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शान्ति पर्व · अध्याय 312

वसिष्ठ का विद्या और अविद्या पर उपदेश

मिथिला के राजा जनक को उपदेश देते हुए वसिष्ठ साङ्ख्य की रीति से विद्या और अविद्या का स्वरूप समझाते हैं: अव्यक्त अविद्या है, पचीसवाँ तत्त्व विद्या है, और दोनों को क्षर तथा अक्षर क्यों कहा जाता है। वे बताते हैं कि प्रकृति और उसके गुण कैसे लय होते हैं, और पचीसवाँ तत्त्व यह जानकर कि वह प्रकृति से भिन्न है, जाल के पीछे चलनेवाली मछली की भाँति अपने पुराने आचरण पर पछताता है और प्रकृति से मुँह मोड़ लेता है। अन्त में वे कहते हैं कि साङ्ख्य और योग एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं।

अध्याय 311अध्याय-सूचीअध्याय 313

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 1 (12.312.1)

साङ्ख्यदर्शनमेतावदुक्तं ते नृपसत्तम । विद्याविद्ये त्विदानीं मे त्वं निबोधानुपूर्वशः ॥

sāṅkhyadarśanametāvaduktaṃ te nṛpasattama | vidyāvidye tvidānīṃ me tvaṃ nibodhānupūrvaśaḥ

हे नृपश्रेष्ठ, साङ्ख्य का दर्शन तुम्हें इतना बता दिया गया। अब तुम मुझसे विद्या और अविद्या के विषय में क्रम से सुनो।

श्लोक 2 (12.312.2)

अविद्यामाहुरव्यक्तं सर्गप्रलयधर्मिणीम् । सर्गप्रलयनिर्मुक्तो विद्यो वै पञ्चविंशकः ॥

avidyāmāhuravyaktaṃ sargapralayadharmiṇīm | sargapralayanirmukto vidyo vai pañcaviṃśakaḥ

सृष्टि और प्रलय जिसका स्वभाव है, उस अव्यक्त को अविद्या कहते हैं। सृष्टि और प्रलय से मुक्त पचीसवाँ तत्त्व विद्या है।

श्लोक 3 (12.312.3)

एकत्वं च बहुत्वं च प्रकृतेरनु तत्त्ववित् । परस्परं तु विद्यां वै त्वं निबोधानुपूर्वशः । यथोक्तमृषिभिस्तात साङ्ख्यस्यास्य निदर्शनम् ॥

ekatvaṃ ca bahutvaṃ ca prakṛteranu tattvavit | parasparaṃ tu vidyāṃ vai tvaṃ nibodhānupūrvaśaḥ | yathoktamṛṣibhistāta sāṅkhyasyāsya nidarśanam

तत्त्व को जाननेवाला प्रकृति में एकत्व और बहुत्व दोनों को देखता है। हे तात, अब तुम ऋषियों के कहे अनुसार, एक-दूसरे के सम्बन्ध में, विद्या को क्रम से समझो; यही इस साङ्ख्य का निदर्शन है।

श्लोक 4 (12.312.4)

कर्मेन्द्रियाणां सर्वेषां विद्या बुद्धीन्द्रियं स्मृतम् । बुद्धीन्द्रियाणां च तथा विशेषा इति नः श्रुतम् ॥

karmendriyāṇāṃ sarveṣāṃ vidyā buddhīndriyaṃ smṛtam | buddhīndriyāṇāṃ ca tathā viśeṣā iti naḥ śrutam

सब कर्मेन्द्रियों के लिए ज्ञानेन्द्रियाँ विद्या मानी गयी हैं, और ज्ञानेन्द्रियों के लिए विशेष (विषय) — ऐसा हमने सुना है।

श्लोक 5 (12.312.5)

विशेषाणां मनस्तेषां विद्यामाहुर्मनीषिणः । मनसः पञ्चभूतानि विद्या इत्यभिचक्षते ॥

viśeṣāṇāṃ manasteṣāṃ vidyāmāhurmanīṣiṇaḥ | manasaḥ pañcabhūtāni vidyā ityabhicakṣate

विशेषों की विद्या मन को मनीषी बताते हैं, और मन की विद्या पाँच महाभूतों को कहते हैं।

श्लोक 6 (12.312.6)

अहंकारस्तु भूतानां पञ्चानां नात्र संशयः । अहंकारस्य च तथा बुद्धिर्विद्या नरेश्वर ॥

ahaṃkārastu bhūtānāṃ pañcānāṃ nātra saṃśayaḥ | ahaṃkārasya ca tathā buddhirvidyā nareśvara

पाँचों भूतों की विद्या अहंकार है, इसमें कोई संशय नहीं; और हे नरेश्वर, अहंकार की विद्या बुद्धि है।

श्लोक 7 (12.312.7)

बुद्धेः प्रकृतिरव्यक्तं तत्त्वानां परमेश्वरम् । विद्या ज्ञेया नरश्रेष्ठ विधिश्च परमः स्मृतः ॥

buddheḥ prakṛtiravyaktaṃ tattvānāṃ parameśvaram | vidyā jñeyā naraśreṣṭha vidhiśca paramaḥ smṛtaḥ

बुद्धि की प्रकृति अव्यक्त है, जो तत्त्वों में परम ईश्वर है। हे नरश्रेष्ठ, यह विद्या जाननी चाहिए, और यही परम विधि मानी गयी है।

श्लोक 8 (12.312.8)

अव्यक्तस्य परं प्राहुर्विद्यां वै पञ्चविंशकम् । सर्वस्य सर्वमित्युक्तं ज्ञेयं ज्ञानस्य पार्थिव ॥

avyaktasya paraṃ prāhurvidyāṃ vai pañcaviṃśakam | sarvasya sarvamityuktaṃ jñeyaṃ jñānasya pārthiva

अव्यक्त से परे पचीसवें को विद्या कहते हैं। हे राजन्, कहा गया है कि सबका सब कुछ ही ज्ञान का ज्ञेय है।

श्लोक 9 (12.312.9)

ज्ञानमव्यक्तमित्युक्तं ज्ञेयो वै पञ्चविंशकः । तथैव ज्ञानमव्यक्तं विज्ञाता पञ्चविंशक ॥

jñānamavyaktamityuktaṃ jñeyo vai pañcaviṃśakaḥ | tathaiva jñānamavyaktaṃ vijñātā pañcaviṃśaka

ज्ञान को अव्यक्त कहा गया है और ज्ञेय को पचीसवाँ। उसी प्रकार ज्ञान अव्यक्त है और जाननेवाला पचीसवाँ है।

श्लोक 10 (12.312.10)

विद्याविद्यार्थितत्त्वेन मयोक्ता ते विशेषतः । अक्षरं च क्षरं चैव यदुक्तं तन्निबोध मे ॥

vidyāvidyārthitattvena mayoktā te viśeṣataḥ | akṣaraṃ ca kṣaraṃ caiva yaduktaṃ tannibodha me

विद्या और अविद्या के जिज्ञासित तत्त्व को मैंने तुम्हें विस्तार से बता दिया। अब अक्षर और क्षर के विषय में जो कहा गया है, उसे मुझसे सुनो।

श्लोक 11 (12.312.11)

उभावेतौ क्षरावुक्तावुभावेतौ क्षराक्षरौ । कारणं तु प्रवक्ष्यामि यथाख्यातो न जानतः ॥

ubhāvetau kṣarāvuktāvubhāvetau kṣarākṣarau | kāraṇaṃ tu pravakṣyāmi yathākhyāto na jānataḥ

ये दोनों ही क्षर कहे गये हैं, और दोनों ही क्षर-अक्षर हैं। जो नहीं जानता, उसके लिए मैं इसका कारण, जैसा कहा गया है, बताऊँगा।

श्लोक 12 (12.312.12)

अनादिनिधनावेतावुभावेवेश्वरौ मतौ । तत्त्वसंज्ञावुभावेतौ प्रोच्यते ज्ञानचिन्तकैः ॥

anādinidhanāvetāvubhāveveśvarau matau | tattvasaṃjñāvubhāvetau procyate jñānacintakaiḥ

ये दोनों ही आदि और अन्त से रहित तथा ईश्वर माने गये हैं। ज्ञान का चिन्तन करनेवाले दोनों को ही तत्त्व नाम से पुकारते हैं।

श्लोक 13 (12.312.13)

सर्गप्रलयधर्मत्वादव्यक्तं प्राहुरक्षरम् । तदेतद्गुणसर्गाय विकुर्वाणं पुनःपुनः ॥

sargapralayadharmatvādavyaktaṃ prāhurakṣaram | tadetadguṇasargāya vikurvāṇaṃ punaḥpunaḥ

सृष्टि और प्रलय के स्वभाववाला होने से अव्यक्त को अक्षर कहते हैं। वही गुणों की सृष्टि के लिए बार-बार विकार को प्राप्त होता है।

श्लोक 14 (12.312.14)

गुणानां महदादीनामुत्पद्यन्ते परम्पराः । अधिष्ठानं क्षेत्रमाहुरेतत्तत्पञ्चविंशकम् ॥

guṇānāṃ mahadādīnāmutpadyante paramparāḥ | adhiṣṭhānaṃ kṣetramāhuretattatpañcaviṃśakam

महत् आदि गुणों से एक के बाद एक परम्परा से उत्पत्तियाँ होती रहती हैं। जो अधिष्ठान है, उसे क्षेत्र कहते हैं, और वही पचीसवाँ है।

श्लोक 15 (12.312.15)

यदा तु गुणजालं तदव्यक्तात्मनि संक्षिपेत् । तदा सह गुणैस्तैस्तु पञ्चविंशो विलीयते ॥

yadā tu guṇajālaṃ tadavyaktātmani saṃkṣipet | tadā saha guṇaistaistu pañcaviṃśo vilīyate

जब गुणों का जाल अव्यक्त आत्मा में समेट लिया जाता है, तब पचीसवाँ भी उन गुणों के साथ लीन हो जाता है।

श्लोक 16 (12.312.16)

गुणा गुणेषु लीयन्ते तदैका प्रकृतिर्भवेत् । क्षेत्रज्ञोऽपि यदा तात तत्क्षेत्रे संप्रलीयते ॥

guṇā guṇeṣu līyante tadaikā prakṛtirbhavet | kṣetrajño'pi yadā tāta tatkṣetre saṃpralīyate

गुण गुणों में लीन हो जाते हैं, तब एकमात्र प्रकृति रह जाती है। और हे तात, जब क्षेत्रज्ञ भी अपने क्षेत्र में पूरी तरह लीन हो जाता है,

श्लोक 17 (12.312.17)

तदाऽक्षरत्वं प्रकृतिर्गच्छते गुणसंज्ञिता । निर्गुणत्वं च वैदेह गुणेष्वप्रतिवर्तनात् ॥

tadā'kṣaratvaṃ prakṛtirgacchate guṇasaṃjñitā | nirguṇatvaṃ ca vaideha guṇeṣvaprativartanāt

तब गुण नामवाली प्रकृति अक्षरत्व को प्राप्त होती है, और हे विदेहराज, गुणों में न लौटने के कारण निर्गुणत्व को भी प्राप्त होती है।

श्लोक 18 (12.312.18)

एवमेव च क्षेत्रज्ञः क्षेत्रज्ञानपरिक्षयात् । प्रकृत्या निर्गुणस्त्वेष इत्येवमनुशुश्रुम ॥

evameva ca kṣetrajñaḥ kṣetrajñānaparikṣayāt | prakṛtyā nirguṇastveṣa ityevamanuśuśruma

इसी प्रकार क्षेत्र-ज्ञान के पूर्ण क्षय होने पर क्षेत्रज्ञ भी अपने स्वभाव से निर्गुण हो जाता है, ऐसा हमने सुना है।

श्लोक 19 (12.312.19)

क्षरो भवत्येष यदा तदा गुणवती मिथः । प्रकृतिं त्वभिजानाति निर्गुणत्वं तथाऽऽत्मनः ॥

kṣaro bhavatyeṣa yadā tadā guṇavatī mithaḥ | prakṛtiṃ tvabhijānāti nirguṇatvaṃ tathā''tmanaḥ

जब वह क्षर हो जाता है, तब वह बदले में गुणवती प्रकृति को पहचान लेता है और अपने निर्गुण होने को भी जान लेता है।

श्लोक 20 (12.312.20)

तदा विशुद्धो भवति प्रकृतेः परिवर्जनात् । अन्योऽहमन्येयमिति यदा बुध्यति बुद्धिमान् ॥

tadā viśuddho bhavati prakṛteḥ parivarjanāt | anyo'hamanyeyamiti yadā budhyati buddhimān

जब बुद्धिमान यह समझ लेता है कि "मैं और हूँ, और यह प्रकृति और है," तब वह प्रकृति के त्याग से शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 21 (12.312.21)

तदैषा त्वन्यतामेति न च मिश्रत्वतां व्रजेत् । प्रकृत्या चैव राजेन्द्र मिश्रोऽनन्यश्च दृश्यते ॥

tadaiṣā tvanyatāmeti na ca miśratvatāṃ vrajet | prakṛtyā caiva rājendra miśro'nanyaśca dṛśyate

तब वह प्रकृति भिन्नता को प्राप्त होती है और वह मिश्रभाव में नहीं जाता; फिर भी हे राजेन्द्र, प्रकृति के कारण वह मिला हुआ और अभिन्न-सा दिखायी देता है।

श्लोक 22 (12.312.22)

यदा तु गुणजालं तत्प्राकृतं विजुगुप्सते । पश्यते चापरं पश्यं तदा पश्यन्न संस्वजेत् ॥

yadā tu guṇajālaṃ tatprākṛtaṃ vijugupsate | paśyate cāparaṃ paśyaṃ tadā paśyanna saṃsvajet

जब वह प्रकृति के उस गुण-जाल से घृणा करने लगता है और देखता हुआ दूसरे को देख लेता है, तब देखता हुआ वह उसमें आसक्त नहीं होता।

श्लोक 23 (12.312.23)

किमहं कृतवानेवं योहं कालमिमं जनम् । यदा मत्स्योदकं ज्ञानमनुवर्तितवांस्तदा । मत्स्यो जालं ह्यविज्ञानादनुवर्तितवानिह ॥

kimahaṃ kṛtavānevaṃ yohaṃ kālamimaṃ janam | yadā matsyodakaṃ jñānamanuvartitavāṃstadā | matsyo jālaṃ hyavijñānādanuvartitavāniha

मैंने यह क्या किया कि इतने समय तक मैं इस जन के पीछे चलता रहा! तब मैं उसके पीछे वैसे ही चला, जैसे मछली अपने जाने हुए जल के पीछे चलती है — जैसे मछली यहाँ अज्ञान के कारण जाल के पीछे चल पड़ती है।

श्लोक 24 (12.312.24)

अहमेव हि संमोहादन्यमन्यं जनाज्जनम् । मत्स्यो यथोदकज्ञानादनुवर्तितवानहम् ॥

ahameva hi saṃmohādanyamanyaṃ janājjanam | matsyo yathodakajñānādanuvartitavānaham

मोह के कारण मैं ही एक जन के बाद दूसरे जन के पीछे चलता रहा, जैसे मछली जल के ज्ञान से उसके पीछे चलती है।

श्लोक 25 (12.312.25)

मत्स्योऽन्यत्वं यथा ज्ञानादुदकान्नाभिमन्यते । आत्मानं तद्वदज्ञानादन्यत्वं चैव वेद्म्यहम् ॥

matsyo'nyatvaṃ yathā jñānādudakānnābhimanyate | ātmānaṃ tadvadajñānādanyatvaṃ caiva vedmyaham

जैसे मछली अपने ज्ञान के कारण जल से अपने को भिन्न नहीं मानती, वैसे ही मैंने अज्ञान से आत्मा को उसी से एक माना; और अब मैं भेद को जानता हूँ।

श्लोक 26 (12.312.26)

ममास्तु धिगबुद्धस्य योऽहमज्ञ इमं पुनः । अनुवर्तितवान्मोहादन्यमन्यं जनाज्जनम् ॥

mamāstu dhigabuddhasya yo'hamajña imaṃ punaḥ | anuvartitavānmohādanyamanyaṃ janājjanam

मुझ अबुद्ध को धिक्कार है, जो अज्ञानवश मोह से फिर इसी के पीछे चलता रहा, एक जन से दूसरे जन तक।

श्लोक 27 (12.312.27)

अयमत्र भवेद्बन्धुरनेन सह मे क्षमम् । साम्यमेकत्वतां यास्ये यादृशस्तादृशस्त्वहम् ॥

ayamatra bhavedbandhuranena saha me kṣamam | sāmyamekatvatāṃ yāsye yādṛśastādṛśastvaham

यहाँ यही मेरा बन्धु हो; इसके साथ समता और एकता पाना मेरे लिए उचित है। जैसा यह है, वैसा ही मैं हो जाऊँगा।

श्लोक 28 (12.312.28)

तुल्यतामिह पश्यामि सदृशोऽहमनेन वै । अयं हि विमलोऽव्यक्तमहमीदृशकस्तथा ॥

tulyatāmiha paśyāmi sadṛśo'hamanena vai | ayaṃ hi vimalo'vyaktamahamīdṛśakastathā

मैं यहाँ समानता देखता हूँ; मैं इसके सदृश ही हूँ। यह निर्मल और अव्यक्त है, और मैं भी वैसा ही हूँ।

श्लोक 29 (12.312.29)

योऽहमज्ञानसंमोहादज्ञया संप्रवृत्तवान् । ससङ्गयाऽहं निःसङ्गः स्थितः कालमिमं त्वहम् ॥

yo'hamajñānasaṃmohādajñayā saṃpravṛttavān | sasaṅgayā'haṃ niḥsaṅgaḥ sthitaḥ kālamimaṃ tvaham

मैं, जो अज्ञान के मोह से उस अज्ञ के साथ प्रवृत्त हो गया था, स्वयं आसक्तिरहित होकर भी आसक्त रहनेवाली उसी के साथ इतने समय तक टिका रहा।

श्लोक 30 (12.312.30)

अनयाऽहं वशीभूतः कालमेतं न बुद्धवान् । उच्चमध्यमनीचानां तामहं कथमावसे ॥

anayā'haṃ vaśībhūtaḥ kālametaṃ na buddhavān | uccamadhyamanīcānāṃ tāmahaṃ kathamāvase

उसके वश में होकर मैं इतने समय तक जाग न सका। ऊँचे, मध्यम और नीच जनों में रहनेवाली उसके साथ मैं कैसे रहूँ?

श्लोक 31 (12.312.31)

समानयानया चेह सहवासमहं कथम् । गच्छाम्यबुद्धभावत्वादेषेदानीं स्थिरो भवे ॥

samānayānayā ceha sahavāsamahaṃ katham | gacchāmyabuddhabhāvatvādeṣedānīṃ sthiro bhave

अपने बराबर बनी रहनेवाली इस साथिन के साथ मैं यहाँ कैसे रहूँ? जाग न होने के कारण मैं इसके साथ चलता रहा; अब मैं स्थिर हो जाऊँ।

श्लोक 32 (12.312.32)

सहवासं न यास्यामि कालमेतद्धि वञ्चनात् । वञ्चितोस्म्यनया यद्धि निर्विकारो विकारया ॥

sahavāsaṃ na yāsyāmi kālametaddhi vañcanāt | vañcitosmyanayā yaddhi nirvikāro vikārayā

अब मैं उसके साथ नहीं रहूँगा। इतने समय तक मैं ठगा गया; मैं विकाररहित हूँ और विकारवाली इसने मुझे छला।

श्लोक 33 (12.312.33)

न चायमपराधोऽस्या ह्यपराधो ह्ययं मम । योऽहमत्राभवं सक्तः पराङ्मुखमुपस्थितः ॥

na cāyamaparādho'syā hyaparādho hyayaṃ mama | yo'hamatrābhavaṃ saktaḥ parāṅmukhamupasthitaḥ

इसमें इसका कोई अपराध नहीं है; अपराध मेरा ही है कि मैं यहाँ आसक्त हो गया और मुँह फेरे खड़ा रहा।

श्लोक 34 (12.312.34)

ततोस्मि बहुरूपासु स्थितो मूर्तिष्वमूर्तिमान् । अमूर्तश्चापि मूर्तात्मा ममत्वेन प्रधर्षितः ॥

tatosmi bahurūpāsu sthito mūrtiṣvamūrtimān | amūrtaścāpi mūrtātmā mamatvena pradharṣitaḥ

इस प्रकार मैं अनेक रूपोंवाली मूर्तियों में स्थित रहा — अमूर्त होकर भी मूर्तिमान, और मूर्त स्वरूपवाला होकर भी अमूर्त — "मेरा" होने के भाव से दबा हुआ।

श्लोक 35 (12.312.35)

प्रकृतेरनयत्वेन तासु तास्विह योनिषु । निर्ममस्य ममत्वेन किं कृतं तासु तासु च ॥

prakṛteranayatvena tāsu tāsviha yoniṣu | nirmamasya mamatvena kiṃ kṛtaṃ tāsu tāsu ca

प्रकृति के कुमार्ग पर ले जाने से, उन-उन योनियों में, "मेरापन" से मुझ निर्मम का क्या सिद्ध हुआ?

श्लोक 36 (12.312.36)

योनीषु वर्तमानेन नष्टसंज्ञेन चेतसा । न ममात्रानया कार्यमहंकारकृतात्मना ॥

yonīṣu vartamānena naṣṭasaṃjñena cetasā | na mamātrānayā kāryamahaṃkārakṛtātmanā

योनियों में भटकते हुए, चेतना खो चुके चित्त से, अहंकार के बनाये हुए स्वरूपवाला मैं — अब मुझे इसके साथ यहाँ कोई प्रयोजन नहीं है।

श्लोक 37 (12.312.37)

आत्मानं बहुधा कृत्वा येयं भूयो युनक्ति माम् । इदानीमेष बुद्धोस्मि निर्ममो निरहंकृतः ॥

ātmānaṃ bahudhā kṛtvā yeyaṃ bhūyo yunakti mām | idānīmeṣa buddhosmi nirmamo nirahaṃkṛtaḥ

जो अपने को अनेक रूपों में बाँटकर मुझे फिर अपने साथ जोड़ लेती है — अब मैं जाग गया हूँ; न मुझमें "मेरापन" है, न अहंकार।

श्लोक 38 (12.312.38)

ममत्वमनया नित्यमहंकारकृतात्मकम् । अपेत्याहमिमां हित्वा संश्रयिष्ये निरामयम् ॥

mamatvamanayā nityamahaṃkārakṛtātmakam | apetyāhamimāṃ hitvā saṃśrayiṣye nirāmayam

अहंकार से रचे हुए इस "मेरेपन" को, जिसे इसने सदा उपजाया है, छोड़कर और इसे त्यागकर मैं निरामय की शरण लूँगा।

श्लोक 39 (12.312.39)

अनेन साम्यं यास्यामि नानयाऽहमचेतसा । क्षमं मम सहानेन नैकत्वमनया सह ॥

anena sāmyaṃ yāsyāmi nānayā'hamacetasā | kṣamaṃ mama sahānena naikatvamanayā saha

मैं इस पुरुष के साथ समता को प्राप्त होऊँगा, इस अचेतन के साथ नहीं। इसके साथ रहना मेरे लिए उचित है; इस प्रकृति के साथ मेरी एकता नहीं है।

श्लोक 40 (12.312.40)

एवं परमसंबोधात्पञ्चविंशोऽनुबुद्धवान् । अक्षरत्वं नियच्छेत त्यक्त्वा क्षरमनामयम् ॥

evaṃ paramasaṃbodhātpañcaviṃśo'nubuddhavān | akṣaratvaṃ niyaccheta tyaktvā kṣaramanāmayam

इस प्रकार परम बोध से जाग उठा पचीसवाँ तत्त्व क्षर को त्यागकर, रोगरहित होकर, अक्षरत्व को धारण करे।

श्लोक 41 (12.312.41)

अव्यक्तं व्यक्तकर्माणं सगुणं निर्गुणं तथा । निर्गुणं परमं दृष्ट्वा तादृग्भवति मैथिल ॥

avyaktaṃ vyaktakarmāṇaṃ saguṇaṃ nirguṇaṃ tathā | nirguṇaṃ paramaṃ dṛṣṭvā tādṛgbhavati maithila

अव्यक्त, जिसके कर्म व्यक्त होते हैं, जो सगुण भी है और निर्गुण भी — हे मैथिल, परम निर्गुण को देखकर मनुष्य वैसा ही हो जाता है।

श्लोक 42 (12.312.42)

अक्षरक्षरयोरेतदुक्तं तत्वनिदर्शनम् । मयेह ज्ञानसंपन्नं यथाश्रुतिनिदर्शनात् ॥

akṣarakṣarayoretaduktaṃ tatvanidarśanam | mayeha jñānasaṃpannaṃ yathāśrutinidarśanāt

अक्षर और क्षर के तत्त्व का यह निदर्शन मैंने यहाँ, श्रुति के निदर्शन के अनुसार, ज्ञान से परिपूर्ण करके कह दिया।

श्लोक 43 (12.312.43)

निःसंदिग्धं च सूक्ष्मं च विबुद्धं विमलं यथा । प्रवक्ष्यामि तु ते भूयस्तन्निबोध यथाश्रुतम् ॥

niḥsaṃdigdhaṃ ca sūkṣmaṃ ca vibuddhaṃ vimalaṃ yathā | pravakṣyāmi tu te bhūyastannibodha yathāśrutam

जैसा मैंने सुना है, वैसा ही मैं तुम्हें फिर बताऊँगा — जो संशयरहित, सूक्ष्म, जागृत और निर्मल है। उसे सुनो।

श्लोक 44 (12.312.44)

साङ्ख्ययोगौ मया प्रोक्तौ शास्त्रद्वयनिदर्शनात् । यदेव शास्त्रं साङ्ख्योक्तं योगदर्शनमेव तत् ॥

sāṅkhyayogau mayā proktau śāstradvayanidarśanāt | yadeva śāstraṃ sāṅkhyoktaṃ yogadarśanameva tat

मैंने साङ्ख्य और योग को दोनों शास्त्रों के निदर्शन के अनुसार कहा है। जो शास्त्र साङ्ख्य में कहा गया है, वही योग का दर्शन भी है।

श्लोक 45 (12.312.45)

प्रबोधनकरं ज्ञानं साङ्ख्यानामवनीपते । विस्पष्टं प्रोच्यते तत्र शिष्याणां हितकाम्यया ॥

prabodhanakaraṃ jñānaṃ sāṅkhyānāmavanīpate | vispaṣṭaṃ procyate tatra śiṣyāṇāṃ hitakāmyayā

हे पृथ्वीपति, साङ्ख्य का ज्ञान जगानेवाला है; शिष्यों के हित की कामना से वहाँ वह अत्यन्त स्पष्ट रूप से कहा गया है।

श्लोक 46 (12.312.46)

पृथक्चैवमिदं शास्त्रमित्याहुः कुशला जनाः । अस्मिंश्च शास्त्रे योगानां पुनर्दधि पुनः शरः ॥

pṛthakcaivamidaṃ śāstramityāhuḥ kuśalā janāḥ | asmiṃśca śāstre yogānāṃ punardadhi punaḥ śaraḥ

कुशल जन कहते हैं कि यह शास्त्र अलग ही है; और योगों के इस शास्त्र में फिर दही है, फिर मलाई।

श्लोक 47 (12.312.47)

पञ्चविंशात्परं तत्त्वं न पश्यति नराधिप । साङ्ख्यानां तु परं तत्त्वं यथावदनुवर्णितम् ॥

pañcaviṃśātparaṃ tattvaṃ na paśyati narādhipa | sāṅkhyānāṃ tu paraṃ tattvaṃ yathāvadanuvarṇitam

हे नराधिप, वह पचीसवें से परे कोई तत्त्व नहीं देखता; साङ्ख्यों का परम तत्त्व यथार्थ रूप से वर्णित हुआ है।

श्लोक 48 (12.312.48)

बुद्धमप्रतिबुद्धं च बुध्यमानं च तत्त्वतः । बुध्यमानं च बुद्धं च प्राहुर्योगनिदर्शनम् ॥

buddhamapratibuddhaṃ ca budhyamānaṃ ca tattvataḥ | budhyamānaṃ ca buddhaṃ ca prāhuryoganidarśanam

बुद्ध, अप्रबुद्ध और बुध्यमान को तत्त्व से — बुध्यमान और बुद्ध को — योग का निदर्शन कहते हैं।

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