥ keciddṛśyante manujarṣabha | guṇāśca yasminbahavo doṣahāniśca kevalā

हे नरश्रेष्ठ, जिसमें कोई भ्रम दिखायी नहीं देता, जिसमें बहुत-से गुण हैं और दोषों का पूर्ण नाश है।

श्लोक 5 (12.307.5)

ज्ञानेन परिसङ्ख्याय सदोषान्विषयान्नृप । मानुषान्दुर्जयान्कृत्स्नान्पैशाचान्विषयांस्तथा ॥

jñānena parisaṅkhyāya sadoṣānviṣayānnṛpa | mānuṣāndurjayānkṛtsnānpaiśācānviṣayāṃstathā

हे राजन्, ज्ञान से दोषयुक्त विषयों की गणना करके — मनुष्यों के सब दुर्जय विषयों की और वैसे ही पिशाचों के विषयों की —

श्लोक 6 (12.307.6)

राक्षसान्विषयाञ्ज्ञात्वा यक्षाणां विषयांस्तथा । विषयानौरगाञ्ज्ञात्वा गान्धर्वविषयांस्तथा ॥

rākṣasānviṣayāñjñātvā yakṣāṇāṃ viṣayāṃstathā | viṣayānauragāñjñātvā gāndharvaviṣayāṃstathā

राक्षसों के विषयों को जानकर, यक्षों के विषयों को भी, नागों के विषयों को जानकर, और गन्धर्वों के विषयों को भी,

श्लोक 7 (12.307.7)

पितृणां विषयाञ्ज्ञात्वा तिर्यक्षु चरतां नृप । सुपर्णविषयाञ्ज्ञात्वा मरुतां विषयांस्तथा ॥

pitṛṇāṃ viṣayāñjñātvā tiryakṣu caratāṃ nṛpa | suparṇaviṣayāñjñātvā marutāṃ viṣayāṃstathā

पितरों के विषयों को जानकर, तथा हे राजन्, पशु-पक्षियों की योनियों में विचरने वालों के, सुपर्णों के और मरुतों के विषयों को भी,

श्लोक 8 (12.307.8)

राजर्षिविषयाञ्ज्ञात्वा ब्रह्मर्षिविषयांस्तथा । आसुरान्विषयाञ्ज्ञात्वा वैश्वदेवांस्तथैव च ॥

rājarṣiviṣayāñjñātvā brahmarṣiviṣayāṃstathā | āsurānviṣayāñjñātvā vaiśvadevāṃstathaiva ca

राजर्षियों के विषयों को जानकर, ब्रह्मर्षियों के भी, असुरों के विषयों को जानकर और वैसे ही विश्वेदेवों के भी,

श्लोक 9 (12.307.9)

देवर्षिविषयाञ्ज्ञात्वा योगानामपि चेश्वरान् । प्रजापतीनां विषयान्ब्रह्मणो विषयांस्तथा ॥

devarṣiviṣayāñjñātvā yogānāmapi ceśvarān | prajāpatīnāṃ viṣayānbrahmaṇo viṣayāṃstathā

देवर्षियों के विषयों को जानकर, योगेश्वरों के भी, प्रजापतियों के विषयों और वैसे ही ब्रह्मा के विषयों को जानकर,

श्लोक 10 (12.307.10)

आयुषश्च परं कालं लोके विज्ञाय तत्त्वतः । सुखस्य च परं तत्त्वं विज्ञाय वदतां वर ॥

āyuṣaśca paraṃ kālaṃ loke vijñāya tattvataḥ | sukhasya ca paraṃ tattvaṃ vijñāya vadatāṃ vara

हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, लोक में आयु की परम सीमा को और सुख के परम तत्त्व को यथार्थ रूप से जानकर,

श्लोक 11 (12.307.11)

प्राप्ते काले च यद्दुःखं सततं विषयैषिणाम् । तिर्यक्षु पततां दुःखं पततां नरके च यत् ॥

prāpte kāle ca yadduḥkhaṃ satataṃ viṣayaiṣiṇām | tiryakṣu patatāṃ duḥkhaṃ patatāṃ narake ca yat

तथा समय आने पर विषयों के सदा खोजियों को जो दुःख प्राप्त होता है, पशु-योनियों में गिरने वालों का दुःख और नरक में गिरने वालों का जो दुःख है,

श्लोक 12 (12.307.12)

स्वर्गस्य च गुणान्कृत्स्नान्दोषान्सर्वांश्च भारत । परिसंख्यानसंख्यानं सत्वं सांख्यगुणात्मकम् । वेदवादे येऽपि दोषा गुणा ये चापि वैदिकाः ॥

svargasya ca guṇānkṛtsnāndoṣānsarvāṃśca bhārata | parisaṃkhyānasaṃkhyānaṃ satvaṃ sāṃkhyaguṇātmakam | vedavāde ye'pi doṣā guṇā ye cāpi vaidikāḥ

हे भारत, स्वर्ग के सब गुणों और सब दोषों को, — संख्याओं की गणना, सत्त्व, गुणस्वरूप सांख्य — और वेदवाद में जो दोष और जो गुण हैं तथा वैदिक कर्मों के जो गुण हैं,

श्लोक 13 (12.307.13)

ज्ञानयोगे च ये दोषा गुणा योगे च ये नृप । साङ्ख्यज्ञाने च ये दोषास्तथैव च गुणा नृप । इतरेषु च ये दोषा गुणास्तेषु च भारत ॥

jñānayoge ca ye doṣā guṇā yoge ca ye nṛpa | sāṅkhyajñāne ca ye doṣāstathaiva ca guṇā nṛpa | itareṣu ca ye doṣā guṇāsteṣu ca bhārata

हे राजन्, ज्ञानयोग के जो दोष और गुण हैं और योग के जो हैं, सांख्यज्ञान के जो दोष और गुण हैं, और दूसरे मतों में भी जो दोष और गुण हैं, हे भारत,

श्लोक 14 (12.307.14)

सत्वं दशगुणं ज्ञात्वा रजो नवगुणं तथा । तमश्चाष्टगुणं ज्ञात्वा वृद्धिं सप्तगुणां तथा ॥

satvaṃ daśaguṇaṃ jñātvā rajo navaguṇaṃ tathā | tamaścāṣṭaguṇaṃ jñātvā vṛddhiṃ saptaguṇāṃ tathā

सत्त्व को दस गुणों वाला, रजस् को नौ गुणों वाला, तमस् को आठ गुणों वाला और वृद्धि को सात गुणों वाली जानकर,

श्लोक 15 (12.307.15)

षङ्गुणं च मनो ज्ञात्वा नभः पञ्चगुणं तथा । बुद्धिं चतुर्गुणां ज्ञात्वा तमश्च त्रिगुणं तथा ॥

ṣaṅguṇaṃ ca mano jñātvā nabhaḥ pañcaguṇaṃ tathā | buddhiṃ caturguṇāṃ jñātvā tamaśca triguṇaṃ tathā

मन को छह गुणों वाला और आकाश को पाँच गुणों वाला जानकर, बुद्धि को चार गुणों वाली और तमस् को तीन गुणों वाला जानकर,

श्लोक 16 (12.307.16)

द्विगुणं च रजो ज्ञात्वा सत्वमेकगुणं पुनः । सर्गं विज्ञाय तत्त्वेन प्रलये प्रेक्ष्य चात्मनः ॥

dviguṇaṃ ca rajo jñātvā satvamekaguṇaṃ punaḥ | sargaṃ vijñāya tattvena pralaye prekṣya cātmanaḥ

रजस् को दो गुणों वाला और सत्त्व को एक गुण वाला जानकर, सृष्टि को यथार्थ रूप में जानकर और आत्मा के प्रलय पर भी विचार करके,

श्लोक 17 (12.307.17)

ज्ञानविज्ञानसंपन्नाः कारणैर्भाविताः शुभाः । प्राप्नुवन्ति शुभं मोक्षं सूक्ष्मा इव नभः परम् ॥

jñānavijñānasaṃpannāḥ kāraṇairbhāvitāḥ śubhāḥ | prāpnuvanti śubhaṃ mokṣaṃ sūkṣmā iva nabhaḥ param

ज्ञान और विज्ञान से सम्पन्न तथा शुभ कारणों से शुद्ध हुए वे जन आकाश से भी परे सूक्ष्म, कल्याणकारी मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 18 (12.307.18)

रूपेण दृष्टिं संयुक्तां घ्राणं गन्धगुणेन च । शब्दे सक्तं तथा श्रोत्रं जिह्वा रसगुणेषु च ॥

rūpeṇa dṛṣṭiṃ saṃyuktāṃ ghrāṇaṃ gandhaguṇena ca | śabde saktaṃ tathā śrotraṃ jihvā rasaguṇeṣu ca

दृष्टि रूप से जुड़ी है, घ्राण गन्ध-गुण से, श्रोत्र शब्द में आसक्त है और जीभ रस-गुणों में;

श्लोक 19 (12.307.19)

त्वचं स्पर्शे तथा सक्तां वायुं नभसि चाश्रितम् । मोहं तमसि संयुक्तं लोभमर्थेषु संश्रितम् ॥

tvacaṃ sparśe tathā saktāṃ vāyuṃ nabhasi cāśritam | mohaṃ tamasi saṃyuktaṃ lobhamartheṣu saṃśritam

त्वचा स्पर्श में आसक्त है और वायु आकाश में आश्रित है; मोह तमस् से जुड़ा है और लोभ धन-वस्तुओं में टिका है;

श्लोक 20 (12.307.20)

विष्णौ क्रान्तं बलं शक्रे कोष्ठे सक्तं तथाऽनलम् । अप्सु देवीं समासक्तामपस्तेजसि संश्रिताः ॥

viṣṇau krāntaṃ balaṃ śakre koṣṭhe saktaṃ tathā'nalam | apsu devīṃ samāsaktāmapastejasi saṃśritāḥ

विक्रम विष्णु में है, बल इन्द्र में, अग्नि जठर में टिकी है, देवी जलों में आसक्त है और जल तेज में आश्रित हैं;

श्लोक 21 (12.307.21)

तेजः सूक्ष्मे च संयुक्तं वायुं नभसि चाश्रितम् । नभो महति संयुक्तं महद्बुद्धौ च संश्रितम् ॥

tejaḥ sūkṣme ca saṃyuktaṃ vāyuṃ nabhasi cāśritam | nabho mahati saṃyuktaṃ mahadbuddhau ca saṃśritam

तेज सूक्ष्म से जुड़ा है, वायु आकाश में आश्रित है, आकाश महत् से जुड़ा है और महत् बुद्धि में आश्रित है;

श्लोक 22 (12.307.22)

बुद्धिं तमसि संसक्तां तमो रजसि संश्रितम् । रजः सत्वे तथा सक्तं सत्वं सक्तं तथाऽऽत्मनि ॥

buddhiṃ tamasi saṃsaktāṃ tamo rajasi saṃśritam | rajaḥ satve tathā saktaṃ satvaṃ saktaṃ tathā''tmani

बुद्धि तमस् में आसक्त है, तमस् रजस् में आश्रित है, रजस् सत्त्व में आसक्त है और सत्त्व आत्मा में आसक्त है;

श्लोक 23 (12.307.23)

सक्तमात्मानमीशे च देवे नारायणे तथा । देवं मोक्षे च संसक्तं मोक्षं सक्तं तु न क्वचित् ॥

saktamātmānamīśe ca deve nārāyaṇe tathā | devaṃ mokṣe ca saṃsaktaṃ mokṣaṃ saktaṃ tu na kvacit

आत्मा ईश्वर में, देव नारायण में आसक्त है; देव मोक्ष में आसक्त हैं; पर मोक्ष कहीं भी आसक्त नहीं है।

श्लोक 24 (12.307.24)

ज्ञात्वा सत्वयुतं देहं वृतं षोडशभिर्गुणैः । स्वभावं चेतनां चैव ज्ञात्वा देहसमाश्रिते ॥

jñātvā satvayutaṃ dehaṃ vṛtaṃ ṣoḍaśabhirguṇaiḥ | svabhāvaṃ cetanāṃ caiva jñātvā dehasamāśrite

सोलह गुणों से घिरे, सत्त्व से युक्त देह को जानकर, और देह में रहने वाले स्वभाव और चेतना को जानकर,

श्लोक 25 (12.307.25)

मध्यस्थमेकमात्मानं पापं यस्मिन्न विद्यते । द्वितीयं कर्म विज्ञाय नृपते विषयैषिणाम् ॥

madhyasthamekamātmānaṃ pāpaṃ yasminna vidyate | dvitīyaṃ karma vijñāya nṛpate viṣayaiṣiṇām

तथा मध्य में स्थित उस एक आत्मा को जानकर जिसमें पाप नहीं है, और हे राजन्, विषयों को खोजने वालों में कर्म को दूसरा जानकर,

श्लोक 26 (12.307.26)

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च सर्वानात्मनि संश्रितान् । दुर्लभत्वं च मोक्षस्य विज्ञाय श्रुतिपूर्वकम् ॥

indriyāṇīndriyārthāṃśca sarvānātmani saṃśritān | durlabhatvaṃ ca mokṣasya vijñāya śrutipūrvakam

तथा इन्द्रियों और उनके सब विषयों को आत्मा में आश्रित जानकर, और श्रुति के अनुसार मोक्ष की दुर्लभता को जानकर,

श्लोक 27 (12.307.27)

प्राणापानौ समानं च व्यानोदानौ च तत्त्वतः । आवहं चानिलं ज्ञात्वा प्रवहं चानिलं पुनः ॥

prāṇāpānau samānaṃ ca vyānodānau ca tattvataḥ | āvahaṃ cānilaṃ jñātvā pravahaṃ cānilaṃ punaḥ

तथा प्राण और अपान, समान, व्यान और उदान को यथार्थ रूप में, और आवह नामक वायु तथा प्रवह नामक वायु को भी जानकर,

श्लोक 28 (12.307.28)

सप्तवातांस्तथा शेषान्सप्तधा विहितान्पुनः । प्रजापतीनृषींश्चैव मार्गांश्चैव बहून्वरान् ॥

saptavātāṃstathā śeṣānsaptadhā vihitānpunaḥ | prajāpatīnṛṣīṃścaiva mārgāṃścaiva bahūnvarān

सात वायुओं को और वैसे ही शेष को भी, जो फिर सात प्रकार से विहित हैं, प्रजापतियों और ऋषियों को, और बहुत-से श्रेष्ठ मार्गों को,

श्लोक 29 (12.307.29)

सप्तर्षीश्च बहूञ्ज्ञात्वा राजर्षीश्च परंतप । सुरर्षीन्महतश्चान्यान्ब्रह्मर्षीन्सूर्यसन्निभान् ॥

saptarṣīśca bahūñjñātvā rājarṣīśca paraṃtapa | surarṣīnmahataścānyānbrahmarṣīnsūryasannibhān

हे परंतप, बहुत-से सप्तर्षियों और राजर्षियों को जानकर, देवर्षियों और अन्य महान् जनों को, सूर्य के समान तेजस्वी ब्रह्मर्षियों को,

श्लोक 30 (12.307.30)

ऐश्वर्याच्च्यावितान्दृष्ट्वा कालेन महता नृप । महतां भूतसङ्घानां श्रुत्वा नाशं च पार्थिव ॥

aiśvaryāccyāvitāndṛṣṭvā kālena mahatā nṛpa | mahatāṃ bhūtasaṅghānāṃ śrutvā nāśaṃ ca pārthiva

और हे राजन्, दीर्घ काल बाद उन्हें ऐश्वर्य से च्युत होते देखकर, तथा हे पार्थिव, महान् प्राणि-समूहों के नाश को सुनकर,

श्लोक 31 (12.307.31)

गतिं चाप्यशुभां ज्ञात्वा नृपते पापकर्मिणाम् । वैतरण्यां च यद्दुःखं पतितानां यमक्षये ॥

gatiṃ cāpyaśubhāṃ jñātvā nṛpate pāpakarmiṇām | vaitaraṇyāṃ ca yadduḥkhaṃ patitānāṃ yamakṣaye

और हे राजन्, पापकर्मियों की अशुभ गति को जानकर, तथा यमलोक में गिरे हुओं का वैतरणी में जो दुःख है उसे जानकर,

श्लोक 32 (12.307.32)

योनीषु च विचित्रासु संसारानशुभांस्तथा । जठरे चाशुभे वासं शोणितोदकभाजने ॥

yonīṣu ca vicitrāsu saṃsārānaśubhāṃstathā | jaṭhare cāśubhe vāsaṃ śoṇitodakabhājane

विचित्र योनियों और अशुभ संसारों को, तथा रक्त और जल के पात्र-रूप अशुभ गर्भ में निवास को जानकर,

श्लोक 33 (12.307.33)

श्लेष्ममूत्रपुरीषे च तीव्रगन्धसमन्विते । शुक्रशोणितसंघाते मज्जास्नायुपरिग्रहे ॥

śleṣmamūtrapurīṣe ca tīvragandhasamanvite | śukraśoṇitasaṃghāte majjāsnāyuparigrahe

जो कफ, मूत्र और मल से भरा है, तीव्र दुर्गन्ध से युक्त है, वीर्य और रक्त का समूह है, मज्जा और स्नायुओं से जकड़ा है,

श्लोक 34 (12.307.34)

सिराशतसमाकीर्णे नवद्वारे पुरेऽशुचौ । विज्ञायाहितमात्मानं योगांश्च विविधान्नृप ॥

sirāśatasamākīrṇe navadvāre pure'śucau | vijñāyāhitamātmānaṃ yogāṃśca vividhānnṛpa

सैकड़ों नाड़ियों से भरा है, नौ द्वारों वाला अपवित्र नगर है; वहाँ आत्मा को अहित में पड़ा जानकर, और हे राजन्, अनेक प्रकार के योगों को जानकर,

श्लोक 35 (12.307.35)

तामसानां च जन्तूनां रमणीयावृतात्मनाम् । सात्विकानां च जन्तूनां कुत्सितं भरतर्षभ ॥

tāmasānāṃ ca jantūnāṃ ramaṇīyāvṛtātmanām | sātvikānāṃ ca jantūnāṃ kutsitaṃ bharatarṣabha

जो तामसी जीवों को, जिनका आत्मा आवृत है, रमणीय लगता है, वही सात्त्विक जीवों को घृणित लगता है, हे भरतश्रेष्ठ,

श्लोक 36 (12.307.36)

गर्हितं महतामर्थे साङ्ख्यानां विदितात्मनाम् । उपप्लवांस्तथा घोराञ्शशिनस्तेजसस्तथा ॥

garhitaṃ mahatāmarthe sāṅkhyānāṃ viditātmanām | upaplavāṃstathā ghorāñśaśinastejasastathā

और आत्मज्ञानी सांख्यों के हित में महान् जनों द्वारा निन्दित है; तथा चन्द्रमा और सूर्य के भयंकर ग्रहण,

श्लोक 37 (12.307.37)

ताराणां पतनं दृष्ट्वा नक्षत्राणां च पर्ययम् । द्वन्द्वानां विप्रयोगं च विज्ञाय कृपणं नृप ॥

tārāṇāṃ patanaṃ dṛṣṭvā nakṣatrāṇāṃ ca paryayam | dvandvānāṃ viprayogaṃ ca vijñāya kṛpaṇaṃ nṛpa

तारों का गिरना और नक्षत्रों का पलटना देखकर, और हे राजन्, जोड़ों का दयनीय वियोग जानकर,

श्लोक 38 (12.307.38)

अन्योन्यभक्षणं दृष्ट्वा भूतानामपि चाशुभम् । बाल्ये मोहं च विज्ञाय क्षयं देहस्य चाशुभम् ॥

anyonyabhakṣaṇaṃ dṛṣṭvā bhūtānāmapi cāśubham | bālye mohaṃ ca vijñāya kṣayaṃ dehasya cāśubham

प्राणियों को एक-दूसरे को खाते देखकर, जो अशुभ है, और बाल्यावस्था के मोह तथा देह के अशुभ क्षय को जानकर,

श्लोक 39 (12.307.39)

रागे मोहे च संप्राप्ते क्वचित्सत्वं समाश्रितम् । सहस्रेषु नरः कश्चिन्मोक्षबुद्धिं समाश्रितः ॥

rāge mohe ca saṃprāpte kvacitsatvaṃ samāśritam | sahasreṣu naraḥ kaścinmokṣabuddhiṃ samāśritaḥ

राग और मोह के आ जाने पर सत्त्व किसी विरले में ही टिकता है; सहस्रों में कोई एक पुरुष मोक्ष की बुद्धि का आश्रय लेता है,

श्लोक 40 (12.307.40)

दुर्लभत्वं च मोक्षस्य विज्ञाय श्रुतिपूर्वकम् । बहुमानमलब्धेषु लब्धे मध्यस्थतां पुनः ॥

durlabhatvaṃ ca mokṣasya vijñāya śrutipūrvakam | bahumānamalabdheṣu labdhe madhyasthatāṃ punaḥ

श्रुति के अनुसार मोक्ष की दुर्लभता को जानकर, जो नहीं मिला उसका बहुत आदर करता है और जो मिल गया उसमें मध्यस्थ रहता है,

श्लोक 41 (12.307.41)

विषयाणां च दौरात्म्यं विज्ञाय नृपते पुनः । गतासूनां च कौन्तेय देहान्दृष्ट्वा तथाऽशुभान् ॥

viṣayāṇāṃ ca daurātmyaṃ vijñāya nṛpate punaḥ | gatāsūnāṃ ca kaunteya dehāndṛṣṭvā tathā'śubhān

और हे राजन्, विषयों की दुष्टता को फिर जानकर, तथा हे कौन्तेय, मृतकों के अशुभ शरीरों को देखकर,

श्लोक 42 (12.307.42)

वासं कुलेषु जन्तूनां दुःखं विज्ञाय भारत । ब्रह्मघ्नानां गतिं ज्ञात्वा पतितानां सुदारुणाम् ॥

vāsaṃ kuleṣu jantūnāṃ duḥkhaṃ vijñāya bhārata | brahmaghnānāṃ gatiṃ jñātvā patitānāṃ sudāruṇām

हे भारत, प्राणियों के कुलों में निवास का दुःख जानकर, तथा गिरे हुए ब्रह्महत्यारों की अत्यन्त भयंकर गति जानकर,

श्लोक 43 (12.307.43)

सुरापाने च सक्तानां ब्राह्मणानां दुरात्मनाम् । गुरुदारप्रसक्तानां गतिं विज्ञाय चाशुभाम् ॥

surāpāne ca saktānāṃ brāhmaṇānāṃ durātmanām | gurudāraprasaktānāṃ gatiṃ vijñāya cāśubhām

तथा सुरापान में लगे दुष्ट ब्राह्मणों की और गुरुपत्नी में आसक्त लोगों की अशुभ गति को जानकर,

श्लोक 44 (12.307.44)

जननीषु च वर्तन्ते येन सम्यग्युधिष्ठिर । सदेवकेषु लोकेषु येन वर्तन्ति मानवाः ॥

jananīṣu ca vartante yena samyagyudhiṣṭhira | sadevakeṣu lokeṣu yena vartanti mānavāḥ

हे युधिष्ठिर, जिस ज्ञान से मनुष्य अपनी माताओं के प्रति ठीक आचरण करते हैं, और जिससे देवताओं सहित लोकों में ठीक व्यवहार करते हैं —

श्लोक 45 (12.307.45)

तेन ज्ञानेन विज्ञाय गतिं चाशुभकर्मणाम् । तिर्यग्योनिगतानां च विज्ञाय च गतिं पृथक् ॥

tena jñānena vijñāya gatiṃ cāśubhakarmaṇām | tiryagyonigatānāṃ ca vijñāya ca gatiṃ pṛthak

उसी ज्ञान से अशुभ कर्म करने वालों की गति जानकर, और पशु-योनियों में गये हुओं की गति को अलग-अलग जानकर,

श्लोक 46 (12.307.46)

वेदवादांस्तथा चित्रानृतूनां पर्ययांस्तथा । क्षयं संवत्सराणां च मासानां च क्षयं तथा ॥

vedavādāṃstathā citrānṛtūnāṃ paryayāṃstathā | kṣayaṃ saṃvatsarāṇāṃ ca māsānāṃ ca kṣayaṃ tathā

विविध वेदवादों को, ऋतुओं के चक्र को, वर्षों के क्षय को और महीनों के क्षय को,

श्लोक 47 (12.307.47)

पक्षक्षयं तथा दृष्ट्वा दिवसानां च संक्षयम् । क्षयं वृद्धिं च चन्द्रस्य दृष्ट्वा प्रत्यक्षतस्तथा ॥

pakṣakṣayaṃ tathā dṛṣṭvā divasānāṃ ca saṃkṣayam | kṣayaṃ vṛddhiṃ ca candrasya dṛṣṭvā pratyakṣatastathā

पक्षों का क्षय और दिनों का अन्त देखकर, तथा चन्द्रमा का क्षय और वृद्धि प्रत्यक्ष देखकर,

श्लोक 48 (12.307.48)

वृद्धिं दृष्ट्वा समुद्राणां क्षयं तेषां तथा पुनः । क्षयं धनानां दृष्ट्वा च पुनर्वृद्धिं तथैव च ॥

vṛddhiṃ dṛṣṭvā samudrāṇāṃ kṣayaṃ teṣāṃ tathā punaḥ | kṣayaṃ dhanānāṃ dṛṣṭvā ca punarvṛddhiṃ tathaiva ca

समुद्रों की वृद्धि और फिर उनका क्षय देखकर, धन का क्षय और फिर उसकी वृद्धि देखकर,

श्लोक 49 (12.307.49)

संयोगानां क्षयं दृष्ट्वा युगानां च विशेषतः । क्षयं च दृष्ट्वा शैलानां क्षयं च सरितां तथा ॥

saṃyogānāṃ kṣayaṃ dṛṣṭvā yugānāṃ ca viśeṣataḥ | kṣayaṃ ca dṛṣṭvā śailānāṃ kṣayaṃ ca saritāṃ tathā

संयोगों का क्षय और विशेषतः युगों का क्षय देखकर, पर्वतों का क्षय और वैसे ही नदियों का क्षय देखकर,

श्लोक 50 (12.307.50)

वर्णानां च क्षयं दृष्ट्वा क्षयान्तं च पुनः पुनः । जरा मृत्युस्तथा जन्म दृष्ट्वा दुःखानि चैव ह ॥

varṇānāṃ ca kṣayaṃ dṛṣṭvā kṣayāntaṃ ca punaḥ punaḥ | jarā mṛtyustathā janma dṛṣṭvā duḥkhāni caiva ha

वर्णों का क्षय देखकर, और बार-बार यह देखकर कि सब कुछ क्षय में ही समाप्त होता है, तथा जरा, मृत्यु, जन्म और दुःखों को देखकर,

श्लोक 51 (12.307.51)

देहदोषांस्तथा ज्ञात्वा तेषां दुःखं च तत्त्वतः । देहविक्लवतां चैव सम्यग्विज्ञाय तत्त्वतः ॥

dehadoṣāṃstathā jñātvā teṣāṃ duḥkhaṃ ca tattvataḥ | dehaviklavatāṃ caiva samyagvijñāya tattvataḥ

और देह के दोषों को तथा तत्त्वतः उनके दुःख को जानकर, और देह की विकलता को भी भली-भाँति यथार्थ रूप से समझकर,

श्लोक 52 (12.307.52)

आत्मदोषांश्च विज्ञाय सर्वानात्मनि संश्रितान् । स्वदेहादुत्थितान्गन्धांस्तथा विज्ञाय चाशुभान् । मूत्रश्लेष्मपुरीषादीन्स्वेदजांश्च सुकुत्सितान् ॥

ātmadoṣāṃśca vijñāya sarvānātmani saṃśritān | svadehādutthitāngandhāṃstathā vijñāya cāśubhān | mūtraśleṣmapurīṣādīnsvedajāṃśca sukutsitān

और आत्मा में आश्रित सब आत्मदोषों को जानकर, तथा अपने ही शरीर से उठने वाली अशुभ गन्धों को — मूत्र, कफ, मल आदि की और पसीने से उत्पन्न अत्यन्त घृणित गन्धों को — जानकर,

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 53 (12.307.53)

कान्स्वगात्रोद्भवान्दोषान्पश्यस्यमितविक्रम । एतन्मे संशयं कृत्स्नं वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥

kānsvagātrodbhavāndoṣānpaśyasyamitavikrama | etanme saṃśayaṃ kṛtsnaṃ vaktumarhasi tattvataḥ

हे अमित पराक्रमी, आप अपने शरीर में उत्पन्न होने वाले कौन-से दोष देखते हैं? मेरा यह सारा संशय कृपया यथार्थ रूप से बताइये।

भीष्म उवाच

श्लोक 54 (12.307.54)

पञ्च दोषान्प्रभो देहे प्रवदन्ति मनीषिणः । मार्गज्ञाः कापिलाः साङ्ख्याः शृणु तानरिसूदन ॥

pañca doṣānprabho dehe pravadanti manīṣiṇaḥ | mārgajñāḥ kāpilāḥ sāṅkhyāḥ śṛṇu tānarisūdana

हे प्रभो, मार्ग को जानने वाले कापिल सांख्य विद्वान देह में पाँच दोष बताते हैं। हे अरिसूदन, उन्हें सुनो।

श्लोक 55 (12.307.55)

कामक्रोधौ भयं निद्रा पञ्चमः श्वास उच्यते ॥

kāmakrodhau bhayaṃ nidrā pañcamaḥ śvāsa ucyate

काम और क्रोध, भय, निद्रा और पाँचवाँ श्वास — ऐसा कहा जाता है।

श्लोक 56 (12.307.56)

एते दोषाः शरीरेषु दृश्यन्ते सर्वदेहिनाम् । छिन्दन्ति क्षमया क्रोधं कामं संकल्पवर्जनात् ॥

ete doṣāḥ śarīreṣu dṛśyante sarvadehinām | chindanti kṣamayā krodhaṃ kāmaṃ saṃkalpavarjanāt

ये दोष सभी देहधारियों के शरीरों में दिखायी देते हैं। वे क्षमा से क्रोध को और संकल्प के त्याग से काम को काट देते हैं,

श्लोक 57 (12.307.57)

सत्वसंसेवनान्निद्रामप्रमादाद्भयं तथा । छिन्दन्ति पञ्चमं श्वासमल्पाहारतया नृप ॥

satvasaṃsevanānnidrāmapramādādbhayaṃ tathā | chindanti pañcamaṃ śvāsamalpāhāratayā nṛpa

सत्त्व के सेवन से निद्रा को और अप्रमाद से भय को; और हे राजन्, अल्प आहार से पाँचवें दोष श्वास को काट देते हैं।

श्लोक 58 (12.307.58)

गुणान्गुणशतैर्ज्ञात्वा दोषान्दोषशतैरपि । हेतून्हेतुशतैश्चित्रैश्चित्रान्विज्ञाय तत्त्वतः ॥

guṇānguṇaśatairjñātvā doṣāndoṣaśatairapi | hetūnhetuśataiścitraiścitrānvijñāya tattvataḥ

सैकड़ों गुणों से गुणों को, सैकड़ों दोषों से दोषों को, सैकड़ों विविध हेतुओं से हेतुओं को जानकर, और विविध वस्तुओं को यथार्थ रूप से समझकर,

श्लोक 59 (12.307.59)

अपां फेनोपमं लोकं विष्णोर्मायाशतैश्चितम् । चित्रभित्तिप्रतीकाशं नलसारमनर्थकम् ॥

apāṃ phenopamaṃ lokaṃ viṣṇormāyāśataiścitam | citrabhittipratīkāśaṃ nalasāramanarthakam

लोक को जल के फेन के समान, विष्णु की सैकड़ों मायाओं से भरा हुआ, चित्रित दीवार के समान, नरकट के सार जैसा खोखला और निरर्थक देखकर,

श्लोक 60 (12.307.60)

तमः श्वभ्रनिभं दृष्ट्वा वर्षबुद्बुदसंनिभम् । क्लेशप्रायं सुखाद्धीनं नाशोत्तरमिहावशम् ॥

tamaḥ śvabhranibhaṃ dṛṣṭvā varṣabudbudasaṃnibham | kleśaprāyaṃ sukhāddhīnaṃ nāśottaramihāvaśam

अन्धकारमय गड्ढे के समान, वर्षा के बुलबुले के समान, प्रायः क्लेश से भरा, सुख से रहित, नाश में समाप्त होने वाला और विवश देखकर,

श्लोक 61 (12.307.61)

रजस्तमसि संमग्नं पङ्के द्विपमिवावशम् । साङ्ख्या राजन्महाप्राज्ञास्त्यक्त्वा देहं प्रजाकृतं ॥

rajastamasi saṃmagnaṃ paṅke dvipamivāvaśam | sāṅkhyā rājanmahāprājñāstyaktvā dehaṃ prajākṛtaṃ

रजस् और तमस् में डूबा हुआ, कीचड़ में फँसे विवश हाथी के समान — हे राजन्, महाप्रज्ञ सांख्य प्रजा-द्वारा रचे इस देह को त्यागकर,

श्लोक 62 (12.307.62)

ज्ञानयोगेन साङ्ख्येन व्यापिना महता नृप । राजसानशुभान्गन्धांस्तामसांश्च तथाविधान् ॥

jñānayogena sāṅkhyena vyāpinā mahatā nṛpa | rājasānaśubhāngandhāṃstāmasāṃśca tathāvidhān

हे राजन्, सांख्य के व्यापक और महान् ज्ञानयोग द्वारा रजस् की अशुभ गन्धों को और वैसी ही तमस् की गन्धों को काटकर,

श्लोक 63 (12.307.63)

पुण्यांश्च सात्विकान्गन्धान्स्पर्शजान्देहसंश्रितान् । छित्त्वाऽऽशु ज्ञानशस्त्रेण तपो दण्डेन भारत ॥

puṇyāṃśca sātvikāngandhānsparśajāndehasaṃśritān | chittvā''śu jñānaśastreṇa tapo daṇḍena bhārata

तथा स्पर्श से उत्पन्न, देह में आश्रित सत्त्व की पुण्य गन्धों को भी, हे भारत, ज्ञान की तलवार और तप के दण्ड से शीघ्र काटकर,

श्लोक 64 (12.307.64)

ततो दुःखोदधिं घोरं चिन्ताशोकमहाह्रदम् । व्याधिमृत्युमहाग्राहं महाभयमहोरगम् ॥

tato duḥkhodadhiṃ ghoraṃ cintāśokamahāhradam | vyādhimṛtyumahāgrāhaṃ mahābhayamahoragam

तब वे प्रज्ञा से दुःख के उस भयंकर सागर को पार करते हैं, जिसका महान् ह्रद चिन्ता और शोक है, महान् ग्राह व्याधि और मृत्यु है, और महान् नाग महाभय है,

श्लोक 65 (12.307.65)

तमःकूर्मं रजोमीनं प्रज्ञया संतरन्त्युत । स्नेहपङ्कं जरादुर्गं ज्ञानदीपमरिंदम् ॥

tamaḥkūrmaṃ rajomīnaṃ prajñayā saṃtarantyuta | snehapaṅkaṃ jarādurgaṃ jñānadīpamariṃdam

जिसका कछुआ तमस् है, मछली रजस् है, कीचड़ स्नेह है, दुर्ग जरा है और दीपक ज्ञान है, हे अरिन्दम,

श्लोक 66 (12.307.66)

कर्मागाधं सत्यतीरं स्थितव्रतमरिंदम् । हिंसाशीघ्रमहावेगं नानारससमाकरम् ॥

karmāgādhaṃ satyatīraṃ sthitavratamariṃdam | hiṃsāśīghramahāvegaṃ nānārasasamākaram

जिसकी अथाह गहराई कर्म है, तट सत्य है, जो व्रतों में स्थिर है, हे अरिन्दम, जिसका वेग हिंसा-सा तीव्र और प्रचण्ड है, और जो अनेक रसों की खान है,

श्लोक 67 (12.307.67)

नानाप्रीतिमहारत्नं दुःखज्वरसमीरणम् । शोकतृष्णामहावर्तं तीक्ष्णव्याधिमहागजम् ॥

nānāprītimahāratnaṃ duḥkhajvarasamīraṇam | śokatṛṣṇāmahāvartaṃ tīkṣṇavyādhimahāgajam

जिसके महारत्न नाना प्रकार की प्रीतियाँ हैं, जिसकी पवन दुःख का ज्वर है, जिसके महान् भँवर शोक और तृष्णा हैं, और महान् हाथी तीखे रोग हैं,

श्लोक 68 (12.307.68)

अस्थिसंघातसंघट्टं श्लेष्मफेनमरिंदम् । दानमुक्ताकरं घोरं शोणितह्रदविद्रुमम् ॥

asthisaṃghātasaṃghaṭṭaṃ śleṣmaphenamariṃdam | dānamuktākaraṃ ghoraṃ śoṇitahradavidrumam

जो हड्डियों के ढेरों से टकराता है, जिसका फेन कफ है, हे अरिन्दम, जिसकी मोती की खान दान है, जो भयंकर है, और जिसके मूँगे रक्त के कुण्ड हैं,

श्लोक 69 (12.307.69)

हसितोत्क्रुष्टनिर्घोषं नानाज्ञानसुदुस्तरम् । रोदनाश्रुमलक्षारं सङ्गत्यागपरायणम् ॥

hasitotkruṣṭanirghoṣaṃ nānājñānasudustaram | rodanāśrumalakṣāraṃ saṅgatyāgaparāyaṇam

जिसकी गर्जना हँसी और चीख का स्वर है, जो नाना प्रकार के ज्ञान के कारण पार करने में अत्यन्त कठिन है, जिसका खारापन रोने के आँसू हैं, और जिसका आश्रय आसक्ति का त्याग है,

श्लोक 70 (12.307.70)

पुत्रदारजलौकौघं मित्रबान्धवपत्तनम् । अहिंसासत्यमर्यादं प्राणत्यागमहोर्मिणम् ॥

putradārajalaukaughaṃ mitrabāndhavapattanam | ahiṃsāsatyamaryādaṃ prāṇatyāgamahormiṇam

जिसमें जोंकों के झुंड पुत्र और स्त्रियाँ हैं, जिसका बन्दरगाह-नगर मित्र और बान्धव हैं, जिसकी मर्यादा अहिंसा और सत्य है, और जिसकी महान् लहरें प्राणों का त्याग हैं,

श्लोक 71 (12.307.71)

वेदान्तगमनद्वीपं सर्वभूतदयोदकम् । मोक्षदुर्लभविषयं वडवामुखसागरम् ॥

vedāntagamanadvīpaṃ sarvabhūtadayodakam | mokṣadurlabhaviṣayaṃ vaḍavāmukhasāgaram

जिसका द्वीप वेदान्त का मार्ग है, जिसका जल सब प्राणियों पर दया है, जिसका विषय दुर्लभ मोक्ष है और जिसमें वडवामुख की अग्नि है — ऐसे सागर को।

श्लोक 72 (12.307.72)

तरन्ति मुनयः सिद्धा ज्ञानयानेन भारत । तीर्त्वाऽतिदुस्तरं जन्म विशन्ति विमलं नभः ॥

taranti munayaḥ siddhā jñānayānena bhārata | tīrtvā'tidustaraṃ janma viśanti vimalaṃ nabhaḥ

हे भारत, मुनि और सिद्ध ज्ञानरूपी नौका से उसे पार करते हैं; और अत्यन्त दुस्तर जन्म को पार करके निर्मल आकाश में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 73 (12.307.73)

तत्र तान्सुकृतीन्साङ्ख्यान्सूर्यो वहति रश्मिभिः । पद्मतन्तुवदाविश्य प्रसह्य विषयान्नृप ॥

tatra tānsukṛtīnsāṅkhyānsūryo vahati raśmibhiḥ | padmatantuvadāviśya prasahya viṣayānnṛpa

वहाँ सूर्य उन पुण्यात्मा सांख्यों को अपनी किरणों से ले जाता है; हे राजन्, वह कमल के तन्तु की भाँति उनमें प्रवेश करके विषयों को बलपूर्वक पार कराता है।

श्लोक 74 (12.307.74)

तत्र तान्प्रवहो वायुः प्रतिगृह्णाति भारत । वीतरागान्यतीन्सिद्धान्वीर्ययुक्तांस्तपोधनान् ॥

tatra tānpravaho vāyuḥ pratigṛhṇāti bhārata | vītarāgānyatīnsiddhānvīryayuktāṃstapodhanān

हे भारत, वहाँ प्रवह वायु उन्हें ग्रहण करती है — वीतराग यति, सिद्ध, वीर्ययुक्त, तप ही जिनका धन है।

श्लोक 75 (12.307.75)

सूक्ष्मः शीतः सुगन्धी च सुखस्पर्शश्च भारत । सप्तानां मरुतां श्रेष्ठो लोकान्गच्छति यः शुभान् । स तान्वहति कौन्तेय नभसः परमां गतिम् ॥

sūkṣmaḥ śītaḥ sugandhī ca sukhasparśaśca bhārata | saptānāṃ marutāṃ śreṣṭho lokāngacchati yaḥ śubhān | sa tānvahati kaunteya nabhasaḥ paramāṃ gatim

हे भारत, वह सूक्ष्म, शीतल, सुगन्धित और सुखद स्पर्श वाली है, सात वायुओं में श्रेष्ठ है, और शुभ लोकों को जाती है; हे कौन्तेय, वह उन्हें आकाश की परम गति तक ले जाती है।

श्लोक 76 (12.307.76)

नभो वहति लोकेश रजसः परमां गतिम् । तमो वहति लोकेश रजसः परमां गतिम् । रजो वहति राजेन्द्र सत्वस्य परमां गतिम् ॥

nabho vahati lokeśa rajasaḥ paramāṃ gatim | tamo vahati lokeśa rajasaḥ paramāṃ gatim | rajo vahati rājendra satvasya paramāṃ gatim

हे लोकेश, आकाश उन्हें रजस् की परम गति तक ले जाता है। हे लोकेश, तमस् उन्हें रजस् की परम गति तक ले जाता है। हे राजेन्द्र, रजस् उन्हें सत्त्व की परम गति तक ले जाता है।

श्लोक 77 (12.307.77)

सत्वं वहति राजेन्द्र परं नारायणं प्रभुम् । प्रभुर्वहति शुद्धात्मा परमात्मानमात्मना ॥

satvaṃ vahati rājendra paraṃ nārāyaṇaṃ prabhum | prabhurvahati śuddhātmā paramātmānamātmanā

हे राजेन्द्र, सत्त्व उन्हें परम प्रभु नारायण तक ले जाता है। शुद्धात्मा प्रभु उन्हें स्वयं परमात्मा तक पहुँचाते हैं।

श्लोक 78 (12.307.78)

परमात्मानमासाद्य तद्भूता यतयोऽमलाः । अमृतत्वाय कल्पन्ते न निवर्तन्ति वा विभो ॥

paramātmānamāsādya tadbhūtā yatayo'malāḥ | amṛtatvāya kalpante na nivartanti vā vibho

परमात्मा को प्राप्त करके निर्मल यति उसी के रूप हो जाते हैं; वे अमरत्व के योग्य हो जाते हैं और हे विभो, लौटकर नहीं आते।

श्लोक 79 (12.307.79)

परमा सा गतिः पार्थ निर्द्वन्द्वानां महात्मनाम् । सत्यार्जवरतानां वै सर्वभूतदयावताम् ॥

paramā sā gatiḥ pārtha nirdvandvānāṃ mahātmanām | satyārjavaratānāṃ vai sarvabhūtadayāvatām

हे पार्थ, द्वन्द्वों से परे, सत्य और सरलता में रत तथा सब प्राणियों पर दया करने वाले महात्माओं की वही परम गति है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 80 (12.307.80)

स्थानमुत्तममासाद्य भगवन्तं स्थिरव्रताः । आजन्ममरणं वा ते स्मरन्त्युत न वाऽनघ ॥

sthānamuttamamāsādya bhagavantaṃ sthiravratāḥ | ājanmamaraṇaṃ vā te smarantyuta na vā'nagha

हे अनघ, उस उत्तम स्थान और भगवान् को पाकर वे दृढ़व्रत जन जन्म से मरण तक की बातें स्मरण रखते हैं या नहीं?

श्लोक 81 (12.307.81)

यदत्र तथ्यं तन्मे त्वं यथावद्वक्तुमर्हसि । त्वदृते पुरुषं नान्यं प्रष्टुमर्हामि कौरव ॥

yadatra tathyaṃ tanme tvaṃ yathāvadvaktumarhasi | tvadṛte puruṣaṃ nānyaṃ praṣṭumarhāmi kaurava

इस विषय में जो सत्य है, वह मुझे ठीक-ठीक बताइये; हे कौरव, आपके सिवा मैं किसी और से नहीं पूछ सकता।

श्लोक 82 (12.307.82)

मोक्षे दोषो महानेष प्राप्य सिद्धिगतानृषीन् । यदि तत्रैव विज्ञाने वर्तन्ते यतयः परे ॥

mokṣe doṣo mahāneṣa prāpya siddhigatānṛṣīn | yadi tatraiva vijñāne vartante yatayaḥ pare

मोक्ष में यह बड़ा दोष है कि सिद्धि को प्राप्त ऋषियों के पास पहुँचकर भी यदि परम यति उसी विज्ञान में बने रहते हैं —

श्लोक 83 (12.307.83)

प्रवृत्तिलक्षणं धर्मं पश्यामि परमं नृप । मग्नस्य हि परे ज्ञाने किं न दुःखतरं भवेत् ॥

pravṛttilakṣaṇaṃ dharmaṃ paśyāmi paramaṃ nṛpa | magnasya hi pare jñāne kiṃ na duḥkhataraṃ bhavet

हे राजन्, मैं प्रवृत्ति-लक्षण धर्म को ही श्रेष्ठ देखता हूँ; क्योंकि परम ज्ञान में डूबे हुए को क्या और अधिक दुःख नहीं होगा?

भीष्म उवाच

श्लोक 84 (12.307.84)

यथान्यायं त्वया तात प्रश्नः पृष्टः सुसंकटः । बुधानामपि संमोहः प्रश्नेऽस्मिन्भरतर्षभ ॥

yathānyāyaṃ tvayā tāta praśnaḥ pṛṣṭaḥ susaṃkaṭaḥ | budhānāmapi saṃmohaḥ praśne'sminbharatarṣabha

हे तात, तुमने प्रश्न यथोचित ढंग से पूछा है, और वह अत्यन्त कठिन है; हे भरतश्रेष्ठ, इस प्रश्न पर विद्वान् भी मोह में पड़ जाते हैं।

श्लोक 85 (12.307.85)

अत्रापि तत्त्वं परमं शृणु सम्यङ्मयेरितम् । बुद्धिश्च परमा यत्र कापिलानां महात्मनाम् ॥

atrāpi tattvaṃ paramaṃ śṛṇu samyaṅmayeritam | buddhiśca paramā yatra kāpilānāṃ mahātmanām

इस पर भी मेरे द्वारा ठीक-ठीक कहा गया परम तत्त्व सुनो, जिसमें महात्मा कापिलों की परम बुद्धि है।

श्लोक 86 (12.307.86)

इन्द्रियाण्येव बुध्यन्ते स्वदेहे देहिनां नृप । कारणान्यात्मनस्तानि सूक्ष्मः पश्यति तैस्तु सः ॥

indriyāṇyeva budhyante svadehe dehināṃ nṛpa | kāraṇānyātmanastāni sūkṣmaḥ paśyati taistu saḥ

हे राजन्, देहधारियों के अपने देह में इन्द्रियाँ ही जानती हैं; वे आत्मा के कारण (साधन) हैं, और सूक्ष्म आत्मा उन्हीं के द्वारा देखता है।

श्लोक 87 (12.307.87)

आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुड्यसमानि तु । विनश्यन्ति न संदेहः फेना इव महार्णवे ॥

ātmanā viprahīṇāni kāṣṭhakuḍyasamāni tu | vinaśyanti na saṃdehaḥ phenā iva mahārṇave

आत्मा से रहित होकर वे काठ और दीवार के समान हैं, और महासागर के फेन की भाँति निःसन्देह नष्ट हो जाती हैं।

श्लोक 88 (12.307.88)

इन्द्रियैः सह सुप्तस्य देहिनः शत्रुतापन । सूक्ष्मश्चरति सर्वत्र नभसीव समीरणः ॥

indriyaiḥ saha suptasya dehinaḥ śatrutāpana | sūkṣmaścarati sarvatra nabhasīva samīraṇaḥ

हे शत्रुतापन, जब देहधारी इन्द्रियों के साथ सो जाता है, तब सूक्ष्म आत्मा आकाश में वायु की भाँति सर्वत्र विचरता है।

श्लोक 89 (12.307.89)

स पश्यति यथान्यायं स्पर्शान्स्पृशति वा विभो । बुध्यमानो यथापूर्वमखिलेनेह भारत ॥

sa paśyati yathānyāyaṃ sparśānspṛśati vā vibho | budhyamāno yathāpūrvamakhileneha bhārata

हे विभो, वह यथोचित देखता है, या स्पर्शों का अनुभव करता है, और हे भारत, यहाँ पहले की भाँति पूर्ण रूप से जाग उठता है।

श्लोक 90 (12.307.90)

इन्द्रियाणीह सर्वाणि स्वे स्वे स्थाने यथाविधि । अनीशत्वात्प्रलीयन्ते सर्पा हतविषा इव ॥

indriyāṇīha sarvāṇi sve sve sthāne yathāvidhi | anīśatvātpralīyante sarpā hataviṣā iva

यहाँ सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने स्थान में, यथाविधि, स्वामित्व के अभाव के कारण ऐसे लीन हो जाती हैं जैसे विष-हीन किये गये साँप।

श्लोक 91 (12.307.91)

इन्द्रियाणां तु सर्वेषां स्वस्थानेष्वेव सर्वशः । आक्रम्य गतयः सूक्ष्माश्चरत्यात्मा न संशयः ॥

indriyāṇāṃ tu sarveṣāṃ svasthāneṣveva sarvaśaḥ | ākramya gatayaḥ sūkṣmāścaratyātmā na saṃśayaḥ

सब इन्द्रियों के अपने-अपने स्थानों में सर्वत्र, सूक्ष्म गति वाला आत्मा उन पर अधिकार करके विचरता है; इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 92 (12.307.92)

सत्वस्य च गुणान्कृत्स्नान्रजसश्च गुणान्पुनः । गुणांश्च तमसः सर्वान्गुणान्बुद्धेश्च भारत ॥

satvasya ca guṇānkṛtsnānrajasaśca guṇānpunaḥ | guṇāṃśca tamasaḥ sarvānguṇānbuddheśca bhārata

हे भारत, सत्त्व के सब गुण, फिर रजस् के गुण, तमस् के सब गुण और बुद्धि के गुण,

श्लोक 93 (12.307.93)

गुणांश्च मनसश्चापि नभसश्च गुणांश्च सः । गुणान्वायोश्च धर्मात्मंस्तेजसां च गुणान्पुनः ॥

guṇāṃśca manasaścāpi nabhasaśca guṇāṃśca saḥ | guṇānvāyośca dharmātmaṃstejasāṃ ca guṇānpunaḥ

और मन के गुण, आकाश के गुण, हे धर्मात्मन्, वायु के गुण, और फिर तेज के गुण,

श्लोक 94 (12.307.94)

अपां गुणांस्तथा पार्थ पार्थिवांश्च गुणानपि । सर्वात्मना गुणैर्व्याप्तः क्षेत्रज्ञेषु युधिष्ठिर ॥

apāṃ guṇāṃstathā pārtha pārthivāṃśca guṇānapi | sarvātmanā guṇairvyāptaḥ kṣetrajñeṣu yudhiṣṭhira

हे पार्थ, जल के गुण और पृथ्वी के गुण भी। हे युधिष्ठिर, क्षेत्रज्ञों में वह सर्वात्मना गुणों से व्याप्त रहता है —

श्लोक 95 (12.307.95)

आत्मा च याति क्षेत्रज्ञं कर्मणी च शुभाशुभे । शिष्या इव महात्मानमिन्द्रियाणि च तं प्रभो ॥

ātmā ca yāti kṣetrajñaṃ karmaṇī ca śubhāśubhe | śiṣyā iva mahātmānamindriyāṇi ca taṃ prabho

और आत्मा शुभ-अशुभ कर्मों सहित क्षेत्रज्ञ के पास जाता है; और हे प्रभो, इन्द्रियाँ उसके पीछे चलती हैं, जैसे शिष्य महान् गुरु के पीछे।

श्लोक 96 (12.307.96)

प्रकृतिं चाप्यतिक्रम्य गच्छत्यात्मानमव्ययम् । परं नारायणं देवं निर्द्वन्द्वं प्रकृतेः परम् ॥

prakṛtiṃ cāpyatikramya gacchatyātmānamavyayam | paraṃ nārāyaṇaṃ devaṃ nirdvandvaṃ prakṛteḥ param

प्रकृति को भी लाँघकर वह अविनाशी आत्मा के पास जाता है, उस परम देव नारायण के पास जो द्वन्द्वरहित और प्रकृति से परे हैं।

श्लोक 97 (12.307.97)

विमुक्तः सर्वपापेभ्यः प्रविष्टस्तमनामयम् । परमात्मानमगुणं न निवर्तति भारत ॥

vimuktaḥ sarvapāpebhyaḥ praviṣṭastamanāmayam | paramātmānamaguṇaṃ na nivartati bhārata

हे भारत, सब पापों से मुक्त होकर, उस अनामय गुणरहित परमात्मा में प्रविष्ट हुआ वह फिर नहीं लौटता।

श्लोक 98 (12.307.98)

शिष्टं तत्र मनस्तात इन्द्रियाणि च भारत । आगच्छन्ति यथाकालं गुरोः संदेशकारिणः ॥

śiṣṭaṃ tatra manastāta indriyāṇi ca bhārata | āgacchanti yathākālaṃ guroḥ saṃdeśakāriṇaḥ

हे तात, वहाँ मन और इन्द्रियाँ शेष रहती हैं; हे भारत, वे समय पर आती हैं, जैसे गुरु का सन्देश पूरा करने वाले दूत।

श्लोक 99 (12.307.99)

शक्यं चाल्पेन कालेन शान्तिं प्राप्तुं गुणार्थिना । एवमुक्तेन कौन्तेय युक्तज्ञानेन मोक्षिणा ॥

śakyaṃ cālpena kālena śāntiṃ prāptuṃ guṇārthinā | evamuktena kaunteya yuktajñānena mokṣiṇā

हे कौन्तेय, गुणों की कामना करने वाले, इस प्रकार उपदिष्ट, योगयुक्त ज्ञान वाले मोक्षार्थी द्वारा थोड़े ही समय में शान्ति पायी जा सकती है।

श्लोक 100 (12.307.100)

साङ्ख्या राजन्महाप्राज्ञा गच्छन्ति परमां गतिम् । ज्ञानेनानेन कौन्तेय तुल्यं ज्ञानं न विद्यते ॥

sāṅkhyā rājanmahāprājñā gacchanti paramāṃ gatim | jñānenānena kaunteya tulyaṃ jñānaṃ na vidyate

हे राजन्, महाप्राज्ञ सांख्य परम गति को प्राप्त होते हैं; हे कौन्तेय, इस ज्ञान के समान कोई ज्ञान नहीं है।

श्लोक 101 (12.307.101)

अत्र ते संशयो मा भूज्ज्ञानं सांख्यं परं मतम् । अक्षरं ध्रुवमव्यक्तं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥

atra te saṃśayo mā bhūjjñānaṃ sāṃkhyaṃ paraṃ matam | akṣaraṃ dhruvamavyaktaṃ pūrṇaṃ brahma sanātanam

इसमें तुम्हें संशय न हो: सांख्य का ज्ञान परम माना गया है — जो अक्षर, ध्रुव, अव्यक्त, पूर्ण और सनातन ब्रह्म है,

श्लोक 102 (12.307.102)

अनादिमध्यनिधनं निर्द्वन्द्वं कर्तृ शाश्वतम् । कूटस्थं चैव नित्यं च यद्वदन्ति शमात्मकाः ॥

anādimadhyanidhanaṃ nirdvandvaṃ kartṛ śāśvatam | kūṭasthaṃ caiva nityaṃ ca yadvadanti śamātmakāḥ

जो आदि, मध्य और अन्त से रहित है, द्वन्द्वहीन है, कर्ता है, शाश्वत है, कूटस्थ और नित्य है — जिसे शान्तचित्त जन कहते हैं,

श्लोक 103 (12.307.103)

यतः सर्वाः प्रवर्तन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः । यच्च शंसन्ति शास्त्रेषु वदन्ति परमर्षयः ॥

yataḥ sarvāḥ pravartante sargapralayavikriyāḥ | yacca śaṃsanti śāstreṣu vadanti paramarṣayaḥ

जिससे सृष्टि और प्रलय के सब विकार प्रवृत्त होते हैं, जिसे शास्त्रों में कहा गया है और परम ऋषि बताते हैं;

श्लोक 104 (12.307.104)

सर्वे विप्राश्च देवाश्च तथा शमविदो जनाः । ब्रह्मण्यं परमं देवमनन्तं परमच्युतम् ॥

sarve viprāśca devāśca tathā śamavido janāḥ | brahmaṇyaṃ paramaṃ devamanantaṃ paramacyutam

सब ब्राह्मण और देवता तथा शान्ति को जानने वाले जन — परम देव, ब्राह्मणों के हितैषी, अनन्त, परम अच्युत।

श्लोक 105 (12.307.105)

प्रार्थयन्तश्च तं विप्रा वदन्ति गुणबुद्धयः । सम्यग्युक्तास्तथा योगाः साङ्ख्याश्चामितदर्शनाः ॥

prārthayantaśca taṃ viprā vadanti guṇabuddhayaḥ | samyagyuktāstathā yogāḥ sāṅkhyāścāmitadarśanāḥ

उनकी प्रार्थना करते हुए गुणों में बुद्धि लगाने वाले ब्राह्मण उनका वर्णन करते हैं, और सम्यक् रूप से युक्त योगी तथा अपार दृष्टि वाले सांख्य भी।

श्लोक 106 (12.307.106)

अमूर्तेस्तस्य कौन्तेय साङ्ख्यं मूर्तिरिति श्रुतिः । अभिज्ञानानि तस्याहुर्मतं हि भरतर्षभ ॥

amūrtestasya kaunteya sāṅkhyaṃ mūrtiriti śrutiḥ | abhijñānāni tasyāhurmataṃ hi bharatarṣabha

हे कौन्तेय, जो निराकार हैं, उनका सांख्य ही रूप है — ऐसी श्रुति है; और वे उनके पहचान के चिह्न बताते हैं, क्योंकि हे भरतश्रेष्ठ, यही माना हुआ मत है।

श्लोक 107 (12.307.107)

द्विविधानीह भूतानि पृथिव्यां पृथिवीपते । जङ्गमाजङ्गमाख्यानि जङ्गमं तु विशिष्यते ॥

dvividhānīha bhūtāni pṛthivyāṃ pṛthivīpate | jaṅgamājaṅgamākhyāni jaṅgamaṃ tu viśiṣyate

हे पृथ्वीपते, यहाँ पृथ्वी पर दो प्रकार के प्राणी हैं, जो जंगम और अजंगम कहलाते हैं; इनमें जंगम श्रेष्ठ है।

श्लोक 108 (12.307.108)

ज्ञानं महद्यद्धि महत्सु राज । न्वेदेषु साङ्ख्येषु तथैव योगे । यच्चापि दृष्टं विविधं पुराणे । साङ्ख्यागतं तन्निखिलं नरेन्द्र ॥

jñānaṃ mahadyaddhi mahatsu rāja | nvedeṣu sāṅkhyeṣu tathaiva yoge | yaccāpi dṛṣṭaṃ vividhaṃ purāṇe | sāṅkhyāgataṃ tannikhilaṃ narendra

हे राजन्, वेदों में, सांख्यों में और वैसे ही योग में जो महापुरुषों का महान् ज्ञान है, और पुराण में जो नाना प्रकार का ज्ञान दिखता है — हे नरेन्द्र, वह सब सांख्य में आ गया है।

श्लोक 109 (12.307.109)

यच्चेतिहासेषु महत्सु दृष्टं । यच्चार्थशास्त्रे नृप शिष्टजुष्टे । ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किंचि । त्साङ्ख्यागतं तच्च महन्महात्मन् ॥

yaccetihāseṣu mahatsu dṛṣṭaṃ | yaccārthaśāstre nṛpa śiṣṭajuṣṭe | jñānaṃ ca loke yadihāsti kiṃci | tsāṅkhyāgataṃ tacca mahanmahātman

बड़े इतिहासों में जो दिखता है, शिष्टजनों से सेवित अर्थशास्त्र में हे राजन्, जो है, और लोक में जो कुछ भी ज्ञान है — हे महात्मन्, वह सब सांख्य में आ गया है।

श्लोक 110 (12.307.110)

शमश्च दृष्टः परमं बलं च । ज्ञानं च साङ्ख्यं च यथावदुक्तम् । तपांसि सूक्ष्माणि सुखानि चैव । साङ्ख्ये यथावद्विहितानि राजन् ॥

śamaśca dṛṣṭaḥ paramaṃ balaṃ ca | jñānaṃ ca sāṅkhyaṃ ca yathāvaduktam | tapāṃsi sūkṣmāṇi sukhāni caiva | sāṅkhye yathāvadvihitāni rājan

उसमें शान्ति देखी गयी है और परम बल भी; ज्ञान और सांख्य का यथार्थ उपदेश किया गया है; और हे राजन्, सूक्ष्म तप तथा सुख भी सांख्य में यथाविधि बताये गये हैं।

श्लोक 111 (12.307.111)

विपर्यये तस्य हि पार्थ देवा । न्गच्छन्ति साङ्ख्याः सततं सुखेन । तांश्चानुसंचार्य ततः कृतार्थाः । पतन्ति विप्रेषु यतेषु भूयः ॥

viparyaye tasya hi pārtha devā | ngacchanti sāṅkhyāḥ satataṃ sukhena | tāṃścānusaṃcārya tataḥ kṛtārthāḥ | patanti vipreṣu yateṣu bhūyaḥ

हे पार्थ, उसमें चूक हो जाने पर सांख्य सुखपूर्वक निरन्तर देवताओं के पास जाते हैं; और उनके बीच विचरकर कृतार्थ होकर वे फिर संयमी ब्राह्मणों के कुलों में उतर आते हैं।

श्लोक 112 (12.307.112)

हित्वा च देहं प्रविशन्ति मोक्षं । दिवौकसो द्यामिव पार्थ साङ्ख्याः । अतोऽधिकं तेऽभिरता महार्थे । साङ्ख्ये द्विजाः पार्थिव शिष्टजुष्टे ॥

hitvā ca dehaṃ praviśanti mokṣaṃ | divaukaso dyāmiva pārtha sāṅkhyāḥ | ato'dhikaṃ te'bhiratā mahārthe | sāṅkhye dvijāḥ pārthiva śiṣṭajuṣṭe

हे पार्थ, देह छोड़कर सांख्य मोक्ष में प्रवेश करते हैं, जैसे स्वर्गवासी स्वर्ग में। हे पार्थिव, वे द्विज शिष्टजनों से सेवित इस महान् लक्ष्य वाले सांख्य में इन सबसे बढ़कर रमते हैं।

श्लोक 113 (12.307.113)

तेषां न तिर्यग्गमनं हि दृष्टं । नार्वाग्गतिः पापकृताधिवासः । न चाबुधानामपि ते द्विजातयो । ये ज्ञानमेतन्नृपतेऽनुरक्ताः ॥

teṣāṃ na tiryaggamanaṃ hi dṛṣṭaṃ | nārvāggatiḥ pāpakṛtādhivāsaḥ | na cābudhānāmapi te dvijātayo | ye jñānametannṛpate'nuraktāḥ

उनके लिए पशु-योनि में जाना नहीं देखा गया, न नीची गति, न पापियों के बीच निवास; और हे राजन्, इस ज्ञान में अनुरक्त वे द्विज अज्ञानियों में भी नहीं गिने जाते।

श्लोक 114 (12.307.114)

साङ्ख्यं विशालं परमं पुराणं । महार्णवं विमलमुदाहरन्ति । कृत्स्नं च साङ्ख्यं नृपते महात्मा । नारायणो धारयतेऽप्रमेयम् ॥

sāṅkhyaṃ viśālaṃ paramaṃ purāṇaṃ | mahārṇavaṃ vimalamudāharanti | kṛtsnaṃ ca sāṅkhyaṃ nṛpate mahātmā | nārāyaṇo dhārayate'prameyam

वे सांख्य को विशाल, परम और पुरातन, निर्मल महासागर कहते हैं; और हे राजन्, सम्पूर्ण सांख्य को अप्रमेय महात्मा नारायण धारण करते हैं।

श्लोक 115 (12.307.115)

एतन्मयोक्तं नरदेव तत्त्वं । नारायणो विश्वमिदं पुराणम् । स सर्गकाले च करोति सर्गं । संहारकाले च तदत्ति भूयः ॥

etanmayoktaṃ naradeva tattvaṃ | nārāyaṇo viśvamidaṃ purāṇam | sa sargakāle ca karoti sargaṃ | saṃhārakāle ca tadatti bhūyaḥ

हे नरदेव, यह तत्त्व मैंने तुम्हें बता दिया; नारायण ही यह पुरातन विश्व हैं। सृष्टि के समय वे सृष्टि रचते हैं और संहार के समय उसे फिर निगल लेते हैं।

श्लोक 116 (12.307.116)

संहृत्य सर्वं निजदेहसंस्थं । कृत्वाऽप्सु शेते जगदन्तरात्मा ॥

saṃhṛtya sarvaṃ nijadehasaṃsthaṃ | kṛtvā'psu śete jagadantarātmā

सबको अपने देह में समेटकर जगत् के अन्तरात्मा जल में शयन करते हैं।

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