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शान्ति पर्व · अध्याय 313

बुद्ध और अबुद्ध

वसिष्ठ मिथिला के राजा जनक को बुद्ध और अबुद्ध का उपदेश पूरा करते हैं: अव्यक्त, पचीसवें और छब्बीसवें तत्त्व का परस्पर सम्बन्ध क्या है, और जाग रहा जीव केवल से मिलकर कैसे मुक्त होता है। वे बताते हैं कि यह परम उपदेश किस गुणवाले शिष्य को दिया जा सकता है, और जनक से कहते हैं कि उन्हें कोई भय नहीं। फिर भीष्म युधिष्ठिर को बताते हैं कि यह ज्ञान हिरण्यगर्भ से वसिष्ठ और नारद के द्वारा उन तक पहुँचा, और जिसने अज्ञान का सागर पार कर लिया, वह रजस् और तमस् से रहित हो जाता है।

अध्याय 312अध्याय-सूचीअध्याय 314

वसिष्ठ उवाच

श्लोक 1 (12.313.1)

अप्रबुद्धमथाव्यक्तमिमं गुणविधिं शृणु । गुणान्धारयते ह्येषा सृजत्याक्षिपते तथा ॥

aprabuddhamathāvyaktamimaṃ guṇavidhiṃ śṛṇu | guṇāndhārayate hyeṣā sṛjatyākṣipate tathā

अब अप्रबुद्ध अव्यक्त के इस गुण-विधान को सुनो: यह प्रकृति गुणों को धारण करती है, उन्हें रचती है और उन्हें समेट भी लेती है।

श्लोक 2 (12.313.2)

अजस्रं त्विह क्रीडार्थं विकरोति जनाधिप । आत्मानं बहुधा कृत्वा तान्येव प्रविचक्षते ॥

ajasraṃ tviha krīḍārthaṃ vikaroti janādhipa | ātmānaṃ bahudhā kṛtvā tānyeva pravicakṣate

हे जनाधिप, वह यहाँ निरन्तर क्रीड़ा के लिए अपने को बदलती रहती है; अपने को अनेक रूपों में बाँटकर वही रूप देखे जाते हैं।

श्लोक 3 (12.313.3)

एतदेवं विकुर्वाणं बुध्यमानो न बुध्यते । अव्यक्तबोधनाच्चैव बुध्यमानं वदन्त्यपि ॥

etadevaṃ vikurvāṇaṃ budhyamāno na budhyate | avyaktabodhanāccaiva budhyamānaṃ vadantyapi

इस प्रकार विकार को प्राप्त होती हुई उस प्रकृति को बुध्यमान नहीं जानता; और अव्यक्त के बोध के कारण उसे भी "बुध्यमान" कहते हैं।

श्लोक 4 (12.313.4)

न त्वेव बुध्यतेऽव्यक्तं सगुणं वाऽथ निर्गुणम् । कदाचित्त्वेव खल्वेतदाहुरप्रतिबुद्धकम् ॥

na tveva budhyate'vyaktaṃ saguṇaṃ vā'tha nirguṇam | kadācittveva khalvetadāhurapratibuddhakam

सगुण हो या निर्गुण, अव्यक्त कभी जागता नहीं; इसीलिए कभी-कभी उसे अप्रतिबुद्ध कहते हैं।

श्लोक 5 (12.313.5)

बुध्यते यदि वाऽव्यक्तमेतद्वै पञ्चविंशकम् । बुध्यमानो भवत्येष सङ्गात्मक इति श्रुतिः । अनेनाप्रतिबुद्धेति वदन्त्यव्यक्तमच्युतम् ॥

budhyate yadi vā'vyaktametadvai pañcaviṃśakam | budhyamāno bhavatyeṣa saṅgātmaka iti śrutiḥ | anenāpratibuddheti vadantyavyaktamacyutam

यदि अव्यक्त को यह पचीसवाँ जगा दे, तब वह बुध्यमान होकर आसक्त स्वभाववाला हो जाता है, ऐसा श्रुति कहती है। इसीलिए अविनाशी अव्यक्त को अप्रतिबुद्ध कहते हैं।

श्लोक 6 (12.313.6)

अव्यक्तबोधनाच्चापि बुध्यमानं वदन्त्युत । पञ्चविंशं महात्मानं न चासावपि बुध्यते ॥

avyaktabodhanāccāpi budhyamānaṃ vadantyuta | pañcaviṃśaṃ mahātmānaṃ na cāsāvapi budhyate

अव्यक्त के बोध के कारण उसे भी बुध्यमान कहते हैं; और वह भी पचीसवें महात्मा को नहीं जान पाता।

श्लोक 7 (12.313.7)

षङ्विंशं विमलं बुद्धमप्रमेयं सनातनम् । स तु तं पञ्चविंशं च चतुर्विशं च बुध्यते ॥

ṣaṅviṃśaṃ vimalaṃ buddhamaprameyaṃ sanātanam | sa tu taṃ pañcaviṃśaṃ ca caturviśaṃ ca budhyate

वह छब्बीसवें को, जो निर्मल, बुद्ध, अप्रमेय और सनातन है, तथा पचीसवें और चौबीसवें को जान लेता है।

श्लोक 8 (12.313.8)

दृश्यादृश्यौ ह्यनुगतावुभावेव महाद्युती । अव्यक्तं तत्तु तद्ब्रह्म बुध्यते तात केवलम् ॥

dṛśyādṛśyau hyanugatāvubhāveva mahādyutī | avyaktaṃ tattu tadbrahma budhyate tāta kevalam

दृश्य और अदृश्य, ये दोनों महातेजस्वी, उसी से व्याप्त हैं। हे तात, "केवल" (वह अद्वितीय तत्त्व) उसी अव्यक्त, उस ब्रह्म को जानता है।

श्लोक 9 (12.313.9)

केवलं पञ्चविंशं च चतुर्विशं च पश्यति । बुध्यमानो यदात्मानमन्योऽहमिति मन्यते ॥

kevalaṃ pañcaviṃśaṃ ca caturviśaṃ ca paśyati | budhyamāno yadātmānamanyo'hamiti manyate

"केवल" पचीसवें और चौबीसवें को देखता है। जब जाग रहा जीव अपने विषय में सोचता है कि "मैं अन्य हूँ,"

श्लोक 10 (12.313.10)

तदा प्रकृतिमानेष भवत्यव्यक्तलोचनः । बुध्यते च परां बुद्धिं विमलाममलां यदा ॥

tadā prakṛtimāneṣa bhavatyavyaktalocanaḥ | budhyate ca parāṃ buddhiṃ vimalāmamalāṃ yadā

तब वह प्रकृतिवाला होकर अव्यक्त की ओर दृष्टि रखनेवाला हो जाता है। और जब वह परम, विशुद्ध और निर्मल बुद्धि को जान लेता है,

श्लोक 11 (12.313.11)

षङ्विंशं राजशार्दूल तथा बुद्धत्वमाव्रजेत् । ततस्त्यजति सोऽव्यक्तं सर्गप्रलयधर्मि वै ॥

ṣaṅviṃśaṃ rājaśārdūla tathā buddhatvamāvrajet | tatastyajati so'vyaktaṃ sargapralayadharmi vai

तब हे राजशार्दूल, वह छब्बीसवें के बुद्धत्व को प्राप्त होता है। फिर वह सृष्टि और प्रलय के स्वभाववाले अव्यक्त को त्याग देता है।

श्लोक 12 (12.313.12)

निर्गुणः प्रकृतिं वेद गुणयुक्तामचेतनाम् । ततः केवलधर्माऽसौ भवत्यव्यक्तदर्शनात् ॥

nirguṇaḥ prakṛtiṃ veda guṇayuktāmacetanām | tataḥ kevaladharmā'sau bhavatyavyaktadarśanāt

निर्गुण होकर वह गुणों से युक्त, अचेतन प्रकृति को जान लेता है। फिर अव्यक्त के दर्शन से वह केवल-स्वभाववाला हो जाता है।

श्लोक 13 (12.313.13)

केवलेन समागम्य विमुक्तोऽऽत्मानमाप्नुयात् । एतं वै तत्त्वमित्याहुर्निस्तत्त्वमजरामरम् ॥

kevalena samāgamya vimukto''tmānamāpnuyāt | etaṃ vai tattvamityāhurnistattvamajarāmaram

केवल से मिलकर मुक्त हुआ वह आत्मा को प्राप्त कर ले। इसी को तत्त्व कहते हैं — निस्तत्त्व, अजर और अमर।

श्लोक 14 (12.313.14)

तत्त्वसंश्रयणादेष तत्त्ववान्न च मानद । पञ्चविंशतितत्त्वानि प्रवदन्ति मनीषिणः ॥

tattvasaṃśrayaṇādeṣa tattvavānna ca mānada | pañcaviṃśatitattvāni pravadanti manīṣiṇaḥ

तत्त्वों का आश्रय लेने से वह तत्त्ववान् है, पर वास्तव में नहीं, हे मानद। मनीषी पचीस तत्त्व बताते हैं।

श्लोक 15 (12.313.15)

न चैष तत्त्ववांस्तात निस्तत्त्वस्त्वेष बुद्धिमान् । एष मुञ्चति तत्त्वं हि क्षिप्रं बुद्धत्वलक्षणम् ॥

na caiṣa tattvavāṃstāta nistattvastveṣa buddhimān | eṣa muñcati tattvaṃ hi kṣipraṃ buddhatvalakṣaṇam

हे तात, वह तत्त्ववान् नहीं है; यह बुद्धिमान तत्त्वरहित है। वह शीघ्र ही तत्त्व को छोड़ देता है — यही जागे हुए का लक्षण है।

श्लोक 16 (12.313.16)

षाङ्विंशोऽहमिति प्राज्ञो गृह्यमाणोऽजरामरः । केवलेन बलेनैव समतां यात्यसंशयम् ॥

ṣāṅviṃśo'hamiti prājño gṛhyamāṇo'jarāmaraḥ | kevalena balenaiva samatāṃ yātyasaṃśayam

"मैं छब्बीसवाँ हूँ," ऐसा प्राज्ञ मानता है; इस प्रकार ग्रहण किया हुआ वह अजर-अमर है, और केवल के ही बल से निःसंदेह समता को प्राप्त होता है।

श्लोक 17 (12.313.17)

षङ्विंशेन प्रबुद्धेन बुध्यमानो ह्यबुद्धिमान् । एवं नानात्वमित्युक्तं साङ्ख्यश्रुतिनिदर्शनात् ॥

ṣaṅviṃśena prabuddhena budhyamāno hyabuddhimān | evaṃ nānātvamityuktaṃ sāṅkhyaśrutinidarśanāt

जाग चुके छब्बीसवें की तुलना में जाग रहा जीव अभी बुद्धिहीन है। साङ्ख्य-श्रुति के निदर्शन से इसी को नानात्व कहा गया है।

श्लोक 18 (12.313.18)

चेतनेन समेतस्य पञ्चविंशतिकस्य च । एकत्वं वै भवत्यस्य यदा बुद्ध्या न बुध्यते ॥

cetanena sametasya pañcaviṃśatikasya ca | ekatvaṃ vai bhavatyasya yadā buddhyā na budhyate

चेतन से जुड़े हुए पचीसवें के लिए एकत्व होता है, जब वह बुद्धि से नहीं जागता।

श्लोक 19 (12.313.19)

बुध्यमानोऽप्रबुद्धेन समतां याति मैथिल । सङ्गधर्मा भवत्येष निःसङ्गात्मा नराधिप ॥

budhyamāno'prabuddhena samatāṃ yāti maithila | saṅgadharmā bhavatyeṣa niḥsaṅgātmā narādhipa

हे मैथिल, जाग रहा जीव अप्रबुद्ध के साथ समता को प्राप्त होता है। हे नराधिप, यह निःसङ्ग आत्मावाला होकर भी आसक्ति के स्वभाववाला हो जाता है।

श्लोक 20 (12.313.20)

निःसङ्गात्मानमासाद्य षङ्विंशकमजं विभुम् । विभुस्त्यजति चाव्यक्तं यदा त्वेतद्विबुध्यते ॥

niḥsaṅgātmānamāsādya ṣaṅviṃśakamajaṃ vibhum | vibhustyajati cāvyaktaṃ yadā tvetadvibudhyate

निःसङ्ग आत्मा को, छब्बीसवें अजन्मा और विभु को पाकर, जब वह इसे जान लेता है, तब वह विभु अव्यक्त को छोड़ देता है।

श्लोक 21 (12.313.21)

चतुर्विशं महाभाग षङ्विंशस्य प्रबोधनात् । एष ह्यप्रतिबुद्धश्च बुध्यमानश्च तेऽनघ ॥

caturviśaṃ mahābhāga ṣaṅviṃśasya prabodhanāt | eṣa hyapratibuddhaśca budhyamānaśca te'nagha

हे महाभाग, छब्बीसवें के प्रबोध से चौबीसवाँ भी है। हे निष्पाप, यह एक साथ अप्रतिबुद्ध भी है और बुध्यमान भी।

श्लोक 22 (12.313.22)

प्रोक्तो बुद्धश्च तत्त्वेन यथाश्रुतिनिदर्शनात् । नानात्वैकत्वमेतावद्द्रष्टव्यं शास्त्रदृष्टिभिः ॥

prokto buddhaśca tattvena yathāśrutinidarśanāt | nānātvaikatvametāvaddraṣṭavyaṃ śāstradṛṣṭibhiḥ

शास्त्रों के निदर्शन के अनुसार उसे तत्त्व से बुद्ध भी कहा गया है। नानात्व और एकत्व — इतना ही शास्त्र-दृष्टि रखनेवालों को देखना चाहिए।

श्लोक 23 (12.313.23)

मशकोदुम्बरे यद्वदन्यत्वं तद्वदेतयोः । मत्स्योदके यथा तद्वदन्यत्वमुपलभ्यते ॥

maśakodumbare yadvadanyatvaṃ tadvadetayoḥ | matsyodake yathā tadvadanyatvamupalabhyate

जैसे मच्छर और गूलर में भिन्नता है, वैसे ही इन दोनों में है; जैसे मछली और जल में भिन्नता दिखती है, वैसे ही।

श्लोक 24 (12.313.24)

एवमेवावगन्तव्यं नानात्वैकत्वमेतयोः । एतद्धि मोक्ष इत्युक्तमव्यक्तज्ञानसंज्ञितम् ॥

evamevāvagantavyaṃ nānātvaikatvametayoḥ | etaddhi mokṣa ityuktamavyaktajñānasaṃjñitam

इन दोनों के नानात्व और एकत्व को इसी प्रकार समझना चाहिए। यही मोक्ष कहा गया है, जिसे अव्यक्त का ज्ञान कहते हैं।

श्लोक 25 (12.313.25)

पञ्चविंशतिकस्यास्य योऽयं देहेषु वर्तते । एष मोक्षयितव्येति प्राहुरव्यक्तगोचरात् ॥

pañcaviṃśatikasyāsya yo'yaṃ deheṣu vartate | eṣa mokṣayitavyeti prāhuravyaktagocarāt

देहों में रहनेवाले इस पचीसवें को अव्यक्त के क्षेत्र से मुक्त कराना चाहिए, ऐसा कहते हैं।

श्लोक 26 (12.313.26)

सोयमेवं विमुच्येत नान्यथेति विनिश्चयः । परेण परधर्मा च भवत्येष समेत्य वै ॥

soyamevaṃ vimucyeta nānyatheti viniścayaḥ | pareṇa paradharmā ca bhavatyeṣa sametya vai

वह इसी प्रकार मुक्त हो सकता है, अन्यथा नहीं — यह निश्चय है। परम से मिलकर वह परम के स्वभाववाला हो जाता है।

श्लोक 27 (12.313.27)

विशुद्धधर्मा शुद्धेन बुद्धेन च स बुद्धिमान् । विमुक्तधर्मा मुक्तेन समेत्य पुरुषर्षभ ॥

viśuddhadharmā śuddhena buddhena ca sa buddhimān | vimuktadharmā muktena sametya puruṣarṣabha

शुद्ध से मिलकर वह शुद्ध स्वभाववाला हो जाता है; बुद्ध से मिलकर वह बुद्धिमान हो जाता है; और हे पुरुषश्रेष्ठ, मुक्त से मिलकर वह मुक्त स्वभाववाला हो जाता है।

श्लोक 28 (12.313.28)

वियोगधर्मिणा चैव वियोगात्मा भवत्यथ । विमोक्षिणा विमोक्षश्च समेत्येह तथा भवेत् ॥

viyogadharmiṇā caiva viyogātmā bhavatyatha | vimokṣiṇā vimokṣaśca sametyeha tathā bhavet

वियोग के स्वभाववाले से मिलकर वह भी वियोगात्मा हो जाता है; और विमुक्त से मिलकर यहीं वह भी विमोक्ष-रूप हो जाता है।

श्लोक 29 (12.313.29)

शुद्धधर्मा शुचिश्चैव भवत्यमितदीप्तिमान् । विमलात्मा च भवति समेत्य विमलात्मना ॥

śuddhadharmā śuciścaiva bhavatyamitadīptimān | vimalātmā ca bhavati sametya vimalātmanā

शुद्ध स्वभाववाला, शुचि और अपार तेजवाला, निर्मल आत्मा से मिलकर वह निर्मल आत्मावाला हो जाता है।

श्लोक 30 (12.313.30)

केवलात्मा तथा चैव केवलेन समेत्य वै । स्वतन्त्रश्च स्वतन्त्रेण स्वतन्त्रत्वमवाप्नुते ॥

kevalātmā tathā caiva kevalena sametya vai | svatantraśca svatantreṇa svatantratvamavāpnute

केवल से मिलकर वह केवल-आत्मा हो जाता है, और स्वतन्त्र से मिलकर स्वतन्त्र होकर स्वतन्त्रता को पा लेता है।

श्लोक 31 (12.313.31)

एतावदेतत्कथितं मया ते । तथ्यं महाराज यथार्थतत्त्वम् । अमत्सरत्वं प्रतिगृह्य चार्थं । सनातनं ब्रह्म विशुद्धमाद्यम् ॥

etāvadetatkathitaṃ mayā te | tathyaṃ mahārāja yathārthatattvam | amatsaratvaṃ pratigṛhya cārthaṃ | sanātanaṃ brahma viśuddhamādyam

हे महाराज, यह मैंने तुम्हें यथार्थ तत्त्व सत्य रूप में बता दिया। ईर्ष्या छोड़कर इस विषय को ग्रहण करो — यह सनातन, विशुद्ध, आदि ब्रह्म है।

श्लोक 32 (12.313.32)

नावेदनिष्ठस्य जनस्य राज । न्प्रदेयमेतत्परमं त्वया भवेत् । विवित्समानाय विबोधकारणं । प्रबोधहेतोः प्रणतस्य शासनम् ॥

nāvedaniṣṭhasya janasya rāja | npradeyametatparamaṃ tvayā bhavet | vivitsamānāya vibodhakāraṇaṃ | prabodhahetoḥ praṇatasya śāsanam

हे राजन्, यह परम उपदेश तुम्हें वेद में निष्ठा न रखनेवाले को नहीं देना चाहिए। जो जानना चाहता है, उसे ही दो — यह जगानेवाला, नम्र जन के प्रबोध के लिए उपदेश है।

श्लोक 33 (12.313.33)

न देयमेतच्च तथाऽनृतात्मने । शठाय क्लीबाय न जिह्मबुद्धये । न पण्डितज्ञानपरोपतापिने । देयं त्वयेदं विनिबोध यादृशे ॥

na deyametacca tathā'nṛtātmane | śaṭhāya klībāya na jihmabuddhaye | na paṇḍitajñānaparopatāpine | deyaṃ tvayedaṃ vinibodha yādṛśe

यह न मिथ्याचारी को देना चाहिए, न धूर्त को, न कायर को, न कुटिल बुद्धिवाले को, और न उसे जो पाण्डित्य से दूसरों को सताता है। सुनो, किसे देना चाहिए:

श्लोक 34 (12.313.34)

श्रद्धान्वितायाथ गुणान्विताय । परापवादाद्विरताय नित्यम् । विशुद्धयोगाय बुधाय चैव । क्रियावते च क्षमिणे हिताय ॥

śraddhānvitāyātha guṇānvitāya | parāpavādādviratāya nityam | viśuddhayogāya budhāya caiva | kriyāvate ca kṣamiṇe hitāya

श्रद्धायुक्त और गुणवान को, जो सदा दूसरों की निन्दा से दूर रहता है, विशुद्ध योगवाले, विद्वान, कर्मनिष्ठ, क्षमाशील और हितकारी को;

श्लोक 35 (12.313.35)

विविक्तशीलाय विधिप्रियाय । विवादहीनाय बहुश्रुताय । विजानते चैव दमक्षमावते । शक्ताय चैकात्मशमाय देहिनाम् ॥

viviktaśīlāya vidhipriyāya | vivādahīnāya bahuśrutāya | vijānate caiva damakṣamāvate | śaktāya caikātmaśamāya dehinām

एकान्तशील, विधि को प्रिय माननेवाले, विवादरहित, बहुश्रुत को, जो जानता है, संयम और क्षमा रखता है, समर्थ है और प्राणियों के बीच शान्त आत्मावाला है।

श्लोक 36 (12.313.36)

एतैर्गुणैर्हीनतमे न देय । मेतत्परं ब्रह्म विशुद्धमाहुः । न श्रेयसा योक्ष्यति तादृशे कृतं । धर्मप्रवक्तारमपात्रदानात् ॥

etairguṇairhīnatame na deya | metatparaṃ brahma viśuddhamāhuḥ | na śreyasā yokṣyati tādṛśe kṛtaṃ | dharmapravaktāramapātradānāt

इन गुणों से अत्यन्त हीन को यह परम विशुद्ध ब्रह्म नहीं देना चाहिए, ऐसा कहते हैं। वैसे के प्रति किया हुआ यह दान धर्म का उपदेश देनेवाले को कल्याण से नहीं जोड़ेगा, क्योंकि वह अपात्र को दिया गया दान है।

श्लोक 37 (12.313.37)

पृथ्वीमिमां यद्यपि रत्नपूर्णां । दद्यान्न देयं त्विदमव्रताय । जितेन्द्रियायैतदसंशयं ते । भवेत्प्रदेयं परमं नरेन्द्र ॥

pṛthvīmimāṃ yadyapi ratnapūrṇāṃ | dadyānna deyaṃ tvidamavratāya | jitendriyāyaitadasaṃśayaṃ te | bhavetpradeyaṃ paramaṃ narendra

चाहे कोई रत्नों से भरी यह पृथ्वी दे दे, तब भी यह अव्रती को नहीं देना चाहिए; पर हे नरेन्द्र, जितेन्द्रिय को यह परम उपदेश निःसंदेह दिया जा सकता है।

श्लोक 38 (12.313.38)

कराल मा ते भयमस्तु किंचि । देतच्छ्रुतं ब्रह्म परं त्वयाऽद्य । यथावदुक्तं परमं पवित्रं । विशोकमत्यन्तमनादिमध्यम् ॥

karāla mā te bhayamastu kiṃci | detacchrutaṃ brahma paraṃ tvayā'dya | yathāvaduktaṃ paramaṃ pavitraṃ | viśokamatyantamanādimadhyam

हे कराल, तुम्हें तनिक भी भय न हो: आज तुमने यह परम ब्रह्म यथावत् कहा हुआ सुन लिया है — परम, पवित्र, शोकरहित, आदि और मध्य से रहित,

श्लोक 39 (12.313.39)

अगाधजन्मामरणं च राज । न्निरामयं वीतभयं शिवं च । समीक्ष्य मोहं त्यज चाऽद्य सर्वं । ज्ञानस्य तत्त्वार्थमिदं विदित्वा ॥

agādhajanmāmaraṇaṃ ca rāja | nnirāmayaṃ vītabhayaṃ śivaṃ ca | samīkṣya mohaṃ tyaja cā'dya sarvaṃ | jñānasya tattvārthamidaṃ viditvā

अगाध, जन्म और मरण से रहित, हे राजन्, रोगरहित, भयरहित और कल्याणमय। मोह को परखकर आज सब कुछ त्याग दो, इसे ज्ञान का तात्त्विक अर्थ जानकर।

श्लोक 40 (12.313.40)

अवाप्तमेतद्धि मया सनातना । द्धिरण्यगर्भाद्यजतो नराधिप । प्रसाद्य यत्नेन तमुग्रतेजसं । सनातनं ब्रह्म यथाऽद्य वै त्वया ॥

avāptametaddhi mayā sanātanā | ddhiraṇyagarbhādyajato narādhipa | prasādya yatnena tamugratejasaṃ | sanātanaṃ brahma yathā'dya vai tvayā

हे नराधिप, यह मैंने सनातन हिरण्यगर्भ से, जब वे यजन कर रहे थे, पाया था; उन उग्र तेजवाले सनातन ब्रह्म को यत्न से प्रसन्न करके, जैसे आज तुमने मुझे प्रसन्न किया है।

श्लोक 41 (12.313.41)

पृष्टस्त्वया चास्मि यथा नरेन्द्र । तथा मयेदं त्वयि चोक्तमद्य । तथाऽवाप्तं ब्रह्मणो मे नरेन्द्र । महाज्ञानं मोक्षविदां परायणम् ॥

pṛṣṭastvayā cāsmi yathā narendra | tathā mayedaṃ tvayi coktamadya | tathā'vāptaṃ brahmaṇo me narendra | mahājñānaṃ mokṣavidāṃ parāyaṇam

हे नरेन्द्र, जैसा तुमने मुझसे पूछा, वैसा ही मैंने आज तुम्हें यह कहा है; और जैसे मैंने इसे ब्रह्मा से पाया — यह महाज्ञान मोक्ष को जाननेवालों का परम आश्रय है।

भीष्म उवाच

श्लोक 42 (12.313.42)

एतदुक्तं परं ब्रह्म यस्मान्नावर्तते पुनः । पञ्चविंशो महाराज परमर्षिनिदर्शनात् ॥

etaduktaṃ paraṃ brahma yasmānnāvartate punaḥ | pañcaviṃśo mahārāja paramarṣinidarśanāt

यह परम ब्रह्म कहा गया, जिसे पाकर पचीसवाँ फिर नहीं लौटता, हे महाराज — परम ऋषि के निदर्शन के अनुसार।

श्लोक 43 (12.313.43)

पुनरावृत्तिमाप्नोति परं ज्ञानमवाप्य च । नावबुध्यति तत्त्वेन बुध्यमानोऽजरामरम् ॥

punarāvṛttimāpnoti paraṃ jñānamavāpya ca | nāvabudhyati tattvena budhyamāno'jarāmaram

परम ज्ञान को पाकर भी वह लौट आता है, यदि जागते हुए भी वह अजर-अमर को तत्त्व से नहीं जान पाता।

श्लोक 44 (12.313.44)

एतन्निःश्रेयसकरं ज्ञानं ते परमं मया । कथितं तत्त्वतस्तात श्रुत्वा देवर्षितो नृप ॥

etanniḥśreyasakaraṃ jñānaṃ te paramaṃ mayā | kathitaṃ tattvatastāta śrutvā devarṣito nṛpa

हे तात, परम कल्याण करनेवाला यह परम ज्ञान मैंने देवर्षि से सुनकर तुम्हें यथार्थ रूप में कह दिया, हे राजन्।

श्लोक 45 (12.313.45)

हिरण्यगर्भादृषिणा वसिष्ठेन महात्मना । वसिष्ठादृषिशार्दूलान्नारदोऽवाप्तवानिदम् ॥

hiraṇyagarbhādṛṣiṇā vasiṣṭhena mahātmanā | vasiṣṭhādṛṣiśārdūlānnārado'vāptavānidam

हिरण्यगर्भ से महात्मा ऋषि वसिष्ठ ने इसे पाया, और ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठ से नारद ने इसे प्राप्त किया।

श्लोक 46 (12.313.46)

नारदाद्विदितं मह्यमेतद्ब्रह्म सनातनम् । मा शुचः कौरवेन्द्र त्वं श्रुत्वैतत्परमं पदम् ॥

nāradādviditaṃ mahyametadbrahma sanātanam | mā śucaḥ kauravendra tvaṃ śrutvaitatparamaṃ padam

नारद से मैंने यह सनातन ब्रह्म जाना। हे कौरवेन्द्र, इस परम पद को सुनकर तुम शोक मत करो।

श्लोक 47 (12.313.47)

येन क्षराक्षरे वित्ते भयं तस्य न विद्यते । विद्यते तु भयं तस्य यो नैतद्वेत्ति पार्थिव ॥

yena kṣarākṣare vitte bhayaṃ tasya na vidyate | vidyate tu bhayaṃ tasya yo naitadvetti pārthiva

जिसने क्षर और अक्षर को जान लिया, उसे भय नहीं होता। पर हे राजन्, भय उसी को होता है जो इसे नहीं जानता।

श्लोक 48 (12.313.48)

अविज्ञानाच्च मूढात्मा पुनः पुनरुपाद्रवत् । प्रेत्य जातिसहस्राणि मरणान्तान्युपाश्नुते ॥

avijñānācca mūḍhātmā punaḥ punarupādravat | pretya jātisahasrāṇi maraṇāntānyupāśnute

अज्ञान के कारण मूढ़ मनुष्य बार-बार भटकता है; मरकर वह हज़ारों जन्म पाता है, जिनका अन्त मृत्यु में होता है।

श्लोक 49 (12.313.49)

देवलोकं तथा तिर्यङ्मनुष्यमपि चाश्नुते । यदि शुध्यति कालेन तस्मादज्ञानसागरात् ॥

devalokaṃ tathā tiryaṅmanuṣyamapi cāśnute | yadi śudhyati kālena tasmādajñānasāgarāt

वह देवलोक को, तथा पशु-पक्षी और मनुष्य योनि को भी पाता है, यदि समय आने पर वह अज्ञान के उस सागर से शुद्ध हो जाता है;

श्लोक 50 (12.313.50)

उत्तीर्णोऽस्मादगाधात्स परमाप्नोति शोभनम् । अज्ञानसागरो घोरो ह्यव्यक्तोऽगाध उच्यते । अहन्यहनि मज्जन्ति यत्र भूतानि भारत ॥

uttīrṇo'smādagādhātsa paramāpnoti śobhanam | ajñānasāgaro ghoro hyavyakto'gādha ucyate | ahanyahani majjanti yatra bhūtāni bhārata

"उस अगाध सागर को पार कर वह परम और शुभ को पा लेता है।" अज्ञान का सागर भयंकर है; उसी अगाध को अव्यक्त कहते हैं, जिसमें हे भारत, प्राणी दिन-प्रतिदिन डूबते रहते हैं।

श्लोक 51 (12.313.51)

यस्मादगाधादव्यक्तादुत्तीर्णस्त्वं सनातनात् । तस्मात्त्वं विरजाश्चैव वितमस्कश्च पार्थिव ॥

yasmādagādhādavyaktāduttīrṇastvaṃ sanātanāt | tasmāttvaṃ virajāścaiva vitamaskaśca pārthiva

हे पार्थिव, तुम उस अगाध सनातन अव्यक्त से पार उतर चुके हो; इसीलिए तुम रजोगुण और तमोगुण से रहित हो।

अध्याय 312अध्याय-सूचीअध्याय 314