शान्ति पर्व · अध्याय 309
अज्ञानी जीव का योनियों में भटकना
वसिष्ठ करालजनक को अपना उपदेश आगे बढ़ाते हैं। जो आत्मा जाग्रत नहीं हुई, वह गुणों से बँधकर, कोश में बँधे रेशम के कीड़े की तरह, पशु, मनुष्य, देव और नरक की हजारों योनियों में भटकती है। वह सब रोगों को भोगती है और सब तप, नियम, यज्ञ-कर्म और दान को 'मेरा' मान लेती है, जबकि कर्म और भोग प्रकृति के हैं। अन्त में वसिष्ठ उन सब बातों की सूची देते हैं जिन्हें अज्ञानी आत्मा अपना स्वरूप मान बैठती है, जबकि वह वस्तुतः उनके विपरीत है।
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 1 (12.309.1)
एवमप्रतिबुद्धत्वादबुद्धमनुवर्तनात् । देहाद्देहसहस्राणि तथा समभिपद्यते ॥
evamapratibuddhatvādabuddhamanuvartanāt | dehāddehasahasrāṇi tathā samabhipadyate
इस प्रकार जाग्रत न होने से और अज्ञान का अनुसरण करने से वह एक देह से दूसरी देह में, हजारों देहों में, जाता रहता है।
श्लोक 2 (12.309.2)
तिर्यग्योनिसहस्रेषु कदाचिद्देवतास्वपि । उपपद्यति संयोगाद्गुणैः सह गुणक्षयात् ॥
tiryagyonisahasreṣu kadāciddevatāsvapi | upapadyati saṃyogādguṇaiḥ saha guṇakṣayāt
वह गुणों के साथ संयोग से और गुणों के बल से हजारों पशु-योनियों में और कभी देवताओं में भी जन्म लेता है।
श्लोक 3 (12.309.3)
मानुषत्वाद्दिवं याति दिवो मानुष्यमेति च । मानुष्यान्निरयस्थानमनन्तं प्रतिपद्यते ॥
mānuṣatvāddivaṃ yāti divo mānuṣyameti ca | mānuṣyānnirayasthānamanantaṃ pratipadyate
मनुष्य-जन्म से वह स्वर्ग जाता है, स्वर्ग से फिर मनुष्य-जन्म पाता है, और मनुष्य-जन्म से नरक के उस स्थान में पहुँचता है जो अन्तहीन-सा है।
श्लोक 4 (12.309.4)
कोशकारो यथाऽऽत्मानं कीटः समनुरुन्धति । सूत्रतन्तुगुणैर्नित्यं तथाऽयमगुणो गुणैः ॥
kośakāro yathā''tmānaṃ kīṭaḥ samanurundhati | sūtratantuguṇairnityaṃ tathā'yamaguṇo guṇaiḥ
जैसे कोश बनाने वाला कीड़ा अपने ही तन्तुओं से अपने को लपेट लेता है, वैसे ही यह निर्गुण आत्मा सदा गुणों से अपने को लपेटे रहता है।
श्लोक 5 (12.309.5)
द्वन्द्वमेति च निर्द्वन्द्वस्तासु तास्विह योनिषु । शीर्षरोगेऽक्षिरोगे च दन्तशूले गलग्रहे ॥
dvandvameti ca nirdvandvastāsu tāsviha yoniṣu | śīrṣaroge'kṣiroge ca dantaśūle galagrahe
द्वन्द्वों से रहित होकर भी वह उन-उन योनियों में द्वन्द्वों को प्राप्त होता है: सिर का रोग, आँखों का रोग, दाँत का दर्द, गले की जकड़न,
श्लोक 6 (12.309.6)
जलोदरे तृषारोगे ज्वरगण्डे विषूचके । श्वित्रकुष्ठेऽग्निदग्धे च सिध्मापस्मारयोरपि ॥
jalodare tṛṣāroge jvaragaṇḍe viṣūcake | śvitrakuṣṭhe'gnidagdhe ca sidhmāpasmārayorapi
जलोदर, तृषा का रोग, ज्वर, गाँठें, हैजा, श्वित्र और कुष्ठ, आग से जलना, सिध्म और मृगी,
श्लोक 7 (12.309.7)
यानि चान्यानि द्वन्द्वानि प्राकृतानि शरीरिषु । उत्पद्यन्ते विचित्राणि तान्येषोऽप्यभिमन्यते ॥
yāni cānyāni dvandvāni prākṛtāni śarīriṣu | utpadyante vicitrāṇi tānyeṣo'pyabhimanyate
और भी जो नाना प्रकार के प्राकृतिक द्वन्द्व देहधारियों में उत्पन्न होते हैं, उन्हें भी वह अपना मान लेता है।
श्लोक 8 (12.309.8)
अभिमन्यत्यभीमानात्तथैव सुकृतान्यपि ॥
abhimanyatyabhīmānāttathaiva sukṛtānyapi
अभिमान के कारण वह उन्हें अपना मानता है, और अपने पुण्य कर्मों को भी वैसे ही।
श्लोक 9 (12.309.9)
शुक्लवासाश्च दुर्वासाः शायी नित्यमधस्तथा । मण्डूकशायी च तथा वीरासनगतस्तथा ॥
śuklavāsāśca durvāsāḥ śāyī nityamadhastathā | maṇḍūkaśāyī ca tathā vīrāsanagatastathā
वह श्वेत वस्त्र पहनता है या मैले वस्त्र, सदा नीचे भूमि पर सोता है, मेंढक की तरह सिमटकर सोता है, वीरासन में बैठता है,
श्लोक 10 (12.309.10)
चीरधारणमाकाशे शयनं स्थानमेव च । इष्टकाप्रस्तरे चैव कण्टकप्रस्तरे तथा ॥
cīradhāraṇamākāśe śayanaṃ sthānameva ca | iṣṭakāprastare caiva kaṇṭakaprastare tathā
खुले आकाश के नीचे वल्कल पहनकर रहता है, वहीं सोता और खड़ा रहता है, ईंटों या काँटों के बिछौने पर लेटता है,
श्लोक 11 (12.309.11)
भस्मप्रस्तरशायी च भूमिशय्याऽनुलेपनः । वीरस्थानाम्बुपङ्के च शयनं फलकेषु च ॥
bhasmaprastaraśāyī ca bhūmiśayyā'nulepanaḥ | vīrasthānāmbupaṅke ca śayanaṃ phalakeṣu ca
राख पर सोता है, शरीर पर लेप लगाये भूमि पर शयन करता है, वीरस्थान में रहता है, जल के कीचड़ में और तख्तों पर लेटता है,
श्लोक 12 (12.309.12)
विविधासु च शय्यासु फलगृद्ध्यान्वितस्तथा । मुञ्जमेखलनग्नत्वं क्षौमकृष्णाजिनानि च ॥
vividhāsu ca śayyāsu phalagṛddhyānvitastathā | muñjamekhalanagnatvaṃ kṣaumakṛṣṇājināni ca
नाना प्रकार की शय्याओं पर लेटता है और फल की लालसा से भरा रहता है; वह मुञ्ज की मेखला पहनता है, नंगा रहता है, क्षौम वस्त्र और काले मृगचर्म धारण करता है,
श्लोक 13 (12.309.13)
शणवालपरीधानो व्याघ्रचर्मपरिच्छदः । सिंहचर्मपरीधानः पट्टवासास्तथैव च ॥
śaṇavālaparīdhāno vyāghracarmaparicchadaḥ | siṃhacarmaparīdhānaḥ paṭṭavāsāstathaiva ca
सन के वस्त्र पहनता है, बाघ की खाल ओढ़ता है, सिंह की खाल पहनता है, और रेशमी वस्त्र भी वैसे ही,
श्लोक 14 (12.309.14)
फलकपरिधानश्च तथा कण्टकवस्रधृत् । कीटकार्पासवसनश्चीरवासास्तथैव च ॥
phalakaparidhānaśca tathā kaṇṭakavasradhṛt | kīṭakārpāsavasanaścīravāsāstathaiva ca
फलक (छाल की पट्टियों) का परिधान, काँटों के वस्त्र, कीड़ों से बने कपड़े और उसी प्रकार चीर के वस्त्र धारण करता है,
श्लोक 15 (12.309.15)
वस्राणि चान्यानि बहून्यभिमन्यत्यबुद्धिमान् । भोजनानि विचित्राणि रत्नानि विविधानि च ॥
vasrāṇi cānyāni bahūnyabhimanyatyabuddhimān | bhojanāni vicitrāṇi ratnāni vividhāni ca
और भी बहुत-से वस्त्रों को, तथा नाना प्रकार के भोजनों और विविध रत्नों को वह अज्ञानी अपना मान लेता है;
श्लोक 16 (12.309.16)
एकवस्रान्तराशित्वमेककालिकभोजनम् । चतुर्थाष्टमकालश्च षष्ठकालिक एव च ॥
ekavasrāntarāśitvamekakālikabhojanam | caturthāṣṭamakālaśca ṣaṣṭhakālika eva ca
एक वस्त्र में रहता है, दिन में एक बार भोजन करता है, चौथे, आठवें या छठे समय पर भोजन करता है,
श्लोक 17 (12.309.17)
षड्रात्रभोजनश्चैव तथैवाष्टाहभोजनः । सप्तरात्रदशाहारो द्वादशाहिकभोजनः ॥
ṣaḍrātrabhojanaścaiva tathaivāṣṭāhabhojanaḥ | saptarātradaśāhāro dvādaśāhikabhojanaḥ
छह रातों के बाद भोजन करता है, वैसे ही आठ दिन बाद, सात रात या दस दिन में एक बार, या बारह दिन में एक बार भोजन करता है,
श्लोक 18 (12.309.18)
मासोपवासी मूलाशी फलाहारस्तथैव च । वायुभक्षोऽम्बुपिण्याकदधिगोमयभोजनः ॥
māsopavāsī mūlāśī phalāhārastathaiva ca | vāyubhakṣo'mbupiṇyākadadhigomayabhojanaḥ
महीने भर उपवास करता है, कन्द-मूल या फल खाकर रहता है, वायु, जल, खली, दही और गोबर का आहार करता है,
श्लोक 19 (12.309.19)
गोमूत्रभोजनश्चैव शाकपुष्पाद एव च । शेवालभोजनश्चैव तथाऽऽचामेन वर्तयन् ॥
gomūtrabhojanaścaiva śākapuṣpāda eva ca | śevālabhojanaścaiva tathā''cāmena vartayan
गोमूत्र पर रहता है, साग और फूल खाता है, सेवार खाता है, और भात के माँड़ पर जीवन चलाता है,
श्लोक 20 (12.309.20)
वर्तयञ्शीर्णपर्णैश्च प्रकीर्णफलभोजनः । विविधानि च कृच्छ्राणि सेवते सिद्धिकाङ्क्षया ॥
vartayañśīrṇaparṇaiśca prakīrṇaphalabhojanaḥ | vividhāni ca kṛcchrāṇi sevate siddhikāṅkṣayā
झड़े हुए पत्तों और बिखरे फलों पर निर्वाह करता है, और सिद्धि की इच्छा से नाना प्रकार के कठिन तप करता है।
श्लोक 21 (12.309.21)
चान्द्रायणानि विधिवल्लिङ्गानि विविधानि च । चातुराश्रम्यपन्थानमाश्रयत्यपथानपि ॥
cāndrāyaṇāni vidhivalliṅgāni vividhāni ca | cāturāśramyapanthānamāśrayatyapathānapi
वह विधि से चान्द्रायण व्रत करता है, नाना प्रकार के चिह्न धारण करता है, चारों आश्रमों के मार्ग पर चलता है और कुमार्गों का भी आश्रय लेता है,
श्लोक 22 (12.309.22)
उपाश्रमानप्यपरान्पाषण्डान्विविधानपि । विविक्ताश्च शिलाच्छायास्तथा प्रस्रवणानि च ॥
upāśramānapyaparānpāṣaṇḍānvividhānapi | viviktāśca śilācchāyāstathā prasravaṇāni ca
अन्य उपाश्रमों और नाना पाखण्ड-मतों का, एकान्त शिला की छाया और झरनों का,
श्लोक 23 (12.309.23)
पुलिनानि विविक्तानि विविक्तानि वनानि च । देवस्थानानि पुण्यानि विविक्तानि सरांसि च ॥
pulināni viviktāni viviktāni vanāni ca | devasthānāni puṇyāni viviktāni sarāṃsi ca
एकान्त बालू के तटों और एकान्त वनों का, पवित्र देवस्थानों और एकान्त सरोवरों का,
श्लोक 24 (12.309.24)
विविक्ताश्चापि शैलानां गुहा गृहनिभोपमाः । विविक्तानि च जप्यानि व्रतानि विविधानि च ॥
viviktāścāpi śailānāṃ guhā gṛhanibhopamāḥ | viviktāni ca japyāni vratāni vividhāni ca
पर्वतों की घर जैसी एकान्त गुफाओं का, एकान्त जप का और नाना प्रकार के व्रतों का,
श्लोक 25 (12.309.25)
नियमान्विविधांश्चापि विविधानि तपांसि च । यज्ञांश्च विविधाकारान्विधींश्च विविधांस्तथा ॥
niyamānvividhāṃścāpi vividhāni tapāṃsi ca | yajñāṃśca vividhākārānvidhīṃśca vividhāṃstathā
नाना नियमों, नाना तपों, अनेक प्रकार के यज्ञों और विविध विधियों का,
श्लोक 26 (12.309.26)
वणिक्पथं द्विजक्षत्रं वैश्यं शूद्रांस्तथैव च । दानं च विविधाकारं दीनान्धकृपणादिषु ॥
vaṇikpathaṃ dvijakṣatraṃ vaiśyaṃ śūdrāṃstathaiva ca | dānaṃ ca vividhākāraṃ dīnāndhakṛpaṇādiṣu
व्यापार के मार्ग, ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग, वैश्य और उसी प्रकार शूद्रों का, तथा दीन, अन्धे, कंगाल आदि को नाना प्रकार के दान का,
श्लोक 27 (12.309.27)
अभिमन्यत्यसंबोधात्तथैव त्रिविधान्गुणान् । सत्वं रजस्तमश्चैव धर्मार्थौ काम एव च ॥
abhimanyatyasaṃbodhāttathaiva trividhānguṇān | satvaṃ rajastamaścaiva dharmārthau kāma eva ca
नासमझी से वह तीन प्रकार के गुणों को, सत्त्व, रज और तम को, तथा धर्म, अर्थ और काम को भी अपना मान लेता है।
श्लोक 28 (12.309.28)
प्रकृत्याऽऽत्मानमेवात्मा एवं प्रविभजत्युत । स्वधाकारवषट्कारौ स्वाहाकारनमस्क्रियाः ॥
prakṛtyā''tmānamevātmā evaṃ pravibhajatyuta | svadhākāravaṣaṭkārau svāhākāranamaskriyāḥ
इस प्रकार आत्मा प्रकृति के द्वारा अपने को स्वयं ही बाँट लेता है; और स्वधाकार, वषट्कार, स्वाहाकार तथा नमस्कार,
श्लोक 29 (12.309.29)
याजनाध्यापनं दानं तथैवाहुः प्रतिग्रहम् । यजनाध्ययने चैव यच्चान्यदपि किंचन ॥
yājanādhyāpanaṃ dānaṃ tathaivāhuḥ pratigraham | yajanādhyayane caiva yaccānyadapi kiṃcana
यजमानों के यज्ञ कराना, पढ़ाना, दान देना और प्रतिग्रह लेना, यज्ञ करना, अध्ययन करना और भी जो कुछ है,
श्लोक 30 (12.309.30)
जन्ममृत्युविवादे च तथा विशसनेऽपि च । शुभाशुभमयं सर्वमेतदाहुः क्रियाफलम् ॥
janmamṛtyuvivāde ca tathā viśasane'pi ca | śubhāśubhamayaṃ sarvametadāhuḥ kriyāphalam
जन्म और मृत्यु, झगड़े और उसी प्रकार हिंसा: यह सब शुभ-अशुभ से बना है, इसे ही वे कर्मफल कहते हैं।
श्लोक 31 (12.309.31)
प्रकृतिः कुरुते देवी भवं प्रलयमेव च । दिवसान्ते गुणानेतानभ्येत्यैकोऽवतिष्ठते ॥
prakṛtiḥ kurute devī bhavaṃ pralayameva ca | divasānte guṇānetānabhyetyaiko'vatiṣṭhate
देवी प्रकृति सृष्टि और प्रलय दोनों करती है; दिन के अन्त में इन गुणों को समेटकर केवल एक ही शेष रहता है।
श्लोक 32 (12.309.32)
रश्मिजालमिवादित्यस्तत्तत्काले नियच्छति । एवमेषोऽसकृत्सर्वं क्रीडार्थमभिमन्यते ॥
raśmijālamivādityastattatkāle niyacchati | evameṣo'sakṛtsarvaṃ krīḍārthamabhimanyate
जैसे सूर्य अपने किरण-जाल को समेट लेता है, वैसे ही वह उन-उन कालों में इन्हें रोक लेती है; और यह आत्मा बार-बार क्रीड़ा के लिए सबको अपना मान लेता है।
श्लोक 33 (12.309.33)
आत्मरूपगुणानेतान्विविधान्हृदयप्रियान् । एवमेव विकुर्वाणः सर्गप्रलयधर्मिणी ॥
ātmarūpaguṇānetānvividhānhṛdayapriyān | evameva vikurvāṇaḥ sargapralayadharmiṇī
अपने ही रूप वाले, हृदय को प्रिय इन नाना गुणों को अपनाकर और इसी प्रकार विकार को प्राप्त होकर वह सृष्टि और प्रलय के धर्म वाला हो जाता है।
श्लोक 34 (12.309.34)
क्रियां क्रियापथे रक्तस्त्रिगुणांस्त्रिगुणाधिपः । क्रियां क्रियापथोपेतस्तथा तदभिमन्यते ॥
kriyāṃ kriyāpathe raktastriguṇāṃstriguṇādhipaḥ | kriyāṃ kriyāpathopetastathā tadabhimanyate
कर्म के मार्ग में लगा हुआ, तीनों गुणों का स्वामी बनकर वह कर्म को अपना मान लेता है, और कर्म-पथ से युक्त होकर 'वह मैं ही हूँ' ऐसा समझता है।
श्लोक 35 (12.309.35)
प्रकृत्या सर्वमेवेदं जगदन्धीकृतं विभो । रजसा तमसा चैव व्याप्तं सर्वमनेकधा ॥
prakṛtyā sarvamevedaṃ jagadandhīkṛtaṃ vibho | rajasā tamasā caiva vyāptaṃ sarvamanekadhā
हे विभो, प्रकृति के द्वारा यह सारा जगत् अन्धा कर दिया गया है, और रज तथा तम से सब कुछ अनेक प्रकार से घिरा हुआ है।
श्लोक 36 (12.309.36)
एवं द्वन्द्वान्यथैतानि वर्तन्ते मयि नित्यशः । ममैवैतानि जायन्ते धावन्ते तानि मामिति ॥
evaṃ dvandvānyathaitāni vartante mayi nityaśaḥ | mamaivaitāni jāyante dhāvante tāni māmiti
'इस प्रकार ये द्वन्द्व सदा मुझमें रहते हैं; ये मुझसे ही उत्पन्न होते हैं और मुझ पर ही टूट पड़ते हैं।' ऐसा वह मानता है।
श्लोक 37 (12.309.37)
निस्तर्तव्यान्यथैतानि सर्वाणीति नराधिप । मन्यतेऽयं ह्यबुद्धित्वात्तथैव सुकृतान्यपि ॥
nistartavyānyathaitāni sarvāṇīti narādhipa | manyate'yaṃ hyabuddhitvāttathaiva sukṛtānyapi
'ये सब पार करने योग्य हैं,' हे नरेश्वर; अज्ञान के कारण वह ऐसा मानता है, और अपने पुण्य कर्मों के विषय में भी:
श्लोक 38 (12.309.38)
भोक्तव्यानि मयैतानि देवलोकगतेन वै । इहैव चैनं भोक्ष्यामि शुभाशुभफलोदयम् ॥
bhoktavyāni mayaitāni devalokagatena vai | ihaiva cainaṃ bhokṣyāmi śubhāśubhaphalodayam
'देवलोक में जाकर मुझे इनका भोग करना है, और यहीं मैं शुभ-अशुभ फलों के उदय का भोग करूँगा।'
श्लोक 39 (12.309.39)
पुण्यमेव तु कर्तव्यं तत्कृत्वा सुसुखं मम । यावदन्तं च मे सौख्यं जात्यां जात्यां भविष्यति ॥
puṇyameva tu kartavyaṃ tatkṛtvā susukhaṃ mama | yāvadantaṃ ca me saukhyaṃ jātyāṃ jātyāṃ bhaviṣyati
'पुण्य ही करना चाहिए; उसे करके मेरा सुख बहुत होगा, और जन्म-जन्म में अन्त तक मेरा सुख बना रहेगा।'
श्लोक 40 (12.309.40)
भविष्यति च मे दुःखं कृतेनेहाप्यनन्तकम् । महद्दुःखं हि मानुष्यं निरये चापि मज्जनम् ॥
bhaviṣyati ca me duḥkhaṃ kṛtenehāpyanantakam | mahadduḥkhaṃ hi mānuṣyaṃ niraye cāpi majjanam
'और यहाँ किये कर्म से मुझे अनन्त दुःख भी होगा; मनुष्य-जन्म बड़ा दुःख है, और नरक में डूबना भी।'
श्लोक 41 (12.309.41)
निरयाच्चापि मानुष्यं कालेनैष्याम्यहं पुनः । मनुष्यत्वाच्च देवत्वं देवत्वात्पौरुषं पुनः ॥
nirayāccāpi mānuṣyaṃ kālenaiṣyāmyahaṃ punaḥ | manuṣyatvācca devatvaṃ devatvātpauruṣaṃ punaḥ
'और नरक से भी मैं समय पर फिर मनुष्य-जन्म में आऊँगा; मनुष्यत्व से देवत्व में, देवत्व से फिर मनुष्यत्व में,'
श्लोक 42 (12.309.42)
मनुष्यत्वाच्च निरयं पर्यायेणोपगच्छति । य एवं वेत्ति नित्यं वै निरात्मात्मगुणैर्वृतः ॥
manuṣyatvācca nirayaṃ paryāyeṇopagacchati | ya evaṃ vetti nityaṃ vai nirātmātmaguṇairvṛtaḥ
और मनुष्यत्व से बारी-बारी नरक को जाता है। जो सदा ऐसा मानता है, वह सच्चे आत्मा से रहित होकर आत्मा के गुणों से घिरा रहता है,
श्लोक 43 (12.309.43)
तेन देवमनुष्येषु निरये चोपपद्यते । ममत्वेनावृतो नित्यं तत्रैव परिवर्तते ॥
tena devamanuṣyeṣu niraye copapadyate | mamatvenāvṛto nityaṃ tatraiva parivartate
उसी से वह देवों, मनुष्यों और नरक में जन्म लेता है; 'मेरा' के भाव से ढका हुआ वह उसी में सदा चक्कर काटता रहता है।
श्लोक 44 (12.309.44)
सर्गकोटिसहस्राणि मरणान्तासु योनिषु । य एवं कुरुते कर्म शुभाशुभफलात्मकम् ॥
sargakoṭisahasrāṇi maraṇāntāsu yoniṣu | ya evaṃ kurute karma śubhāśubhaphalātmakam
करोड़ों-हजारों सृष्टियों में, मृत्यु में समाप्त होने वाली योनियों में, जो इस प्रकार शुभ-अशुभ फल वाला कर्म करता है,
श्लोक 45 (12.309.45)
स एवं फलमाप्नोति त्रिषु लोकेषु मूर्तिमान् । प्रकृतिः कुरुते कर्म शुभाशुभफलात्मकम् । प्रकृतिश्च तदश्नाति त्रिषु लोकेषु कामगा ॥
sa evaṃ phalamāpnoti triṣu lokeṣu mūrtimān | prakṛtiḥ kurute karma śubhāśubhaphalātmakam | prakṛtiśca tadaśnāti triṣu lokeṣu kāmagā
वही देहधारी होकर तीनों लोकों में उसका फल पाता है। प्रकृति ही शुभ-अशुभ फल वाला कर्म करती है, और प्रकृति ही स्वेच्छा से विचरती हुई तीनों लोकों में उसे भोगती है।
श्लोक 46 (12.309.46)
तिर्यग्योनिमनुष्यत्वे देवलोके तथैव च । त्रीणि स्थानानि चैतानि जानीयात्प्राकृतानिह ॥
tiryagyonimanuṣyatve devaloke tathaiva ca | trīṇi sthānāni caitāni jānīyātprākṛtāniha
पशु-योनि, मनुष्यत्व और देवलोक: इन तीन स्थानों को यहाँ प्रकृति के जानना चाहिए।
श्लोक 47 (12.309.47)
अलिङ्गां प्रकृतिं त्वाहुर्लिङ्गैरनुमिमीमहे । तथैव पौरुषं लिङ्गमनुमानाद्धि गम्यते ॥
aliṅgāṃ prakṛtiṃ tvāhurliṅgairanumimīmahe | tathaiva pauruṣaṃ liṅgamanumānāddhi gamyate
वे प्रकृति को बिना चिह्न की कहते हैं, और हम उसका अनुमान चिह्नों से करते हैं; उसी प्रकार पुरुष का चिह्न भी अनुमान से जाना जाता है।
श्लोक 48 (12.309.48)
स लिङ्गान्तरमासाद्य प्राकृतं लिङ्गमव्रणम् । व्रणद्वाराण्यधिष्ठाय कर्मणाऽऽत्मनि पश्यति ॥
sa liṅgāntaramāsādya prākṛtaṃ liṅgamavraṇam | vraṇadvārāṇyadhiṣṭhāya karmaṇā''tmani paśyati
दूसरा चिह्न पाकर, व्रणरहित प्राकृत चिह्न को पाकर और व्रणों के द्वारों पर अधिष्ठित होकर वह कर्म के द्वारा अपने भीतर देखता है।
श्लोक 49 (12.309.49)
श्रोत्रादीनि तु सर्वाणि पञ्च कर्मेन्द्रियाण्यथ । वागादीनि प्रवर्तन्ते गुणेष्विह गुणैः सह ॥
śrotrādīni tu sarvāṇi pañca karmendriyāṇyatha | vāgādīni pravartante guṇeṣviha guṇaiḥ saha
श्रोत्र आदि सब इन्द्रियाँ और वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ यहाँ गुणों के बीच गुणों के साथ ही प्रवृत्त होती हैं।
श्लोक 50 (12.309.50)
अहमेतानि वै सर्वं मय्येतानीन्द्रियाणि ह । निरिन्द्रियो हि मन्येत व्रणवानस्मि निर्व्रणः ॥
ahametāni vai sarvaṃ mayyetānīndriyāṇi ha | nirindriyo hi manyeta vraṇavānasmi nirvraṇaḥ
'मैं ही ये सब हूँ; ये इन्द्रियाँ मुझमें हैं।' ऐसा वह मानता है; इन्द्रियरहित होकर भी वह समझता है कि 'मैं व्रणों वाला हूँ', जबकि वह व्रणरहित है।
श्लोक 51 (12.309.51)
अलिङ्गो लिङ्गमात्मानमकालः कालमात्मनः । असत्वं सत्वमात्मानमतत्त्वं तत्त्वमात्मनः ॥
aliṅgo liṅgamātmānamakālaḥ kālamātmanaḥ | asatvaṃ satvamātmānamatattvaṃ tattvamātmanaḥ
चिह्नरहित होकर भी वह चिह्न को अपना स्वरूप मानता है; कालरहित होकर काल को; सत्त्वरहित होकर सत्त्व को; तत्त्वरहित होकर तत्त्व को;
श्लोक 52 (12.309.52)
अमृत्युर्मृत्युमात्मानमचरश्चरमात्मनः । अक्षेत्रः क्षेत्रमात्मानमसर्गः सर्गमात्मनः ॥
amṛtyurmṛtyumātmānamacaraścaramātmanaḥ | akṣetraḥ kṣetramātmānamasargaḥ sargamātmanaḥ
अमर होकर भी वह मृत्यु को अपना स्वरूप मानता है; अचल होकर चल को; क्षेत्ररहित होकर क्षेत्र को; सृष्टिरहित होकर सृष्टि को;
श्लोक 53 (12.309.53)
अतपास्तप आत्मानमगतिर्गतिमात्मनः । अभवो भवमात्मानमभयो भयमात्मनः ॥
atapāstapa ātmānamagatirgatimātmanaḥ | abhavo bhavamātmānamabhayo bhayamātmanaḥ
तपरहित होकर तप को; गतिरहित होकर गति को; भवरहित होकर भव को; निर्भय होकर भय को;
श्लोक 54 (12.309.54)
अकर्ता कर्तृ चात्मानमबीजो बीजमात्मनः । अक्षरः क्षरमात्मानमबुद्धिस्त्वभिमन्यते ॥
akartā kartṛ cātmānamabījo bījamātmanaḥ | akṣaraḥ kṣaramātmānamabuddhistvabhimanyate
अकर्ता होकर कर्ता को; बीजरहित होकर बीज को। अक्षर आत्मा अज्ञान के कारण क्षर को अपना स्वरूप मान बैठता है।