शान्ति पर्व · अध्याय 314
भृगुवंशी ऋषि का जनकवंशी राजकुमार को उपदेश
भीष्म जनकवंश के राजकुमार वसुमान् की कथा कहते हैं, जो शिकार खेलते हुए भृगुवंश के एक ऋषि से मिलता है और पूछता है कि नश्वर शरीर में बँधे, कामना के वश में रहनेवाले मनुष्य का कल्याण किसमें है। ऋषि बताते हैं कि दूसरों को दुःख देनेवाले कर्मों से बचना चाहिए, धैर्य के साथ धर्म का आचरण करना चाहिए, पात्र को आदरपूर्वक दान देना चाहिए और ज्ञानियों की सेवा करनी चाहिए। राजकुमार काम से मन हटाकर धर्म में बुद्धि लगाता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (12.314.1)
मृगयां विचरन्कश्चिद्विजने जनकात्मजः । वने ददर्श विप्रेन्द्रमृषिं वंशधरं भृगोः ॥
mṛgayāṃ vicarankaścidvijane janakātmajaḥ | vane dadarśa viprendramṛṣiṃ vaṃśadharaṃ bhṛgoḥ
एक बार जनक के वंश के एक राजकुमार ने शिकार के लिए निर्जन वन में घूमते हुए एक विप्रश्रेष्ठ ऋषि को देखा, जो भृगु के वंश को धारण करनेवाले थे।
श्लोक 2 (12.314.2)
तमासीनमुपासीनः प्रणम्य शिरसा मुनिम् । पश्चादनुमतस्तेन पप्रच्छ वसुमानिदम् ॥
tamāsīnamupāsīnaḥ praṇamya śirasā munim | paścādanumatastena papraccha vasumānidam
बैठे हुए मुनि को सिर झुकाकर प्रणाम करके वह उनके पास बैठ गया; फिर उनकी अनुमति पाकर वसुमान् ने यह पूछा:
वसुमानुवाच
श्लोक 3 (12.314.3)
भगवन्किमिदं श्रेयः प्रेत्य चापीह वा भवेत् । पुरुषस्याध्रुवे देहे कामस्य वशवर्तिनः ॥
bhagavankimidaṃ śreyaḥ pretya cāpīha vā bhavet | puruṣasyādhruve dehe kāmasya vaśavartinaḥ
"भगवन्, अनित्य शरीर में रहनेवाले, कामना के वश में पड़े मनुष्य के लिए परलोक में और इस लोक में क्या कल्याणकारी है?"
भीष्म उवाच
श्लोक 4 (12.314.4)
सत्कृत्य परिपृष्टः सन्सुमहात्मा महातपाः । निजगाद ततस्तस्मै श्रेयस्करमिदं वचः ॥
satkṛtya paripṛṣṭaḥ sansumahātmā mahātapāḥ | nijagāda tatastasmai śreyaskaramidaṃ vacaḥ
सत्कार के साथ पूछे जाने पर उन महात्मा और महातपस्वी ने तब ये श्रेयस्कर वचन कहे।
ऋषिरुवाच
श्लोक 5 (12.314.5)
मनसः प्रतिकूलानि प्रेत्य चेह नचेच्छसि । भूतानां प्रतिकूलेभ्यो निवर्तस्व यतेन्द्रियः ॥
manasaḥ pratikūlāni pretya ceha nacecchasi | bhūtānāṃ pratikūlebhyo nivartasva yatendriyaḥ
तुम परलोक में या इस लोक में अपने मन के प्रतिकूल कुछ नहीं चाहते; इसलिए इन्द्रियों को वश में करके प्राणियों के प्रतिकूल कर्मों से दूर रहो।
श्लोक 6 (12.314.6)
धर्मः सदा हितः पुंसां धर्मश्चैवाश्रयः सताम् । धर्माल्लोकास्त्रयस्तात प्रवृत्ताः सचराचराः ॥
dharmaḥ sadā hitaḥ puṃsāṃ dharmaścaivāśrayaḥ satām | dharmāllokāstrayastāta pravṛttāḥ sacarācarāḥ
धर्म सदा मनुष्यों का हित है और धर्म ही सज्जनों का आश्रय है। हे तात, धर्म से ही चर और अचर सहित तीनों लोक प्रवृत्त हुए हैं।
श्लोक 7 (12.314.7)
स्वादुकामुक कामानां वैतृष्ण्यं किं न गच्छसि । मधु पश्यसि दुर्बुद्धे प्रपातं नानुपश्यसि ॥
svādukāmuka kāmānāṃ vaitṛṣṇyaṃ kiṃ na gacchasi | madhu paśyasi durbuddhe prapātaṃ nānupaśyasi
हे स्वाद के लोभी, भोगों के कामी, तू कामनाओं से विरक्त क्यों नहीं होता? हे दुर्बुद्धि, तू मधु को देखता है और गड्ढे को नहीं देखता।
श्लोक 8 (12.314.8)
यथा ज्ञाने परिचयः कर्तव्यस्तत्फलार्थिना । तथा धर्मे परिचयः कर्तव्यस्तत्फलार्थिना ॥
yathā jñāne paricayaḥ kartavyastatphalārthinā | tathā dharme paricayaḥ kartavyastatphalārthinā
जैसे ज्ञान का फल चाहनेवाले को ज्ञान का अभ्यास करना चाहिए, वैसे ही धर्म का फल चाहनेवाले को धर्म का अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक 9 (12.314.9)
असता धर्मकामेन विशुद्धं कर्म दुष्करम् । सता तु धर्मकामेन सुकरं कर्म दुष्करम् ॥
asatā dharmakāmena viśuddhaṃ karma duṣkaram | satā tu dharmakāmena sukaraṃ karma duṣkaram
जो बुरा मनुष्य धर्म चाहता है, उसके लिए शुद्ध कर्म करना कठिन है; और जो सज्जन धर्म चाहता है, उसके लिए जो कर्म सरल है, वह दूसरों के लिए कठिन है।
श्लोक 10 (12.314.10)
वने ग्राम्यसुखाचारो यथाग्राम्यस्तथैव सः । ग्रामे वनसुखाचारो यथा वनचरस्तथा ॥
vane grāmyasukhācāro yathāgrāmyastathaiva saḥ | grāme vanasukhācāro yathā vanacarastathā
जो वन में रहकर ग्राम के सुखों के अनुसार चलता है, वह ग्रामीण ही है; और जो गाँव में रहकर वन के सुखों के अनुसार चलता है, वह वनवासी है।
श्लोक 11 (12.314.11)
मनोवाक्कर्मगे धर्मे कुरु श्रद्धां समाहितः । निवृत्तौ वा प्रवृत्तौ वा संप्रधार्य गुणागुणान् ॥
manovākkarmage dharme kuru śraddhāṃ samāhitaḥ | nivṛttau vā pravṛttau vā saṃpradhārya guṇāguṇān
निवृत्ति और प्रवृत्ति के गुण-दोषों को तौलकर, एकाग्र होकर मन, वाणी और कर्म में स्थित धर्म में श्रद्धा रखो।
श्लोक 12 (12.314.12)
नित्यं च बहु दातव्यं साधुभ्यश्चानसूयता । प्रार्थितं ब्राह्मणेभ्यश्च सत्कृतं देशकालयोः ॥
nityaṃ ca bahu dātavyaṃ sādhubhyaścānasūyatā | prārthitaṃ brāhmaṇebhyaśca satkṛtaṃ deśakālayoḥ
सदा सज्जनों को बहुत दान देना चाहिए, द्वेषरहित होकर; ब्राह्मणों द्वारा माँगा हुआ दान आदरपूर्वक, उचित देश और काल में देना चाहिए।
श्लोक 13 (12.314.13)
शुभेन विधिना लब्धमर्हाय प्रतिपादयेत् । क्रोधमुत्सृज्य दत्त्वाऽथ नानुतप्येन्न कीर्तयेत् ॥
śubhena vidhinā labdhamarhāya pratipādayet | krodhamutsṛjya dattvā'tha nānutapyenna kīrtayet
उचित उपाय से पाया हुआ धन योग्य पात्र को देना चाहिए; क्रोध छोड़कर दान देने के बाद न पछताना चाहिए, न उसका बखान करना चाहिए।
श्लोक 14 (12.314.14)
अनृशंसः शुचिर्दान्तः सत्यवागार्जवे स्थितः । योनिकर्मविशुद्धश्च पात्रं स्याद्वेदविद्द्विजः ॥
anṛśaṃsaḥ śucirdāntaḥ satyavāgārjave sthitaḥ | yonikarmaviśuddhaśca pātraṃ syādvedaviddvijaḥ
जो क्रूर न हो, पवित्र हो, इन्द्रियों को जीते हुए हो, सत्य बोलनेवाला हो, सरलता में स्थित हो और जन्म तथा कर्म से शुद्ध हो — ऐसा वेदज्ञ द्विज पात्र होता है।
श्लोक 15 (12.314.15)
संस्कृता चैकपत्नी च जात्या योनिरिहेष्यते । ऋग्यजुःसामगो विद्वान्षट्कर्मा पात्रमुच्यते ॥
saṃskṛtā caikapatnī ca jātyā yoniriheṣyate | ṛgyajuḥsāmago vidvānṣaṭkarmā pātramucyate
यहाँ जन्म से योनि वह मानी गयी है जो संस्कारित और एक ही पति की पत्नी हो; और ऋग्, यजुः और साम का ज्ञाता षट्कर्मा विद्वान पात्र कहा जाता है।
श्लोक 16 (12.314.16)
स एव धर्मः सोऽधर्मस्तं तं प्रति नरं भवेत् । पात्रकर्मविशेषेण देशकालाववेक्ष्य च ॥
sa eva dharmaḥ so'dharmastaṃ taṃ prati naraṃ bhavet | pātrakarmaviśeṣeṇa deśakālāvavekṣya ca
वही कर्म पात्र और कर्म की विशेषता के अनुसार, देश और काल को देखकर, अलग-अलग मनुष्य के लिए धर्म और अधर्म हो सकता है।
श्लोक 17 (12.314.17)
लीलयाऽल्पं यथा गात्रात्प्रमृज्यात्तु रजः पुमान् । बहुयत्नेन च महत्पापनिर्हरणं तथा ॥
līlayā'lpaṃ yathā gātrātpramṛjyāttu rajaḥ pumān | bahuyatnena ca mahatpāpanirharaṇaṃ tathā
जैसे मनुष्य शरीर की थोड़ी धूल खेल-खेल में पोंछ सकता है, पर बड़े पाप को दूर करने में बड़ा यत्न लगता है।
श्लोक 18 (12.314.18)
विरिक्तस्य यथा सम्यग्घृतं भवति भेषजम् । तथा निर्हृतदोषस्य प्रेत्य धर्मः सुखावहः ॥
viriktasya yathā samyagghṛtaṃ bhavati bheṣajam | tathā nirhṛtadoṣasya pretya dharmaḥ sukhāvahaḥ
जैसे शुद्धि कराये हुए रोगी के लिए घी उचित औषधि होता है, वैसे ही जिसके दोष निकल चुके हैं, उसके लिए परलोक में धर्म सुखदायी होता है।
श्लोक 19 (12.314.19)
मानसं सर्वभूतेषु वर्तते वै शुभाशुभम् । अशुभेभ्यः समाक्षिप्य शुभेष्वेवावधारय ॥
mānasaṃ sarvabhūteṣu vartate vai śubhāśubham | aśubhebhyaḥ samākṣipya śubheṣvevāvadhāraya
सब प्राणियों में मन शुभ और अशुभ दोनों में चलता है; उसे अशुभ से खींचकर केवल शुभ में ही टिकाओ।
श्लोक 20 (12.314.20)
सर्वं सर्वेण सर्वत्र क्रियमाणं च पूजय । स्वधर्मे यत्र रागस्ते कामं धर्मो विधीयताम् ॥
sarvaṃ sarveṇa sarvatra kriyamāṇaṃ ca pūjaya | svadharme yatra rāgaste kāmaṃ dharmo vidhīyatām
सब स्थानों पर सबके द्वारा जो कुछ किया जा रहा हो, उसका आदर करो; और अपने धर्म में जहाँ तुम्हारी रुचि हो, वहाँ अपनी इच्छा के अनुसार धर्म का आचरण करो।
श्लोक 21 (12.314.21)
अधृतात्मन्धृतौ तिष्ठ दुर्बुद्धे बुद्धिमान्भव । अप्रशान्तः प्रशाम्य त्वमप्राज्ञः प्राज्ञवच्चर ॥
adhṛtātmandhṛtau tiṣṭha durbuddhe buddhimānbhava | apraśāntaḥ praśāmya tvamaprājñaḥ prājñavaccara
हे अधीर, धैर्य में स्थित हो; हे दुर्बुद्धि, बुद्धिमान बन; हे अशान्त, शान्त हो; हे अज्ञानी, ज्ञानी की तरह आचरण कर।
श्लोक 22 (12.314.22)
तेजसा शक्यते प्राप्तुमुपायः सहचारिणा । इह च प्रेत्य च श्रेयस्तस्य मूलं धृतिः परा ॥
tejasā śakyate prāptumupāyaḥ sahacāriṇā | iha ca pretya ca śreyastasya mūlaṃ dhṛtiḥ parā
उचित उपाय के साथ चलनेवाले तेज से वह पाया जा सकता है। इस लोक और परलोक में कल्याण की जड़ परम धैर्य है।
श्लोक 23 (12.314.23)
राजर्षिरधृतिः स्वर्गात्पतितो हि महाभिषः । ययातिः क्षीणपुण्योपि धृत्या लोकानवाप्तवान् ॥
rājarṣiradhṛtiḥ svargātpatito hi mahābhiṣaḥ | yayātiḥ kṣīṇapuṇyopi dhṛtyā lokānavāptavān
धैर्य खोने से राजर्षि महाभिष स्वर्ग से गिर पड़ा; और पुण्य क्षीण हो जाने पर भी ययाति ने धैर्य से लोकों को फिर पा लिया।
श्लोक 24 (12.314.24)
तपस्विनां धर्मवतां विदुषां चोपसेवनात् । प्राप्स्यसे विपुलां बुद्धिं तथा श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥
tapasvināṃ dharmavatāṃ viduṣāṃ copasevanāt | prāpsyase vipulāṃ buddhiṃ tathā śreyo'bhipatsyase
तपस्वियों, धर्मात्माओं और विद्वानों की सेवा से तुम्हें विपुल बुद्धि मिलेगी और तुम कल्याण को प्राप्त करोगे।
भीष्म उवाच
श्लोक 25 (12.314.25)
स तु स्वभावसंपन्नस्तच्छ्रुत्वा मुनिभाषितम् । विनिवर्त्य मनः कामाद्धर्मे बुद्धिं चकार ह ॥
sa tu svabhāvasaṃpannastacchrutvā munibhāṣitam | vinivartya manaḥ kāmāddharme buddhiṃ cakāra ha
उस स्वभाव से सम्पन्न पुरुष ने मुनि की वह बात सुनकर अपने मन को काम से हटाया और बुद्धि को धर्म में लगा दिया।