Skip to main content

शान्ति पर्व · अध्याय 315

याज्ञवल्क्य द्वारा जनक को आठ प्रकृतियों और नौ सर्गों का उपदेश

युधिष्ठिर भीष्म से उस तत्त्व के विषय में पूछते हैं जो धर्म-अधर्म और जन्म-मृत्यु से परे है। भीष्म याज्ञवल्क्य और मिथिला-नरेश जनक के एक प्राचीन संवाद से उत्तर देते हैं। जनक पूछते हैं कि इन्द्रियाँ और प्रकृतियाँ कितनी हैं, अव्यक्त क्या है और उससे परे क्या है; याज्ञवल्क्य आठ प्रकृतियाँ और सोलह विकार गिनाते हैं, चौबीस तत्त्वों को रचने वाले नौ सर्गों का वर्णन करते हैं और फिर काल की गणना की ओर बढ़ते हैं।

अध्याय 314अध्याय-सूचीअध्याय 316

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (12.315.1)

धर्माधर्मविमुक्तं यद्विमुक्तं सर्वसंशयात् । जन्ममृत्युविमुक्तं च विमुक्तं पुण्यपापयोः ॥

dharmādharmavimuktaṃ yadvimuktaṃ sarvasaṃśayāt | janmamṛtyuvimuktaṃ ca vimuktaṃ puṇyapāpayoḥ

जो धर्म और अधर्म से मुक्त है, सब संशयों से परे है, जन्म और मृत्यु से मुक्त है और पुण्य तथा पाप से भी मुक्त है—

श्लोक 2 (12.315.2)

यच्छिवं नित्यमभयं नित्यमक्षरमव्ययम् । शुचि नित्यमनायासं तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥

yacchivaṃ nityamabhayaṃ nityamakṣaramavyayam | śuci nityamanāyāsaṃ tadbhavānvaktumarhati

जो कल्याणरूप, नित्य, अभयस्वरूप, अविनाशी और अव्यय है, जो पवित्र, शाश्वत और अनायास है—उसे बताने में आप समर्थ हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 3 (12.315.3)

अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् । याज्ञवल्क्यस्य संवादं जनकस्य च भारत ॥

atra te vartayiṣyāmi itihāsaṃ purātanam | yājñavalkyasya saṃvādaṃ janakasya ca bhārata

हे भरतवंशी, इस विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा—याज्ञवल्क्य और जनक का संवाद।

श्लोक 4 (12.315.4)

याज्ञवल्क्यमृषिश्रेष्ठं दैवरातिर्महायशाः । पप्रच्छ जनको राजा प्रश्नं प्रश्नविदांवरः ॥

yājñavalkyamṛṣiśreṣṭhaṃ daivarātirmahāyaśāḥ | papraccha janako rājā praśnaṃ praśnavidāṃvaraḥ

प्रश्न करना जानने वालों में श्रेष्ठ, महायशस्वी राजा जनक—देवरात के पुत्र—ने ऋषियों में श्रेष्ठ याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया।

जनक उवाच

श्लोक 5 (12.315.5)

कतीन्द्रियाणि विप्रर्षे कति प्रकृतयः स्मृताः । किमव्यक्तं परं ब्रह्म तस्माच्च परतस्तु किम् ॥

katīndriyāṇi viprarṣe kati prakṛtayaḥ smṛtāḥ | kimavyaktaṃ paraṃ brahma tasmācca paratastu kim

हे विप्रर्षि, इन्द्रियाँ कितनी हैं? प्रकृतियाँ कितनी मानी गई हैं? अव्यक्त क्या है, परब्रह्म क्या है, और उससे भी परे क्या है?

श्लोक 6 (12.315.6)

प्रभवं चाप्ययं चैव कालसङ्ख्यां तथैव च । वक्तुमर्हसि विप्रेन्द्र त्वदनुग्रहकाङ्क्षिणः ॥

prabhavaṃ cāpyayaṃ caiva kālasaṅkhyāṃ tathaiva ca | vaktumarhasi viprendra tvadanugrahakāṅkṣiṇaḥ

हे विप्रश्रेष्ठ, आप मुझे उत्पत्ति और लय के विषय में, तथा काल की गणना के विषय में भी बताएँ; मैं आपकी कृपा की आकांक्षा रखता हूँ।

श्लोक 7 (12.315.7)

अज्ञानात्परिपृच्छामि त्वं हि ज्ञानमयो निधिः । तदहं श्रोतुमिच्छामि सर्वमेतदसंशयम् ॥

ajñānātparipṛcchāmi tvaṃ hi jñānamayo nidhiḥ | tadahaṃ śrotumicchāmi sarvametadasaṃśayam

मैं अज्ञान के कारण पूछ रहा हूँ, क्योंकि आप ज्ञान से भरे हुए भण्डार हैं। मैं यह सब निःसंशय होकर सुनना चाहता हूँ।

याज्ञवल्क्य उवाच

श्लोक 8 (12.315.8)

श्रूयतामवनीपाल यदेतदनुपृच्छसि । योगानां परमं ज्ञानं साङ्ख्यानां च विशेषतः ॥

śrūyatāmavanīpāla yadetadanupṛcchasi | yogānāṃ paramaṃ jñānaṃ sāṅkhyānāṃ ca viśeṣataḥ

हे पृथ्वीपालक, तुम जो पूछ रहे हो उसे सुनो—योग का और विशेषतः साङ्ख्य का परम ज्ञान।

श्लोक 9 (12.315.9)

न तवाविदितं किंचिन्मां तु जिज्ञासते भवान् । पृष्टेन चापि वक्तव्यमेष धर्मः सनातनः ॥

na tavāviditaṃ kiṃcinmāṃ tu jijñāsate bhavān | pṛṣṭena cāpi vaktavyameṣa dharmaḥ sanātanaḥ

तुमसे कुछ भी अज्ञात नहीं है, फिर भी तुम मुझसे जानना चाहते हो। और जिससे पूछा जाए उसे उत्तर देना चाहिए—यही सनातन धर्म है।

श्लोक 10 (12.315.10)

अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्ता विकाराश्चापि षोडश । आसां तु सप्त व्यक्तानि प्राहुरध्यात्मचिन्तकाः ॥

aṣṭau prakṛtayaḥ proktā vikārāścāpi ṣoḍaśa | āsāṃ tu sapta vyaktāni prāhuradhyātmacintakāḥ

आठ प्रकृतियाँ कही गई हैं और सोलह विकार। अध्यात्म का चिन्तन करने वाले कहते हैं कि इनमें से सात व्यक्त हैं।

श्लोक 11 (12.315.11)

अव्यक्तं च महांश्चैव तथाऽहंकार एव च । पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥

avyaktaṃ ca mahāṃścaiva tathā'haṃkāra eva ca | pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam

अव्यक्त, महत्, और अहंकार भी; तथा पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ ज्योति (तेज)।

श्लोक 12 (12.315.12)

एताः प्रकृतयस्त्वष्टौ विकारानपि मे शृणु । श्रोत्रं त्वक्चैव चक्षुश्च जिह्वा घ्राणं च पञ्चमम् ॥

etāḥ prakṛtayastvaṣṭau vikārānapi me śṛṇu | śrotraṃ tvakcaiva cakṣuśca jihvā ghrāṇaṃ ca pañcamam

ये आठ प्रकृतियाँ हैं। अब मुझसे विकारों को भी सुनो—श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और पाँचवीं नासिका;

श्लोक 13 (12.315.13)

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च । वाक्च हस्तौ च पादौ च पायुर्मेढ्रं तथैव च ॥

śabdaḥ sparśaśca rūpaṃ ca raso gandhastathaiva ca | vākca hastau ca pādau ca pāyurmeḍhraṃ tathaiva ca

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध भी; तथा वाणी, दोनों हाथ और दोनों पैर, गुदा और जननेन्द्रिय।

श्लोक 14 (12.315.14)

एते विशेषा राजेन्द्र महाभूतेषु पञ्चसु । बुद्धीन्द्रियाण्यथैतानि सविशेषाणि मैथिल ॥

ete viśeṣā rājendra mahābhūteṣu pañcasu | buddhīndriyāṇyathaitāni saviśeṣāṇi maithila

हे राजेन्द्र, ये पाँच महाभूतों के विशेष (भेद) हैं। और हे मैथिल, ये ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विशेषों सहित हैं।

श्लोक 15 (12.315.15)

मनः षोडशकं प्राहुरध्यात्मगतिचिन्तकाः । त्वं चैवान्ये च विद्वांसस्तत्त्वबुद्धिविशारदाः ॥

manaḥ ṣoḍaśakaṃ prāhuradhyātmagaticintakāḥ | tvaṃ caivānye ca vidvāṃsastattvabuddhiviśāradāḥ

मन को सोलहवाँ कहा जाता है—ऐसा आत्मगति का चिन्तन करने वाले, तुम स्वयं और तत्त्वबुद्धि में निपुण अन्य विद्वान् भी कहते हैं।

श्लोक 16 (12.315.16)

अव्यक्ताच्च महानात्मा समुत्पद्यति पार्थिव । प्रथमं सर्गमित्येतदाहुः प्राधानिकं बुधाः ॥

avyaktācca mahānātmā samutpadyati pārthiva | prathamaṃ sargamityetadāhuḥ prādhānikaṃ budhāḥ

हे राजन्, अव्यक्त से महान् आत्मा (महत्) उत्पन्न होता है। ज्ञानी इसे पहला सर्ग कहते हैं, जो प्राधानिक है।

श्लोक 17 (12.315.17)

महतश्चाप्यहंकार उत्पद्यति नराधिप । द्वितीयं सर्गमित्याहुरेतद्बुद्ध्यात्मकं स्मृतम् ॥

mahataścāpyahaṃkāra utpadyati narādhipa | dvitīyaṃ sargamityāhuretadbuddhyātmakaṃ smṛtam

हे नराधिप, महत् से अहंकार उत्पन्न होता है। इसे वे दूसरा सर्ग कहते हैं, जो बुद्धिस्वरूप माना गया है।

श्लोक 18 (12.315.18)

अहंकाराच्च संभूतं मनो भूतगुणात्मकम् । तृतीयः सर्ग इत्येष आहंकारिक उच्यते ॥

ahaṃkārācca saṃbhūtaṃ mano bhūtaguṇātmakam | tṛtīyaḥ sarga ityeṣa āhaṃkārika ucyate

अहंकार से मन उत्पन्न होता है, जिसका स्वरूप भूतों के गुणों वाला है। यह तीसरा सर्ग है, जिसे आहंकारिक कहा जाता है।

श्लोक 19 (12.315.19)

मनसस्तु समुद्भूता महाभूता नराधिप । चतुर्थं सर्गमित्येतन्मानसं चिन्तनात्मकम् ॥

manasastu samudbhūtā mahābhūtā narādhipa | caturthaṃ sargamityetanmānasaṃ cintanātmakam

हे नराधिप, मन से महाभूत उत्पन्न होते हैं। इसे चौथा सर्ग कहते हैं, जो मानस और चिन्तनरूप है।

श्लोक 20 (12.315.20)

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च । पञ्चमं सर्गमित्याहुर्भौतिकं भूतचिन्तकाः ॥

śabdaḥ sparśaśca rūpaṃ ca raso gandhastathaiva ca | pañcamaṃ sargamityāhurbhautikaṃ bhūtacintakāḥ

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध भी—इसे भूतों का चिन्तन करने वाले पाँचवाँ सर्ग कहते हैं, जो भौतिक है।

श्लोक 21 (12.315.21)

श्रोत्रं त्वक्चैव चक्षुश्च जिह्वा घ्राणं च पञ्चमम् । सर्गं तु षष्ठमित्याहुर्बहुचिन्तात्मकं स्मृतम् ॥

śrotraṃ tvakcaiva cakṣuśca jihvā ghrāṇaṃ ca pañcamam | sargaṃ tu ṣaṣṭhamityāhurbahucintātmakaṃ smṛtam

श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और पाँचवीं नासिका—इसे वे छठा सर्ग कहते हैं, जो बहुत चिन्तन वाला माना गया है।

श्लोक 22 (12.315.22)

अधः श्रोत्रेन्द्रियग्राम उत्पद्यति नराधिप । सप्तमं सर्गमित्याहुरेतदैन्द्रियकं स्मृतम् ॥

adhaḥ śrotrendriyagrāma utpadyati narādhipa | saptamaṃ sargamityāhuretadaindriyakaṃ smṛtam

हे नराधिप, नीचे की ओर श्रोत्र आदि इन्द्रियों का समूह उत्पन्न होता है। इसे वे सातवाँ सर्ग कहते हैं, जो ऐन्द्रियक माना गया है।

श्लोक 23 (12.315.23)

ऊर्ध्वं स्रोतस्तथा तिर्यगुत्पद्यति नराधिप । अष्टमं सर्गमित्याहुरेतदार्जवकं स्मृतम् ॥

ūrdhvaṃ srotastathā tiryagutpadyati narādhipa | aṣṭamaṃ sargamityāhuretadārjavakaṃ smṛtam

हे नराधिप, ऊपर की ओर बहने वाला स्रोत तथा तिरछा भी उत्पन्न होता है। इसे वे आठवाँ सर्ग कहते हैं, जो आर्जवक माना गया है।

श्लोक 24 (12.315.24)

तिर्यक्स्रोतस्त्वधःस्रोत उत्पद्यति नराधिप । नवमं सर्गमित्याहुरेतदार्जवकं बुधाः ॥

tiryaksrotastvadhaḥsrota utpadyati narādhipa | navamaṃ sargamityāhuretadārjavakaṃ budhāḥ

हे नराधिप, तिरछा स्रोत और नीचे की ओर का स्रोत उत्पन्न होता है। इसे वे नवाँ सर्ग कहते हैं, जो आर्जवक है—ऐसा ज्ञानी कहते हैं।

श्लोक 25 (12.315.25)

एते वै नव सर्गा हि तत्त्वानि च नराधिप । चतुर्विशतिरुक्तानि यथाश्रुतिनिदर्शनम् ॥

ete vai nava sargā hi tattvāni ca narādhipa | caturviśatiruktāni yathāśrutinidarśanam

हे नराधिप, ये नौ सर्ग हैं और चौबीस तत्त्व कहे गए हैं, जैसा श्रुति दिखलाती है।

श्लोक 26 (12.315.26)

अत ऊर्ध्वं महाराज गुणस्यैतस्य तत्त्वतः । महात्मभिरनुप्रोक्तां कालसङ्ख्यां निबोध मे ॥

ata ūrdhvaṃ mahārāja guṇasyaitasya tattvataḥ | mahātmabhiranuproktāṃ kālasaṅkhyāṃ nibodha me

हे महाराज, इसके आगे इस गुण के विषय में महात्माओं द्वारा बताई गई काल की गणना को यथार्थ रूप में मुझसे सुनो।

अध्याय 314अध्याय-सूचीअध्याय 316