शान्ति पर्व · अध्याय 311
वसिष्ठ द्वारा योग, साङ्ख्य और पच्चीसवें तत्त्व का निरूपण
जनक स्वीकार करते हैं कि एकत्व और नानात्व का भेद अभी उनके लिए स्पष्ट नहीं है और वे उसे पूरा सुनना चाहते हैं। वसिष्ठ पहले योग की साधना बताते हैं: इन्द्रियों को विषयों से हटाकर मन को पत्थर की भाँति स्थिर करना, जब तक कि वायुरहित स्थान के दीपक की तरह अपने भीतर आत्मा का दर्शन न हो। फिर वे साङ्ख्य की गणना बताते हैं: अव्यक्त प्रकृति से महत्, अहंकार, भूत और इन्द्रियाँ, उनकी उत्पत्ति और लय, तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, अर्थात् पच्चीसवाँ तत्त्व, जो अपने को जान लेने पर अकेला रह जाता है और जिसे जानने वालों को कोई भय नहीं रहता।
जनक उवाच
श्लोक 1 (12.311.1)
नानात्वैकत्वमित्युक्तं त्वयैतदृषिसत्तम । पश्यामि वाभिसंदिग्धमेतयोर्वै निदर्शनम् ॥
nānātvaikatvamityuktaṃ tvayaitadṛṣisattama | paśyāmi vābhisaṃdigdhametayorvai nidarśanam
हे ऋषिश्रेष्ठ, आपने नानात्व और एकत्व की बात कही, किन्तु इन दोनों का दृष्टान्त मुझे अब भी संदिग्ध दिखाई देता है।
श्लोक 2 (12.311.2)
तथाऽबुद्धप्रबुद्धाभ्यां बुध्यमानस्य चानघ । स्थूलबुद्ध्या न पश्यामि तत्त्वमेतन्न संशयः ॥
tathā'buddhaprabuddhābhyāṃ budhyamānasya cānagha | sthūlabuddhyā na paśyāmi tattvametanna saṃśayaḥ
इसी प्रकार, हे निष्पाप, अबुद्ध और प्रबुद्ध के सम्बन्ध में बोध पाने वाले का यह तत्त्व मैं अपनी स्थूल बुद्धि से नहीं देख पाता, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 3 (12.311.3)
अक्षरक्षरयोर्युक्तं त्वया यदपि कारणम् । तदप्यस्थिरबुद्धित्वात्प्रनष्टमिव मेऽनघ ॥
akṣarakṣarayoryuktaṃ tvayā yadapi kāraṇam | tadapyasthirabuddhitvātpranaṣṭamiva me'nagha
और हे निष्पाप, अक्षर और क्षर के विषय में आपने जो उचित कारण बताया था, वह भी मेरी चंचल बुद्धि के कारण मानो मेरे हाथ से निकल गया है।
श्लोक 4 (12.311.4)
तदेतच्छ्रोतुमिच्छामि नानात्वैकत्वदर्शनम् । प्रबुद्धमप्रबुद्धं च बुध्यमानं च तत्त्वतः ॥
tadetacchrotumicchāmi nānātvaikatvadarśanam | prabuddhamaprabuddhaṃ ca budhyamānaṃ ca tattvataḥ
मैं यही सुनना चाहता हूँ: नानात्व और एकत्व का दर्शन, और प्रबुद्ध, अप्रबुद्ध तथा बोध पाने वाले का यथार्थ स्वरूप।
श्लोक 5 (12.311.5)
विद्याविद्ये च भगवन्नक्षरं क्षरमेव च । साङ्ख्यं योगं च कार्त्स्न्येन पृथक्चैवापृथक्च ह ॥
vidyāvidye ca bhagavannakṣaraṃ kṣarameva ca | sāṅkhyaṃ yogaṃ ca kārtsnyena pṛthakcaivāpṛthakca ha
और हे भगवन्, विद्या और अविद्या, अक्षर और क्षर, तथा साङ्ख्य और योग, ये सब पूर्ण रूप से, अलग भी और अभिन्न भी, मुझे बताइए।
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 6 (12.311.6)
हन्त ते संप्रवक्ष्यामि यदेतदनुपृच्छसि । योगकृत्यं महाराज पृथगेव शृणुष्व मे ॥
hanta te saṃpravakṣyāmi yadetadanupṛcchasi | yogakṛtyaṃ mahārāja pṛthageva śṛṇuṣva me
अच्छा, तुम जो पूछ रहे हो, उसे मैं भली-भाँति बताऊँगा। हे महाराज, योग का कर्तव्य मुझसे अलग से सुनो।
श्लोक 7 (12.311.7)
योगकृत्यं तु योगानां ध्यानमेव परं बलम् । तच्चापि द्विविधं ध्यानमाहुर्वेदविदो जनाः ॥
yogakṛtyaṃ tu yogānāṃ dhyānameva paraṃ balam | taccāpi dvividhaṃ dhyānamāhurvedavido janāḥ
योगों का कर्तव्य ध्यान ही है, जो उनका परम बल है; और वेद के जानने वाले कहते हैं कि वह ध्यान भी दो प्रकार का है।
श्लोक 8 (12.311.8)
एकाग्रता च मनसः प्राणायामस्तथैव च । प्राणायामस्तु सगुणो निर्गुणो मनसस्तथा ॥
ekāgratā ca manasaḥ prāṇāyāmastathaiva ca | prāṇāyāmastu saguṇo nirguṇo manasastathā
एक मन की एकाग्रता और दूसरा प्राणायाम। प्राणायाम सगुण है और मन की एकाग्रता निर्गुण।
श्लोक 9 (12.311.9)
मूत्रोत्सर्गपुरीषे च भोजने च नराधिप । द्विकालं नाभियुज्जीत शेषं युञ्जीत तत्परः ॥
mūtrotsargapurīṣe ca bhojane ca narādhipa | dvikālaṃ nābhiyujjīta śeṣaṃ yuñjīta tatparaḥ
हे नराधिप, मूत्र-त्याग, मल-त्याग और भोजन के समय वह दो कालों में अभ्यास न करे; शेष समय में उसी में लगा रहकर अभ्यास करे।
श्लोक 10 (12.311.10)
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो निवर्त्य मनसा मुनिः । दशद्वादशभिर्वापि चतुर्विंशात्परं ततः ॥
indriyāṇīndriyārthebhyo nivartya manasā muniḥ | daśadvādaśabhirvāpi caturviṃśātparaṃ tataḥ
मन के द्वारा इन्द्रियों को उनके विषयों से लौटाकर मुनि, दस या बारह के द्वारा भी, फिर चौबीस से परे की ओर ध्यान लगाए।
श्लोक 11 (12.311.11)
तं चोदनाभिर्मतिमानात्मानं चोदयेदथ । तिष्ठन्तमजरं यं तु यत्तदुक्तं मनीषिभिः ॥
taṃ codanābhirmatimānātmānaṃ codayedatha | tiṣṭhantamajaraṃ yaṃ tu yattaduktaṃ manīṣibhiḥ
तब बुद्धिमान मनुष्य इन प्रेरणाओं से उस आत्मा को प्रेरित करे, जो अजर होकर स्थित है और जिसके विषय में मनीषियों ने कहा है।
श्लोक 12 (12.311.12)
तैश्चात्मा सततं योज्य इत्येवमनुशुश्रुम । द्रुतं ह्यहीनमनसो नान्यथेति विनिश्चयः ॥
taiścātmā satataṃ yojya ityevamanuśuśruma | drutaṃ hyahīnamanaso nānyatheti viniścayaḥ
इनके द्वारा आत्मा को निरन्तर जोड़ना चाहिए, ऐसा हमने सुना है। जिसका मन क्षीण नहीं होता, उसके लिए यह शीघ्र सिद्ध होता है; यह अन्यथा नहीं है, यही निश्चय है।
श्लोक 13 (12.311.13)
विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो लध्वाहारो जितेन्द्रियः । पूर्वरात्रेऽपररात्रे च धारयेत मनोऽऽत्मनि ॥
vimuktaḥ sarvasaṅgebhyo ladhvāhāro jitendriyaḥ | pūrvarātre'pararātre ca dhārayeta mano''tmani
सब आसक्तियों से मुक्त, हल्का आहार करने वाला और जितेन्द्रिय होकर वह रात के पहले और पिछले पहर में मन को आत्मा में स्थिर करे।
श्लोक 14 (12.311.14)
स्थिरीकृत्येन्द्रियग्रामं मनसा मिथिलेश्वर । मनो बुद्ध्या स्थिरं कृत्वा पाषाण इव निश्चलः ॥
sthirīkṛtyendriyagrāmaṃ manasā mithileśvara | mano buddhyā sthiraṃ kṛtvā pāṣāṇa iva niścalaḥ
हे मिथिलेश्वर, मन से इन्द्रियों के समूह को स्थिर करके और बुद्धि से मन को स्थिर करके वह पत्थर की भाँति निश्चल हो जाए।
श्लोक 15 (12.311.15)
स्थाणुवच्चाप्यकम्पः स्याद्दारुवच्चापि निश्चलः । बुधा विधिविधानज्ञास्तदा युक्तं प्रचक्षते ॥
sthāṇuvaccāpyakampaḥ syāddāruvaccāpi niścalaḥ | budhā vidhividhānajñāstadā yuktaṃ pracakṣate
वह खूँटे के समान अकम्प और काठ के समान निश्चल हो जाए। तब विधि-विधान को जानने वाले ज्ञानी उसे युक्त कहते हैं।
श्लोक 16 (12.311.16)
न शृणोति न चाघ्राति न रस्यति न पश्यति । न च स्पर्शं विजानाति न संकल्पयते मनः ॥
na śṛṇoti na cāghrāti na rasyati na paśyati | na ca sparśaṃ vijānāti na saṃkalpayate manaḥ
वह न सुनता है, न सूँघता है, न चखता है, न देखता है; न स्पर्श को जानता है और न मन कोई संकल्प करता है।
श्लोक 17 (12.311.17)
न चाभिमन्यते किंचिन्न च बुध्यति काष्ठवत् । तदा प्रकृतिमापन्नं युक्तमाहुर्मनीषिणः ॥
na cābhimanyate kiṃcinna ca budhyati kāṣṭhavat | tadā prakṛtimāpannaṃ yuktamāhurmanīṣiṇaḥ
वह किसी वस्तु में अभिमान नहीं करता और काठ के समान कुछ भी नहीं जानता। तब मनीषी उसे प्रकृति को प्राप्त हुआ युक्त कहते हैं।
श्लोक 18 (12.311.18)
निर्वाते हि यथा दीप्यन्दीपस्तद्वत्प्रकाशते । निर्लिङ्गो विचलश्चोर्ध्वं न तिर्यग्गतिमाप्नुयात् ॥
nirvāte hi yathā dīpyandīpastadvatprakāśate | nirliṅgo vicalaścordhvaṃ na tiryaggatimāpnuyāt
जैसे वायुरहित स्थान में जलता हुआ दीपक स्थिर प्रकाशित होता है, वैसे ही वह दिखाई देता है: निर्लिङ्ग, ऊपर की ओर गतिमान, वह तिरछी गति को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 19 (12.311.19)
तदा तमनुपश्येत यस्मिन्दृष्टे तु कथ्यते । हृदयस्थोऽन्तरात्मेति ज्ञेयो ज्ञस्तात मद्विधैः ॥
tadā tamanupaśyeta yasmindṛṣṭe tu kathyate | hṛdayastho'ntarātmeti jñeyo jñastāta madvidhaiḥ
तब वह उसे देखे, जिसे देख लेने पर कहा जाता है, "हृदय में स्थित अन्तरात्मा"; हे तात, मेरे जैसे लोगों को ज्ञ को इसी प्रकार जानना चाहिए।
श्लोक 20 (12.311.20)
विधूम इव सप्तार्चिरादित्य इव रश्मिमान् । वैद्युतोऽग्निरिवाकाशे दृश्यतेऽऽत्मा तथाऽऽत्मनि ॥
vidhūma iva saptārcirāditya iva raśmimān | vaidyuto'gnirivākāśe dṛśyate''tmā tathā''tmani
धूमरहित अग्नि के समान, किरणों वाले सूर्य के समान और आकाश में बिजली की अग्नि के समान आत्मा आत्मा में दिखाई देता है।
श्लोक 21 (12.311.21)
संपश्यन्ति महात्मानो धृतिमन्तो मनीषिणः । ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्था ह्ययोनिममृतात्मकम् ॥
saṃpaśyanti mahātmāno dhṛtimanto manīṣiṇaḥ | brāhmaṇā brahmayonisthā hyayonimamṛtātmakam
महात्मा, धैर्यवान, मनीषी और ब्रह्मयोनि में स्थित ब्राह्मण उस अयोनि और अमृतस्वरूप को देखते हैं।
श्लोक 22 (12.311.22)
तदेवाहुरणुभ्योऽणु तन्महद्भ्यो महत्तरम् । तत्तत्र सर्वभूतेषु ध्रुवं तिष्ठन्न दृश्यते ॥
tadevāhuraṇubhyo'ṇu tanmahadbhyo mahattaram | tattatra sarvabhūteṣu dhruvaṃ tiṣṭhanna dṛśyate
उसी को वे अणु से भी अणु और महान से भी महान कहते हैं। वह सब प्राणियों के भीतर दृढ़ता से स्थित रहकर भी दिखाई नहीं देता।
श्लोक 23 (12.311.23)
बुद्धिद्रव्येण दृश्येत मनोदीपेन लोककृत् । महतस्तमसस्तात पारे तिष्ठन्न तामसः ॥
buddhidravyeṇa dṛśyeta manodīpena lokakṛt | mahatastamasastāta pāre tiṣṭhanna tāmasaḥ
लोकों का रचयिता बुद्धिरूपी द्रव्य से और मनरूपी दीपक से देखा जा सकता है। हे तात, वह महान अन्धकार के पार स्थित है और तमोगुण वाला नहीं है।
श्लोक 24 (12.311.24)
स च मानस इत्युक्तस्तत्त्वज्ञैर्वेदपारगैः । विमलो वितमस्कश्च निर्लिङ्गोऽलिङ्गसंज्ञकः ॥
sa ca mānasa ityuktastattvajñairvedapāragaiḥ | vimalo vitamaskaśca nirliṅgo'liṅgasaṃjñakaḥ
वेदों के पारगामी तत्त्वज्ञ उसे "मानस" कहते हैं: वह निर्मल, अन्धकाररहित, निर्लिङ्ग और अलिङ्ग नाम से जाना जाने वाला है।
श्लोक 25 (12.311.25)
योगमेतत्तु योगानां मन्ये योगस्य लक्षणम् । एवं पश्यं प्रपश्यन्ति आत्मस्थमजरं परम् ॥
yogametattu yogānāṃ manye yogasya lakṣaṇam | evaṃ paśyaṃ prapaśyanti ātmasthamajaraṃ param
योगों में यही मैं योग का लक्षण मानता हूँ: इस प्रकार देखने वाले आत्मा में स्थित उस अजर परम को देख लेते हैं।
श्लोक 26 (12.311.26)
योगदर्शनमेतावदुक्तं ते तत्त्वतो मया । साङ्ख्यज्ञानं प्रवक्ष्यामि परिसंख्यानदर्शनम् ॥
yogadarśanametāvaduktaṃ te tattvato mayā | sāṅkhyajñānaṃ pravakṣyāmi parisaṃkhyānadarśanam
योग का दर्शन इतना ही मैंने तुम्हें यथार्थ रूप से बताया। अब मैं साङ्ख्य का ज्ञान बताऊँगा, जो गणना का दर्शन है।
श्लोक 27 (12.311.27)
अव्यक्तमाहुः प्रकृतिं परां प्रकृतिवादिनः । तस्मान्महत्समुत्पन्नं द्वितीयं राजसत्तम ॥
avyaktamāhuḥ prakṛtiṃ parāṃ prakṛtivādinaḥ | tasmānmahatsamutpannaṃ dvitīyaṃ rājasattama
प्रकृति को मानने वाले अव्यक्त को परा प्रकृति कहते हैं। हे राजश्रेष्ठ, उससे दूसरा तत्त्व महत् उत्पन्न हुआ।
श्लोक 28 (12.311.28)
अहंकारस्तु महतस्तृतीय इति नः श्रुतम् । पञ्चभूतान्यहंकारादाहुः साङ्ख्यनिदर्शिनः ॥
ahaṃkārastu mahatastṛtīya iti naḥ śrutam | pañcabhūtānyahaṃkārādāhuḥ sāṅkhyanidarśinaḥ
महत् के बाद तीसरा अहंकार है, ऐसा हमने सुना है; और साङ्ख्य का निदर्शन करने वाले कहते हैं कि अहंकार से पाँच भूत उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 29 (12.311.29)
एताः प्रकृतयश्चाष्टौ विकाराश्चापि षोडश । पञ्च चैव विशेषा वै तथा पञ्चेन्द्रियाणि च ॥
etāḥ prakṛtayaścāṣṭau vikārāścāpi ṣoḍaśa | pañca caiva viśeṣā vai tathā pañcendriyāṇi ca
ये आठ प्रकृतियाँ हैं, और सोलह विकार भी हैं; और पाँच विशेष तथा उसी प्रकार पाँच इन्द्रियाँ भी।
श्लोक 30 (12.311.30)
एतावदेव तत्त्वानां साङ्ख्या आहुर्मनीषिणः । साङ्ख्ये विधिविधानज्ञा नित्यं साङ्ख्यपथे रताः ॥
etāvadeva tattvānāṃ sāṅkhyā āhurmanīṣiṇaḥ | sāṅkhye vidhividhānajñā nityaṃ sāṅkhyapathe ratāḥ
तत्त्वों की इतनी ही गणना मनीषी साङ्ख्य बताते हैं। साङ्ख्य में वे विधि-विधान के ज्ञाता हैं और सदा साङ्ख्य के मार्ग में रत रहते हैं।
श्लोक 31 (12.311.31)
यस्माद्यदभिजायेत तत्तत्रैव प्रलीयते । लीयन्ते प्रतिलोमानि सृज्यन्ते चान्तरात्मना ॥
yasmādyadabhijāyeta tattatraiva pralīyate | līyante pratilomāni sṛjyante cāntarātmanā
जिससे जो उत्पन्न होता है, वह उसी में लीन हो जाता है। वे प्रतिलोम क्रम से लीन होते हैं और अन्तरात्मा द्वारा रचे जाते हैं।
श्लोक 32 (12.311.32)
अनुलोमेन जायन्ते लीयन्ते प्रतिलोमतः । गुणा गुणेषु सततं सागरस्योर्मयो यथा ॥
anulomena jāyante līyante pratilomataḥ | guṇā guṇeṣu satataṃ sāgarasyormayo yathā
वे अनुलोम क्रम से उत्पन्न होते हैं और प्रतिलोम क्रम से लीन होते हैं; गुण गुणों में निरन्तर, समुद्र की लहरों की तरह।
श्लोक 33 (12.311.33)
सर्वप्रलय एतावान्प्रकृतेर्नृपसत्तम । एकत्वं प्रलये चास्य बहुत्वं च यदाऽसृजत् ॥
sarvapralaya etāvānprakṛternṛpasattama | ekatvaṃ pralaye cāsya bahutvaṃ ca yadā'sṛjat
हे नृपश्रेष्ठ, प्रकृति का सर्वप्रलय इतना ही है: प्रलय में एकत्व और जब उसने सृष्टि की तब बहुत्व।
श्लोक 34 (12.311.34)
एवमेव च राजेन्द्र विज्ञेयं ज्ञेयचिन्तकैः । अधिष्ठाता य इत्युक्तस्तस्याप्येतन्निदर्शनम् ॥
evameva ca rājendra vijñeyaṃ jñeyacintakaiḥ | adhiṣṭhātā ya ityuktastasyāpyetannidarśanam
और हे राजेन्द्र, जानने योग्य पर चिन्तन करने वालों को इसे इसी प्रकार समझना चाहिए। जो अधिष्ठाता कहा गया है, उसके लिए भी यही दृष्टान्त है।
श्लोक 35 (12.311.35)
एकत्वं च बहुत्वं च प्रकृतेरनुतत्त्ववान् । एकत्वं प्रलये चास्य बहुत्वं च प्रवर्तनात् ॥
ekatvaṃ ca bahutvaṃ ca prakṛteranutattvavān | ekatvaṃ pralaye cāsya bahutvaṃ ca pravartanāt
तत्त्व को जानने वाले के अनुसार एकत्व और बहुत्व प्रकृति के हैं: प्रलय में उसका एकत्व और प्रवृत्त होने से उसका बहुत्व।
श्लोक 36 (12.311.36)
बहुधाऽऽत्मानमकरोत्प्रकृतिः प्रसवात्मिका । तच्च क्षेत्रं महानात्मा पञ्चविंशोऽधितिष्ठति ॥
bahudhā''tmānamakarotprakṛtiḥ prasavātmikā | tacca kṣetraṃ mahānātmā pañcaviṃśo'dhitiṣṭhati
प्रसव करने के स्वभाव वाली प्रकृति ने अपने को अनेक रूपों में किया; और उस क्षेत्र पर महान आत्मा, पच्चीसवाँ, अधिष्ठित है।
श्लोक 37 (12.311.37)
अधिष्ठातेति राजेन्द्र प्रोच्यते यतिसत्तमैः । अधिष्ठानादधिष्ठाता क्षेत्राणामिति नः श्रुतम् ॥
adhiṣṭhāteti rājendra procyate yatisattamaiḥ | adhiṣṭhānādadhiṣṭhātā kṣetrāṇāmiti naḥ śrutam
हे राजेन्द्र, श्रेष्ठ यतियों द्वारा उसे अधिष्ठाता कहा जाता है; अधिष्ठित होने से वह क्षेत्रों का अधिष्ठाता है, ऐसा हमने सुना है।
श्लोक 38 (12.311.38)
क्षेत्रं जानाति चाव्यक्तं क्षेत्रज्ञ इति चोच्यते । अव्यक्तके पुरे शेते पुरुषश्चेति कथ्यते ॥
kṣetraṃ jānāti cāvyaktaṃ kṣetrajña iti cocyate | avyaktake pure śete puruṣaśceti kathyate
वह अव्यक्त क्षेत्र को जानता है, इसलिए क्षेत्रज्ञ कहा जाता है; वह अव्यक्त पुर में शयन करता है, इसलिए पुरुष कहा जाता है।
श्लोक 39 (12.311.39)
अन्यदेव च क्षेत्रं स्यादन्यः क्षेत्रज्ञ उच्यते । क्षेत्रमव्यक्तमित्युक्तं ज्ञाता वै पञ्चविंशकः ॥
anyadeva ca kṣetraṃ syādanyaḥ kṣetrajña ucyate | kṣetramavyaktamityuktaṃ jñātā vai pañcaviṃśakaḥ
क्षेत्र अलग वस्तु है और क्षेत्रज्ञ अलग कहा जाता है। क्षेत्र अव्यक्त कहा गया है और ज्ञाता पच्चीसवाँ है।
श्लोक 40 (12.311.40)
अन्यदेव च ज्ञानं स्यादन्यज्ज्ञेयमुच्यते । ज्ञानमव्यक्तमित्युक्तं ज्ञेयो वै पञ्चविंशकः ॥
anyadeva ca jñānaṃ syādanyajjñeyamucyate | jñānamavyaktamityuktaṃ jñeyo vai pañcaviṃśakaḥ
ज्ञान अलग है और ज्ञेय अलग कहा जाता है। ज्ञान अव्यक्त कहा गया है और ज्ञेय पच्चीसवाँ है।
श्लोक 41 (12.311.41)
अव्यक्तं क्षेत्रमित्युक्तं यथासत्त्वं तथेश्वरम् । अनीश्वरमतत्त्वं च तत्त्वं तत्पञ्चविंशकम् ॥
avyaktaṃ kṣetramityuktaṃ yathāsattvaṃ tatheśvaram | anīśvaramatattvaṃ ca tattvaṃ tatpañcaviṃśakam
अव्यक्त को क्षेत्र कहा गया है, वैसे ही सत्त्व और वैसे ही ईश्वर; वह पच्चीसवाँ अनीश्वर है, अतत्त्व है और फिर भी तत्त्व है।
श्लोक 42 (12.311.42)
साङ्ख्यदर्शनमेतावत्परिसङ्ख्यानदर्शनम् । साङ्ख्याः प्रकुर्वते चैव प्रकृतिं च प्रचक्षते ॥
sāṅkhyadarśanametāvatparisaṅkhyānadarśanam | sāṅkhyāḥ prakurvate caiva prakṛtiṃ ca pracakṣate
साङ्ख्य का दर्शन इतना ही है, जो गणना का दर्शन है। साङ्ख्य इसका प्रतिपादन करते हैं और प्रकृति का वर्णन करते हैं।
श्लोक 43 (12.311.43)
तत्त्वानि च चतुर्विंशत्परिसंख्याय तत्त्वतः । साङ्ख्याः सह प्रकृत्या तु निस्तत्त्वः पञ्चविंशकः ॥
tattvāni ca caturviṃśatparisaṃkhyāya tattvataḥ | sāṅkhyāḥ saha prakṛtyā tu nistattvaḥ pañcaviṃśakaḥ
चौबीस तत्त्वों की यथार्थ गणना करके साङ्ख्य उन्हें प्रकृति सहित गिनते हैं; किन्तु पच्चीसवाँ निस्तत्त्व है।
श्लोक 44 (12.311.44)
पञ्चविंशोऽप्रबुद्धात्मा बुध्यमान इति स्मृतः । यदा तु बुध्यतेऽऽत्मानं तदा भवति केवलः ॥
pañcaviṃśo'prabuddhātmā budhyamāna iti smṛtaḥ | yadā tu budhyate''tmānaṃ tadā bhavati kevalaḥ
अप्रबुद्ध आत्मा वाला पच्चीसवाँ "बोध पाने वाला" कहा जाता है। परन्तु जब वह अपने को जान लेता है, तब वह केवल अकेला रह जाता है।
श्लोक 45 (12.311.45)
सम्यग्दर्शनमेतावद्भाषितं तव तत्त्वतः । एवमेतद्विजानन्तः साम्यतां प्रतियान्त्युत ॥
samyagdarśanametāvadbhāṣitaṃ tava tattvataḥ | evametadvijānantaḥ sāmyatāṃ pratiyāntyuta
यह इतना ही सम्यक् दर्शन मैंने तुम्हें यथार्थ रूप से कहा। इसे इस प्रकार जानने वाले समता को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 46 (12.311.46)
सम्यङ्निदर्शनं नाम प्रत्यक्षं प्रकृतेस्तथा । गुणतत्त्वाद्यथैतानि निर्गुणोऽन्यस्तथा भवेत् ॥
samyaṅnidarśanaṃ nāma pratyakṣaṃ prakṛtestathā | guṇatattvādyathaitāni nirguṇo'nyastathā bhavet
यह सम्यक् निदर्शन कहलाता है, प्रकृति का प्रत्यक्ष भी: कि ये गुणतत्त्व से हैं और उनसे भिन्न एक अन्य निर्गुण हो सकता है।
श्लोक 47 (12.311.47)
न त्वेवं वर्तमानानामावृत्तिर्विद्यते पुनः । विद्यतेऽक्षरभावत्वे स परात्परमव्ययम् ॥
na tvevaṃ vartamānānāmāvṛttirvidyate punaḥ | vidyate'kṣarabhāvatve sa parātparamavyayam
किन्तु इस प्रकार रहने वालों का फिर लौटना नहीं होता। अक्षर भाव में वह परात्पर अव्यय स्थित है।
श्लोक 48 (12.311.48)
पश्येरन्नेकमतयो न सम्यक् तेषु दर्शनम् । ते व्यक्तं प्रतिपद्यन्ते पुनः पुनररिंदम ॥
paśyerannekamatayo na samyak teṣu darśanam | te vyaktaṃ pratipadyante punaḥ punarariṃdama
एक ही मत वाले देख तो लें, किन्तु उनमें सम्यक् दर्शन नहीं होता। हे शत्रुदमन, वे बार-बार व्यक्त को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 49 (12.311.49)
सर्वमेतद्विजानन्तो नासर्वस्य प्रबोधनात् । व्यक्तीभूता भविष्यन्ति व्यक्तस्य वशवर्तिनः ॥
sarvametadvijānanto nāsarvasya prabodhanāt | vyaktībhūtā bhaviṣyanti vyaktasya vaśavartinaḥ
यह सब जानते हुए भी, जो सर्व नहीं है उसके बोध के बिना, वे व्यक्त हो जाएँगे और व्यक्त के वश में रहेंगे।
श्लोक 50 (12.311.50)
सर्वमव्यक्तमित्युक्तमसर्वः पञ्चविंशकः । य एनमभिजानन्ति न भयं तेषु विद्यते ॥
sarvamavyaktamityuktamasarvaḥ pañcaviṃśakaḥ | ya enamabhijānanti na bhayaṃ teṣu vidyate
सब कुछ अव्यक्त कहा गया है, किन्तु पच्चीसवाँ सर्व नहीं है। जो उसे जानते हैं, उन्हें भय नहीं रहता।